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दुख-दर्द

चुनाव के लिए भड़के पत्रकार

देश के कई राज्यों के प्रेस संगठनों में उथल-पुथल मची हुई है। कहीं चुनाव को लेकर तो कहीं पत्रकार हित को लेकर। बी4एम लखनऊ, पटना, रायपुर और इलाहाबाद के प्रेस क्लबों-संगठनों की ताजी हलचल से आपको रूबरू कराने जा रहा है। शुरुआत करते हैं लखनऊ से। यहां मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति आजकल पत्रकारों के निशाने पर है। समिति पदाधिकारियों पर पत्रकार-हितों के विरोध में काम करने के गंभीर आरोप हैं। चुनाव न होने से भड़के पत्रकारों ने भड़ास4मीडिया को बताया कि समिति अध्यक्ष प्रमोद गोस्वामी तथा सचिव हेमन्त तिवारी ने अपना दो वर्ष का कार्यकाल गत 7 जुलाई 09 को पूरा कर लिया। अब पत्रकार चुनाव कराने की मांग कर रहे हैं पर समिति पदाधिकारी अभी चुनाव कराने के मूड में नहीं हैं। इन्हीं स्थितियों से क्षुब्ध होकर उपाध्यक्ष कुलसूम तल्हा ने गत दिनों अपने पद से इस्तीफा दे दिया। आरोप हैं कि समिति पदाधिकारी अपने विरोधियों को निशाना बनाने के लिए मुख्यमंत्री कार्यालय के एक वरिष्ठ अधिकारी का इस्तेमाल कर रहे हैं।

देश के कई राज्यों के प्रेस संगठनों में उथल-पुथल मची हुई है। कहीं चुनाव को लेकर तो कहीं पत्रकार हित को लेकर। बी4एम लखनऊ, पटना, रायपुर और इलाहाबाद के प्रेस क्लबों-संगठनों की ताजी हलचल से आपको रूबरू कराने जा रहा है। शुरुआत करते हैं लखनऊ से। यहां मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति आजकल पत्रकारों के निशाने पर है। समिति पदाधिकारियों पर पत्रकार-हितों के विरोध में काम करने के गंभीर आरोप हैं। चुनाव न होने से भड़के पत्रकारों ने भड़ास4मीडिया को बताया कि समिति अध्यक्ष प्रमोद गोस्वामी तथा सचिव हेमन्त तिवारी ने अपना दो वर्ष का कार्यकाल गत 7 जुलाई 09 को पूरा कर लिया। अब पत्रकार चुनाव कराने की मांग कर रहे हैं पर समिति पदाधिकारी अभी चुनाव कराने के मूड में नहीं हैं। इन्हीं स्थितियों से क्षुब्ध होकर उपाध्यक्ष कुलसूम तल्हा ने गत दिनों अपने पद से इस्तीफा दे दिया। आरोप हैं कि समिति पदाधिकारी अपने विरोधियों को निशाना बनाने के लिए मुख्यमंत्री कार्यालय के एक वरिष्ठ अधिकारी का इस्तेमाल कर रहे हैं।

अपने पूरे कार्यकाल में समिति पत्रकारों से ज्यादा सरकार के पक्ष में खड़ी नजर आई है। समिति अध्यक्ष, सचिव और कोषाध्यक्ष निजी कार्य सरकार से करवाते हैं, बदले में पत्रकारों को ‘ठीक’ करने के सुझाव सरकार को देते रहते हैं। प्रदेश सरकार द्वारा पत्रकारों के विरोध में उठाये गये हर कदम में समिति ने भी भरपूर सहयोग किया है। समिति के सुझाव पर सरकार ने पत्रकारों को मान्यता देने वाली नियमावली ही बदल डाली। नियमावली में ऐसे अंश जोड़े गये कि पत्रकार छोटे अखबार का हो या बड़े अखबार का, सरकार जब चाहे जिसकी मान्यता निरस्त कर सकती है। जबकि नियमावली का प्रमुख अंश यह था कि जो पत्रकार सरकार के पक्ष में पचास प्रतिशत से अधिक खबरें नहीं लिखेगा, उसकी मान्यता सरकार ले सकती है। वर्तमान समिति राज्य सरकार को भी रास आ रही है। हाल ही में मीडिया सेंटर में पत्रकारों की हो रही जासूसी पर जब पत्रकारों ने बवाल मचाया तो समिति ने मीडिया सेंटर को खत्म करने की सलाह सरकार को दे डाली। साथ ही पत्रकारों को बेघर करने का भी एक सुझाव मुख्यमंत्री कार्यालय को दिया गया है, जिसमें पत्रकारों को दिये गये सरकारी आवास नियम बनाकर वापस लेने पर विचार करने की बात कही गयी है। सुझाव है कि आवास केवल उन्हीं पत्रकारों को मिले जो सरकार समर्थक हों। नियम ऐसे हों कि पत्रकारों पर सरकारी आवास खाली कराने की तलवार हमेशा लटकती रहे। आरोप हैं कि समिति ने चुनाव कराने की मांग करने वाले कई वरिष्ठ पत्रकारों को सबक सिखाने की योजना बनाई है। समिति अध्यक्ष और सचिव ने अपने लिए आलीशान सरकारी आवास आवंटित करा लिए हैं।

‘देशबंधु’ के रिपोर्टर अनिल त्रिपाठी का कहना है कि लखनऊ में पत्रकारों के लिए आपातकाल जैसी स्थिति हो गई है। माया सरकार का पत्रकारों पर शिकंजा कसता जा रहा है। मीडिया सेंटर मुख्य जगह से हटाकर किनारे कर दिया गया है। पत्रकारों की मान्यता का मसला दो साल तक लंबित रखा गया। इसके बाद नई नियमावली लागू कर दी गई। हालात ये हैं कि अब माया सरकार के अधिकारी सर्टीफिकेट देकर बताएंगे कि कौन पत्रकार है, कौन नहीं है। संवाद समिति का काम सिर्फ प्रेस कांफ्रेस का आयोजन करना होता है, जबकि वे सरकार की गलत करतूतों में मददगार बन रहे हैं। बड़े अखबारों ने सरकार से भारी लाभ ले रखा है, इसलिए सरकार के गलत कार्यों को वे भी मूक सहमति दिए हुए हैं। वे सरकार के बूते खड़े किए गए अपने साम्राज्य को बचाने के लिए ऐसा कर रहे हैं। समिति चुनाव होने की कोई उम्मीद नहीं है। दस-पंद्रह पत्रकारों का कॉकश बाकी समुदाय को नुकसान पहुंचा रहा है। कोई मकान, कोई गाड़ी ले रहा है। उपजा, हिंदी समाचारपत्र सम्मेलन, मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति, सभी संगठनों के बड़े पदाधिकारी लाभ लेने में व्यस्त हैं। डेढ़ सौ फर्जी पत्रकारों की जांच होनी चाहिए, जिन्हें सचिवालय प्रशासन ने पास दिया है। पत्रकार दिलीप सिंह का कहना है कि मान्यता-प्राप्त संवाददाता समिति के पदाधिकारियों पर लगे आरोपों से हमारा कोई लेना-देना नहीं, हमारी मांग सिर्फ इतनी है कि चुनाव होने चाहिए।

इस पूरे मामले पर समिति सचिव हेमंत तिवारी का भड़ास4मीडिया से कहना है कि एक वर्ग ऐसा है, जिनके पास जर्नलिज्म का काम नहीं। जब राजनाथ सिंह इस समिति के अध्यक्ष थे, 17 साल तक चुनाव नहीं कराए गए। विजय शंकर पंकज अध्यक्ष, सुरेश बहादुर सिंह सचिव थे तो पांच साल तक चुनाव नहीं हुए। कष्ट है कि उनके कार्यकाल में पत्रकारों के हित में कोई काम नहीं किए गए। तिवारी दावा करते हैं कि पिछले दो साल में इस समिति ने राज्य मुख्यालय पर संवाददाताओं के लिए जितने कार्य पत्रकार-हित में किए हैं, चाहे उसका कोई पत्रकार मूल्यांकन कर ले। विगत दस वर्षों में भी इतने कार्य नहीं हुए थे। भड़ास4मीडिया की टीम खुद लखनऊ आकर देख ले कि ऐसा मीडिया सेंटर और किसी राज्य मुख्यालय में हो तो मैं पत्रकारिता करना छोड़ दूंगा। बनते समय मैंने खुद सौ बार निर्माण सामग्री की गुणवत्ता चेक की थी। पुराने सेंटर में दो कंप्यूटर थे, अब छह कंप्यूटर नेट व प्रिंटर सहित उपलब्ध हैं। पहली बार लाइब्रेरी, कांफ्रेंस हाल में विजुअल मीडिया के लिए आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं। दो-तीन साल पहले विधानभवन स्थित प्रेस रूम को जिन महानुभावों, पत्रकारों-गैरपत्रकारों ने देखा हो, वे कृपया वहां जाएं और वहां की सुविधा और स्वरूप पांच गुना बेहतर न पाएं तो मेरे शब्द निर्थक हैं। विधानभवन स्थित मुख्य भवन के प्रेस रूम में जहां कभी लोग बैठना गंवारा नहीं करते थे, उसे एसी, फर्नीचर आदि सुविधाओं से सुव्यस्थित कर दिया गया है। पहले न नेट, न कंप्यूटर था, न अखबार-पत्रिकाएं वहां मंगाई जाती थीं। पिछले चालीस वर्षों से सदन कार्यवाही के सीधे प्रसारण की वहां व्यवस्था नहीं थी। हमने कराई। फ्रीलांस फोटोग्राफरों को मान्यता का प्राविजन कराया। मैं पूछना चाहता हूं कि जब पत्रकारों के मसले पर समिति अध्यक्ष गोस्वामी के साथ जाकर विजयशंकर पांडेय से लगातार हम मिलते रहे, फिर काहे का बखेड़ा किया जा रहा है। हमारे चार लिखित हस्तक्षेप पत्र आज भी वहां देखे जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि समिति के चुनाव होंगे, हमे भय नहीं, लेकिन कई बातें कोर्ट में निर्णयाधीन हैं, उस पर फैसले साफ हो जाएं, कुछ लंबित व्यवस्थाएं नियमित हो जाएं, फिर चुनाव का स्वागत है। नियमावली में संशोधन पर लगातार सरकार को विरोध पत्र दिया गया है। आरोप लगाने वालों को अपने गिरेबां में भी झांक लेना चाहिए। जासूसी कैमरे लगाने की बात चेकिंग में गलत निकली। फिल्टर को कैमरा बता दिया गया। इस समिति के कार्यकाल से पहले पत्रकारों के हित में कितने काम संगठन ने कराए, सबको पता है।

इलाहाबाद भी बेचैन : यहां के प्रेस क्लब की भी इन दिनों कुछ वैसी ही दास्तान है। भड़ास4मीडिया को बताया गया है कि मशहूर पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी के नाम से स्थापित इलाहाबाद प्रेस क्लब अब कामर्शियल ठिकाना-सा बन चुका है। कॉकस और फर्जी पत्रकार हावी होते जा रहे हैं। प्रेस क्लब सचिव और अध्यक्ष इन हालातों पर खामोश और बेखबर बने हुए हैं। प्रेस क्लब का पिछले कई सालों से चुनाव नहीं हुआ है। सूत्रों के अनुसार यहां प्रेस कांफ्रेंस करवाने के लिए तीन से पांच सौ रुपये तक जमा करवाए जाते हैं, लेकिन इसका कोई हिसाब-किताब मिलना मुश्किल है। क्लब की कार्यकारिणी में भी वही लोग हावी हैं, जिनकी पत्रकार के रूप में खुद की कोई पहचान नहीं है। पत्रकारिता से उनका दूर-दूर तक कुछ लेना देना नहीं है। प्रेस क्लब और पत्रकार हितों के नाम पर सरकार, नेताओं, मंत्रियों, सांसदों, निजी कंपनियों से हर साल जो भी अनुदान, सामान मिलता है, वह सब भी औने-पौने कर दिया जाता है। प्रेस क्लब की सदस्यता सूची में भी उन्हीं पत्रकारों को जोड़ा जाता है, जो पदाधिकारियों के ‘अपने’ जैसे हों।

रायपुर प्रेस क्लब :  रायपुर प्रेस क्लब का चुनाव घोषित कर दिया गया है। अध्यक्ष अनिल पुसदकर ने बताया कि 23 अगस्त को चुनाव कराए जाएंगे। ज्ञात हो कि इससे पहले पत्रकार शंकर पांडेय ने खुद ही चुनाव कराने की घोषणा कर दी थी और चुनाव की तारीख 19 जुलाई मुकर्रर कर दिया। यह ऐलान बिना कार्यकारिणी की मीटिंग के किया गया था, इसलिए चुनाव नहीं हो पाया। अब अध्यक्ष अनिल पुसदकर ने कार्यकारिणी की मीटिंग के बाद प्रेस क्लब चुनाव कराने का विधिवत तरीके से ऐलान कर दिया है। सूत्रों का कहना है कि रायपुर प्रेस क्लब भी कई तरह के विवादों का केंद्र रहा है। यहां चुनाव के दौरान काफी झगड़ा-लड़ाई होता रहा है। तीन साल पहले जब चुनाव हुआ था, उस समय सदस्यता सूची नहीं बनी थी। चुनाव होने के बाद जब अनिल पुसदकर जीते तो कुछ लोग विरोध में कोर्ट में चले गए। वह मामला अब भी विचाराधीन है।

पटना प्रेस क्लब गठन का रास्ता साफ :  पटना में प्रेस क्लब के गठन का रास्ता साफ हो गया है। यहां के पत्रकारों की कोशिशों के बाद राज्य सरकार ने जमीन का आवंटन कर दिया है। अब अगस्त के दूसरे सप्ताह में इसके उदघाटन की तैयारी है। पत्रकार इसके लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से संपर्क में हैं। इसका नाम ‘पटना प्रेस क्लब’ होगा। फिलहाल प्रेस क्लब के ढ़ांचे को तैयार करने के लिए पांच सदस्यीय कमेटी का गठन हुआ है। कमेटी में गायत्री शर्मा (टाईम्स आफ इंडिया), नीतीश चंद्र (इंडिया टीवी), श्रीकांत प्रत्यूश (जी न्यूज), संजय सिंह (द ट्रिब्यून) और मुअज्जम हैदरी (उर्दू अखबार, संगम) हैं। प्रेस क्लब के गठन के बाद चुनाव को संचालित करने के लिए भी तीन सदस्यीय निर्वाचन समिति बनी है। इसमें दो पत्रकार अरुण वर्मा (पीआईबी) एवं निवेदिता झा सहित सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के एक पदाधिकारी को शामिल किया गया है। प्रेस क्लब में सिर्फ उन्हीं लोगों को सदस्यता दी जानी है, जो राज्य सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं या फिर जिनका संस्थान में प्रॉविडेंट फंड कटता है। कमेटी के सदस्य नीतीश चंद्र ने बताया कि सदस्यता संबंधी फार्म निःशुल्क मिलेंगे। इसे सूचना एवं जनसंपर्क विभाग में रखा गया है। अभी तक 600 पत्रकारों ने आवेदन किया है। फार्म जमा करने की तारीख बीत चुकी है, मगर अब भी कई पत्रकार फार्म जमा कर रहे हैं। पांच सदस्यीय समिति द्वारा सभी फार्मों की स्क्रूटनी कर सदस्यों की सूची तैयार की जाएगी। अंतिम तौर पर सदस्यों की सूची जारी होने के बाद वोटर लिस्ट को जारी किया जाएगा और चुनाव की प्रक्रिया संपन्न होगी। फिलहाल सदस्यता शुल्क तय नहीं किया गया है। इसके लिए उदघाटन का इंतजार किया जा रहा है। प्रेस क्लब के लिए राज्य सरकार ने गांधी मैदान के पास बिस्कोमान के बगल में एक बड़े सरकारी बंगले का आवंटन किया है। हाल तक यह बंगला सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के अधिकार में था। राज्य सरकार की तरफ से ही बंगले की मरम्मत एवं रंग-रोगन का काम चल रहा है। प्रेस क्लब को उपलब्ध होने वाली सुविधाओं की बाबत उन्होंने बताया कि इसमें कैंटीन होगी। यहां काफी अधिक स्पेस है और भविष्य में अन्य सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जाएंगी। हालांकि, प्रेस क्लब के गठन को लेकर पटना के पत्रकारों के आपस में ही दो गुट बन गए थे। इसके चलते इसका गठन लगातार टलता जा रहा था।

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