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पुण्य प्रसून वाजपेयी का माफीनामा

दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित आलेखइशरत जहां के फर्जी मुठभेड़ को सनसनीखेज बनाने के हमारे पेशे के आचरण पर उंगली उठायी गयी थी. एक न्यायिक अधिकारी की रिपोर्ट आने के बाद भड़ास4मीडिया में हमने भी इस मुद्दे पर बहस शुरू की थी. एक लेख में कहा गया था कि सनसनी फैलाने वाले चैनल माफी मांगें. उस वक़्त के सबसे लोकप्रिय चैनल में बड़ी जिम्मेदारी के पद पर काम कर रहे एक बड़े पत्रकार ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि “इशरत, हमें माफ़ कर दो”. पत्रकारिता के पेशे में ऐसे बहुत कम लोग हैं जो अपनी गलती को ऐलानियाँ स्वीकार कर सकें. बहुत ज़्यादा हिम्मत, बहादुरी और पेशे के प्रति प्रतिबद्धता चाहिए ऐसा करने के लिए. देश के बड़े टीवी पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी ने न केवल माफी माँगी है बल्कि उसे सार्वजनिक कर दिया है.

दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित आलेखइशरत जहां के फर्जी मुठभेड़ को सनसनीखेज बनाने के हमारे पेशे के आचरण पर उंगली उठायी गयी थी. एक न्यायिक अधिकारी की रिपोर्ट आने के बाद भड़ास4मीडिया में हमने भी इस मुद्दे पर बहस शुरू की थी. एक लेख में कहा गया था कि सनसनी फैलाने वाले चैनल माफी मांगें. उस वक़्त के सबसे लोकप्रिय चैनल में बड़ी जिम्मेदारी के पद पर काम कर रहे एक बड़े पत्रकार ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि “इशरत, हमें माफ़ कर दो”. पत्रकारिता के पेशे में ऐसे बहुत कम लोग हैं जो अपनी गलती को ऐलानियाँ स्वीकार कर सकें. बहुत ज़्यादा हिम्मत, बहादुरी और पेशे के प्रति प्रतिबद्धता चाहिए ऐसा करने के लिए. देश के बड़े टीवी पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी ने न केवल माफी माँगी है बल्कि उसे सार्वजनिक कर दिया है.

ध्यान देने की बात यह है कि उनकी माफी को उनकी व्यक्तिगत गलती की माफी मांगने की गलती करने की ज़रूरत नहीं है. वे इशरत जहां मामले के लिए व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार नहीं है. लेकिन वे पत्रकारिता की गरिमा को समझते हैं. इसलिए हमें उन पर गर्व है. पुण्य प्रसून वाजपेयी का माफीनामा दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित हुआ है, जिसे हम वहां से साभार लेकर यहां प्रकाशित कर रहे हैं.

-एडिटर, भड़ास4मीडिया


 

इशरत हमें माफ कर दो

पुण्य प्रसून बाजपेयी

15 जून 2004 को सुबह-सुबह जब अहमदाबाद के रिपोर्टर ने टेलीफोन पर ब्रेकिंग न्यूज कहते हुये यह खबर दी कि आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तोएबा में लड़कियां भी जुड़ी हैं और गुजरात पुलिस ने पहली बार लश्कर की ही एक लड़की को एनकांउटर में मार गिराया है, तो मेरे जेहन में तस्वीर यही उभरी कि कोई लड़की हथियारों से लैस किसी आतंकवादी की तर्ज पर किसी मिशन पर निकली होगी और रास्ते में पुलिस आ गयी होगी, जिसके बाद एनकाउंटर। लेकिन अहमदाबाद के उस रिपोर्टर ने तुरंत अगली लकीर खुद ही खींच दी। बॉस, यह एक और फर्जी एनकाउंटर है। लेकिन लड़की। यही तो समझ नहीं आ रहा है कि लड़की को जिस तरह मारा गया है और उसके साथ तीन लड़कों को मारा गया है, जबकि इस एनकाउंटर में कहीं नहीं लगता कि गोलियां दोनों तरफ से चली हैं। लेकिन शहर के ठीक बाहर खुली चौड़ी सड़क पर चारों शव सड़क पर पड़े हैं। एक लड़के की छाती पर बंदूक है। कार का शीशा छलनी है। अंदर सीट पर कुछ कारतूस के खोखे हैं और एक रिवॉल्वर पड़ी है। साथ ही पुलिस कमिश्नर खुद कह रहे हैं कि चारो के ताल्लुकात लश्कर-ए-तोएबा से हैं।

घटना स्थल पर पुलिस कमिशनर कौशिक, क्राइम ब्रांच के ज्वाइंट पुलिस कमिश्नर पांधे और डीआईजी वंजारा खुद मौजूद हैं, जो लश्कर का कोई बड़ा गेम प्लान बता रहे हैं। ऐसे में एनकाउंटर को लेकर सवाल खड़ा कौन करे? 6 बजे सुबह से लेकर 10 बजे तक यानी चार घंटो के भीतर ही जिस शोर -हंगामे में लश्कर का नया आंतक और निशाने पर मोदी के साथ हर न्यूज चैनल के स्क्रीन पर आतंकवाद की मनमाफिक परिभाषा गढ़नी शुरू हुई, उसमें रिपोर्टर की पहली टिप्पणी फर्जी एनकाउंटर को कहने या इस तथ्य को टटोलने की जहमत करें कौन? यह सवाल खुद मेरे सामने खड़ा था। क्योंकि लड़की के लश्कर केसाथ जुड़े तार को न्यूज चैनलों में जिस तरह भी परोसा जा रहा था, उसमें पहली और आखिरी हकीकत यही थी कि एक सनसनाहट देखने वाले में हो और टीआरपी बढ़ती चली जाए। लेकिन एक खास व्यवस्था में किस तरह हर किसी की जरूरत कमोवेश एक-सी होती चली जाती है, और राज्य की ही अगर उसमें भागीदारी हो जाए तो सच और झूठ के बीच की लकीर कितनी महीन हो जाती है, यह इशरत जहां के एनकाउंटर के बाद कई स्तरों पर बार-बार साबित होती चली गयी।

एनकाउंटर के बाद मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब पुलिस प्रशासन की पीठ थपथपायी, तब मोदी राज्य व्यवस्था को आतंकवाद के खिलाफ मजबूती प्रदान करने वाले किसी नायक सरीखे दिखे। लड़की के लश्कर के संबंध को लेकर जब मोदी ने एक खास समुदाय को घेरा, तो आंतकवाद के खिलाफ मोदी हिंदुत्व के नायक सरीखे लगे। इस नायकत्व पर उस वक्त किसी भी राजनीतिक दल ने उंगली उठाने की हिम्मत नहीं की। क्योंकि जो राजनीति उस वक्त उफान पर थी, उसमें पाकिस्तान या कहें सीमा पार आतंकवाद का नाम ऑक्सीजन का काम कर रहा था। यह हथियार सत्ताधारियों के लिए हर मुद्दे को अपने अनुकूल बनाने का ऐसा मंत्र साबित हो रहा था जिस पर कोई अंगुली उठाता, तो वह खुद आतंकवादी करार दिया जा सकता था। कई मानवाधिकार संगठनों को इस फेरहिस्त में एनडीए के दौर में खड़ा किया भी गया। इसका लाभ कौन कैसे उठाता है, इसकी भी होड़ मची। इसी दौर में नागपुर के संघ मुख्यालय को जिस तरह आतंकवादी हमले से बचाया गया, उसने देशभर में आतंकवाद के फैलते जाल पर बहस शुरू की, लेकिन नागपुर में संघ मुख्यालय जिस घनी बस्ती में मौजूद है, उसमें उसी बस्ती यानी महाल के लोगों को भी समझ नहीं आया कि कैसे मिसाइल सरीखे हथियार से लैस होकर कोई उनकी बस्ती में घुस गया और इसकी जानकारी उन्हें सुबह न्यूज चैनल चालू करने पर मिली। इस हमले को भी फर्जी कहने वाले मानवाधिकार कार्यकर्ताओ का पुलिस ने जीना मुहाल कर दिया। सुरेश खैरनार नामक एक कार्यकर्ता तो दिल्ली में तमाम न्यूज चैनलो में हमले की जांच रिपोर्ट को दिखाने की मन्नत करते हुये घूमता रहा, लेकिन किसी ने संघ हेडक्वार्टर की रिपोर्ट को फर्जी कहने की हिम्मत नहीं की, क्योंकि शायद इसे दिखाने का मतलब एक अलग लकीर खिंचना होता।

जाहिर है गुजरात हाईकोर्ट ने कुछ दिुनों पहले ही तीन आईएएस अधिकारियों को इस एनकाउंटर का सच जानने की जांच में लगाया है। लेकिन किसी भी घटना के बाद शुरू होने वाली मजिस्ट्रेट जांच की रिपोर्ट ने ही जिस तरह इशरत जहां के एनकाउंटर को पुलिस मेडल पाने के लिए की गयी हत्या करार दिया है, उसने एक साथ कई सवालों को खड़ा किया है। अगर मजिस्ट्रेट जांच सही है, तो उस दौर में पत्रकारों और मीडिया की भूमिका को किस तरह देखा जाए। खासकर कई रिपोर्ट तो मुबंई के बाहरी क्षेत्र में, जहां इसरत रहती थी, उन इलाको को भी संदेह के घेरे में लाने वाली बनी। उस दौर में मीडिया रिपोर्ट ने ही इशरत की मां और बहन का घर से बाहर निकलना दुश्वार किया। उसको कौन सुधारेगा? सवाल है कि मजिस्ट्रेट जांच के बाद जो विवाद उभरे हैं, उनके बारे में फैसला कब तक होगा? लेकिन इसका इंतजार में हम फिलहाल इतना तो कह ही सकते हैं-इशरत हमें माफ कर दो ।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं

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