आईबीएन7 व सुदर्शन पर हुई पंचायत देखें-सुनें

सुदर्शन न्यूज पर प्रसारित लाइव शो में अपनी बात रखते मनोज रघुवंशी और यशवंत सिंह
सुदर्शन न्यूज पर प्रसारित लाइव शो में अपनी बात रखते मनोज रघुवंशी और यशवंत सिंह
नीरा राडिया टेप कांड ने भ्रष्ट मीडिया की पोल खोल कर रख दी है. सत्ता और कारपोरेट की दलाली के जरिए टर्नओवर बढ़ाने वाले, भयंकर लाभ कमाने वाले स्वनामधन्य मीडिया हाउसों की ब्रांड इमेज को तगड़ा झटका लगा है. अपने अपने चैनलों अखबारों के लिए ब्रांड बन चुके कई पत्रकारों के चेहरों से नकाब उठ चुका है. जाहिर है, हर बड़े कांड के बाद बहसों का जो दौर शुरू होता है, इस नीरा राडिया कांड के बाद भी शुरू हुआ है. हेडलाइंस टुडे, एनडीटीवी के बाद अब आईबीएन7 ने भी राडिया और मीडिया के मुद्दे पर एक शो ”क्या कारपोरेट का खिलौना बनने लगे हैं पत्रकार?” का आयोजन कल चैनल पर किया.

चैनल के मैनेजिंग एडिटर आशुतोष खुद ही इस शो को होस्ट कर रहे थे और इसमें भास्कर के श्रवण गर्ग और साधना के एनके सिंह शरीक हुए. राजदीप सरदेसाई ने भी अपने विचार रखे. आईबीएन7 ने नतीजे में बताया कि पत्रकारों को सत्ता और कॉरपोरेट के हाथ का खिलौना बनने से रोकना होगा. पर यह नहीं बताया कि जब पत्रकारिता टीआरपी को ध्यान में रखकर होने लगी है, लाभ कमाने के मकसद से होने लगी हैं, सरकार और उद्यमियों के हितों की सुरक्षा करते हुए होने लगी है तो आखिर कैसे पत्रकारों को सत्ता व कारपोरेट के हाथ का खिलौना बनने से रोका जा सकता है. सुदर्शन न्यूज नामक चैनल ने अपने यहां लाइव परिचर्चा का आयोजन किया जिसमें वरिष्ठ पत्रकार मनोज रघुवंशी और मैं (यशवंत) शरीक हुआ. होस्ट किया इस चैनल के मालिक सुरेश चाह्वाणके ने, ‘बिंदास बोल’ नामक कार्यक्रम में.

कल दिल्ली स्थित प्रेस क्लब आफ इंडिया में भी विचार मंथन हुआ. इन सभी बहसों, चर्चाओं, परिचर्चाओं का स्वागत किया जाना चाहिए लेकिन यह भी देखते रहना है कि इन बहसों के जरिए हम कुछ नतीजे भी निकाल पा रहे हैं या फिर कांव कांव करते हुए कुछ दिन बाद किसी नए मुद्दे पर बहसियाने लगेंगे. पूरी बातचीत जो हो रही है, वह कुछ अधूरी सी है. वजह

आईबीएन7 पर परिचर्चा में राजदीप, आशुतोष, श्रवण और एनके
आईबीएन7 पर परिचर्चा में राजदीप, आशुतोष, श्रवण और एनके
यह कि बीमारी के मूल कारणों की तलाश की बजाय हम बीमारी होने पर दुखी दिख रहे हैं और यह पता लगा रहे हैं कि कौन कौन बीमार हो गया है.

आर्थिक उदारीकरण के जिस मॉडल को अपने देश ने अपनाया है, या यूं कहें कि अमेरिका व वर्ल्ड बैंक द्वारा तैयार आर्थिक माडल को दुनिया के ज्यादातर देशों ने अपनाया है, उसी ने वह रास्ता दिखाया जिस पर चलते हुए हम, हमारी संस्थाएं, हमारे नेता, हमारे नौकरशाह, हमारे पत्रकार दिन प्रतिदिन भ्रष्ट से भ्रष्टतम होते जा रहे हैं. इस आर्थिक माडल में कोई पाजिटिव वैल्यू सिस्टम नहीं है. वैल्यू सिस्टम सिर्फ एक है, ज्यादा से ज्यादा पैसे कमाते जाना, चाहे नेक रास्ते से या अनेक रास्ते से. अनेक रास्तों से कमाते रहने, माल बटोरते जाने की जिद के कारण गलत-सही का भेद खत्म हो चुका है. साध्य और साधन, दोनों पैसा बटोरना हो गया है.

श्रम, मानवीय मूल्य, ईमानदारी, सच्चाई, त्याग जैसे मूल्य धारण करने वाले लोगों को वर्तमान आर्थिक माडल खराब लोगों में शुमार करता है क्योंकि ये लोग पूंजी, बाजार से अप्रभावित होते हैं या कहिए, इसके विरोध में होते हैं. वे किसी भी आर्थिक माडल, शासन का मकसद ज्यादा से ज्यादा लोगों को सुख, शांति, समृद्धि देना मानते हैं, मानवीय मूल्यों को जीने वालों को प्रोत्साहित करना मानते हैं. पर दुख यह कि आज जो ईमानदार होता है, बड़े मानवीय मूल्यों के साथ जीता है, वह समाज और सिस्टम द्वारा पागल आदमी घोषित कर दिया जाता है, उससे अछूतों की तरह व्यवहार किया जाता है, उसे व्यावहारिक नहीं माना जाता, उसे किसी दूसरी दुनिया का आदमी मान लिया जाता है. और, ईमानदार लोगों के पास, जो शासन-सिस्टम या संस्थाओं के अंग नहीं हैं, इस आर्थिक माडल में स्वस्थ तरीके से पैसे कमाने, जीने खाने के लिए, परिवार चलाने के लिए पैसे पाने के रास्ते नहीं के बराबर हैं. लंबी बहस है, बड़ा मुद्दा है ये.

मीडिया सहित किसी भी संस्था में फैल रहे भ्रष्टाचार के घुन पर बड़े फलक पर बात होनी चाहिए न कि शोशेबाजी व नारेबाजी के जरिए पूरे मसले को जनरलाइज कर देना चाहिए. मैं निजी तौर पर पहले भी मानता रहा हूं और इन घटनाक्रमों के बाद मेरी ये धारणा और पुष्ट हुई है कि परंपरागत मीडिया नफे-नुकसान के आर्थिक खेल में फंसकर पत्रकारिता से भटक चुकी है, और उनके भटके हुए पत्रकार अब जनता के हितों के लिए सत्ता, शासन व कारपोरेट से टकराने की जगह उनसे गलबहियां डालने में लगे हुए हैं, और, रास्ता दिखाने का काम नई मीडिया करेगी, नए मीडिया के लोग करेंगे क्योंकि नई मीडिया के संचालन में खर्च बहुत कम है, संचालन करने वाली टीम की जरूरत बहुत कम होती है, हर आदमी के पास न्यू मीडिया के जरिए पत्रकारिता करने का विकल्प रहेगा. विकीलीक्स ने साबित कर दिया है. भड़ास4मीडिया ने भी साबित किया है.

इन बातों को मैंने सुदर्शन न्यूज पर हुए लाइव शो में भी रखा. आइए, सुदर्शन न्यूज और आईबीएन7 पर दिखाए गए प्रोग्राम के वीडियो को देखें. नीचे दिए गए शीर्षकों पर क्लिक करें.

उम्मीद करते हैं कि इन बहसों को देख-सुनकर दूरदराज के पत्रकार साथी भी बहस में शरीक होंगे और अपनी ईमानदार राय से सभी को अवगत कराएंगे. इसके लिए नीचे दिए गए कमेंट बाक्स का सहारा ले सकते हैं.  राडिया के टेपों और पत्रकारों से उसकी बातचीत के बारे में,  भड़ास4मीडिया ने बहुत पहले 7 मई को खबर का प्रकाशन किया. उसके बाद लगातार खबरें प्रकाशित होती रहीं. बरखा और वीर के दामन दागदार होने की बातें लिखी गईं. पर तब मीडिया के सारे दिग्गज चुप्पी साधे रहे, इन खबरों को ही संदेह की नजर से देखते रहे, वह भी तब जबकि हम लोगों ने सीबीआई और आयकर विभाग के बीच नीरा राडिया, पत्रकारों से बातचीत, ए राजा आदि को लेकर हुए पत्राचार के डाक्यूमेंट्स को भी प्रकाशित किया था.

अब जब टेप सामने आ गए हैं और कुछ अंग्रेजी मैग्जीनों ने इससे संबंधित खबरों को छापना शुरू किया तो सारे मीडिया वाले जगे हुए, चिंतित मुद्रा में बहस करते दिख रहे हैं. आठ महीने पहले मई में ये लोग कहां सो रहे थे. तब इन्हें उम्मीद थी कि मामला सामने नहीं आ सकेगा लेकिन न्यू मीडिया के लोगों के लगातार प्रयास के चलते यह मुद्दा फोकस में आ ही गया. ये जीत न्यू मीडिया की है और इस जीत के जरिए न्यू मीडिया ने परंपरागत मीडिया को अपने गिरबां में झांकने का मौका दिया है लेकिन हम सबको पता है कि कुछ होना जाना नहीं है क्योंकि बाजार की आंधी में वैश्विक उदारीकृत आर्थिक सिस्टम के साथ कदमताल में परंपरागत मीडिया के लोग जाने कब का जनता का हाथ छोड़ चुके हैं, पूंजीपतियों और नेताओं के संरक्षण में पल-बढ़ कमा-खा रहे हैं. लेकिन निराश होने की जरूरत नहीं है.

हमारे दौर में अगर ढेरों खलनायक हैं तो नायक भी दिख रहे हैं, बन रहे हैं. विकीलीक्स के असांज एक महानायक हैं. महादैत्य अमेरिकी के पिछवाड़े सुतली बम दाग रखा है इस शख्स ने जिसकी चिलचिलाहट से दुनिया भर में धमाल मचा हुआ है. कभी हैकर रहे असांज आज महानायक हैं, उसी तरह जैसे कभी डाकू रहे बाल्मीकि बहुत बड़े संत हुए. मैं यकीन करने लगा हूं कि जिन्होंने ने नरक नहीं भोगा, जिन्होंने गलत नहीं देखा-किया, वे अच्छे के प्रति भयंकर रूप से कमिटेड नहीं हो पाएंगे. कुछ उसी तरह जैसे हम रात के बिना दिन की कल्पना नहीं कर सकते, अगर दिन ही दिन हो तो दिन का एहसास होना खत्म हो जाएगा. ये बातें थोड़ी आध्यात्मिक हैं लेकिन बिलकुल सच हैं. जीवन के दुखों, जीवन के संघर्षों, जीवन की गल्तियों से लिपटे-चिपटे लोगों में बेहद ईमानदार, साहसी और श्रेष्ठ बनने की ज्यादा संभावना होती है बनस्पत जो खुद को जन्मना महान बताते दिखते रहते हैं.

और, ऐसे जन्मना महान लोगों की जब पोल खुलती है तो हमारे दिलों में कायम उनके नायकत्म की छवि टूटती है और हम दुखी होते हैं, निराश होते हैं, अवसाद से ग्रस्त होते हैं. इसीलिए मुझे लगता है कि अगर बरखा दत्त, प्रभु चावला, वीर सांघवी…. सभी आरोपी पत्रकार अपनी गलती मान लें, और, आगे बढ़ें तो उनके अंदर का पत्रकार ज्यादा मजबूत व महान बनेगा. पर वो कहा जाता है न कि गलती करना बेहद आसान होता है लेकिन उसे महसूस कर पाना, आगे से वैसा न कर पाने का जज्बा कायम करना, गलती के लिए माफी मांगी लेना बेहद मुश्किल और बड़ा काम होता है.

जब आप गलती महसूस करने लगते हैं, अपराध बोध से ग्रस्त होते हैं तो आपके अंदर का मन आधा ईमानदार हो चुका होता है और जब माफी मांग लेते हैं तो पूरी तरह ईमानदार हो चुके होते हैं. लेकिन ये माफी स्ट्रेटजिक न हो, दिखावे के लिए न हो, अंतरमन से आया होना चाहिए. पर थेथरई की हद देखिए, सभी आरोपी पत्रकार किंतु परंतु लेकिन इफ बट करते हुए अपने-अपने चैनलों में अपने-अपने मीडिया हाउसों में अपने-अपने धंधे में लगे हुए हैं.

इसीलिए कह रहा हूं कि इनको एक्सपोज करने के साथ-साथ अब हम लोगों को न्यू मीडिया को मजबूत करने की जरूरत है. वेब माध्यमों के जरिए पत्रकारिता के मिशन व आदर्श को आगे बढ़ाने की जरूरत है, जनता के सरोकार को जीने की जरूरत है. इससे कोई फरक नहीं पड़ता कि मीडिया के नाम की मलाई वो खा रहे हैं और मीडिया के नाम के दुख हम उठा रहे हैं. मिशनरी लोग जिस दौर में भी रहे हों, वो संघर्षों व दुखों को ही अपना आभामंडल मानते हैं और इस आभामंडल को वो इंज्वाय करते हैं.

हम दुखों, चुनौतियों, संघर्षों को अगर इंज्वाय नहीं कर पाते तो तय मानिए, हमें भी आगे पीछे कभी न कभी नीरा राडियाओं से संपर्क संबंध बनाने की जरूरत महसूस होगी और मौका मिलते ही हम संबंध बनाकर अपने दुखों, चुनौतियों, संघर्षों को टाटा बाय बाय बोल देंगे. सच कहूं तो अभाव में जीने वाला पत्रकार ही ज्यादा संजीदगी से जनता के दुखों को महसूस कर पाता है. और उन दुखों से निजात दिलाने के बारे में नीति-निर्माण के संबंध में सोच पाता है. ये अभाव व चैलेंज ही समाज को बहुआयामी तरीके से समझने में मदद करता है. कांच के घरों में रहने वाले जर्नलिस्ट बदलते समाज और बदलते भारत में भूखे पेट सोने वालों के बारे में कुछ न महसूस कर पाएंगे, सो, वो क्या दिखाएंगे, लिख पाएंगे, इसे समझा जा सकता है.

बैगर जमीनी इनपुट के कांच के घरों रहने वाले, लाखों की सेलरी पाने वाले जर्नलिस्ट जो लिखेंगे, दिखाएंगे, वो ब्यूरोक्रेट्स वाली निष्प्राण आंकड़ेबाजी ज्यादा होगी, असली संवेदना व जेनुइनिटी का बिलकुल अभाव होगा. बल्कि कहूं कि कांच के घरों में रहने वाले जर्नलिस्ट सत्ता, कारपोरेट के आक्टोपसी शोषक पंजों को मानवीय बताने में ज्यादा सन्नध-उद्धत रहते हैं, ताकि उनके कांच के घरों – दफ्तरों में पर चांदी-सोने की पालिश चढ़ सके, तो गलत न होगा और इसी कारण राडियाओं बरखाओं का गठजोड़ होता है और सब जानबूझकर भी डा. प्रणय राय जैसे शख्स को चुप रह जाना पड़ जाता है, राजदीप सरदेसाई को आरोपियों के बचाव में बोलना पड़ता है और सवाल उठाने वालों पर सवाल उठाने को मजबूर होना पड़ता है.

बहुत सिंपल सी गणित है. कारपोरेट घरानों सरीखे होते जा रहे परंपरागत मीडिया हाउसों को कंटेंट की भावुक दुकान के बल पर जिससे आम जन को पटाया जा सके, ज्यादा से ज्यादा टर्नओवर बढ़ाने के लिए नेताओं और उद्योगपतियों को रिझाना पड़ता है और इसी उलटबांसी में राडियाओं बरखाओं को गठजोड़ करने को मजबूर होना पड़ता है. इस गठजोड़ पर चिंता करने की बजाय गठजोड़ पैदा करने वाली परिस्थितियों को दूर करने के लिए जुटना पड़ेगा और कोई मीडिया हाउस मुनाफे वाली अपनी इंटरनल इकानामी को त्यागने को राजी नहीं होगा, सो यह खेल तमाशा इसी तरह जन्म-जन्मांतर तक चलता रहेगा. इतिश्री मीडिया अध्यायम राडिया राडारम जनता सन्निपातम चहुंओर मातम… नमस्कारम…..

यशवंत

एडिटर

भड़ास4मीडिया

फोन- 09999330099 मेल- yashwant@bhadas4media.com

Comments on “आईबीएन7 व सुदर्शन पर हुई पंचायत देखें-सुनें

  • yashwant ji aap sahi channel pe, sahi karyakram me gaye the, bindas bol me aap apani site ki tarah hi bindas bol rahe the our manoj ji ne ese char chand lagaye. suresh ji to hamesha hi rang me rahate hai our lagata hai ki koi radia ya barakha unki our darshako ke samane khadi hai.
    bohat achha program huwa.
    bhagawan desk ko bachaye

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  • Amitabh Tripathi says:

    This whole expose has put secularism in India before crisis. All journalists who have been exosed were great champion for secularism and doing crusade for secularism. :D:D:D:D:D:D:D

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  • zareen siddiqui says:

    yaswantji namaskar neera radiya veer sanghvi ka pura mamala aur asli chehara ab sabke samne hai matlub saaf hai media bhi paak saaf nahi hai aaj bhi noida me office khul rahe hai aur chennel ki id chand rupyo me bechi ja rahi hai dukh ke sath aapko baata raha ho keis dhande me kai naami giraami patrkar bhi saamil hai aaj jiski jeb bhari hai wo jurnalist hai aur unke boss hote hai bilder ya mafiya ya corpet gharano kr malik aise me kaha ki patrkariya jivet rahegi ….zareen siddiqui raipur

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  • zareen siddiqui says:

    channel aur patrkar ki dukan abhi badastor lagi hui hai 2500 se 25000 me patrkar 5000 me channel id two lakh mr beuro chief chauthe stambh ke thekedaar hai mafiya bilder, aur unke liyye kaam kare rahe hai tathakathit patrkar kya hoga …iska anjam ….zareen siddiqui raipur

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