Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

कहिन

राजेंद्र माथुर : हिंदी पत्रकारिता के नायक

पुण्यतिथि (9 अप्रैल, 1991) पर विशेष

आजादी के बाद की हिंदी पत्रकारिता में उन जैसा नायक खोजे नहीं मिलता। राजेंद्र माथुर सही अर्थों में एक ऐसे लेखक, विचारक और संपादक के रूप में सामने आते हैं जिसने हिंदी पत्रकारिता को समकालीन विमर्श की एक सार्थक भाषा दी। उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को वह ऊंचाई दी जिसका वह एक अरसे से इंतजार कर रही थी। राष्ट्रीय एवं वैश्विक संदर्भों में जिस तरह से उन्होंने हिंदी को एक सामर्थ्य का बोध कराया वह उल्लेखनीय है। 7 अगस्त, 1935 को मध्य प्रदेश के धार जिले की बदनावर तहसील में जन्मे राजेंद्र माथुर की प्राथमिक शिक्षा धार में ही हुई। इंदौर से उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर की उपाधि हासिल की। श्री माथुर को अंग्रेजी साहित्य और दर्शन में बहुत रूचि थी।

पुण्यतिथि (9 अप्रैल, 1991) पर विशेष

आजादी के बाद की हिंदी पत्रकारिता में उन जैसा नायक खोजे नहीं मिलता। राजेंद्र माथुर सही अर्थों में एक ऐसे लेखक, विचारक और संपादक के रूप में सामने आते हैं जिसने हिंदी पत्रकारिता को समकालीन विमर्श की एक सार्थक भाषा दी। उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को वह ऊंचाई दी जिसका वह एक अरसे से इंतजार कर रही थी। राष्ट्रीय एवं वैश्विक संदर्भों में जिस तरह से उन्होंने हिंदी को एक सामर्थ्य का बोध कराया वह उल्लेखनीय है। 7 अगस्त, 1935 को मध्य प्रदेश के धार जिले की बदनावर तहसील में जन्मे राजेंद्र माथुर की प्राथमिक शिक्षा धार में ही हुई। इंदौर से उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर की उपाधि हासिल की। श्री माथुर को अंग्रेजी साहित्य और दर्शन में बहुत रूचि थी।

पढ़ाई पूरी होने के पहले ही 1955 से उन्होंने इंदौर के अखबार नई दुनिया में लिखना शुरू कर दिया था। साठ के दशक में उनका स्तंभ ‘पिछला सप्ताह’ काफी लोकप्रिय हो गया था। 1970 तक वे इंदौर के एक कालेज में अंग्रेजी साहित्य का अध्यापन करते रहे और फिर पूरी तरह से पत्रकारिता के प्रति समर्पित हो गए। 1980 में वे द्वितीय प्रेस आयोग के सदस्य मनोनीत किए गए। 1981 में वे नई दुनिया का प्रधान संपादक बने। इसी तरह एक सफल पारी का निर्वहन करने के बाद अक्टूबर 1982 में वे दिल्ली से प्रकाशित नवभारत टाइम्स के संपादक बने। राजेंद्र माथुर की पूरी पत्रकारीय यात्रा में विचारों की जगह साफ दिखाई देती है।

साहित्य और पत्रकारिता की जिस तरह की जुगलबंदी आजादी के आंदोलन के दौरान ही कायम हो गयी थी। प्रायः वे ही पत्रकार एवं संपादक हिंदी की मुख्यधारा की पत्रकारिता का नेतृत्व कर रहे थे जो साहित्यकार भी थे। हिंदी पत्रकारिता के नायकों में इसीलिए साहित्यकार पत्रकारों की एक लंबी परंपरा देखने को मिलती है। इसके चलते तमाम संपादकों ने गति न होते हुए भी साहित्य लिखने की कोशिश की, जबकि यह कर्म एक विशेष कौशल की मांग करता है। राजेंद्र माथुर का ऐसे समय में  राष्ट्रीय पत्रकारिता के फलक पर अवतरण एक ऐसे नायक की तरह हुआ जिसने साहित्य से इतर पत्रकारिता की भाषा को न सिर्फ संबल दिया वरन यह साबित भी किया कि पत्रकारिता एक अलग किस्म का कौशल है और यशस्वी संपादक होने के लिए साहित्य में गति होना अनिवार्य नहीं है। इस संदर्भ में राजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी जहां विचार की पत्रकारिता के वाहक बने वहीं हिंदी को सूचना की ताकत का अहसास एसपी सिंह ने कराया।

ये तीन नायक हमें न मिलते तो यह कहना कठिन है कि हिंदी पत्रकारिता का चेहरा- मोहरा आज कैसा होता। हिंदी पत्रकारिता यदि अंग्रेजी पत्रकारिता के अनुगमन से मुक्त होकर अपनी खास भाषा और शैली के साथ आत्मविश्वास पा सकी तो इसके लिए इन नायकों के कार्यों का मूल्यांकन जरूरी होगा। तो बात राजेंद्र माथुर की। माथुर साहब ने जिस तरह भारत के इतिहास, धर्म, दर्शन, संस्कृति, साहित्य, समाज और राजनीति में रुचि दिखायी, वह प्रेरणा का बिंदु है। उनका विश्लेषण जिस तरह की बौद्धिक उत्तेजना पैदा करता है, हिंदी के पाठक ऐसी सामग्री पहली बार अपनी भाषा में पा रहे थे। वे एक ऐसे पत्रकार थे जो लगातार अपने देश को जानने की कोशिश कर रहा था। उनकी देश के प्रति जिज्ञासा, भारत प्रेम उनके लेखन में सदैव महसूस होता है, वे अपने पाठकों को अपने साथ लेने की कोशिश करते हैं। हिंदी पत्रकारिता के वैचारिक दारिद्रय को लेकर वे बहुत सजग थे। राजेंद्र माथुर ने अंग्रेजी साहित्य में एमए किया था और अंग्रेजी भाषा पर उनकी पकड़ ने उनके सरोकार व्यापक किए। वे चाहते तो आसानी से किसी मुख्यधारा के अंग्रेजी अखबार में अपनी सेवाएं दे सकते थे। किंतु उन्होंने हिंदी को अपनाया। जाहिर तौर पर वे ज्यादातर लोगों से संवाद करना चाहते थे। अंग्रेजी साहित्य और विश्व की तमाम नई जानकारियों से वे लैस रहा करते थे। विदेशों में छप रही नई किताबों पर उनकी नजर रहती थी और वे उन्हें पढ़कर अपने पाठकों तक उसका आस्वाद पहुंचाते थे। प्रोफेसर ए. एल. बाशम की किताब- ‘द वंडर दैट वाज इंडिया’ पर उन्होंने ‘क्या बतलाता है हमें बाशम का अदभुत भारत’ नामक लेख लिखा। उन्होंने लिखा- यह किताब उन लोंगों को जरूर पढ़नी चाहिए जो विद्वान बने बगैर भारत के बारे में एक दृष्टि विकसित करना चाहते हैं।

राजेंद्र माथुर हिंदी अखबारों की विचारहीनता को लेकर लगातार सोचते रहे। एक संपूर्ण अखबार के बारे में भी उन्होंने सोचने की शुरुआत की। आज जब हिंदी की पत्रकारिता एक उंचाई ले रही है और विविध सामग्री अखबारों में जगह पा रही, तब राजेंद्र माथुर की याद बहुत स्वाभाविक और मार्मिक हो उठती है। राजेंद्र माथुर की भारत की तरफ देखने की एक खास नजर थी। वे देश के महान नेताओं महात्मा गाँधी और पं. जवाहर लाल नेहरू से खासे प्रभावित थे। बावजूद इसके, उनका लेखन तमाम सीमाओं का अतिक्रमण करता है। तमाम तरह के विचार उनके लेखन को प्रभावित करते हैं। अपने एक लेख ‘गहरी नींद के सपनों में बनता हुआ देश’ में माथुर साहब भारत की अदभुत व्याख्या करते हैं। वे भारतीय राज्य-राष्ट्र की एक नई व्याख्या करते नजर आते हैं। वे आज के एक बेहद विवादित विषय पर लिखते हैं कि – दरअसल जिसे हिंदू धर्म कहते हैं, वह इस लेख में वर्णित अर्थों में धर्म है ही नहीं। वह मिथक- संचय की भारतीय प्रक्रिया का नाम है। इस संचय–प्रक्रिया को त्यागकर कोई देश नहीं बन सका, तो हिंदुस्तान कैसे बनेगा, जिसकी निरंतरता तीन हजार साल से नहीं टूटी है। आशंका इस बात की है कि सिंहासन के झगड़ों के कारण और आसपास के दबावों के कारण कहीं यह संचय प्रक्रिया समाप्त न हो जाए और हिंदुत्व सचमुच एक धर्म न बन जाए। आज हिंदुत्व पर भारी दबाव है कि वह संकीर्ण, एकांगी और असहिष्णु बने।

राजेंद्र माथुर संभावनाओं और खतरों को भांपकर चलनेवाले दूरदर्शी पत्रकार थे। उनकी पंक्तियां जाहिर तौर पर भविष्य को व्यक्त कर देती हैं, एक लेख में वे लिखते हैं- राज्य के छोटे टुकड़े होने पर स्वराज्य का पारिभाषित अंतर समाप्त हो जाएगा, यह मानने का कोई कारण प्रतीत नहीं होता। यदि गाय मांस नहीं खाती तो छोटे-छोटे टुकड़े कर देने से उसकी खून की उल्टियां रूक नहीं जाएंगी। इसी लेख में वे लिखते हैं- चालीस साल से कभी अपने निजत्व से राज्य को क्षत-विक्षत करते कभी राज्य के खातिर अपने निजत्व लहूलुहान होते हुए देखते हुए हम चल रहे हैं। कोई संभावना नहीं है कि इस त्रास से निकट भविष्य से हमें मुक्ति मिलेगी। जब मिलेगी, तब तक हम बदल चुके होंगें और हमारा राज्य भी।

संजय द्विवेदीकुल मिलाकर राजेंद्र माथुर का लेखन और चिंतन हमें प्रेरित करता है और प्रभावित भी। राजेंद्र माथुर सही मायनों में एक ऐसे संपादक के रूप में सामने आते हैं जिसने समूची हिंदी पत्रकारिता को आंदोलित किया। वे अपने समय में एक लेखक और संपादक के रूप में ऐसी मिसाल कायम करते हैं जिसपर आज भी हिंदी पत्रकारिता को गर्व है। आज जबकि हिंदी पत्रकारिता पर कई तरह के संकट सवाल की तरह खड़े हैं, श्री माथुर की स्मृति एक संबल की तरह हमारे साथ है।


लेखक संजय द्विवदी माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के जनसंचार विभाग में रीडर हैं। उनसे संपर्क 09893598888 या [email protected] के जरिए किया जा सकता है।
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास तक खबर सूचनाएं जानकारियां मेल करें : [email protected]

भड़ास के वाट्सअप चैनल से जुड़ें और नवीनतम खबरें पाएं : Bhadas Whatsapp

भड़ास लीगल टीम : किसी किस्म की लीगल हेल्प के लिए संपर्क करें- Bhadas Legal Team

You May Also Like

Uncategorized

भड़ास4मीडिया डॉट कॉम तक अगर मीडिया जगत की कोई हलचल, सूचना, जानकारी पहुंचाना चाहते हैं तो आपका स्वागत है. इस पोर्टल के लिए भेजी...

Uncategorized

भड़ास4मीडिया का मकसद किसी भी मीडियाकर्मी या मीडिया संस्थान को नुकसान पहुंचाना कतई नहीं है। हम मीडिया के अंदर की गतिविधियों और हलचल-हालचाल को...

हलचल

[caption id="attachment_15260" align="alignleft"]बी4एम की मोबाइल सेवा की शुरुआत करते पत्रकार जरनैल सिंह.[/caption]मीडिया की खबरों का पर्याय बन चुका भड़ास4मीडिया (बी4एम) अब नए चरण में...

Uncategorized

मीडिया से जुड़ी सूचनाओं, खबरों, विश्लेषण, बहस के लिए मीडिया जगत में सबसे विश्वसनीय और चर्चित नाम है भड़ास4मीडिया. कम अवधि में इस पोर्टल...