रवीश कुमार की झूठी रिपोर्ट का सच

शाम के चार बज रहे थे। ढाबे वाले को बार-बार दबाव डाल रहा था कि जल्दी कुछ भी बना दीजिए। सुबह नाश्ता भी नहीं किया था। पेट जल रहा था। बगल की कुर्सी पर ढाबे का मालिक भी आकर बैठ गया था। तभी सामने से एक शख्स शराब के नशे में धुत ख़ुद को संभालता हुआ मेरे पास आने लगा। आकर बैठ गया। आप हैं। आपको टीवी पर देखता हूं। अच्छा लगता है। ठीक बात करते हैं आप। वो इतना होश में था कि मुझे पहचान रहा था। कहने लगा कि मैं ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी में क्लर्क हूं (मैं सही पदनाम नहीं दे रहा हूं)।

इतना सुन कर मैं पूछने लग गया कि कितनी ज़मीन किसानों की गई है। कोई गांव बचा भी है जिसका अधिग्रहण न हुआ हो। उसकी आंखें नाचने लगती थीं। जब टिकती थीं तभी जवाब निकलता था। बोला एक भी ऐसा गांव नहीं है। बातचीत थोड़ी ही लंबी हुई कि उसके साथ खड़े लोगों ने खींचना शुरू कर दिया। कहा भाई साहब इन्हें जल्दी छोड़ दीजिए। फिर उसे पकड़ कर ढाबे में बने कमरे की तरफ ले गए। एक आदमी बाइक पर एक महिला को बिठा कर ले आता है। सरेआम उसे कमरे की तरफ धकेलने लगता है। थोड़ी हिचक के बाद वो अंदर चली जाती है। दरवाज़ा बंद हो जाता है। पांच मिनट के भीतर वो शख्स फिर बाहर आ जाता है।

मेरी तरफ आने लगता है और आकर बैठ जाता है। तभी बाइक वाला फिर उस महिला को लेकर चला जाता है। जब तक वो बाइक स्टार्ट करता, दूसरा उसके गाल खींचने लगता है। वो हाथ छुड़ा कर बैठ जाती है। बाइक चली जाती है। शायद मेरे जाने का इंतज़ार किया जा रहा होगा। उन्हें लगा होगा कि टीवी रिपोर्टर के सामने सुरक्षित नहीं है। वो तीन-चार लोग क्लर्क को घेरे हुए थे। दलाल टाइप के लग ही रहे थे। मेरे जाने के बाद उसे दुबारा लाने की योजना इशारों इशारों में बन गई थी।

मैं कार में बैठने लगा। क्लर्क फिर मेरे पास आ गया। मैंने कह दिया कि देखिये हम तो जा रहे हैं। लेकिन बातें समझ में आ ही जाती हैं। जीवन में इतना ग़लत न करें कि अफसोस का भी मौका न मिले। बस इतने में वो बिलखने लगा। अपनी आवाज़ को दबा कर कहने लगा कि मेरे बस में क्या है। कहते-कहते अपने बांह की चमड़ी नोचने लगा। बोला इसमें कीड़े पड़ गए होंगे। मैं शराब न पीयूं और ये सब न करूं तो इसी नहर में काट के फेंक देंगे। कौन ग़लत नहीं है इस दुनिया में। आप कितनों को दिखायेंगे। आपने जिनता भी शूट किया है वो सब झूठ है। आप सच्चाई के पांच फीसदी भी करीब नहीं पहुंचें होंगे। आपको क्या मालूम कि ज़मीन को लेकर किस लेवल पर कैसा खेल होता है। ये तो आदमी की बोटी खा लेते हैं। मुझमें इतनी ताकत नहीं कि इनको मना कर दूं। ये साले सब…। काग़ज़ तो देना ही होगा न। ज़मीन आदमी को लालची बना देता है। आप रवीश जी अच्छे आदमी हो। मैं भी आपकी रिपोर्ट देखता हूं। मगर बेकार हो आप।

मैं कहने लगा कि ये सब बहाना है। आप ठीक मालूम होते हैं। बस शराब छोड़ दीजिए और इससे पहले कि वो महिला फिर आए आप यहां से चले जाइये। घर जाइये। दफ्तर के बाहर लोगों से क्यों मिलते हैं। मत मिला कीजिए। वो कहने लगा कि रंडी (ये उसी के शब्द हैं) और पैसा दोनों छाती पर डाल कर ये लोग खड़े हो जाते हैं। रही बात बड़ी कंपनी वालों की तो उनका खेल रवीश जी आप कभी नहीं जान पायेंगे। कौन सुधर रहा है। बड़े-बड़े लोग इन ग़रीबों की चमड़ी नोच कर खा जा रहे हैं। वो क्या रंडीबाज़ नहीं हैं। किसानों की चमड़ी से तो ही खेलते हैं वो सब। आप पत्रकारों को कभी इसकी भनक भी नहीं लगेगी। और ये साले जो अभी नारे लगा रहे हैं, ये सब कीड़े की तरह शांत हो जाएंगे। कितनी रिपोर्ट बना लोगे आप। सब झूठी बातें होंगी आपकी रिपोर्ट में।

उसकी बातें मेरी आंखों में धंस गईं। अलीगढ़ के किसानों का प्रदर्शन, कंपनी माफिये के हाथों विकास के नाम पर ज़मीन का सौदा। इतना मन ख़राब हुआ कि रिपोर्ट की आखिर में एक पीटूसी करने की सोच रखा था, किया ही नहीं गया। जब कई लोगों की प्रतिक्रिया आ रही थी ‘ज़मीन बनाम जनहित’पर, उस वक्त मैं घबराहट से भरा जा रहा था। कुछ ने तो हदें पार कर यहां तक कह दिया कि मैं महान हूं। जनता की बात करने वाला अकेला रह गया हूं। सच कहता हूं। लेकिन पहली बार मुझे भी लगा कि मेरी रिपोर्ट झूठी है।

तब से सोच रहा हूं कि समाज भी कितने कम से खुश हो जाता है। मेरी औसत से कुछ बेहतर रिपोर्ट को कालजयी बता देता है। टीवी पर दिखने वालों को स्टार मान कर किसी भी न्यूज एंकर को फेसबुक पर महान बताने लगते हैं। रिपोर्टर क्या करेगा। उसकी सीमा तो सिर्फ बताने तक ही है। उसमें भी वो सच के पांच फीसदी तक नहीं पहुंचता है तो फिर उसे महान क्यों कहा जाए। पहली बार लगा कि चिप(टेप की जगह चिप में रिकार्ड करता हूं)को लात मार-मार कर तोड़ दूं। ऐसा नहीं कर सकता था। हर शुक्रवार को रिपोर्ट जानी ही है। सो चली गई। मगर उस शराबी क्लर्क की बातें और उसका चमड़ी नोंचना भूल नहीं पा रहा हूं। मेरी रिपोर्ट की सच का झूठ आप तक पहुंचने से पहले ही उसने साबित कर दिया था। अलीगढ़ के टप्पल में आज भी किसान आमरण अनशन पर बैठे हैं। सब भूल गए। मैं भी। मैं कल से किसी और विषय के आलिंगन में चला जाऊंगा। फिर से अपनी औसत रिपोर्ट पर महान, कालजयी और बेहतरीन जैसी प्रतिक्रियाओं के स्वागत के लिए। मुझे उस क्लर्क की लाचारी कम, अपनी लाचारी ज़्यादा नज़र आ रही थी।

लेखक रवीश कुमार एनडीटीवी के चर्चित एंकर व रिपोर्टर हैं.

Comments on “रवीश कुमार की झूठी रिपोर्ट का सच

  • यशवंत says:

    रवीश भाई, आपकी हिम्मत को सलाम. संपादकों, रिपोर्टरों को ऐसी कई स्थितियों से दो चार होना पड़ता है जिसे वे दिखा नहीं पाते. लेकिन वे लोग बताते भी नहीं, ब्लागों, फेसबुकों आदि के जरिए. आपने यह पहल बहुत पहले कर दी थी, और अब जाकर यह खरा सोना बना है. मैं निजी तौर पर आपकी इस रिपोर्ट से बहुत प्रभावित हूं. दरअसल यह भी एक पीपली लाइव है, बिना कहे आत्महत्या करने पर उतारू एक महाघुसखोर क्लर्क. लेकिन उस क्लर्क के अंदर की जो मनुष्यता है, जो लाचारी है, उसे कौन देख पाएगा. वो देखने के लिए रवीश जैसे किसी शख्स की आंख चाहिए. मैं आपकी इस पोस्ट को अब तक की सबसे बेहतरीन पोस्ट का दर्जा दूंगा. आपने भले किसी भावना में लिखा हो, पर
    आभार
    यशवंत
    भड़ास4मीडिया

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  • Ravis bhai parh kar achha laga, ye sach hai ki daru peekar aadmi sach bol deta hai. leki sach yehi hai ki in aadam khor poojipatio ke aage aap jaise ekke dukke,logo ke pryas dikhai nahi dete , achhe pryas ke liye dhanyabad.

    p d shukla lucknow.

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  • Sudhir.Gautam says:

    रवीश भैया आपको हरा सलाम (लाल लिखने पर पाबंदी हो सकती है शायद) क्योंकि जब यशवंत भाई लिखते हैं की ये आपकी बेहतरीन पोस्ट है चाहे कसी भाव में लिखी हो तो इस वक्तव्य में अतिश्योक्ति नजर नहीं आती…क्लर्क की लाचारी एक अभिन्न मित्र द्वारा क्यों ऐसा करते हो पूछने पर सुनाये शेर की याद दिलाती है…
    चोरी न करें झूठ न बोलें तो क्या करें,
    चूल्हे पर क्या असूल पकाएंगे शाम को!!!
    लेकिन क्या मात्र संवाद ही काफी होगा ऐसे विषयों में या फिर संवाद से इतर भी कुछ करने की चाह है, यदि चाह है तो क्या इस दिशा में कोई राह है? क्या इस पर बात नहीं होनी चाहिए, या फिर इसी तरह बेहतर लेखन के माध्यम से समय समय पर हम ऐसे ही मुद्दों पर अपनी genuine प्रतिक्रिया के मार्फ़त अपने कर्तव्य की इतिश्री करते रहेंगे…
    कहीं हम (कृपया गलत ना समझें हम से तात्पर्य मुझसे और आपसे है ना की सिर्फ आपसे, जैसा की संवाद में आम तौर पर समझ लिया जाता है) भी कहीं उस क्लर्क की तरह लाचारी का प्रदर्शन कर मांस नोचने और पैसा पीटने को अपनी मजबूरी बताकर सही रास्ते पर कदमबोशी करने से बच नहीं रहे हैं???
    कॉलेज के दिनों की दो लाइने और याद आ रही हैं…
    अभी वही है निजामे कोहना , अभी तो रंगे अलम वही है…
    मैं कैसे मानूं की उन खुदाओं की बंदगी का तिलिस्म टूटा…
    अभी तो रहबर बने हुए हैं, अभी तो उनका सितम वही है…
    क्या वाकई में कोई सही चुनाव हो सकता है? जो हम कर रहे हैं उससे बेहतर…यदि हाँ तो संवाद की दिशा वहां मोड़ दें ताकि कम अज कम, आत्मवंचना और आत्मसंतुष्टि से परे नजर वहां पहुँच सके जहाँ…हम इस तथकथित मजबूरी से मौजूद घटिया चुनाव की बजाय सही विकल्प का निर्णय लेते हुए नजर आयें, नहीं तो आने वाली जनरेसन भी यही चुनाव करेगी जो हमने किये और दुखी रहे…तो एक बीमार समाज विकसित करने में अनजाने ही हमारा योगदान क्योंकर हो???इससे न लिखना और घुट घुट कर मर जाना बेहतर होगा, लिखना ही है तो वो लिखें जो अनुकरणीय हो जैसा की हमारे आस पास बहुत सारे लोग तरक्की की दौड़ में हाँ में हाँ मिलाने से मना करके हैं…इन कुत्सित पत्रों का चित्रण मनोहर श्याम जोशी के “हमजाद ” के घृणित पात्रों की कड़ी में एक नया पात्र और जोड़ता है…घटिया दिमागों के मनोरंजन के लिए …क्योंकि यदि मंशा झकझोरने की है…तो पहले हमें अपने आप से शुरुआत करनी होगी…औसत और झूठी रिपोर्ट को पठने से पहले तथ्यों की छानबीन कर प्रभावशाली और वास्तविक रिपोर्ट बनाने में अतिरिक्त समय लगाकर(ये महज एक उदाहरण है-symptomatic relief for the acute attack, for proper comprehensive treatment we may braistorm @ facebook)
    रवीश आपका लेखन ना केवल घटना से आपको लगे मानसिक आघात को सही दर्शाता है वरन एक सोफ्ट कॉर्नर के साथ आत्म विवेचना करने की ताकत भी आपमें है इसका परिचय देता है…धन्यवाद आपको की आपने एक बार फिर धीरे धीरे मरने लगी ताकत के पुनरुत्थान में इस लेख के माध्यम से कैटालिस्ट बनकर मदद की !!!यशवंत भाई आपको भी बधाई की आप समय समय पर ऐसे मुद्दों के चुनाव में चूकते नहीं जहाँ संवाद अपरिहार्य हो जाता है !!!
    लेकिन अंत में यही कहना चाहूँगा की बेहतर स्थति कुछ और होगी क्या ये हमें निर्णय करना होगा आने वाली पीढ़ियों के लिए, इससे पहले की ताकत और छीन होकर ख़त्म ही हो जाए!!!
    सुधीर.गौतम

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  • Raveesh ji,Kasar to aapne bhi nahin chodi is andolan ko damage karne main..
    Apne to andolan ko dalito aur jaaton main baant diya jab ki aap bhi jaante hai ki daliton ka hi isse sabse jyada nukasaan hona tai hai.
    Aap yeh bhi jante hain ki bhrashtachar aur aniyamittaon ki saari hade paar ho gai hai is adhigrahan main aur koi bolne ka sahas bhi nahin juta pa raha hai…,
    Yeh hai takat poonji ki aur aapka saahas to aap khud bayan kar hi rahe hai.
    Khair….Apki karni apke saath !
    Par ab desh aur samaj main se chauthe stambh ki garima aur samman samapt hone ka waqt aa gaya sa lagta hai.

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  • jabardast lekh.aur utni hi kadwi sachaye………..sham ke 5 baje report likho to sab sahi lgta hai lekin dil janta hai ki jo likha hai wo pura nahi hai

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  • कमेंट में वही बात कही गई है जिससे रवीश जी खींजे हुए है. यानि फिर वही रिपोर्ट की तारीफ. कुछ करने की सोचिए भाई.

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  • Aapko mera salaam,
    Atleast you have guts to say the truth. Very few media persons are having this. And you are one of them. Keep it up. God Bless You

    Dayal Babu
    Media Avenue
    Delhi

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  • तारीफ कहाँ है,यहाँ तो सत्य लिखा है कि रवीश जी ने तो पूरा प्रयास किया है इस आन्दोलन तो नुक्सान पहुँचाने का, अपनी रिपोर्ट में जाट और दलित में बाँट कर!
    आखिर पूँजी ही भारी पड़ी है सत्य पर अब किसानो का भाग्य आन्दोलन पर ही निर्भर है,चौथा स्तम्भ तो नाकाम सिद्ध हुआ अथवा पूँजी का बंधुआ !

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  • satya prakash "AZAD" says:

    पेड़ को हम पकड़कर हल्ला मचाएं कि पेड़ ने हमें पकड़ लिया तो शायद बहुत सही नहीं होगा…हमारे अंदर आत्मबल होगा तो हम पेड़ को आराम से छोड़ देंगे….कोशिश हमें करनी है….अपेक्षा अपने आप से रखनी है……जय हिंद

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  • भाई रविश, अपनी मजबूरी- लाचारी बताने से ज्यादा अब अगली बार कोई रिपोर्ट करें तो उम्मीद करता हूं आप ऐसी दलील फिर नहीं देंगें, और सच्चाई कि तह तक जाएंगे।

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  • क्या यहां भी अरुंधती रॉय जैसे लोगों की जरुरत है जो आकर धरने पर बैठे…तब जाकर किसानों को न्याय मिलेगा…

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  • Ashwani Malhotra says:

    shat pratishat sachhai to koi bhi nahin dikha sakta,akhir koi in shatiron se paar bhi kaise paye phir bhi bik jane se jaan per khel ker sachhai ko samne jitna laya ja sakta hai us ke aap meri nazar me koi kami nahin chodte…..baki her ek ka apna nazaria hai,,,,lage rahen bahut hain jo dekhna chahte hain aapki nazar se

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  • very nice report ravish bhai.yeh bhi ek sachi patrakarita ka sach hai. yasvant bhai ne thik hi kaha hai ki aapne patrakarita ka pipli live dikha diya. salam

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  • Shri Ravish ji,,,,,,,Accha laga jankar ki sach mehsus karne aur batane ki takat ab bhi aapme he…..aise line chote logo (Age + Post) ko bhi himmat deti he……kabhi bastar aye….aise situation se kai baar do-char hone ka mouka lagega………….

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  • What Ravish Kumar realised is perhaps naked truth of journalism today. A good account from Ravish Kumar. He deserves copliments.
    Ranjan

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  • shubhkant vyas says:

    ravish sir
    mera manna he ki aaj agar kisi report se sambandhit vyakti ghabra ya khush hota he chahe vo shan bhar ke lia ho aap ki mehnat ka phal de jata he………………
    bade badlav ki jagah chota badlav asrdar or asan ho sakta he

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