क्या लिखती और क्यों पढ़ी जाती हैं मृणाल पांडे

संजय कुमार सिंहमृणाल पांडे को प्रसार भारती का चेयरपर्सन बनाने की घोषणा क्या हुई जनसत्ता ने उनका पाक्षिक कॉलम छापने का भी एलान कर दिया। और मृणाल जी ने अपना पहला लेख लिखा – ‘असली चुनौतियां इधर हैं’ जिसे भड़ास4मीडिया ने ब्लॉग जगत के नियतिहीन कोने में दम नहीं शीर्षक से प्रकाशित किया। मैंने पूरा लेख कई बार पढ़ लिया पर समझ में नहीं आया कि मृणाल जी कहना क्या चाहती हैं और जो कहना चाहती हैं उसे साफ-साफ क्यों नहीं कहतीं। भड़ास4मीडिया ने जो शीर्षक लगाया है वह उनके लेख का एक वाक्य है। अपने इस कथन के पक्ष में उन्होंने कुछ नहीं लिखा है और यह बताने की कोशिश भी नहीं की है कि ब्लॉग जगत का कोना क्यों नियति हीन है और उसमें दम क्यों और कैसे नहीं है। दम है यह कैसे समझ में आएगा या माना जाएगा। दम होने का पैमाना क्या है। या दम डालने के लिए क्या कुछ किया जाना चाहिए। जनसत्ता के शीर्षक – असली चुनौतियां इधर हैं, से भी नहीं समझ में आता है कि इधर का मतलब क्या है। पूरा लेख पढ़कर यही लगता है कि इसमें कोई दम नहीं है। लेकिन उनकी कुछ बातें गौर करने लायक है। सबसे पहले तो उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया है कि हिन्दी मीडिया से उनका क्या तात्पर्य है?

वे खुद को इससे बाहर मानती हैं या इसमें शामिल हैं। हिन्दी मीडिया से बाहर होने की इच्छा या घोषणा भर से वे हिन्दी मीडिया से बाहर या अलग नहीं हो जाएंगी। और जब वे खुद हिन्दी मीडिया में हैं, रही हैं, अच्छे, जिम्मेदार और कमाऊ पदों पर रही हैं तब उन्होंने क्या किया है जिसकी अपेक्षा वे अब हिन्दी मीडिया से कर रही हैं।

उन्होंने लिखा है, अगर हिंदी पत्रकारिता के पुरोधाओं के सपने संसाधनों के अभाव में साकार नहीं हो पा रहे थे, तो विज्ञापनों की प्रचुर आमदनी से दमकते हिंदी मीडिया को अब तो समाज के कमजोर वर्गों के अधिकारों, संसाधनों को लूटने वाले हर वर्ग से पूरे आत्मविश्वास के साथ बार-बार मोर्चा लेना चाहिए था….. पता नहीं वे कैसे और किस मोर्चे की बात कर रही हैं और मुझे यह भी पता नहीं है कि हिन्दी मीडिया ने संसाधनों के अभाव में कब कहां मोर्चा नहीं लिया। और जहां मोर्चा नहीं लिया वहां संसाधनों की कमी का कोई रोना रोया गया। हिन्दी मीडिया का इतिहास स्वतंत्रता पूर्व का है और स्वतंत्रता आंदोलन के जमाने से ही यह अभावों में ही मोर्चा लेता रहा है। इसकी जानकारी किसे नहीं है।

फिर भी, उन्होंने लिखा है… ”यह सचमुच गंभीर शोध का विषय है कि वह ऐसा क्यों नहीं कर रहा है। क्यों वह ‘हैव्स’ का प्रतिनिधि समझे जाने वाले अंग्रेजी मीडिया के स्तर पर भी, महंगाई से लेकर पैसे लेकर खबरें छापने तक का खुला विरोध नहीं कर रहा?” विरोध तो हो ही रहा है, खुलकर हो रहा है। पता नहीं मृणाल जी क्या चाहती हैं, शायद यह कि जिसने पैसे लिए हैं वह भी विरोध करे।

मृणाल जी ने लिखा है, जिन अखबारों को वे (शायद ब्लॉग चलाने वाले हिन्दी मीडियाकर्मी) इन पाप कर्मों का दोषी बता रहे हैं वहां नौकरियां खुलते ही वे सब हो हो कर उमड़ कर हर तरह की घिनौनी चिरौरी और सिफारिशी प्रणायाम साधने में तत्पर हो जाते हैं। मृणाल जी को कौन बताए कि प्रसार भारती का चेयरपर्सन बनने के बावजूद वे जनसत्ता (भले ही यह पापकर्मों का दोषी न हो) में पाक्षिक कॉलम लिखने का लोभ नहीं छोड़ पाईं तो गरीब पत्रकार, छोटी नौकरी चाहने वाला क्यों न नौकरी पाने के लिए चिरौरी करे। फिर भी उनके पास ऐसा कोई उदाहरण नहीं है। मृणाल जी किसी का नाम बता देंती तो उनकी यह बात दमदार हो जाती। पर ऐसा वे नहीं करती हैं, सो नहीं किया है। दूसरी ओर, मुझे नहीं लगता कि मृणाल जी को उन लोगों का नाम बताने की जरूरत नहीं है जो बेरोजगार हैं पर नौकरी मांगने के लिए उनकी या किसी और की चिरौरी करने नहीं गए।

यहां 24 जनवरी को हिन्दुस्तान टाइम्स में प्रकाशित वीर सांघवी के आलेख का उल्लेख करना अप्रासंगिक नहीं होगा। उनके इस लेख को पढ़कर लगता है कि अपनी राय जताने या बनाने से पहले उन्होंने नए मीडिया को जानने समझने में समय और श्रम लगाया है और अपनी राय यूं ही नहीं व्यक्त कर दी है और न सरसरी तौर पर कुछ कह दिया है।

मृणाल जी के लेख का अगला अंश पढ़िए – नौबत यहां तक आ गई है कि जब एक बड़े टीवी चैनल के प्रमुख एक बड़े अखबार में लिखते हैं कि मीडिया प्रबंधक आज पाठकों / दर्शकों से अधिक शेयर-धारकों और व्यवस्थापकों के आगे जवाबदेही हैं, लिहाजा अधिकाधिक मुनाफा कमाने की जुगत बिठाना उनका सहज और तर्कसंगत धर्म है, तो उनका प्रतिवाद करने की फुर्सत किसी के पास नहीं। क्या पता कब उस चैनल या अखबार में भर्तियां खुल जाएं? जब यही इनकी पार्टी-लाइन हो तो असहमति का जोखिम क्यों उठाएं?

यहां गौरतलब है कि बात संपादक की नहीं, मीडिया प्रबंधक की हो रही है। और प्रबंधक के मामले में यह कहीं से गलत नहीं है। फिर भी प्रतिवाद करना ही था तो मृणाल जी ने क्यों नहीं किया? खुद प्रतिवाद नहीं करके प्रसार भारती की चेयरपर्सन बन गईं और दूसरों ने प्रतिवाद नहीं किया तो क्योंकि, क्या पता कब उस चैनल में भर्तियां खुल जाएं। वाह, कितना दमदार तर्क है।

मृणाल जी आगे लिखती हैं, छपाई की रामराज्य जैसी सुविधाएं बनाई जा रही हैं, पर पत्रकारिता के स्वस्थ प्रतिमान कायम नहीं हो पा रहे, क्योंकि कई जगत प्रबंधन के हुकुम पर संपादकीय टीमें अपने काम मे दक्षता लाने के बजाय विज्ञापन लाने और नेताओं-प्रशासकों की जरूरत के अनुसार मदद सुनिश्चित करने का काम कर रही हैं। ऐसे मंजर में पूंजीवाद भी है, समाजवाद भी और दोनों को एक समझदार चुप्पी एक साथ गूंथे हुए है। अगर थीसिस और एंटीथीसिस के बीच नैसर्गिक टकराव के बजाय ऐसा हंसमुख शांतिपूर्ण सहअस्तित्व कायम हो जाएगा तो, किसका संघर्ष और कैसी प्रगति? और यह बात उन्होंने तब नहीं कही जब वे एक संपादकीय टीम का नेतृत्व करते हुए उसे दुरुस्त करने की बजाय बताया जाता है कि, टीम की कटाई-छंटाई में व्यस्त थीं।

उन्होंने आगे लिखा है, अगर कल को सरकार मीडिया के लिए एक आचरण संहिता बना कर उसे लागू कराने पर उतारू हो जाए, और ध्वनितरंगों को राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर एक सरकारी संस्थान के सुपुर्द कर दिया जाए तो क्या वैसा देशव्यापी जनांदोलन छिड़ सकता है जैसा तेलंगाना के नाम पर हुआ? शायद यह काम प्रसार भारती के कार्य क्षेत्र में आएगा और मृणाल जी यह चेतावनी दे रही हैं कि सरकार की ओर से मैने ऐसा कुछ कर दिया तो देशव्यापी आंदोलन नहीं छिड़ पाएगा और पाठकों कान खोल कर सुन लो मैं जो करना चाहूंगी कर दूंगी।

क्योंकि उन्होंने आगे लिखा है, बिना मुकदमा चलाए राजा मुंज से लेकर अनारकली तक को तहखाने में बंद रखने वालों और बलात्कृत लड़की को खराब आचरण का हवाला देकर स्कूल से निकलवाने वालों के मुल्क में, बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का आखिर में जाकर कितना वजन माना जाएगा? अखबारों-चैनलों के कर्मी चुंकि जनता या शेयरधारकों द्वारा नहीं चुने जाते, उनसे यह भी तो कहा जा सकता है, कि उन्हें क्या हक है कि वे खुद को जनता की रुचि और रुझान का सरकार या प्रबंधक से बेहतर प्रवक्ता मान बैठें?

मृणाल जी के लिखे का जो मतलब मैंने लगाया है उससे अलग आपको कुछ समझ में आता हो तो अवश्य बताइए।

लेखक संजय कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं. इन दिनों वे अनुवाद का काम बड़े पैमाने पर कर रहे हैं. उनसे संपर्क anuvaadmail@gmail.com या 9810143426 के जरिए कर सकते हैं.

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Comments on “क्या लिखती और क्यों पढ़ी जाती हैं मृणाल पांडे

  • Rishi Naagar says:

    Hats off to you Mr Singh….what a bold and to-the-point analysis you have brought! Ms. Mrinal ji has really committed a blunder while she wrote this article…I personally feel, it is her own pent up emotions and her helplessness against “Hindustan” that her pen erupted this smoke. Thanks, anyway, to you Mr. Sanjay K. Singh ji.

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  • sandas singh says:

    mrinal pande ka lekh bhadas me chhapane aur uspar vah sheershak lagane ka matalab bhee samajh me nahin aaya, jispar unhone khud vistar se nahin likha. vah lekh itana mahatvapoorna nahin tha tab sanjay singh ka ispar itana manasik vyayam karana bhee samjh me nahin aataa.
    Sandas Singh

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  • e`.kkyth lrjat dh pky pyus dh dksf’k’k gj ges’kk ls gh djrh vkbZ gSaA muds gfFk;kj vkfndky ds tekus ds gSa vkSj ml ij rqjkZ fd oks [kqn dHkh gfFk;kj ugha pykrhA dqan yxs gfFk;kj nqljksa dks idM+k nsrh gSa geyk djus ds fy,A meZnjkt ukjh gksus ds ckn Hkh muesa ;s ‘kkfrjiuk—–rkSck—-rkSck—-! vkius lgh vkadyu fd;k gS vius ys[k esaA bruh maph inoh esa igqapus ds ckn Hkh ;s lksp—-

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  • media ka madhav says:

    shaabas sanjay.blog aur bhadas jaise website se mrinal pande khar khai hui hain par is ‘boojho to jane’ type lekh (unke lekhan kee khasiyat hai )lekh me naitikta ka sabak dene walee mrinaljee tab kahan theen jab hindustan se logon ko bahar kiya ja raha tha.hindu me managment ke khokhlepan par do kisten likh marne wali prasar bharti kee ye pramukh management ke unhin nanhe bchchon kee jo lallo-chappo kartin theen kisi se bhee uskee tasdeek kar len.

    Reply
  • Shiwani ki putri ,IAS Arvind Mishra ki patni,kumanyu ke Prashshnik pariwar ki putravadhu hone ke sath BJP neta Dr. Murli Manohar Joshi ki Bhatiji hona Mrinal Pandey ki sabse badi yogyata hai.Hindustan me PAHADI BRAHMANWAD chalane aur sau se adhik varisth patrakaro ko nikalwakar pahadio ki bharti karne wali Mrnal Pandey kya ab Prasar Bharti me bhi PAHADI BRAHMANWAD chalayengi.

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  • Aparna Khare says:

    मुझे समझ नहीं आता कि मृणाल जी को लेकर लोग इतने परेशान क्यों हैं? कॉलम राइटर की एक समस्या यह भी होती है कि कुछ लिखने को न भी हो तब भी लिखना तो है ही। नहीं तो पैसे भी मारे जाएंगे और देर-सबेर कॉलम भी हाथ से निकल जाएगा। ठीक उसी तरह जिस तरह उनके रहते तमाम लोग हिंदुस्तान से निकलते रहे। अब जो लोग यह सोचते हैं कि शिवानी की बेटी होने भर से वे उन जैसा लिख लेंगी तो ये तो गलत बात है न! उन्हें अपनी भड़ास निकालने दीजिए। और मेहरबानी करके भड़ास पर उन्हें इतनी तवज्जो देना या तो बंद करिए या फिर इसकी सार्थकता बताइए। – अपर्णा

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  • संजय जी मैने आपका लेख पढ़ा अक्सर भड़ास में किसी न किसी मुद्दे पर आपकी बेवाक राय देखने को मिलती हैं लेकिन शायद मृणाल जी के लिखे लेख के ऊपर की गई टिप्पणी को मैं आत्मसात नहीं कर पा रहा हुं….क्योंकि जो उन्होने लिखा वो समस्यांए व्यावहरिक रूप से मीडिया के सामने मुंह बांए खड़ी हैं….सीएनएन चार सौ लोगों को बाहर निकाल देता हैं लेकिन कोई आवाज़ नहीं उठाता…उल्टा नए साल पर उद्योगपतियों और राजनेताओं को सम्मानित किया जाता हैं……आखिर ये राजनीति, पूंजी और मीडिया का गठजोड़ ही तो हैं…तभी तो इतने लोग बाहर कर दिए गए और कहीं से एक आवाज़ नहीं उठी…और आखिरी में जो मृणाल जी ने मीडिया की सफाई की बात कहीं हैं उससे तो आप भी रूबरू हैं क्योंकि मीडिया में सिर्फ गुटों का आधिपत्य रह गया हैं कुछ ख़ास लोग ही मजे उडा रहे हैं…बाकी हिंदी मीडिया में काम करने वाले नब्बें फीसदी से ज्यादा लोगों की जिंदगी दिहाड़ी मजदूरों से बेहतर नहीं हैं….इसलिए सफाई की जरूरत तो हैं….

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  • Sukarn Singh Rathore says:

    Mrinalji ne sahi likha hai ki bhartiyan khulne ke dar se log khul kar nahi likhte bolte hain…. Hindustan ki sampadak rahte hue unhone kabhi sonia-rahul ya UPA ke khilaph kabhi kuchh nahi likha… hindustan me karyakal ke antim dono me unhe ehsas ho gaya tha ki ab unhe bahar ka rasta dikhaya jane wala hai isliye we aur sambhal kar likhne lagin…. bhartiyan khuli aur unhe 10 Janpath se bulawa aa gaya…. Mrinal ji ka ye lekh darasal unka apna anubhav hai… wo bhi aalok Mehta ki mauseri bahan lagtin hain jo hamesha UPA ko mahimamandit karne me lage rehte hain… koi ashcharya nahi ki kal phir koi bharti khule aur wahan Alok Mehta ji viraajman ho jayen.
    Sukarn

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  • A JOURNALIST says:

    Namaskaar Bhaaiyon,
    Jinko Mrinal ji ka lekh samajh mein nahin aaya, unke saath meri puri hamdardi hai…everybody is free to express his/her views…Mrinal ji ke kahe se main sahmat hoon…waise bhi jinhen baat-baat mein ya jaanbujh kar kami-dosh nikaalne ki aadat ho, unhen kaun rok sakta hai..yahan sirf yehi kahna chaahonga ki
    “BURA JO DEKHAN MAIN CHALA, BURA NA DEEKHA KOI,
    JO DIL DEKHA AAPNO, MUJHSE BURA NA KOI”
    thank u

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  • rasmi singh says:

    Mranal ji ka bharti khulne aur iske baad ke comment… sharmnak aur us soch ke prateek hain jisne desh me ajadi ke baad vidhaika, karyapalika aur media par kabja kar kundali mar kar baith gaye,ye log chahe patrkar ho ya neta ya adhikari,ye aaj bhi apne ko desh ka super class samajhte hain inhi me marnalji bhi hain, aam admi kee peeda ya naukari pane ka prayas aur haath pair marna inhe uphas ka vishay lagta hai kyoki kabhi khud unhe is peeda ko nahi jhelna pada.khud UPA Govt. ki chatukarita ke hado ko paar kar gaye aur doosro ko updesh de rahe hain.mranal ji kya batana pasand kareengi ki Prasar Bharti ke liye Desh me unse behtar koi nahi ya is pad ko pane ke liye unse behtar chatukar koi nahi.

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  • rajeev gupta says:

    sanjayji mrinalji mai mrinal ji ko pichle 15 salo se pad raha hoo …unper es tareh ki tipni kerna ki wo kun likhi aur padi jati hai theek nahi hai…unke lekh mai saaf hai ki media jis disha mai ja raha hai aur jaise ja raha hai us per chinta prakat ki hai…ab mrinal ji ki likhne ki apni bhasha hai aur apni shaili hai ….es umer aur es mukam per wo kisi ko apni baat samjhane ke liye ye tou nahi badal sakti.

    Reply
  • sandip thakur says:

    mrinal pandey patrakar na kabhi thi aur na ab hai.unka likha parhana bhus mei lathai marne jisa hai.kuch samajh me nahai aye-ga (this is fact). unki matajee shivani ek sahityakar thi aur mrinaljee ko bhi ek sahityakar hai mana ja sakta hai.mujhe surprise es per hotha hai ki koy bhi management unhey editor ya key post per rakh kase leta hai.mrinaljee ke patrakaritha ke safar per ek nazar daleye.pata chal jayaga ke woh kiteney barhi patrakar hai.SAPTAHIK HINDUSTAN mei thei,band ho gya.VAMA ke editor bani,band karva kar hei nekeli.DD news chanel mei thi band ho gaya.HINDUSTAN ke editor thi,500 se adhik logo ke nukari lene ke bad non performence ke adhar per hata dye gaye.ab PRASAR BHARTI mei gaye hai dekhete hai kya hota hai.mrinaljee ko karib se janney wale khatei hai ke jaha pare mrinal ke kadam,bantadhar hona tay….

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  • KM Satyarthi says:

    जनसत्ता से निकाला गया हर पत्रकार ऐसी ही राय रखता होगा. मृणाल पांडे शनिवार को प्रसार भारती चीफ बनी..जनसत्ता का कालम रविवार के इशु में प्रकाशित हुआ, अर्थात शनिवार को मुद्रित हुआ.. तो क्या जनसत्ता ने शनिवार को ही पांडे को अप्प्रोच कर लिया और वो उसी वक़्त राज़ी हो गयी, उन्होंने कालम उसी दिन लिख भी दिया … संजय जी, जनसत्ता का विरोध करना हो तो करते रहो परन्तु बे सिरपैर की बात तो मत करो.. इससे तो जनसत्ता की इज्ज़त बढ़ा ही रहे हो, चाहे उद्देश्य कुछ और हो सकता है. जहाँ तक मेरी जानकारी है रविवार के पृष्ठ चार दिन पहले बन कर दूसरे शहरों के संस्करणों को प्रेषित कर दिए जाते है.

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  • media ka madhav says:

    chand baten jo chhoot gain—- samachar barti se carrier shuru kiya aur agency band ho gai.yanee charan padte hee bantachaar.inke pati hain arvind pande.sasur bd pande congress ke koshaadhyaksha the aur rihaish thee shayad 4 tilak marg yanee times of india ke tatkaleen karta-dharta rameshchandra jain kee ain padosan thee mohtarma.pati pmo me tab under secretary the times kee liosoning ke tahat sirf unke liye vama launch karne ka pact hua aur kam khatam to magazine ka kya kaam.ndtv bhee tab star tha .pati tab tak sail ke chairmen ho chuke the so lakhon ka ek ad roz.star bhee bant gaya ndtv bana.yani star kee bhee aisi-taisi.haan prasar bharti aur khas taur par dd par to mrinal jee kee atma mandrati rahtee thee.hindustan me na jane kitnee khabren plant huin theen unke samay me.pichhle ank palat kar dekhen.asal me tv feelik hai mrinaljee—kabhee star-ndtv to kabhee dd ,loksabha chanel…sunte hain loksabha chanel ke khali pad ka jugad laga rahin theen par usse bhee bada jugad ho gaya,ek bat aur murli manohar joshi jee kee nahin unkee patnee kee bhanjee hain apnee mrinaljee,joshi jee kee patnee unkee ma shivanee jee kee sagee bahan hain.

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  • विनीत कुमार says:

    ब्लॉगर,इंटनेट और न्यू मीडिया को लेकर मृणाल पांडे ने जिस दुराग्रह से लिखा है उससे मेरी घोर असहमति है। आप यहां भी पढ़ सकते हैं- http://taanabaana.blogspot.com/2010/01/blog-post_27.html

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  • sandas singh says:

    जिस नियम से मृणाल जी जहाँ जाती हैं वह बंद होता है उसी नियम से भड़ास में उनका लेख छपने के बाद भड़ास भी बंद होगा. – संडास सिंह

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  • sandas singh says:

    इसे अन्यथा न ले, पर संजय कुमार सिंह की मुस्कान देश प्रसिद्द राठौर की मुस्कान से मिलती सी है.

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  • ANIL KUMAR VERMA says:

    mradal ji k sambandh me yah kahana ki ve kuch bhi sahi nahi likhati hain. mai sahamat nahi hoon. HINDUSTAN me rahate huai unhone jo bhi kiya usme se kuch galat hua to yah ki sirf apane sagirdon k kahane parkuch aise logo ko baahar ka rasta dikha diya jo vastav me HINDUSTAN ki jaan the. saayad yani kaaran raha ki unke saath bhi vaisa hi hua. rahi kaalam ki to bahut aise bhi lekh unki kalam se nikle jinme grameen anchal k logo ko vaastav me tuch kiya.

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  • Rajeev Ranjan Nag says:

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