शशि ने स्थानीय संपादकों को दिए कई संदेश

‘हिंदुस्तान’ के प्रधान संपादक शशि शेखर ने ग्रुप के सभी वरिष्ठ स्थानीय संपादकों और स्थानीय संपादकों के साथ पहली बैठक में अपने तेवर का इजहार कर दिया। बैठक में शशि ने ‘हिंदुस्तान’ को चुस्त-दुरुस्त बनाने के लिए सभी स्थानीय संपादकों से कमर कस लेने का आह्वान किया। सूत्रों के मुताबिक शशि शेखर ने ब्लागों और पोर्टलों पर जो कुछ प्रकाशित हो रहा है, उसकी तरफ ध्यान न देने की भी सभी से अपील की। शशि ने कहा कि ‘हिंदुस्तान’ को बदलने की जरूरत है। इसके लिए सभी स्थानीय संपादकों को सुबह से ही उनके टच में रहना होगा। वे लोग क्या प्लान कर रहे हैं, क्या कुछ नया कर रहे हैं, इसकी जानकारी उन तक फोन या एसएमएस के माध्यम से पहुंचना चाहिए।

शशि शेखर ने अपनी स्टाइल में स्थानीय संपादकों की पहली बैठक ली। उनके तेवर व स्टाइल को देख हिंदुस्तान के स्थानीय संपादकों में पहले से कायम आशंका और बढ़ गई है। स्थानीय संपादकों को यह महसूस होने लगा है कि प्रबंधन ने शशि शेखर को असीमित अधिकार दे रखा है। इसलिए शशि शेखर अपने तरीके से अखबार का संचालन करेंगे। स्थानीय संपादकों का कार्य करने का अभी तक का जो रुटीन रहा है, वह अब नहीं चलने वाला है, यह बात सभी स्थानीय संपादकों को शशि शेखर ने बैठक में समझा दिया। शशि शेखर अखबार के कंटेंट से नाखुश दिखे। उन्होंने इसे जल्द ही चुस्त-दुरुस्त और ठीक करने का भी संकेत दिया। अखबार के सभी जिला व शहर संस्करणों को और ज्यादा स्थानीय बनाने पर भी शशि शेखर ने बल दिया। नए लांच होने वाली बरेली संस्करण के कंटेंट को लेकर शशि शेखर ने लखनऊ के वरिष्ठ स्थानीय संपादक नवीन जोशी और बरेली संस्करण के स्थानीय संपादक अनिल भास्कर के साथ अलग से बैठक की। स्थानीय संपादकों के साथ बैठक में सीईओ राजीव वर्मा समेत एचआर व प्रबंधन के अन्य विभागों के वरिष्ठ लोग भी शामिल थे। इससे पहले शशि शेखर ने दिल्ली संस्करण के वरिष्ठ स्थानीय संपादक प्रमोद जोशी के साथ बैठक की। फिर दिल्ली संस्करण में काम करने वाले संपादकीय सहयोगियों से परिचय प्राप्त किया। उन्होंने सभी संपादकीय सहयोगियों से कह दिया है कि वे जब भी चाहें, उनसे सीधे संपर्क कर सकते हैं। 

शशि शेखर की मीटिंग के बाद हिंदुस्तान के स्थानीय संपादक अब रक्षात्मक मुद्रा में हैं। कुछ का कहना है कि जितने दिन तक वे आत्मसम्मान के साथ काम कर सकते हैं, करेंगे। अगर उन्हें यह लगने लगा कि यहां पर काम करने में दिक्कत हो रही है तो फिर नया विकल्प तलाशना शुरू कर देंगे। बैठक में एक स्थानीय संपादक काफी मुखर थे। उन्होंने शशि शेखर के आगे अपनी बात खुलकर रखी। कुल मिलाकर हिंदुस्तान की सभी यूनिटों के वरिष्ठों में कायम संशय का भाव खत्म होने के बजाय अब और ज्यादा बढ़ गया है। सूत्रों का कहना है कि ऐसा होना स्वाभाविक भी है। अभी तक मृणाल पांडे की गुड बक में रहे सभी स्थानीय संपादक अपनी मर्जी और नीति के हिसाब से काम करते थे। मृणाल पांडे स्थानीय संपादकों के काम में दखल कम देती थीं। शशि शेखर हमेशा से केंद्रीकृत तरीके से काम करने के आदी रहे हैं। इसलिए स्थानीय संपादकों को हर कदम पर शशि शेखर को जवाब देना होगा। इस बदलाव से स्थानीय संपादक खुद को असहज महसूस करने लगे हैं।  हिंदुस्तान से जुड़े एक सूत्र का कहना है कि दिल्ली स्थित हिंदुस्तान के मुख्यालय के प्रथम तल (संपादकीय विभाग) पर शशि शेखर के आने के बाद आशंका और असहजता का माहौल बन गया है। अभी तक हिंदुस्तान में काम करने को सरकारी नौकरी समझ कर काम करने वाले परेशान हो चुके हैं। वहीं द्वितीय तल (प्रबंधन) में काफी रौनक है। वहां के माहौल से ऐसा प्रतीत हो रहा है कि शशि शेखर को लाकर प्रबंधन ने सब कुछ ठीक हो जाने की गारंटी कर ली है। 

उधर, चर्चा इस बात की भी है जो प्रबंधन मृणाल पांडे के पिछले कई वर्षों के कार्यकाल में ‘बदलेगा हिंदुस्तान’, ‘बदल रहा है हिंदुस्तान’ और ‘बदल गया हिंदुस्तान’ का नारा लगा रहा था,  वही प्रबंधन अब शशि शेखर के कार्यकाल में फिर से यही नारा दुहराने वाला है- ‘बदलेगा हिंदुस्तान’, ‘बदल रहा है हिंदुस्तान’ और ‘बदल गया हिंदुस्तान’। इन तीन चरणों के बदलाव के संबंध में शशि शेखर ने अपनी बैठक में इशारा भी कर दिया है। उन्होंने लेआउट, खबरें, तेवर-कलेवर को लेकर अपनी नाखुशी का इजहार कर दिया और इसे बदलने के संकेत दे दिए हैं। इस पर कुछ स्थानीय संपादकों का कहना है कि आखिर गड़बड़ी कहां है, यह तो पता चले। सूत्रों के मुताबिक आने वाले दिनों में हिंदुस्तान में आंतरिक द्वंद्व तेज होने के आसार हैं क्योंकि हिंदुस्तान का शशि शेखर के राज में जो बदलाव होगा, वह सहज और स्मूथ नहीं होने वाला है। अभी तक जो टीम है, उसने मृणाल पांडे के विजन के हिसाब से अखबार को बदला और संवारा-निखारा है। शशि शेखर जिस लेवल के अखबार की कल्पना कर रहे हैं, उसे मूर्त रूप देने में इन स्थानीय संपादकों का रवैया उतना ही सहज और स्मूथ होगा, जितना मृणाल पांडे के कार्यकाल में था, इसके बारे में कुछ भी कहना आसान नहीं है।

 

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