मेरा नाम Stephen है, आपका नाम क्ये है?

अमिताभ यदि कोई आपसे इसी तरह से हिंदी और अंग्रेजी में लिख कर कुछ पूछेगा तो इसमें कोई आश्चर्य वाली बात कत्तई नहीं होगी क्योंकि हिंदी और अंग्रेजी भाषा का व्यापक प्रयोग तो हम करते ही हैं. पर यदि ऐसा लिखने वाला एक बूढा अपरिचित अँगरेज़ हो और जिस जगह यह बातचीत चल रही हो वह इंग्लैंड का एक चर्च हो तो आप एक बार आश्चर्य में तो पड़ ही जायेंगे.

जी हाँ, कुछ ऐसा ही मेरे साथ तब हुआ जब मैं रविवार के दिन नहा-धो कर कैम्ब्रिज स्थित अपने मेंजिस होटल से बाहर निकला. चूँकि मैं फुर्सत में था सो इंग्लैंड के कंट्रीसाइड (ग्रामीण इलाका) देखने के लिए घूमते हुए बगल के एक गाँव में पहुँच गया. वहाँ जाने पर एक चर्च का घंटा बजता देख उसी चर्च में हो लिया. चर्च के गेट पर बड़ी दाढ़ी वाले एक बुजुर्ग अँगरेज़ मिले जिन्होंने एक अपरिचित को देख के बड़े प्यार से मुस्कुरा कर मुझे गुड मॉर्निंग किया. मैंने उन्हें उत्तर में बड़े आदर से नमस्कार किया और फिर पता नहीं क्यों इच्छा हुई कि चल कर चर्च में ही कुछ देर बैठा जाए और अंग्रेजों के इस धार्मिक कार्य को देखा जाए.

मैं भी उन बुजुर्ग सज्जन के साथ हो लिया और उनके बगल में बैठ गया. मैंने देखा कि वहाँ करीब तैतीस-चालीस की संख्या में लोग बैठे थे. उनमे से ज्यादातर लोग बुजुर्गवार थे या कम से कम अधेढ़ उम्र के. नौजवान बहुत ही कम होंगे, शायद दो या तीन. मैं वहीँ बैठा रहा और अपने बगल वाले सज्जन से अंग्रेजी में बात करता रहा. मैंने उन्हें बताया कि मैं लखनऊ का हूँ तो वे काफी प्रसन्न हुए और कहा कि वे भी कुछ समय तक ‘गजिआबाद’ में काम कर चुके हैं. आगे पूछने पर मालूम चला कि वे पेशे से इन्जीनियर रहे हैं और एक समय यूपी में रहना हुआ था, जिस दौरान दिल्ली, मेरठ, लखनऊ, इलाहाबाद आदि जाना होता था.

इसके बाद चर्च के धार्मिक कार्यक्रम शुरू हो गए और हम उसी में व्यस्त हो गए. चूँकि सब कुछ काफी व्यवस्थित ढंग से हो रहा था और पूरी तरह शांति थी इसीलिए कोई बातचीत नहीं हो पा रही थी. बीच-बीच में लोग प्रार्थना के लिए उठते, प्रभु और जीसस के प्रति अपनी श्रद्धा और भक्ति प्रकट करते, उनका गुणगान करते और फिर बैठ कर संचालन कर रही महिला पादरी की बातें और सरमन (उपदेश) सुनते. इसी बीच जब उस महिला पादरी का संबोधन चल रहा था तो अचानक बगल वाले बुजुर्ग सज्जन ने एक लिफ़ाफ़े के ऊपर कुछ लिखा और मेरी ओर बढ़ाया. मैंने उसे देखा तो एकदम से अचंभित हो गया. उस पर लिखा था- ‘मेरा नाम STEPHEN है. आप का नाम क्ये है?’  एक तो मैं इंग्लैंड के एक चर्च में बैठा हुआ, ऊपर से एक अँगरेज़ के बगल में और उसके हाथ से हिंदी में लिखा हुआ कुछ आ जाए, वह भी बहुत ही साफ़-सुथरी लिखावट में, तो आश्चर्य होना स्वाभाविक है. मैं भी एकदम से अवाक रह गया. फिर बगल में उस बुजुर्ग को देखा. उनके चेहरे पर एक बड़ी प्यारी सी मुस्कान थी, जिसमे कुछ शरारत थी, कुछ बालपन था, कुछ गर्व का भाव था, कुछ चुहल का और कुछ खुशी का. मैंने भी काफी मुस्कुरा कर अपना आश्चर्य और अपनी खुशी जाहिर की और साथ ही इस कार्य पर शाबाशी भी दिया.

मैंने अपना नाम हिंदी में अमिताभ लिखा तो उन बुजुर्ग से मेरे नाम को हिंदी में देख कर एक-एक अक्षर को अंग्रेजी में अपने ढंग से लिखा- AMITAB और इसके बाद मुझे देखा. मैंने उसके अंत में H जोड़ा तो वह बुजुर्ग एक बार फिर खुश हुआ और मुस्कुरा कर अपनी प्रसन्नता का इजहार किया. इसके बाद उन्होंने अगला प्रश्न किया-‘आप के पास BIBLE है?’ इसके बाद आगे भी लिख कर संवाद होता रहा पर अब अंग्रेजी में ही.

पूरी प्रार्थना खत्म होने के बाद उन्होंने मुझे वहाँ कई लोगों से मिलवाया और सब से यही कहा कि ये पुलिसवाले हैं और पुलिस के बड़े अधिकारी हैं. दरअसल वहाँ एक दिन पहले ही पुलिस के लोग आये थे और नेबरहूड पुलिसिंग पर कुछ चर्चा हुई थी, इसीलिए लोग अपने बीच भारत के एक पुलिस अधिकारी को देख कर खुश थे. स्टीफेन साहब ने मुझे ‘चे’ या ‘कफी’ भी पूछा और ला कर दिया. इस तरह मुझे इंग्लैंड में हिंदी का एक दोस्त और प्रेमी मिल गया जिसकी मुझे सपने तक में उम्मीद नहीं थी.

लेखक अमिताभ यूपी कैडर के आईपीएस अधिकारी हैं और मेरठ में आर्थिक अपराध अनुसंधान शाखा में बतौर पुलिस अधीक्षक पदस्थ हैं. इन दिनों पुलिस प्रशिक्षण के लिए इंग्‍लैंड में हैं.

Comments on “मेरा नाम Stephen है, आपका नाम क्ये है?

  • चंदन कुमार मिश्र says:

    इस बार आपकी कही घटना पसन्द आई। वैसे मैं आपके लिखे को पढ़ कर आगे निकल जाता हूँ खासकर जब आप अमेरिका और इंग्लैंड जैसे देशों का गुणगान करते हैं। भले ही उनके यहाँ हमसे अच्छी व्यवस्थाएँ हों लेकिन भारत में नहीं हैं तो दोष सामान्य आदमी से लेकर सरकार तक का है।
    http://hindibhojpuri.blogspot.com/2011/07/blog-post_02.html पर आकर देख सकते हैं, क्यों मैं इन अंग्रेजों और अमेरिकनों को पसन्द नहीं करता। इस बात पर ज्यादा कहना अभी ठीक नहीं। है।

    आप और नूतन जी अमेरिका और इंग्लैंड की पुलिस को आदर्श व्यवस्था मत मानिए। क्योंकि इतिहास के लिए भौतिकी का शोध अनावश्यक है। इसी तरह भारत की अपनी मानसिकता है, अपनी सामाजिक संरचना है, अपना समाज है यानि सब कुछ ब्रिटेन और अमेरिका से अलग है। इसलिए उनकी व्यवस्था को हम अपने यहाँ लागू नहीं कर सकते। 1947 के पहले भी और बाद भी उन्हीं की बनाई व्यवस्था लागू है और देश सिर्फ़ पीछे गया है। बाहरी आवरण रंगीन हो जाने से देश विकसित नहीं कहलाता। यहाँ सब कर्ज ले-लेकर देश को डुबा कर कुछ अमीरी दिखने की व्यवस्था कर दी गई है लेकिन सब झूठ है और भारत का सच यह है ही नहीं।

    उम्मीद करता हूँ, मेरी बातों का बुरा नहीं मानेंगे। लेकिन भारत के किसी अधिकारी को यहाँ की सामाजिक रचना, लोगों की मानसिकता की बजाय इंग्लैंड की व्यवस्था का अध्ययन करवाना मुझे तो ठीक नहीं लग रहा। क्योंकि मंगल ग्रह की समस्या के लिए चंद्रमा पर शोध बेकार ही है। और वैसे भी जितनी बार यहाँ से लोगों को प्रशिक्षण के लिए बाहर भेजा जाता है उतनी बार भारत सरकार का पैसा बेकार होता है। क्योंकि शायद ही कुछ सीखकर आप यहाँ कर सकेंगे।

    बातों पर ध्यान दीजिएगा।

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  • Pushpendra mishra says:

    Amitabh ji,
    Prabat rai England me hai se lekar Mera nam stephen hai sabhi chiththiya padi. aap ek IPS hai . aamtour per police ka nam aate hi logo ka ke man me ek Khdush tipe ka ensan jahan me baith jata hai…….lekin aap ke lekhan ki kala awam melansarita ka mai kayal ho gaya hu. ha ek bar persanly aap se bat karne ya melne ki ekksha ho rahi hai……….

    Pushpendra mishra Naidunia Jabalpur.

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  • shravan shukla says:

    badhai ho sir. jahan aam hindustani hindi ko bhulaaye baitha hai wahi ek british ke bare mai aisa jaankar bahut khushi hui

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  • चंदन कुमार मिश्र says:

    ये क्या? मेरी टिप्पणी अधूरी क्यों दिख रही है?

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