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वीओआई : बडे़ झटके से बचा मीडिया जगत

सुभाष गुप्तावीओआई के मालिक बदल गए हैं। मित्तल बंधुओं ने अमित सिन्हा को ये चैनल बेचने की फाइनल डील पर आखिर हस्ताक्षर कर ही दिए। कुछ महीने पहले तक वीओआई के आला पदाधिकारी और स्टाफ को बदला जा रहा था। अब मालिकों में बदलाव आ गया है। इससे करीब दो महीने से बंद इस चैनल से जुडे रहे लोगों के चेहरे पर खुशी लौटी है। अंधेरे में दिवाली गुजारने की पीड़ा के बाद की ये खुशी दरअसल, कई उम्मीदों से जुड़ी है। हालांकि वीओआई के नोएडा मुख्यालय का तकरीबन पूरा स्टाफ इस्तीफे देकर अपना फुल एंड फाइनल पेमेंट ले चुका है। राज्यों के ब्यूरो के स्टाफ को अभी ये भुगतान नहीं मिला है। वीओआई के स्टाफ ने दिन रात की मेहनत के बाद ऐसा बहुत कुछ सहन किया है, जिसे यातना की श्रेणी में रखा जा सकता है। वो ज्यादा दिन पुरानी बात नहीं है, जब पगार मांगने पर बार-बार झूठे वायदे मिला करते थे।

सुभाष गुप्तावीओआई के मालिक बदल गए हैं। मित्तल बंधुओं ने अमित सिन्हा को ये चैनल बेचने की फाइनल डील पर आखिर हस्ताक्षर कर ही दिए। कुछ महीने पहले तक वीओआई के आला पदाधिकारी और स्टाफ को बदला जा रहा था। अब मालिकों में बदलाव आ गया है। इससे करीब दो महीने से बंद इस चैनल से जुडे रहे लोगों के चेहरे पर खुशी लौटी है। अंधेरे में दिवाली गुजारने की पीड़ा के बाद की ये खुशी दरअसल, कई उम्मीदों से जुड़ी है। हालांकि वीओआई के नोएडा मुख्यालय का तकरीबन पूरा स्टाफ इस्तीफे देकर अपना फुल एंड फाइनल पेमेंट ले चुका है। राज्यों के ब्यूरो के स्टाफ को अभी ये भुगतान नहीं मिला है। वीओआई के स्टाफ ने दिन रात की मेहनत के बाद ऐसा बहुत कुछ सहन किया है, जिसे यातना की श्रेणी में रखा जा सकता है। वो ज्यादा दिन पुरानी बात नहीं है, जब पगार मांगने पर बार-बार झूठे वायदे मिला करते थे।

कुछ लोगों को पगार की जगह मुकदमें भी नसीब हुए। वीओआई बेचने और खरीदने के लिए मित्तल बंधुओं और अमित सिन्हा के बीच कई महीने से बातचीत चल रही थी। कई तरह की पैंतरेबाजी से लहूलुहान होकर दो महीने पहले इस बातचीत ने अचानक दम भी तो़ड दिया था। इसके साथ ही वीओआई का प्रसारण बंद हो गया था।

वीओआई से सीधे तौर पर जुडे सैकडों पत्रकार और दूसरे मीडिया कर्मियों के लिए ये संकट की घडी जैसा वक्त था। बाजार की मंदी के बीच एक साथ करीब साढे पांच सौ लोगों के बेरोजगार होने से मीडिया क्षेत्र के सामने भी एक बडी चुनौती खडी हो गई थी। मीडिया क्षेत्र में हर साल कुछ सौ नए लोगों को ही रोजगार मिल पा रहा है। ऐसे में अचानक सैकडों लोगों के बेरोजगार होने से मंदी की मार गहराने का खतरा पैदा हो गया था। ऐसी स्थितियां मीडिया के लोगों की सेलरी बारगेन करने की शक्ति पर सीधा असर डाल सकती हैं।

इन हालात में वीओआई के नए कर्ताधर्ता अमित सिन्हा ने स्टाफ को खुद बुलाकर दिसम्बर से अगस्त तक की अटकी हुए पगार देकर न सिर्फ उम्मीदों को जिंदा रखा, बल्कि ये संदेश भी दिया है कि चैनल चलाने के लिए वायदों के पुलिंदे या भव्यता का ड्रामा करने की नहीं, उन लोगों की जरूरत को समझने की आवश्यकता होती है, जिनके खून पसीने की महक किसी तामझाम को भरोसेमंद चैनल बना देती है।

कई महीने भूख से लड़कर अगस्त के आखिर तक चैनल चलाने वाले पत्रकारों और स्टाफ को सलाम करने का दिल चाहता है। माली हालत चरमराने के बावजूद उन्होंने अपने धर्म का जिस निष्ठा और ईमानदारी से पालन किया है, प्रतिकूल हालात में भी जिस तरह दिन रात कार्य करके चैनल की साख से कोई समझौता नहीं किया … उसकी दूसरी मिसाल शायद न मिले। मित्तल बंधुओं ने झूठे वायदे सिर्फ स्टाफ से ही नहीं किए, हालात इशारा करते हैं कि अमित सिन्हा जैसा पुराना पत्रकार भी उनके लच्छेदार शब्दों की जद में आ गया था।

फुल एंड फाइनल पेमेंट लेने वाला वीओआई का स्टाफ अब मित्तल बंधुओं की पुरानी कम्पनी का स्टाफ नहीं रहा है बल्कि अमित सिन्हा की कम्पनी स्टाफ की नए सिरे से नियुक्तियां करेगी। उम्मीद की जानी चाहिए कि वीओआई के स्टाफ के घर आंगन में भी अब खुशियां महकेंगी। देश का मीडिया एक साथ सैकडों लोगों की बेरोजगारी का दर्द झेलने से बच जाएगा। दर्शक एक बार फिर उस चैनल को देख सकेंगे, जिसे साढे पांच सौ से ज्यादा लोगों ने खून पसीने के साथ ही आंसुओं से सींचा है … वे आंसू जो नारों की शक्ल अख्तियार करने लगे थे। स्टाफ और खुद अमित सिन्हा ने तमाम तरह के फरेब और समस्याओं के बावजूद जिस तरह अपनी सदाशयता, सहनशक्ति और ईमानदारी नहीं छोड़ी, वो इसका विश्वास दिलाते हैं कि वीओआई एक बार फिर चमकेगा….


लेखक सुभाष गुप्ता वीओआई, उत्तराखंड के रेजीडेंट एडिटर हैं.

 

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