कोशिश करके भी वामपंथी न बन सका : सुभाष राय

सुभाष रायइंटरव्यू : सुभाष राय : वरिष्ठ पत्रकार और संपादक (विचार), डीएलए : भाग दो : कई मामलों पर असहमतियों के कारण मुझे शशि शेखर से अलग होना पड़ा था : गलत लोग हर दौर में आगे बढ़े पर वे नष्ट भी हुए : कई बार ऐसा लगता है कि शब्द से भी आगे जाने की जरूरत है : मीडिया के लिए कठिन समय, पत्रकार को नयी भूमिका तलाशने का वक्त है : तब लगता था कि हम वही काम कर रहे हैं जो कभी भगत-सुभाष-चंद्रशेखर ने किया : गुरु चंद्रनाथ योगेश्वर ने तांत्रिक दीक्षा दी,  मिथुन भाव वर्जित था पर मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा के प्रयोग की इजाजत : मैं नाथ पंथ का योगी ‘सुभाषानंदनाथ’ घोषित हो गया : इलाहाबाद ने मेरे जेहन से संघ के प्रभाव को खत्म कर दिया : फिर तो लगा कि उनके शरीर से एक मधुर विद्युत धार मेरे शरीर में प्रवेश कर रही है : मैं बहुत सक्रिय और आलसी प्रवृत्ति का हूं : ज्यादा भगदड़ व भागदौड़ पसन्द नहीं करता : मैं पूरी दुनिया घूमना चाहता हूं, धीमी गति से चलने वाले वाहन से : सफलता के लिए जीवन में हमेशा असंतुष्ट रहने की सोच अधकचरी : खाने और पीने में न किसी को पकड़ा है और न किसी को छोड़ा है :


सुभाष राय-आपकी नजर में एक सफल पत्रकार किसे कहा जाना चाहिए?

-एक पत्रकार के नाते मैं अपनी सफलता इस बात से आंकता हूं कि मैंने लोगों के लिए, समाज के लिए, देश के लिए क्या किया, न कि अपने लिए क्या किया। मेरी नजर में किसी भी पत्रकार की सफलता का मानदंड यही होना चाहिए। परिवर्तन की गति को पहचानना और उसे तेज करना पत्रकार की जिम्मेदारी है। ऐसे वक्त में जब लोगों के हक मारे जा रहे हों, लोगों पर जुल्म हो रहे हों, अपराध बढ़ रहे हों, अपनी वृहत्तर जिम्मेदारियों को समझने की जगह अधिकांश लोग निजी एजेंडे पूरा करने में लगे हों, तब इस धारा को उलटने में मीडिया की बड़ी भूमिका हो सकती है। परंतु आजकल मीडिया या पत्रकार इस विजन के प्रति पूरी तरह समर्पित नहीं दिखता क्योंकि वह पूंजी से नियंत्रित हो रहा है। पूंजी के लिए मीडिया अन्य धंधों की ही तरह एक धंधा है। धंधे में फायदा होना चाहिए। इसीलिए पत्रकार का नजरिया जरूरी मुद्दों को पहचानने और उन्हें उठाने की जगह अब शायद यह बन गया है कि जिन मुद्दों को उठाने से धंधा बढ़ सकता हो, वही उठाये जायें। इस दबाव ने पत्रकारों को पूरी आजादी से वंचित कर रखा है। इस धंधे में कई बार वे चीजें भी अच्छा माल बन जाती हैं, जो समाज को या देश को लाभ पहुंचा सकती हैं। लेकिन ऐसा दुर्घटनावश होता है, किसी दृष्टि के कारण नहीं।

-मालिक और पूंजी से घिरा आधुनिक पत्रकार कितना आजाद है?

-पत्रकार की आजादी उतनी ही है, जितनी उसका मालिक देता है। उसकी कलम या वाणी धंधे के उसूलों से बंधी हुई है। क्योंकि वह नौकरी करता है, इसलिए वह भरसक उसूल तोड़ने की हद तक नहीं जाता। जो स्वतंत्र रूप से लिखते हैं, विश्लेषण करते हैं, उन्हें भी माध्यम तो पूंजी ही मुहैया कराती है, इसलिए वे भी लाभ के लिए धंधे की मर्यादा का अतिक्रमण नहीं करते। ऐसे में मीडिया अपनी असली भूमिका सीमित अर्थों में ही निभा पा रही है। यह नहीं कह सकते सुभाष रायकि मीडिया की ताकत खत्म हो गयी है क्योंकि कई मौकों पर मीडिया के दबाव से न्याय होता दिखायी पड़ता है। जेसिका लाल का मामला रहा हो या रुचिका का या सांसदों की रिश्वतखोरी का मामला रहा हो या ठाकरे परिवार के संकीर्ण सोच का, मीडिया ने हिम्मत की और सच का साथ दिया। पर बहुत सारा झूठ, अंधविश्वास भी तो यही मीडिया परोस रहा है। लोग समाचार चैनलों पर मनोरंजन का आनंद उठाने लगे हैं, कुछ इस तरह प्रस्तुतियां की जाने लगी हैं। ज्यादा से ज्यादा दर्शक या पाठक जुटाने की होड़ ही अखबारों और न्यूज चैनलों का कंटेंट तय करने लगी है। क्योंकि जब ज्यादा लोग देखेंगे या पढ़ेंगे, तभी ज्यादा विज्ञापन मिलेंगे, ज्यादा लाभ होगा। यह नजरिया ही गलत है। लोग समाचारों के अलावा समाचारों के नेपथ्य में घट रहे नाटकों को भी समझना चाहते हैं, बाजार के षड्यंत्र को भी जानना चाहते हैं, गरीबों की दुर्दशा और भ्रष्टाचार के सामाजिक-राजनीतिक कारणों को भी पहचानना चाहते हैं। लोग लड़ना भी चाहते हैं और मीडिया से इसकी पहल की अपेक्षा करते हैं। महंगाई के घटाटोप या इसी तरह की अन्य बड़ी समस्याओं के पीछे सरकार की नीयत और उसकी विवशता का पोस्टमार्टम होते देखना चाहते हैं। पर चैनलों पर प्रेम, अपराध की कहानियां, भूत-प्रेतों का रोमांच, भाषा के संयम भंग करते हंसगुल्ले दिखायी पड़ते हैं, अखबारों में भी सनसनी, अपराध और गुदगुदाने वाली सामग्री परोसी जा रही हैं। सोचा नहीं जा रहा है, प्रयोग नहीं किये जा रहे हैं, पाठकों या दर्शकों के चिंतन को झकझोरने, उनकी सोच को परिष्कृत करने और उन्हें एक नागरिक के रूप में अपनी जिम्मेदारियों के प्रति सजग करने की कोशिश नदारद है। इसी नाते मीडिया की विश्वसनीयता भी कम हुई है। फिर भी मीडिया से लोगों की आशाएं खत्म हो गयी हों, ऐसा नहीं है।  एक सवाल मेरे मन में बहुत दिनों से उठता है। हमने सच लिख दिया या बोल दिया, कुछ शब्द फेंक दिया, क्या यहीं हमारी जिम्मेदारी खत्म हो जाती है? आप ने समाज के भीतर के असंतोष को, लोगों की नाराजगी को व्यक्त तो कर दिया लेकिन क्या आप देखते हैं कि नाराजगी दूर हुई, काम हुआ या नहीं? ऐसी परिस्थितियां बनी या नहीं कि गुस्सा कम हो सके? अगर कुछ नहीं हुआ तो आप के शब्द क्या निरर्थक चले गये? कई बार ऐसा लगता है कि अपने माध्यम से भी आगे जाने की जरूरत है, शब्द से भी आगे।

-तो क्या पत्रकार कलम, कंप्यूटर और माइक छोड़कर मैदान में आ खड़ा हो, लड़ाई में सीधा उतर जाये?

सुभाष राय

-अगर जरूरत हो तो अपने शब्दों की विश्वसनीयता स्थापित करने के लिए यह प्रयोग करने का वक्त आ गया है। अगर ऐसा लगता है कि माध्यम से बाहर पत्रकार की मौजूदगी उसकी पहल को और ताकत दे सकती है, और लोगों को सामने आने को प्रेरित कर सकती है तो इसमें बुराई क्या है? इस सवाल पर मीडिया के लोगों को विचार करने की जरूरत है। एक पत्रकार की एक सोशल एक्टिविस्ट के रूप में क्या भूमिका हो सकती है? दोनों साथ-साथ चलते रहें, इसमें क्या खतरे हैं, इसके फायदे क्या हैं? क्या अपनी विश्वसनीयता के लिए यह जरूरी है? एक प्राकृतिक आपदा या दुर्घटना की सूचना पर पहुंचा पत्रकार वहां देखता है कि राहत और बचाव के प्रयासों में उसकी सख्त जरूरत है तो उसकी प्राथमिकता में क्या होना चाहिए? ऐसे अवसर बार-बार उपस्थित होते हैं, जब हमारी अपनी संस्थागत जिम्मेदारियों से ज्यादा महत्वपूर्ण दायित्व अचानक सामने उपस्थित हो जाते हैं, जा किसी एक आदमी की मदद से कई लोगों की जान बच सकती है, ऐसी परिस्थिति में पत्रकार केवल दर्शक बना रहे, खबर बनाता रहे या समाज, देश और जनता के वृहत्तर हित के पक्ष में अपनी प्राथमिकता बदल दे या दोनों काम साथ-साथ पूरा करे? दरअसल हमारे समाज में पहल करने की इच्छा खत्म होती जा रही है, लोग अन्याय, अपराध, जुल्म, अत्याचार, भ्रष्टाचार देखते हैं और चुपचाप आगे बढ़ जाते हैं। अपनी जरूरत पड़ने पर उसी कालिख में लिपट जाते हैं, उसका विरोध नहीं करते। यह पहल क्यों न मीडिया करे? क्यों न पत्रकार आगे आयें? शब्द जब सार्थकता खोने लगें तो शब्दों से आगे बढ़कर जूझने की जरूरत पड़ती है। बेशक आज शब्द कमजोर हुए हैं, कल और कमजोर हो सकते हैं। मीडिया के लिए कठिन वक्त है, पत्रकार को नयी भूमिका तलाशने का वक्त है। वह भूमिका क्या होगी,इस पर विचार की आवश्यकता है।     

-किशोर उम्र की वो कौन-सी स्मृतियां हैं जिसे अब भी आप सहेजे हुए हैं?

-किशोर उम्र में सारा आसमान मुट्ठी में कर लेने की मंशा थी। पढ़ाई भी, आंदोलन भी, कविता भी, प्रेम भी। कई स्तरों पर बंटा हुआ था। पर तलाश थी किसी चीज की। मैं भी नहीं जानता था मैं क्या ढूढ रहा हूं। इतना जरूर था कि साधु और कवि मुझे बहुत अच्छे लगते थे। बचपन में गांव में भीख मांगने आने वाले साधुओं के पीछे घूमता रहता। राजा भरथरी की विरक्ति से संबंधित गीत गाने वाले जोगियों की सारंगी बहुत खींचती थी। मन बहुत साफ था। ऊंच-नीच की बात कभी नहीं आती। भरटोली और चमरौटी में जाने में तनिक संकोच नहीं होता। वे लोग भी मुझे बहुत मानते। बाबू कहते पर खूब बतियाते। गांव में आल्हा या नौटंकी होती तो काका के लाख मना करने पर भी पहुंच जाता। पिताजी को हम तीनों भाई काका ही कहते थे। शहर में  कवि सम्मेलन होता तो मंच के नीचे बैठकर कवियों को निहारता। वे तब मुझे किसी देवदूत से कम नहीं लगते।

-तब आपको किस कवि ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया?

सुभाष राय

-मुझे कविवर श्याम नारायण पांडेय ने उन दिनों बहुत प्रभावित किया। आपातकाल में उनका सान्निध्य भी मिला। तब तक मैं उनके प्रभाव में वीररस की तमाम रचनाएं कर चुका था। पांडेयजी की आपातकाल के आंदोलनकारियों से बहुत सहानुभूति थी। वे दाना-भूजा तो खिलाते ही, खूब पीठ भी ठोंकते। उस दौर में महाकवि निराला, जयशंकर प्रसाद, महादेवी, दिनकर आदि ने भी प्रभावित किया। जिसे पढ़ता उसकी शैली में कविताएं लिखने लगता। वही समय था जब डा. उमा शंकर तिवारी मिले। वे मेरे प्रथम काव्य गुरू थे। नवगीत आँदोलन के बड़े स्तंभ रहे। मेरे अध्यापक भी। उनके नाते कैलाश गौतम, उमाकांत मालवीय, शतानंद, बुद्धिनाथ मिश्र जैसे प्रखर गीतकारों से मुलाकात हुई। तब तक मैं तमाम प्रभावों से मुक्त होकर अपनी शैली और भाषा की तलाश में एक सीमा तक कामयाब होने लगा था। इमर्जेंसी लगी तो लगा कि देश गुलाम हो गया है। मैं तब युवा था। मन बहुत कोमल भी था और बहुत उग्र भी। भीतर कोमल तुकबंदी करने वाला और प्रेमगीत लिखने वाला एक कवि था तो ओज भरी रचनाओं को जन्म देने वाला एक कवि भी। राष्ट्र, त्याग, बलिदान, कर्तव्य की बातें मैंने अपने गुरु मंगनू सिंहजी से सीखीं। वे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कट्टर समर्थक थे। जब मैं बहुत छोटा था तो वे हमारे गांव में अक्सर आया करते थे और शाखा लगाया करते थे। उनकी बुलंद आवाज में वह गीत कभी भूलेगा नहीं, मैं सोता सिंह जगा दूंगा, तुम उसे सुला सकते हो क्या… मैं घर-घर दीप जला दूंगा, तुम उसे बुझा सकते हो क्या….। इमर्जेंसी में उनका घर-सामान सब कुर्क हो गया था। मेरे अग्रज और इस समय झारखंड में आदिवासियों की सेवा में लगे अशोक राय महतो (तब वे महतो नहीं थे) और मैं उस समय वहां खड़े थे, जब पुलिस उनके खाट-खटोले ट्रक पर लाद कर ले जा रही थी। हम दोनों को कोई पहचान नहीं सका। तब तक लड़ाई छिड़ चुकी थी। मैं और मेरे दोस्त सक्रिय हो गये थे। कुछ समय पहले ही गोविंदाचार्य जी के संपर्क में आया था। उनकी सरलता, विद्वत्ता, उदारता, विनम्रता, दोस्ती का भाव चमत्कारिक लगता था। मैं अब भी उनके संपर्क में रहता हूं। वे स्वदेशी आंदोलन के लिए समर्पित विचारक की तरह आज भी देश को अपनी जड़ों से जोड़े रखने के अभियान में जुटे हुए हैं। आंदोलन के दौरान ही अग्रज राम बहादुर राय, प्रबाल मैत्र भी संपर्क में आये। दोनों ही कालांतर में देश के शीर्ष पत्रकार बने। राय साहब प्रथम प्रवक्ता के जरिये अलख जगाने में जुटे हुए हैं तो प्रबाल जी अपने अनुभवों को पुस्तक का रूप देने में लगे हैं। इमर्जेंसी में ताजोपुर गांव हमारे प्रमुख कार्यालय की तरह था। उसी गांव के विजय बहादुर सिंह जी अच्छे कवि हैं। उनका छोटा भाई जगन्नाथ मेरे साथ कालेज में पढ़ता था। वह छात्र संघ का अध्यक्ष भी चुना गया था। उसके पिताजी मेरे महान उत्प्रेरक की भूमिका में होते थे। वे आजाद हिंद फौज के सिपाही रहे थे। गोलियां लगने से उनके दोनों पैर घुटने से नीचे काट दिये गये थे। पर उनकी घनी मूंछों में जो संकल्प था, उनकी बातों में जो दम था, उसका कोई सानी नहीं। विरोध जमकर हुआ। कई बार पकड़े जाने से बाल-बाल सुभाष रायबचे। एक बार तो स्कूल की दीवार पर नारा लिखते समय पुलिस की गाड़ी आ गयी और मैं दीवार से लगे गंदे पंडोहे में उतर गया। गले तक। गाड़ी चले जाने के बाद बाहर निकला तो बदाबू से सराबोर। वैसे ही नदी तक गया। वहां सारे कपड़े उतारकर उनकी फिंचाई की फिर गीले ही पहनकर कमरे पर आ गया। ऐसे कई मौके आये। बड़ा रोमांच होता था। अंत में जब खुद गिरफ्तारी देने का फैसला किया तभी पकड़े गये। मिथिलेश जी मेरे प्यारे मित्रों में थे, आज भी हैं, मेधावी पत्रकार हैं। गिरफ्तारी के लिए वे थाने के सामने अचानक प्रकट हुए थे। जेल में बड़ा आनंद था। कई तरह के लोग थे। संघ के, जमाते-इस्लामी के और आनंद मार्ग के। डा. कन्हैया सिंह जैसा विद्वान साहित्यकार, रामनरेश यादव जैसा सीधा-सादा वकील, यशवंत सिंह और जयशंकर गुप्त जैसे मित्र वहीं मिले। यशवंत बाद में मंत्री बने, रामनरेश मुख्यमंत्री और जयशंकर गुप्त बड़े पत्रकार। वे इस समय लोकमत नागपुर में एक्जीक्यूटिव एडिटर हैं। जेल में मैंने जमाते-इस्लामी के सदस्य और शिवली नेशनल डिग्री कालेज के शिक्षक मौलवी एकराम साहा से उर्दू सीखी थी।

-जब आप ये सब काम कर रहे होते तो किसे रोल माडल मानकर कर रहे होते?

-लगता था कि हम वही काम कर रहे हैं जो कभी भगत सिंह, सुभाष बोस और चंद्रशेखर ने किया था।

-पत्रकारिता की शुरुआत किस तरह हुई?

-इमर्जेँसी हटने के बाद मैं पढ़ाई के लिए गोरखपुर यूनिवर्सिटी गया। मनोविज्ञान में एमए करने। वहीं प्रिय सखा लालजी त्रिपाठी से भेंट हुई। हम दोनों ही मनोविज्ञान विभाग के स्वयंभू  अध्यक्ष की कार्यप्रणाली से असहमत रहे। यह असहमति अपने चरम पर ता पहुंची जब मैंने विभाग के खिलाफ एक लेख लिखा और उस समय के प्रतिष्ठित समाचारपत्र ‘आज’ को भेज दिया। ‘आज’ ने भी देरी नहीं की और वह तीन-चार दिन में ही प्रकाशित होकर आ गया। अब रुकना ठीक नहीं था क्योकि उस लेख में मनोविज्ञान विभाग और उसके कर्ता-धर्ताओं की खाल उधेड़ने में कोई कसर नहीं छूटी थी। मैंने पढ़ाई छोड़ दी, मऊ आ गया। लालजी का क्या हुआ, यह मुझे बाद में पता चला। वे भी विभाग को नमस्कार कर घर चले गये थे। बाद में वे उसी यूनिवर्सिटी के शिक्षा विभाग में नियुक्त हुए। अब प्रोफेसर हैं। वे शिक्षाविद, समाजवैज्ञानिक के अलावा बड़े कवि भी हैं। उनकी दर्जनों पुस्तकों में एक गजल संग्रह भी है- दिल की किताब। तीन और संग्रह प्रकाशनाधीन हैं। मुझे लगता है कि जो बीज मऊ के नामचीन पत्रकार रमाशंकर मिश्र ने अपनी ‘ज्ञान’ पत्रिका में मेरी कविताएं प्रकाशित करके बोया था, उसे ‘आज’ अखबार ने मेरा लेख छापकर अंकुरित करने का काम किया। वह मेरी पत्रकारिता की शुरुआत थी।

-कभी कोई ऐसा क्षण आया हो जब आप रुवांसे हो गए हों?

सुभाष राय-बिलकुल आया है। गोरखपुर विश्वविद्यालय छोड़ने के बाद भटकते हुए मैं आजमगढ़ डीएवी कालेज पहुंचा। डा. कन्हैया सिंह जी के स्नेह से। उसी विभाग में शिक्षक थे श्रीराम वर्मा। वरिष्ठ कवि और आलोचक। वे जितने बड़े लेखक थे, उतने ही अदने आदमी। खूब बतियाते थे, झाड़ भी लगाते थे। एक बार स्कूल में एक कार्यक्रम का संचालन मैंने किया। बहुत अच्छा रहा। शाम को गुरु की शाबाशी लेने उनके घर गया तो वे नजर मिलाने को तैयार ही नहीं थे। आखिर मुझे पूछना पड़ा, गुरुजी कैसा रहा कार्यक्रम। जब वे बोले तो मेरी सारी खुशी काफूर हो गयी–दो कौड़ी का। तुम्हें बोलना नहीं आता। उच्चारण भ्रष्ट है। ठीक करो। मुझे रुलाई सी आ गयी। फिर उन्होंने पीठ ठोंकी, कई नामचीन साहित्यकारों के नाम चिट्ठियां तैयार कीं और कहा, यहां वक्त बर्बाद मत करो, इलाहाबाद जाओ। और मैं इलाहाबाद आ गया। आया तो था पढ़ने के लिए, प्रवेश भी लिया। लेकिन चले कैसे। पैसा कहां से आये। सो दौड़ता रहता। कभी आकाशवाणी तो कभी पत्रिकाओं के दफ्तरों पर।

-इलाहाबाद में किसने आपकी मदद की? किन-किन लोगों से आपका संपर्क हुआ?

-इलाहाबाद में वरिष्ठ कवि कैलाश गौतम ने मेरी मदद की। उन्होंने ‘भारत’ के संपादक डा. मुकुंद देव शर्मा से मिलवाया। मैं ट्रेनी के रूप में रख लिया गया। शायद डेढ़ सौ रुपये वेतन पर। वहां प्रशिक्षुओं का अनुवाद चेक करते थे, वरिष्ठतम पत्रकार और जाने माने साहित्यकार परमानन्द शुक्ल। उम्र रही होगी, 75 के आस-पास। बड़ी-बड़ी आंखें, उन पर मोटा चश्मा और हाथ में अक्षरों को बड़ा करके देखने वाला लेंस। उनसे डर लगता था। वे बार-बार अपने दो चेलों का उदाहरण देते थे। देखो रामदत्त को हमने सिखाया है, शुकदेव को हमने सिखाया है। तब राम दत्त त्रिपाठी अमृत प्रभात में जा चुके थे। वे फिर बीबीसी का उत्तर भारत का काम देखते रहे। शुकदेव बड़े विज्ञान लेखक बने, जिन्हें दर्जनों पुरस्कार मिल चुके हैं और जिनकी सौ से ज्यादा पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। भारत में तब देश के कई शीर्ष हिंदी पत्रकार थे। बाल कृष्ण पांडेय, हेरंब मिश्र, अवध बिहारी श्रीवास्तव जैसे दिग्गजों से सीखने का अवसर मिला। उन दिनों अमृत प्रभात इलाहाबाद का सबसे तेज-तर्रार अखबार था। भारत छोड़ने के बाद में कुछ दिनों के लिए जागरण या शायद देशदूत, इलाहाबाद गया लेकिन उस्तादी में अनुवाद की एक त्रुटि के कारण वहां से बाहर कर दिया गया। दरअसल जो तार मुझे अनुवाद के लिए मिला था, उसमें कुछ अक्षर अस्पष्ट थे। उन्हें अपने ढंग से समझने में गलती कर बैठा और अर्थ का अनर्थ कर बैठा। कुछ ही माह वहां टिक पाया हूंगा। एक मित्र की मदद से मेरा अमृत प्रभात में दाखिल हो गया। वरिष्ठ पत्रकार शिवशंकर गोस्वामी ने मेरा परिचय वहां कराया। पढ़ाई-लिखाई कब नौकरी में बदल गयी, पता ही नहीं चला। पर इस नौकरी ने मेरे पत्रकार को निखारने में बहुत मदद की। वहां एक-से एक धुरंधर पत्रकार मौजूद थे। वहीं मेरी मुलाकात पंडित रामधनी द्विवेदी, श्रीधर द्विवेदी, सुधांशु उपाध्याय, गोपाल रंजन, डा. जगदीश द्विवेदी, एस के दुबे, कृष्ण मोहन अग्रवाल सरीखे लोगों से हुई। आदरणीय सत्यनारायण जायसवाल को अर्थशास्त्र का पंडित माना जाता था। वे संपादक थे। बाद में यह जिम्मेदारी कमलेश बिहारी माथुर जैसे ब्यूरोक्रेटिक अंदाज सुभाष रायवाली शख्सीयत ने संभाली। माथुरजी को तेज-तर्रार बच्चे बहुत पसंद थे, वे थोड़ी सी बातचीत में पहचान लेते थे। वहीं कभी-कभार मंगलेश डबराल और वीरेन डंगवाल जैसे लोगों से मुलाकातें हो जाती थीं। इन दोनों के लिए मेरे मन में भारी सम्मान है। उसी समय इनकी गणना बड़े कवियों में होने लगी थी। सुधांशु उपाध्याय मेरे बड़े भाई जैसा थे, अब भी हैं। वह भी आज नवगीत के क्षेत्र में एक बड़ा नाम हैं।  पढ़ाई बंद हो गयी थी। एक बार हिंदी में, एक बार समाजशास्त्र में और एक बार दर्शनशास्त्र में प्रवेश लेकर भी इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से स्नातकोत्तर की उपाधि लेने का गौरव हासिल नहीं कर सका।

-ऐसा नहीं लगता कि आप कई व्यक्तित्वों को एक साथ जीने की कोशिश कर रहे थे?

-हां, ये तो है. तब मैं विभाजित व्यक्तित्व के साथ मैं खुद से ही लड़ रहा था। एक तरफ साहित्यकार बनने की ललक, सो गोष्ठियों में धमकना, साहित्यकार मित्र मंडली में शिरकत करना, बड़े साहित्यकारों से मिलना-जुलना तो दूसरी तरफ पूर्ण पत्रकार बनने की कोशिश। एक तीसरी धारा भी थी, जो जन्म से थी शायद। एक सहज आध्यात्मिक तरंग थी भीतर। तब तांत्रिकों की चमत्कार कथाएं आकर्षित करती थीं। इसीलिए एक तांत्रिक गुरु की तलाश थी। यह तलाश पूरी करायी चंडी के संपादक उमादत्त शुक्ल ने। उन्होंने मुझे मेरे गुरु से मिलवाया। उनका नाम था चंद्रनाथ योगेश्वर।

-अच्छा बताया आपने। तंत्र-मंत्र और अध्यात्म में क्या सक्रियता रही, विस्तार से बताएं?

-काफी सक्रिय रहा। जो गुरु मिले चंद्रनाथ योगेश्वर, उनसे मैं व एक और पत्रकार मित्र राजेंद्र गुप्त ने तांत्रिक दीक्षा ले ली। मुझे महाकाली का बीजाक्षर मंत्र मिला। गुरुदेव की पंचमकार साधना थी। वे महान तांत्रिक और तंत्र साहित्य के उद्धारक स्वामी अक्षोभ्यानंद के शिष्य थे। स्वामीजी ने देश भर से तंत्र साहित्य की सैकड़ों पांडुलिपियां एकत्र कीं और उन्हें सुरक्षित रखवाया। जब साधना चल पड़ी तो चमत्कारप्रियता गायब हो गयी। वहां गुरुदेव के घर में ही रहते। मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा के प्रयोग की गुरु ने इजाजत दी थी। मिथुन भाव वर्जित था, शायद विवाह के बाद उसे साधन के रूप में इस्तेमाल होना था। उस दौरान मुझे तंत्र साहित्य पढ़ने का मौका मिला। खूब पढ़ा। धीरे-धीरे शुद्ध तंत्र और अभाचार कर्म का अंतर समझ में आने लगा। मकार का अर्थ भी सुभाष रायखुलने लगा। साधना और अध्ययन में मेरी गहन रुचि को देखते हुए गुरुदेव ने मुझे उच्चस्तरीय क्रम में दीक्षित करना आरंभ किया। और एक दिन मेरा पूर्णाभिषेक हो गया। मैं नाथ पंथ का योगी घोषित हो गया। मेरा नाम सुभाषानंदनाथ हो गया। मुझे चक्र पूजन संपन्न कराने और दीक्षा देने का अधिकार मिल गया। पर कई वर्ष मकार के स्थूल सेवन के साथ तंत्र साहित्य के पारायण ने मुझे संदेह में डाल दिया था। मैं समझ गया था कि मकार स्थूल नहीं है, यह सांकेतिक है। मद्यपान का मतलब शराब पीना नहीं है, मांस का मतलब मांसभक्षण नहीं है, बलि का मतलब बकरे की गर्दन उड़ाना नहीं है। मैं बेचैन रहने लगा था। यह सब नितांत व्यक्तिगत था, इसलिए मेरे पत्रकार मित्रों को बहुत कुछ पता नहीं रहता कि मैं क्या कर रहा हूं। कमरे के बाहर मैं एक उग्र तेवर वाले युवा के रूप में ही जाना जाता था।

-आपके समय इलाहाबाद में किस तरह की सक्रियता हुआ करती थी?

-उस समय इलाहाबाद साहित्यिक गतिविधियों और प्रशासनिक परीक्षाओं के केंद्र के रूप में देश भर में प्रतिष्ठित था। शैलेश मटियानी, उपेंद्र नाथ अश्क, अमरकांत, नरेश मेहता, लक्ष्मीकांत वर्मा, जगदीश गुप्त, डा. रघुवंश, दूधनाथ सिंह, मार्कंडेय, नीलकंठ, राजेंद्र कुमार, अमर गोस्वामी, अजामिल, कैलाश गौतम, उमाकांत मालवीय, अमरनाथ श्रीवास्तव समेत अनेक बड़े और नामचीन नाम हमारे सामने थे। शैलेश मटियानी, मार्कंडेय, दूधनाथ सिंह, कैलाश और अमरनाथ का मेरे ऊपर अतीव स्नेह था। पर मेरे हम उम्र साथियों की भी कमी नहीं थी। ऐसे कुछ मित्रों में चितरंजन सिंह, रामजीराय, राजेंद्र मंगज, राजकुमार, शिवशंकर मिश्र, केके राय, मिथिलेश सिंह, हरीश मिश्र, अनिल सिंह, त्रिलोकी राय, अरविंद कुमार सिंह, वंशीधर मिश्र का नाम ले सकता हूं। ये सभी साहित्य, समाज और राजनीति की प्रखर समझ रखने वाले युवक थे। बाद में इनमें से कई शीर्ष पत्रकार, कुछ साहित्य के शिक्षक, कुछ प्रशासनिक अधिकारी, सामाजिक कार्यकर्ता, संपादक, कवि, साधु बने। इन मित्रों का मेरे ऊपर बहुत प्रभाव पड़ा। चिंतन और समझ का दायरा बढ़ा, चीजों को देखने का नजरिया बदला, परिवर्तन की हूक पैदा हुई। हम सभी डा. सिंहेश्वर सिंह को एक तरह से अपने नेता की तरह देखते थे। डा. सिंह अत्यंत प्रतिभाशाली लेखक, चिंतक और कवि थे। समझौता उनके व्यक्तित्व में था ही नहीं। वे बहुत अनिश्चित जिंदगी जीते थे। न रहने का ठिकाना, न खाने का। कभी कोई काम मिल भी जाता तो भी लंबा नहीं चलता। झगड़ा कर लेते। तब उनकी रचनाएं सारिका, भाषा जैसी अत्यंत प्रतिष्ठित पत्रिकाओँ में प्रकाशित होती थीं। मैं उनका मुरीद था। जह उनके पास एकदम पैसे नहीं होते तो वे मेरे या हरीश के पास प्रकट होते और बेलाग सुभाष रायमांग लेते। वे जानते थे कि हम अपने पैसों पर उनका बराबर का अधिकार मानते थे। वे बेशक बड़े रचनाधर्मी थे, पर उन्हें भ्रम था कि इलाहाबाद के सभी बड़े साहित्यकार मठाधीशी करके उनके खिलाफ साजिश करते रहते हैं। प्रख्यात साहित्यकार धर्मवीर भारती को चुनौती देने के लिए उनकी तर्ज पर डा. सिंहेश्वर ने सूरज का आठवां घोड़ा नाम का उपन्यास लिखा, पर उसकी चर्चा ज्यादा नहीं हुई। वे बहुत लिखते थे। इतना ज्यादा कि अपने सीलन भरे कमरे में बोरों में भरकर रचनाएं टांड़ पर रखते। वे मिथिलेशजी के साथ एक झुग्गी जैसे कमरे में रहते थे। वे जीते जी हम मित्रों के लिए कहानी जैसे बन गये थे। महान साहित्यकार त्रिलोचन जी के शिष्य थे। भोजन, भाषण, शयन, लेखन के अलावा उनके पास कोई और काम नहीं था।

-आपने बताया कि शुरुआत में आप पर संघ के लोगों का प्रभाव रहा। इलाहाबाद के जिन लोगों का आपने नाम गिनाया, उनमें कई वामपंथी थे और हैं। आपका वामपंथ की ओर रुझान नहीं हुआ?

-सही कहिए तो इलाहाबाद ने मेरे जेहन से संघ के प्रभाव को खत्म कर दिया। मेरे अधिकांश मित्र वाम सोच के थे, यह सही है। मुझे उनकी बातें भी अच्छी लगती थीं, हम खूब बहस करते थे। पर मैं पूरी कोशिश करके भी वामपंथी नहीं बन पाया। मुझे लगता था कि अच्छा बने रहने के लिए संघी या वामपंथी होने की जरूरत नहीं है। नैतिक, उदार और ईमानदार मन हो तो पर्याप्त है। चिंतन के विकास के लिए पढ़ाई की जरूरत होती है और पढ़ने के मामले में कोई आग्रह नहीं होना चाहिए। इसीलिए मैंने वामपंथी साहित्य भी पढ़ा और अपना पुरातन साहित्य भी। उपनिषदों ने बहुत प्रभावित किया।

-तांत्रिक साधना के दौर से बाहर कैसे निकले?

-इलाहाबाद में ही एक दौर आया जब मैं तांत्रिक साधना से मोहभंग की स्थिति में आ गया था और वैकल्पिक मार्ग की तलाश कर रहा था। मुझे अनुभव के स्तर पर जानना था। मैं ऐसे किसी व्यक्ति की तलाश में था, जो भाषण या उपदेश न देकर मुझे आनुभविक धरातल पर ले जा सके। तब मैं इलाहाबाद में गणेशनगर में रहता था। वहां मेरे समानधर्मा मित्र थे, शील कुमार मिश्र। वे अब आगरा कालेज में रसायन शास्त्र विभाग में रीडर हैं। हम दोनों हर आध्यात्मिक तलाश में साथ होते थे। किसी भी साधु के बारे में पता चलता तो तुरंत पहुंच जाते। कई पाखंडियों, ठगों से भी पाला पड़ा। एक बार तो एक ठग शव साधना कराने शमशान पर भी ले गया लेकिन वहां उसकी कलई खुल गयी। एक और मित्र थे विद्यानंद। हंडिया बाबा के शिष्य। भौतिकशास्त्र से प्रथम श्रेणी में एमएससी, उच्च कोटि के साधक। बाद में वे मेरे गुरुभाई बने और आज भी इलाहाबाद में प्रकृष्ट योग साधना में रत हैं। वे एक ऐसे घर में रहते हैं जो बाहर से बंद रहता है। बहुत कम लोग जानते हैं कि यहां कोई संन्यासी रहता है। नवरात्र के दिनों मैं भैरवकुंड (विंध्याचल) में अपने तांत्रिक गुरु के साथ होता। वहां चक्र पूजन समेत तमाम गुह्य साधना क्रम चलते रहते पर धीरे-धीरे मैं अन्यमनस्क होने लगा था। उसी बेचैनी में मेरे कानों में वहां हो रहे यज्ञ के संकल्प की ध्वनि आयी। मुझे उसके आरोह-अवरोह, उच्चारण ने बेहद प्रभावित किया। मैंने वहां जाकर देखा तो एक साधारण ब्राह्मण संकल्प बोल रहे थे। अगले साल फिर वही यज्ञ, वही पंडितजी। लेकिन उस बार मैंने वहां कुछ लोगों से बातचीत की। कछवा इंटर कालेज के एक अध्यापक मिले। वंशराज सिंह। उन्होंने यज्ञ संचालक ब्राह्मण के बारे जो जानकारियां दीं, उससे मेरे मन को लगा कि मेरी तलाश पूरी होने वाली है। मैंने तुरंत डा. शील कुमार मिश्र को खबर की और फिर हम दोनों एक साथ विंध्याचल पहुंचे। पडितजी से मिले, आग्रह किया, हम आ गये हैं। उन्होंने कहा, इसी यज्ञ मंडप में आराम करो, सोना चाहो तो सो जाओ, मैं जगा लूंगा। जब उन्होंने जगाया तो रात के तीन बज रहे थे। चारो ओर सन्नाटा था। पंडितजी थे अकोढ़ी-विरोही गांव के पंडित देवता प्रसाद मिश्र। सहज, सरल, अदने ग्रामीण जैसे। खिलखिलाकर बच्चों की तरह हंसने वाले। बड़ी चुटिया और मोटी जनेऊ वाले। उन्होंने हम दोनों को अपने सामने बैठाया और बिना कुछ पूछे एक-एक ऊंगली हम दोनों की पसरी हथेलियों के पोर पर रख दी। फिर तो लगा कि उनके शरीर से सुभाष रायएक मधुर विद्युत धार मेरे शरीर में प्रवेश कर रही है। कुछ देर में पूरा शरीर स्पंदनों के संकुल में बदल गया। मैंने उन्हें बताया तो उन्होंने कहा कि मेरी आंखों में देखो। उनकी आंखों में देखने के बाद जब मैंने आंखें बंद कीं तो उनकी एक आंख मेरे भाल पर। जैसे तीसरा नेत्र। आश्चर्यजनक ढंग से यह आंख महीने भर मेरे ललाट पर रही और उसने अनुभवों की एक नयी दुनिया मेरे सामने खोल दी। गुरुदेव से मिलना मेरे जीवन की सबसे सुखद घड़ी थी। वे कर्मकांड के मामले में जितने पारंपरिक थे, साधना के मामले में उतने ही प्रगतिशील। वे शरीर से तो नहीं रहे लेकिन शक्ति के रूप में मुझमें अब भी हैं, मुझे निरंतर ले चल रहे हैं। कुछ वर्षों तक उनका सान्निध्य मिला फिर मैंने मई 1986 में शादी कर ली, उनका आशीर्वाद लिया और आगरा आ गया। पढ़ने की मन में इच्छा थी, इसलिए आगरे में आज और अमर उजाला में काम करते हुए पढ़ाई पूरी की। साहित्य में एमए किया प्रथम श्रेणी में, नेट पास किया, ला किया और दादू के साहित्य पर शोध किया, जिसके लिए आगरा विश्वविद्यालय से जनवरी 2010 में डाक्टोरेट मिली। अभी पढ़ाई से जी भरा नहीं है।   

-आपने शादी इलाहाबाद में रहते हुए ही की?

-योग और तन्त्र की साधना करते समय मैंने यह सोचा कि मैं कभी शादी नहीं करूंगा। लेकिन बाद में वहां कुछ ऐसी परिस्थितियां बनीं कि मुझे अपना निर्णय बदलना पड़ा। घरवालों ने भी मुझ पर दबाव डाला और मुझे भी लगा कि अब शादी कर लेनी चाहिए, तो मैंने अपने घर पर शादी करने का सन्देशा भिजवा दिया। मेरी पत्नी के पिताजी और मेरे भैया पहले से ही बहुत अच्छे मित्र थे और दोनों ने मिलकर हमारी शादी तय कर दी। इस तरह दस दिनों के भीतर शादी हो गई। शादी के बाद पत्नी को लेकर इलाहाबाद आ गया। शादी के बाद लगा कि अब और पैसे होने चाहिए क्योंकि इतने पैसों से गुजारा करने में थोड़ी कठिनाई हो रही थी। उसी समय 1986-87 में आगरा से ‘आज’ अखबार निकला तो हम आगरा आ गए और इस तरह से कुछ पैसे भी हमारे बढ़ गए।

-आप ‘आज’ अखबार, आगरा में किसके माध्यम से आए?

-शशि शेखर जी, जो इस समय हिन्दुस्तान के संपादक हैं, उनसे मेरा संपर्क हुआ और वो ही मुझे आज अखबार में ले आए। आज अखबार से पहले शशि शेखर इलाहाबाद में थे और आगरा में आज अखबार के एडिटर बनकर आए थे। यहां आकर उन्होंने अपनी एक टीम बनाई और उनकी इस टीम में मैं भी था। उसमें मैं उप समाचार संपादक था। बाद में हम लोग अलग हो गए।

-आपने ‘आज’ अखबार कब छोड़ा?

-1990 में। मैं अमर उजाला में आ गया था। लगभग दो-ढाई वर्षों तक मैंने आज अखबार, आगरा में काम किया था।

-‘आज’ अखबार आगरा में बहुत बिका और एक दिन बंद भी हो गया, यह कैसे हुआ?

-मैं जब इसमें काम करता था, तो यह अखबार बड़ी ऊंचाइयों पर था और बाद में क्यों बन्द हो गया, इसके कई कारण हो सकते हैं। कभी-कभी लोगों का अखबार से विश्वास उठ जाता है, चाहे इसके लिए एक छोटी-सी घटना ही क्यों न जिम्मेदार हो। लोगों का जो विश्वास आज अखबार ने शुरुआती दिनों में अर्जित किया, उसे बाद में नहीं बनाए रख सका। यही इस अखबार के बन्द होने का मुख्य कारण था।

-आज अखबार आगरा में संपादक शशि शेखर हुआ करते थे. उनकी टीम के आप हिस्से रहे हैं. आपकी उनके बारे में क्या राय है?

-जब मैं उनके साथ काम करता था, उस समय कई मामलों पर हम दोनों एक दूसरे से असहमत हुआ करते थे। वो असहमतियां यहां तक पहुंच गई थी, कि हम दोनों को अलग होना पड़ा। मैं मानता हूं कि जो किसी से असहमत होगा, वह उससे थोड़ा बायस्ड भी होगा, इसीलिए मैं उनके बारे में मेरा टिप्पणी करना ठीक न होगा।

-शशि शेखर के बारे में कहा जाता है कि वे असहमत लोगों को साथ नहीं रखते, क्या सच है?

-अब यह मैं नहीं कहूंगा, लेकिन ठीक है, जो उनसे सहमत हैं, वो उनको रखते हैं, और आज के जमाने में मुझे लगता है कि सफलता के लिए यह फण्डा काम कर रहा है। अगर मैं ही किसी ऐसे व्यक्ति को काम पर रख लूं जिसके विचार मुझसे नहीं मिलते हैं और वह मेरे ढंग से काम नहीं करता है तो यह मेरे लिए ही परेशानी का कारण होगा।

-‘आज’ अखबार क्यों छोड़ा और ‘अमर उजाला’ कब ज्वाइन किया?

-कुछ पर्सनल कारणों की वजह से मैंने एक दिन अचानक आज अखबार छोड़ दिया। घर पर ग्यारह-बारह दिन आराम करने के बाद, मैंने अजय अग्रवाल जी को फोन किया। उन्होंने मुझे बुलाया और हमारी बातचीत हुई। इसके बाद मैं अमर उजाला, आगरा में काम करने लगा। 2005 तक अमर उजाला, आगरा में रहा। अजय जी ने अमर उजाला से अलग होकर जब अपना मीडिया हाउस शुरू किया तो तबसे डीएलए में हूं।

-आज अखबार आगरा के दौरान का कोई अनुभव जो शेयर करना चाहें?

-कोई विशेष घटना नहीं। मेरा जो काम करने का तरीका होता था वह बहुत टारगेटेड रहता था। जो संपादक होते, वह मीटिंग करते, लोगों से अपने ढंग से काम कराते। लोगों से क्या करा रहे हैं, इसके बारे में मैं ज्यादा नहीं जानता था। लेकिन मेरे पास जब चीजें आती थी, तो मैं बहुत टारगेटेड रहता था। शुरू से यह मेरा काम करने का स्टाइल रहा  है। मैं यह चाहता था कि जिस तरह का संघर्ष मैंने जीवन में किया है, ऐसा संघर्ष जो व्यक्ति कर रहे हैं, उनकी मैं मदद कर सकूं। समाज में नई चेतना ला सकें। अगर कोई अपने अधिकार से वंचित रह गया है तो उसकी मदद करना दायित्व है। ऐसा मैं बचपन से सोचता रहा हूं और इसी सोच के कारण इमरजेंसी में जेल गए और इसी सोच को लेकर पत्रकारिता में आया। खबरों के संशोधन-संपादन में हमेशा इस बात का ध्यान रखता हूं और दूसरों से रखवाने की कोशिश करता हूं कि कोई ऐसी बात न कट जाए, हटा दिया जाए जिससे अधूरी जानकारी समाज तक पहुंचे।

-आप पैसे और पद के चक्कर में उछल-कूद मचाने वाले संपादकों में से नहीं हैं। जिसके साथ रहे, जी भर कर रहे। वजह?

-मेरे व्यक्तित्व की बनावट बड़े अजीब ढंग की है। मैं बहुत सक्रिय भी हूं और बहुत आलसी भी हूं, इसलिए नौकरी के मामले में मैं एक जगह जहां पहुंच गया वहां से कभी हटना नहीं चाहा। और जीवन में इंसान हमेशा पद और पैसे के लिए भागता रहता है। कुछ लोग बहुत जल्दी बहुत उच्च पदों पर पहुंच जाते हैं लेकिन मेरे अन्दर यह बात कभी नहीं आई। अमर उजाला में जब मैंने ज्वाइन किया तो मैं कभी किसी से अपने बारे में कुछ नहीं कहता। मैं अपना काम करता रहता था और जब भी मेरा प्रमोशन होता या सेलरी बढ़ती थी, तो मुझे बुलाकर बता दिया जाता। मुझे ऐसा लगता था कि जो पैसा हमें मिलता है, उसमें हमारी गुजर-बसर ठीक ढंग से हो जाती है। शायद इसीलिए मुझे बहुत ज्यादा पैसों की जरूरत नहीं महसूस हुई।  

-आपको ऐसा नहीं लगा कि आपके साथ के कई लोग करियर में बहुत आगे निकल गए?

-मेरा जो आध्यात्मिक मन है, उसके कारण मैं जीवन में ज्यादा भगदड़ व भागदौड़ पसन्द नहीं करता। पैसे कम हों लेकिन शांति हो, प्रतिष्ठा हो, ऐसा मैं चाहता रहा हूं। मैं जहां कहीं होता हूं, वहीं बने रहना मुझे पसन्द आने लगता है। आगे जाना और पीछे रह जाना, यह देखने का अपना-अपना नजरिया है।

-आपको कौन-सी अभिनेत्रियां पसंद रही हैं?

-मैं सिनेमा बहुत कम देखता हूं। हां, किशोरावस्था में, जैसे सबको शौक होता है सिनेमा देखने का, वैसे मुझे भी था और मुझे कई अभिनेत्रियों का काम अच्छा लगा। जैसे स्मिता पाटिल, रेखा, हेमा मालिनी। कुछ फिल्में मीना कुमारी की बहुत अच्छी लगीं। जिस फिल्म में जो अभिनेत्री अच्छा काम करती, उस समय वही अच्छी लगने लगती। मेरी कभी कोई ऐसी पसन्दीदा अभिनेत्री नहीं रही जिसकी सभी फिल्में मैं देखने के लिए सिनेमाहाल गया होऊं।

-आपकी नजर में आपकी तीन-तीन बुराइयां-अच्छाइयां क्या हैं?

-मेरे अन्दर बहुत सारी बुराइयां हैं। एक तो यह कि तंबाकू-पान खाता हूं, जो मुझे बहुत नुकसान पहुंचाता है और मुझे लगता है कि इसे मुझे छोड़ देना चाहिए। दूसरा यह कि मेरे मन में जो भी बात आती है, उसे मैं तुरन्त बोल देता हूं। ऐसा करना व्यावहारिक नहीं माना जाता। इसीलिए लोग मुझसे नाराज रहते हैं। तीसरी मेरी सबसे बड़ी बुराई यह है कि मेरे मन में जिस व्यक्ति के प्रति जैसा भाव रहता है, वह भाव उस आदमी के सामने प्रकट हो जाता है। शायद आदर्शवादी प्रवृत्ति के कारण ऐसा होता है। अगर मैं किसी से नाराज हूं तो वह नाराजगी मेरे चेहरे पर साफ पता चलती है। रही अच्छाइयों की बात तो हमारी जो अध्यात्म की यात्रा है, उसमें हमें बुराइयों को देखना ही ठीक लगता है। पहले मैं अपने अन्दर की अच्छाइयों को देखता था, गिनता था, लेकिन जैसे-जैसे मैं अपनी साधना के पथ पर आगे बढ़ता गया, चीजों को देखने का मेरा नज़रिया ही बदल गया।

-आपके जीवन का लक्ष्य क्या है?

-मुझे लगता है कि अभी मैं अपने जीवन के लक्ष्य की तलाश कर रहा हूं। ऐसा महसूस होता है कि मेरे जीवन के लक्ष्य की तलाश कहीं न कहीं अध्यात्म में जाकर ही पूरी होगी।

-आपके जीवन की वाइल्ड फैंटेसी क्या है? क्या चीज करने की इच्छा होती है?

-मैं अपने जीवन में एक बार पूरी दुनिया घूमना चाहता हूं और वो भी ऐसे वाहन से जो आराम से, धीरे-धीरे, चले। धीरे-धीरे चले ताकि मैं सारी दुनिया को देखता-महसूसता हुआ आगे बढ़ूं। लेकिन मुझे नहीं लगता कि मेरी यह इच्छा कभी पूरी हो पाएगी क्योंकि जिस धीमी गति से मैं दुनिया घूमना चाहता हूं, उसमें कई वर्ष लग जाएंगे। लेकिन अध्यात्म के द्वारा अगर आप अपने आत्मबल को बढ़ा लेते हैं, तो आपका दृष्टिबल भी बढ़ जाता है और इस तरह आप एक जगह बैठे-बैठे ही सब कुछ देख सकते हैं। ऐसी दृष्टि बहुत विरले लोगों को ही मिलती है लेकिन ऐसा सोचने में क्या बुरा है कि एक दिन ऐसी शक्ति मुझे भी मिल जाए।

-क्या आपकी इच्छा सब कुछ छोड़कर साधु-संत बनने की नहीं होती है?

-आप कहीं भी रहकर अपने हिसाब से जीवन जी सकते हैं। इसके लिए साधु बनना जरूरी नहीं है। मुझे लगता है कि बाहरी दिखावे से ज्यादा अन्दर की साधुता जरूरी है। साधु बनकर घूमने से क्या मिलेगा? मुझे लगता है कि जो गलती हमारे पूर्वजों ने की है, उससे हमें सीखना चाहिए। इतना घूमने और टहलने के बाद पूर्वजों को लगा कि यह सब व्यर्थ था। वे पांच-छ: दिन किसी वृक्ष के नीचे बैठे और तय कर लिया कि तभी उठूंगा जब तक ज्ञान नहीं प्राप्त कर लेता, चाहे भले ही इसके लिए शरीर नष्ट हो जाए, हडि्डयां गल जाएं। तो जो गलती उन्होंने की है उसे दोहराने की क्या आवश्यकता है. हमें अपने पूर्वजों की गलतियों को नजरअंदाज कर, जिस अभ्यास से उन्होंने ज्ञान सीखा, उसे अपने जीवन में अपनाते हुए आगे बढ़ना चाहिए।

-पत्रकारिता में पहले सरोकार मुख्य एजेंडा हुआ करता था, अब बाजार और बिजनेस मुख्य एजेंडा हो गया है। आपने दोनों दौर देखे हैं। इस बदलाव को किस तरह महसूस करते हैं आप?

-थोड़ी सी कठिनाई तो है। लेकिन पहले भी पत्रकारिता या अखबार चलाने वाले हुआ करते थे लेकिन जितना प्रभाव बाजार का आज है, उतना पहले नहीं हुआ करता था। आज भी जो अच्छे लोग हैं, उनकी मानसिकता यह है कि हमें बाजार को भी सुरक्षित रखना है और अपनी कलम को भी। बाजार जिसके उपयोग का है, वह बाजार को देखे। हमारी कलम को लिखने की स्वतन्त्रता है, हमें यह देखना है। मुझे लगता है यह स्वतन्त्रता सीमित अर्थों में है। बहुत से बाजार समर्थक अखबार बाजारवाद के खिलाफ लेख व खबर प्रकाशित करते हैं। कई अखबारों में मैं यह देखता हूं कि वे उन सिद्धान्तों के खिलाफ लिखते रहते हैं जो उन्होंने स्वयं बनाएं हैं। इसीलिए आज ऐसे लोग रखे जा रहे हैं, जो बाजार को भी समझते हों और अखबार को भी।

-पत्रकारिता में बिजनेस का यह जो भयावह दौर चल रहा है,  उसके बारे में क्या सोचते हैं आप?

-आज पूरी दुनिया पर आर्थिक संकट का दबाव है। हम मध्यवर्गीय परिवारों में जन्म लेते हैं, तो चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा पैसा हमारे घरों में आए तो उसी तरह से एक आदमी जिसने करोड़ों रुपये लगाये हैं, तो फिर वह ऐसा क्यों नहीं चाहेगा कि उसे भी रिटर्न मिले। चूंकि आज पत्रकारिता एक बिजनेस बन गया है तो इसमें जो निवेश करेगा, वह जरूर चाहेगा कि उसे लाभ प्राप्त हो। फिर उसे हम कैसे बुरा कह सकते हैं। उसकी दृष्टि में, यह उसका व्यापार है और हमारी दृष्टि में अपने सिद्धान्तों के पक्ष में खड़े रहना और उसकी रक्षा करना हमारा कर्तव्य है।

-जीवन में कभी किसी ने आपके साथ विश्वासघात किया?

-पहले मन में कई लोगों के प्रति यह भावना आती थी कि उसने मेरे साथ गलत किया। लेकिन अब लगता है कि यह बहुत चिन्तनीय प्रश्न नहीं है। इससे उबर जाना चाहिए।

-आपको सर्वाधिक खुशी कब हुई?

-व्यक्तिगत जीवन में सबसे ज्यादा खुश तब हुआ जब मुझे मेरे गुरु मिले। जब मेरे बेटे का आईआईटी में सेलेक्शन हुआ, तब भी मुझे बहुत खुशी हुई। उससे भी ज्यादा खुश तब हुआ जब मेरी बेटी का भी सेलेक्शन आईआईटी में हो गया।

-ऐसी कोई पंक्ति जिसे आप गुनगुनाते हों?

-मुझे गीता का एक श्लोक बहुत पसन्द है। इसका मैं अपने जीवन में भी अनुकरण करता हूं। वह यह है कि, ‘जो क्षण बीत गया है, मैं उसके बारे में ज्यादा सोचता नहीं हूं, और जो आने वाला है, उसे लेकर ज्यादा चिन्तित नहीं होता हूं, मैं जहां होता हूं, उसकी ही चिन्ता करता हूं और उसके बाद क्या होगा, उसके बारे में नहीं सोचता हूं।’ यह एक श्लोक है जो इस प्रकार है- ‘अशोचानन्य शोचस्त्वम् प्रज्ञावादानस्च भाषसे गतासून गतासूनश्च नानुशोचन्ति पण्डिता’ यह श्लोक उस समय का है जब अर्जुन अपने सामने सेना को देखकर बहुत चिन्तित होते हैं, वह यह सोच रहे हैं कि हम जिनके साथ युद्ध करने जा रहे हैं, वह सब तो अपने ही हैं और हम अपनों के साथ युद्ध कैसे कर सकते हैं? उनकी इसी चिन्ता को देखकर श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं, हे अर्जुन! तुम अपने आप को विद्वान कहते हो, लेकिन वास्तव में तुम विद्वान नहीं हो। क्योंकि विद्वान तो वही होता है, जो गत या आगत के बारे में सोचकर दु:खी नहीं होता है। गीता में अर्जुन के लिए उसका काम युद्ध करना था और यहां हम लोगों का काम अपना कर्म करना है। अपना काम करते हुए हमें इस बात का जरूर ध्यान रखना चाहिए कि कोई है जो हमारी कार्यप्रणाली और हमारे व्यवहार पर कड़ी निगरानी रख रहा है। अगर कोई गलती करोगे तो उसकी सजा तुम्हें वह जरूर देगा।

-आपको सबसे ज्यादा संतुष्टि कब मिलती है?

-मैं हमेशा सन्तुष्ट रहता हूं। लेकिन आजकल ये सिद्धान्त है कि हमेशा असन्तुष्ट रहोगे, तभी आगे बढ़ पाओगे। मुझे लगता है कि यह बहुत अधकचरी सोच से निकला हुआ सिद्धान्त है। क्योंकि जब तुम हमेशा असन्तुष्ट रहोगे, तो अपने आस-पास के लोगों से भी तुम असन्तुष्ट रहोगे, अपने काम से और अपनी पत्नी से भी तुम असन्तुष्ट रहोगे। मुझे लगता है कि जब यह असन्तोष तुम्हारे पूरे चैतन्य को घेरे रहेगा, तो तुम आगे कैसे बढ़ोगे? जो परम सन्तुष्ट होता है, वह ही आगे बढ़ सकता है, क्योंकि उसका दिमाग एकदम मुक्त होता है और आगे सोचने के लिए वह स्वतन्त्र होता है।

-खाने और पीने में आपकी क्या पसंद है?

-जो मिल जाए, सब चल जाता है। शुरू से ही मुझे खाने में ज्यादा रुचि नहीं थी। पहले मैं नॉनवेज भी खाता था लेकिन अब छोड़ दिया है। पर मैंने नॉनवेज कभी न खाने की शपथ भी नहीं ली है। अगर मैं किसी के घर गया और उसने मुझे नॉनवेज परोस दिया, तो मैं मना भी नहीं करता था, और अब भी खा लेता हूं। रही पीने की बात तो वह भी इसी तरह है, जैसे जब कोई मित्र पीने बैठ गए तो मैं भी पी लेता हूं। नहीं है तो नहीं पीता हूं। पीने के लिए अपनी ओर से प्रयत्न नहीं करता। न किसी को पकड़ा है और न किसी को छोड़ा है।

-नए लोग जो पत्रकारिता में आ रहे हैं, वे बहुत जल्द सब कुछ पा लेना चाहते हैं। आपको ऐसा नहीं लगता?

सुभाष राय-मुझे लगता है कि जिस तरह का दबाव है आजकल के परिवारों पर, उनके बच्चों पर, उसमें गलत नहीं है कि बच्चे बहुत जल्दी बहुत कुछ पाना चाहते हैं। जिनमें क्षमता होती है, वह सब कुछ पाते भी हैं। लेकिन कभी भी गलत रास्ते पर चलकर कुछ भी हासिल नहीं करना चाहिए, क्योंकि गलती कभी न कभी लोगों के सामने जरूर आती है। एक बात और है। कोई भी समय ऐसा नहीं रहा है जिसमें गलत लोग आगे न बढ़े हों। जैसे भगवान शंकर का सबसे बड़ा शिष्य था रावण। भगवान शंकर ने सबसे ज्यादा प्यार दिया भस्मासुर को। ये दोनों कौन-से बढ़िया आदमी थे। पर इन दोनों ने प्रगति की और नष्ट भी हुए। तो आज के दौर में रावण और भस्मासुर जैसे लोगों की जो प्रगति है, वह कोई नई बात नहीं है। लेकिन अन्तिम सत्य यही है कि ऐसे लोगों को एक दिन पराजित होना है, नष्ट होना है और नरक में जाना है। एक सत्य यह भी है कि आगे वही बढ़ा है जिसने मेहनत और ईमानदारी से काम किया है।

-शुक्रिया सर, आपने इतना वक्त दिया।

-धन्यवाद यशवंत, पुरानी यादों को ताजा कराने के लिए।

(समाप्त)

इससे पहले का पार्ट पढ़ने के लिए क्लिक करें- वे केमिस्ट्री पूछते, मैं कविता सुनाता 

सुभाष राय से संपर्क 09927500541 के जरिए किया जा सकता है.

Comments on “कोशिश करके भी वामपंथी न बन सका : सुभाष राय

  • satyendra says:

    अद्भुत और विलक्षण साक्षात्कार के लिए यशवंत जी आपको बधाई। सुभाष राय से जुड़े विविध पहलुओं को आपने जिस बेबाकी से उठाया और श्री राय ने जिस साफगोई से उनका उत्तर दिया दोनों काबिलेतारीफ हैं। मैंने आपकी भडास पर कई तथाकथित बड़े पत्रकारों और पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतीक बने लोगों के साक्षात्कार पढ़े हैं सुभाष राय जैसी ईमानदारी, स्पष्टता और सहजता शायद ही कहीं देखने में मिली हो। जहां हर व्यक्ति दोहरा जीवन जी रहा हो वहां पत्रकारिता जीवन में भी अपने आदर्शों पर मान्यताओं को सुरक्षित रखना और उन्हें ईमानदारी से जीना बड़ी बात है। दुखद यह है कि रावण और भस्मासुर अपने काल में अकेले थे जबकि आज की पत्रकारिता में रावण और भस्मासुर सरीखे पत्रकारों की बाढ़ आयी हुई है। बहुमत उनका है चल भी उनकी रही है।
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    Reply
  • surendranath sinha says:

    good interview.reveals a lot about the struggles which are undergone only by language journalists of this country

    Reply
  • रियली ग्रेट इंटरव्यू है। कई बार पढ़ा….. हर बार नया अर्थ मिला। जीवन को समझने के लिए काफी मायने रखता है यह इंटरव्यू…. दिल्ली से दूर कितने सजग पत्रकार और संपादक लोग हैं, यह इस इंटरव्यू से पता चलता है…. भड़ास4मीडिया को बधाई, इस शानदार इंटरव्यू के लिए…

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  • Dr Maharaj Singh Parihar says:

    aaj hindi patrakarita jis tarah misson se hatkar poori tarah bajaroo banti ja rahi he aise samay men patrakar ko sabda se aage jana chahiye. Dr Rai ke interview me patrakarita par chhaye sankat se spasta zalak dekhi ja sakti he. hindi patrakarita ki giravat ka mukhya karan sampadako dwara ayogya lekin chamchon ko aashraya dena tatha yogya kintu swabhimani patrakaron ko akhawar se nikalne ki sajish karna rah gaya he. sari visangatiyon ke vavjood samarpit. honest aur yogya patrakar hamesh sangharsha karta he, vyavastha se, pakhand se, gulamon aur chamchon se aur yathasthitivad se. is interview se ek sachche patrakar ka dard zalakta he.

    Reply
  • yashwant ji thanks for this interview. This is great and par excellent. you did really a great job.
    I have been associated with Shri Subhash Rai since last 18 Years but had no knowledge about all these thinngs, which you have interviewed. I learnt a lot, knew too much about the life. He is a great personality, a man of high thinking and have very vast knowledge. His life shows various span of his personality.
    I never talked him on philosophy perticularly on religious belief. I had read about ‘panch makar’ (mans, madira, maithun etcs) but his new thinking reveals many new idias.
    threre so many things to be told, to be wrote but I would like say on other occasion.
    Once again accept my heart thanks for this great interview.

    With regards for you and Shri Subhash Rai sahab

    Piyuh
    Deputy News Editor
    DLA, AGRA

    Reply
  • भाई यशवंत जी ,
    साधुवाद ,भाई श्री सुभाष राय जी से सुन्दर बात-चीत के लिए.
    जिनके साथ में ने लगभग एक साल तक काम किया ,उस
    दोरान मेने उनसे एक चीज सीखी थी ,वह है समाचार का इंट्रो बनाना .
    जिस तरह से श्री राय साहब इंट्रो बनाते ,उसमे ही पूरे समाचार का आभास
    हो जाता. बात सन१९८७ कि है उन दिनों में समाचार डेक्स पर नया -नया आया था,
    (उससे पहले विभिन्न अखबारों व पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र लेखन करता था.)
    जिसकी शुरुवात आज अखबार वाराणसी से हुई थी,डॉ राम मोहन पाठक जी
    ने ही मुझे मोका दिया था,जब आज अगर से शुरु हुआ तो मुझे भी आगरा भेज दिया गया था
    ,जहाँ पर संपादक श्री सशी शेखर जी थे ,तभी श्री राय साहब भी वहाँ समाचार संपादक
    हो कर आए थे, मन उप संपादक था,कभी-कदापि समाचार संकलन के लिए भी मुझे भेज दिया जाता .
    इसी क्रम में श्री राइ साहब ने मुझे आगरा के मानसिक अस्पताल के वरिष्ट डाक्टर (नाम भूल चुका हूँ)
    से बातचीत के लिए भेजा था,जिसे में लेकर आया, श्री राइ साहब ने उस बारे में होम वर्क भी करवाया था,
    फिर उसे अपनी तरह से लिखवाया .वह बात आज तक मेरे जेहन में है.यह अलग बात है कि राय साहब कों
    कों में याद न हूँ .
    ख़ैर, आपकी बातचीत काफी अच्छी लगी, जिससे सी राय साहब के बारे में जानने कों भी मिला.
    प्रदीप श्रीवास्तव
    0 9848997327

    Reply
  • Anand Kushawaha says:

    Subhash Ray Ji ko tab se janrk hun jab main Amar Ujala Agra ks auraiya sanvaddata tha. Unke bare main unke mitra Dr.shivshankar mishra Ajitmal janta mahavidyalay ne ek bar kafi bkten batain then. vastav main unke jaise vidvan,saral,bade dil vale sampadak hi patrakaron ke liye Adarsh Ho sakte hain. Yasvant ji ko is intevue ke liye bhut badhai.

    Reply
  • kamta prasad says:

    यशवंत जी, वैसे तो आपके द्वारा पेश हर साक्षात्का र श्रमसाध्ये होता है, आपके श्रम-सृजन को सलाम क्योंइकि मैं जानता हूं कि ट्रास्क्राकइब करना कितना तकलीफदेह काम होता है पर माफ कीजिए भड़ास पर छपा यह इकलौता ईमानदारी भरा साक्षात्काबर है। पुन: साधुवाद।
    सिस्टकम के भीतर रहकर और उसके होकर भी ऐसा कुछ तो है रायसाहब में उनका जिक्र आने पर मन में आदर का भाव पैदा होता है। सब कुछ रोजमर्रा की जिंदगी में मनुष्योंब के साथ आपके व्यंवहार से तय होता है और यहीं पर सुभाष राय जी बहुत से बहुत ही ऊपर के पायदान पर आसीन हैं। जिंदगी बाकी रही तो तंत्र साधना वाले चैप्टहर पर भरपूर धीरज के साथ मिलूंगा बाकायदा समय लेकर। आगरा गया था और ताजमहल देखे बगैर लौट आया पर अफसोस नहीं हुआ लेकिन इस बात के लिए अब हो रहा है काश हालात अनुकूल होते …

    Reply
  • Dr. Anand Rai says:

    It is truly great to have next half of the great and realistic interview from Dr. Rai posted on board! I have gone through both the parts several times. It is a must read material for budding journalists. His greatness has driven me crazy. The more I read it the more I admire this saga of continuous extremely stressful but focused, honest and never giving up attitude of Dr. Rai. As a journalist he has a considerably long and consistently productive career. He could have been in many folds better position had he compromised with his ever mature, unbiased, fearless and honest journalist in side him.

    This brings me a bleak thought that with such a past he might have made his immediate family live with a status they were not due to. But hey, he has told in his interview that both of his kids have been selected in the most prestigious and difficult competition (IIT). This certainly tells the entire treasure hunting compromisers that if we try to keep our morale handy then on one hand there are pretty good chances that we might preserve our precious self-respect with self confidence. On the other hand it keeps our progeny low profiled, honest yet gives them power to fight tough for their future.

    Dr. Rai has had lot of inclination towards tantra/mantra. Although it has never been my cup of tea but as it has been on Dr. Rai’s favorite cards I have no doubts that it too would have some positively serious effect on shaping and maintaining a good humane. I assume that tantra/mantra is also a science which still has to be understood by today’s scientists.

    I totally agree him that for being productive for our society we do not necessarily have to be a leftist or a rightist or practice a lot of religion. Being sensitive, sensible and selfless server is enough.

    I have heard several times people murmuring that every thing has decayed, society has rotten and there is no hope left any more. This comes from even them who, I know, have lived a scrupulous and fishy life. I would ask them who makes our society. Every single entity is responsible for this degradation. People try all odds to grab success in financial terms. They fail doing their part of duty and still call names. This is loud and clear from this great interview that if every single being is honest and good then the whole society would be brighter.

    Last but not the least, I do thank the interviewer for this great epic and salute Dr. Rai for being such a refined human being. May be today he does not ride a chauffeur driven car or lives in a great bungalow but does preserve the precious self respect/pride and also the clan of honest, fearless and unbiased journalism. I once again wish him all success in his every future endeavor.

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  • Anand Ji, Maine interview parha hai aur mai bhi aap ki baaton se poori tarah se sahamat hun. Yeh bahut hi prasangik aur vyavaharik. Mai interviewer sahab ko sadhuvad deta hun aur Subhash Sahab ko pranam karta hun.

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  • I am a news paper reader from braj shetra. Earlier I used to read Amar Ujala. But when I came to know that Mr. Subash started looking after DLA, I too switched over to the same. Dear Yashvant ji I must thank you for bringing up such a good interview in to light. A lot has been unfolded which otherwise would have stayed undisclosed. Very impressive and inspiring! Thanks again.

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  • Surya Kant Tripathi says:

    Thank you
    Yashwant ji
    You have interviewed Subhsh Rai, a historical journalist and the interview is also historical .
    What`s not in this interview. rai shaheb watched every corner of possibilities for journalism and for life but with truths. mindblowing interview . Thank you once agian .

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  • Dr. Trimohan Shakya 'Taral' says:

    bhai vaah ! ekdam laajabaab, laasaani saakshatkaar hai. Pyaaj ke chhilakon ki tarah part-dar-part nai aur aashcharyajanak jaankaariyon ka ek antheen islsilaa. Dr. Subhash Rai se mera parichaya kab aur kaise ghanishthataa men badal gayaa pataa hi nahin chalaa. Lagataa hai jaise hum ek-doosare ko sadiyon se jaanate hain. Lekin interview padhane ke baad ahsaas huaa ki main unake bahuaayaami ( betarteeb bhi?) vyaktitva ke baare men bahut kab jaanataa hun. Gyaan ke samudra ki gaharaaiyon men utarkar bahumoolya moti dhoondne ki yaa phir aasmaan ke poore failaav ko apani mutthi men bhar lene ki ek na bujhane vaali pyaas saaf dikhaai deti hai unake vaktavya men. Saahas aur yaayaavari aisi ki iterview padhate samay lagaa li angreji ke prasiddha upanyaaskaar Henry Fielding ke Tom Jones jaisaa koi picaresque novel padh rahaa houn jisakaa naayak apani zindagi ke oobad-khaabad raston se guzarate hue naye-naye padaavon aur makaamon par pahunchataa hai. usakaa gantavya kyaa hai shaayad vah nahin jaanataa lekin usaki talaash nhi kabhi samaapta nahin hoti.Zindagi ki oonchaaiyon par chadhataa hai, fisalataa hai ,girataa hai, sambhalataa hai aur phir chadhataa hai. Gantavya par pahuncharaa hai yaa nahin yeh aavashyak nahin hai. aavashyak yeh hai ki bahurangi aur bahuaayaami raaston se guzarate hue, unhen naapate hue, sahaj roop se kuchh bade kaam kar letaa hai, badaa gyaan haasil kar letaa hai, badaa anubhav praapta kar letaa hai jo samaajopayogi hi nahin itihaas men darz hone laayak bhi hotaa hai. Yashvantji, aise bahuaayaami anubhavon ki kitaab ke tamaam mahatvapoorna pannon ko kholkar saamane laane ke liye aapko bahut dhanyabaad aur saahaspoorna evam eimaandaar udgaaron ke liye Dr. Rai ko meri haardik badhaai.

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  • arvind kumar singh says:

    badhai yashwant bhai
    bahut prabhavshali interview hai.rai sahib ko main bahut yaad karta hoon.
    arvind kumar singh

    Reply
  • श्रीधर द्विवेदी says:

    subhash rai ki ye hamesha hi khasiyat rahi ke woh sach ko sach kahte hain aur yeh interview unki isi khasiyat ko ujagar karta hai. unko unki saafgoi par sadhuvad

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  • जयंत अवस्थी says:

    भइया,
    वाकई शानदार इंटरव्यू है। अगर आज के पत्रकार कम मैनेजर समझ सकें तो कितना अच्छा है। ये लाइन अक्षरश सच है
    मैं मानता हूं कि जो किसी से असहमत होगा, वह उससे थोड़ा बायस्ड भी होगा।
    जयंत अवस्थी
    न्यूज-24

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  • Hemant Tyagi journalist says:

    Bhai subhash rai ko kabhi dekha nahi sirf unke baare mei suna hai ki woh bade hi bebak patrakar hai.Jo paise ke peechey bhaagey woh sachcha patrakar nahi ho sakta.sirf dalalali karne wale patrakar hi aaj ke jamaney mei safal hote hai.Bhagwan rai saheb jaise patrakaron ko lambi umar de.
    Thank you yashwantji for satarting such a nice blog for journalists.

    Reply
  • pawan kumar upreti says:

    Bhaut shandar article hai. Mer jaise fresher ko kafi umeed ki kiran dikhata hai. Bahut badhai hai apko is article par. Bhadas ne is article ko chaap kar kai logon ki madad ki hai Really it was Commendeble effort

    Reply
  • SNEH MADHUR says:

    Subhash ji ko pahli baar saarvjanik hone ke liyey badhai. Main unhe tab se jaantaa hoon jab unhone khamoshi key saath Patrakarita ke chhetra mein dastak di thi. Bahut hi khamosh tabiat ke insaan hain aur vaise hi patrakar bhi. Bolte nahi hain lekin apne bheeter barood rakhte hain . Ek baar unhone ek khabat page one top per lagai thi, six column mein…DIG koa naa kahne ki saja thappad…. Badi charcha hui thi. kursi per jab baith jaate thhey toa sir uthakar nahi dekhte thhey. Us samay teleprinter per taar aate thhey, khud hi phaad laate thhey aur khud hi banate thhey, apne juniors sey kaam kum lete thhey. chair per baithney ke baad bahut rare hi uthkar jaaate dekha jata thhaa. Gapbazi kaa toa sawal hi nahi uthhta thha. Aaisi shakshiyat bahut kum hoti hai. Unhe toa aur bhi aage jana chahiye. Hame aise patrakaro ki jaroorat hai jisse log prerna ley sakein. Inspire karne vale patrakar kaha milte hain. Unhe toa aur likhna chahiye apni khamosh lekin patrakarita ki lambi yatra ke baare mein. Badhai!
    Sneh Madhur
    Lucknow

    Reply
  • subhash rai ka interview jis tarah se prakashit kiya gaya he usse lagta he rai sahab patrakarita ke aadhar stambh he .unhone jis bebaki se apna paksh rakhha he vo kabile tarif he .yashwant jee unke baare me kuchh aur prakashit kare . thanks

    Reply
  • JosephTabitha18 says:

    That is understandable that cash makes people autonomous. But how to act if someone does not have money? The one way only is to receive the home loans or just short term loan.

    Reply

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