वे केमिस्ट्री पूछते, मैं कविता सुनाता : सुभाष राय

सुभाष राय

इंटरव्यू : सुभाष राय : वरिष्ठ पत्रकार और संपादक (विचार), डीएलए : भाग एक : सुभाष राय. कई दशकों से हिंदी पत्रकारिता में सक्रिय. लंबे समय से आगरा में हैं. दशक भर से ज्यादा समय तक अमर उजाला में रहे. जब अमर उजाला का बंटवारा हुआ तब भी निदेशक अजय अग्रवाल का साथ नहीं छोड़ा. वे इन दिनों डीएलए, आगरा में ही संपादक (विचार) हैं. सुभाष राय जब छात्र थे तो इमरजेंसी का दौर था. वे इसका विरोध करते हुए जेल चले गए. तंत्र-मंत्र और ध्यान में दिलचस्पी रही तो गुरु को तलाश कर उच्चस्तरीय दीक्षा ली. घर से पैसा मिलना बंद हो गया तो लिख-पढ़ कर जो कुछ मिल जाता, उससे जिंदगी चला लेते. कभी किसी से मांगा नहीं. जब मिला तो खाया. न मिला तो भूखे सो गए. ईमानदार संपादकों की जो इस देश में परंपरा रही है, उसके प्रतीक हैं सुभाष राय. बेईमानी, झूठ और हायतौबा के बल पर कभी आगे बढ़ने की कोशिश नहीं की. जो कुछ अपने आप हासिल होता गया, उसी में संतुष्ट रहे. हमेशा अपना सर्वोत्तम देने की कोशिश की.

पिछले दिनों मैं एक कार्यक्रम के सिलसिले में उज्जैन जा रहा था लेकिन ट्रेन के अत्यधिक लेट होने के कारण आगरा में उतर गया. लगा, जो हुआ अच्छा हुआ, इसी बहाने सुभाष राय साहब से मुलाकात हो जाएगी. इंटरव्यू करने की इच्छा पूरी हो जाएगी. आगरा में रुकने के बाद सुभाष राय से संपर्क साधा और उनका एक इंटरव्यू किया. मोबाइल फोन से ही तस्वीरें उतारीं. कई मुद्दों पर खुलकर बातचीत हुई. सुभाष राय को सुनकर लगता है कि चीजें चाहें जितनी बिगड़ जाएं, बनाने वाले लोग अब भी हैं. दरअसल, वक्त ऐसा है कि जो सही हैं वे दुनिया की निगाह में किनारे नजर आते हैं, जो गलत हैं वे हायतौबा करते हुए सिर पर चढ़े हुए दिखते हैं. इस दौर में जरूरत सुभाष राय जैसे संपादकों की है जो कलम के लिए कभी भी पद व पैसे की परवाह नहीं करते. उनके लिए ईमानदारी मुख्य है, मिजाज, विचार और संवेदना मुख्य है, अन्य भौतिक लाभ बाद में.

आइए, सुभाष राय से हुई बातचीत के पहले अंश को पढ़ें और गुनें.

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया


सुभाष राय

-सर, बचपन से शुरू कीजिए. कब और कहां पैदा हुए? प्राइमरी व उच्च शिक्षा कहां ली? पत्र-पत्रिकाओं में लिखने-पढ़ने की शुरुआत कब-कैसे हुई?

-मैं बनारस के पास जिला आजमगढ़ के मऊनाथ भंजन का निवासी हूं. मऊनाथ भंजन पहले आजमगढ़ का पार्ट हुआ करता था. अब स्वतंत्र जिला है. इसी में एक गांव है बड़ागांव. बड़ागांव का मैं रहने वाला हूं. मेरा जन्म 21 जनवरी, 1956 को हुआ. शुरुआती पढ़ाई-लिखाई मेरी वहीं गांव के स्कूल में ही हुई. कक्षा आठ के बाद मऊ शहर के कॉलेज से इंटर पास किया। मैं विज्ञान का विद्यार्थी था इसीलिए आगे की पढ़ाई-लिखाई के लिए बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) गया. मेरी रुचि साहित्य में थी. कक्षा आठ से ही छोटे-छोटे अखबारों में लिखने-छपने का दौर शुरू हो गया था. जनवार्ता अखबार समेत मऊ की कई छोटी-छोटी पत्रिकाओं में छपने लगा था. मेरे बड़े भैया की राय थी कि घर में एक वकील, एक डॉक्टर और एक इंजीनियर होना चाहिए. यह सोच तब अमूमन मध्यवर्गीय परिवारों में होती थी. उन्होंने सोचा, सुभाष को डॉक्टर बना दूंगा. उससे छोटे वाले को इंजीनियर बना दूंगा. और उससे भी छोटे वाले को वकील बना दूंगा. लेकिन कई बार आदमी जो सोचता है वह होता नहीं है. हम तीनों ही लोग, भैया जो चाहते थे, उस दिशा में नहीं गए.

मैं बीएचचू में 1973 में पहुंचा. बीजेडसी (बाटनी, जूलोजी, केमिस्ट्री) ग्रुप था मेरा. सभी में फर्स्ट क्लास था. इंटरव्यू में भी फर्स्ट क्लास आया. आसानी से एडमिशन हो गया. साइंस में एडमिशन तो हो गया लेकिन जो मेरी रुचि थी उसके हिसाब से मैं जीता रहा, उसे मैं खोजता-तलाशता रहा. ऐसा लगता था कि जैसे कुछ खो गया है, और हमें जहां जाना चाहिए था, वहां हम नहीं जा रहे हैं. मैं क्लास में कम रहता. कभी अस्सी पर होता तो कभी साधुओं की तलाश में घूम रहा होता. कुछ दिन ऐसे ही बीते.

1974 के आरम्भ या अन्त में, बीएससी पहले साल में ही पढ़ाई छोड़ दी और अपने शहर लौट आया. डॉक्टर बनने और विज्ञान विषयों में मेरी जितनी रुचि थी, उससे ज्यादा रुचि साहित्य में थी. कभी-कभी ऐसा होता कि जैसे केमिस्ट्री पढ़ाई जा रही है, और मैं सबसे पीछे बैठा हुआ होता. कविताएं लिखा रहा होता. टीचर को लगता कि ये लड़का पढ़ने में तो अच्छा है, फिर पीछे क्या कर रहा है. तो, वे कभी-कभी बीच में मुझे खड़ा कर पूछ लेते कि क्या पढ़ाया जा रहा था, बताओ? जवाब में मैं इधर-उधर देखने लगता. कहता- सर, मेरा ध्यान दूसरी तरफ था, मैं कविता लिख रहा हूं, कहिए तो कविता सुना दूं.

मुझे ऐसा लगता कि जो चीजें क्लास में पढ़ाई जा रही हैं वह किताबों में भी हैं और उसे पढ़कर पास तो हो ही जाएंगे. इस तरह अन्दर-अन्दर एक करंट सा चल रहा था. मुझे लिखने-पढ़ने और साहित्य व कवियों से बड़ा प्रेम रहता. कभी कवि सम्मेलन हो रहा है तो उसमें चले गए. जहां भी बैठने की जगह मिली, बैठ गए. मेरे अंदर जो लेखक व कवि का व्यक्तित्व था, वह कहीं न कहीं मुझे बीएससी करने से रोक रहा था. वहां से जब मैं चला आया तो मऊ के डीसीएसके डिग्री कॉलेज में बीए में एडमिशन लिया. हिन्दी, अंग्रेजी और साइकोलॉजी विषय में. 1976 में ग्रेजुएशन पूरा किया.

इसी बीच इमरजेंसी का दौर शुरू होगा. शायद 74-75 का समय रहा होगा. हम लोग स्वतन्त्रता के प्रति, जनतान्त्रिक मूल्यों के प्रति, जीवन के प्रति भीतर से कहीं गहरे जुड़े हुए थे. इमरजेंसी से विरोध था. वह विरोध सात-आठ महीने तक चलता रहा. कई तरह से वह विरोध चला. वॉल राइटिंग करते रहे. पोस्टर लगाते रहे. पम्पलेट छपवा कर बांटते रहे. पुलिस लंबे समय तक हम लोगों को तलाशती रही लेकिन हम लोगों को कोई पहचानता न था. हम लोग साधारण विद्यार्थी थे. कोई नेता तो थे नहीं कि वे पहचानते. मुझे एक सोशल एक्टिविस्ट के तौर पर कोई नहीं जानता. हम लोग जीवन मूल्यों पर संकट आने पर हमेशा खड़े हो जाते. इमरजेंसी के दौरान क्या-क्या हुआ, बहुत सारी बातें बाद में पता चलीं कि किस तरह देश के अखबारों ने रिएक्ट किया, नेताओं ने रिएक्ट किया. हम लोग तब बाहर के बारे में बहुत कम जानते थे. हम लोगों का स्थानीय स्तर पर जो पर्सनल रिएक्शन था, वह प्रकट हुआ. रात में दीवारों पर इमरजेंसी के सुभाष रायखिलाफ नारे लिखते थे. पोस्टर बनाते, हाथ से कविताएं लिखकर दीवारों पर चिपकाते, पंफलेट तैयार करते, सारे दफ्तरों में रात के तीन-चार बजे के आसपास दरवाजों के नीचे से पंफलेट डाल देते. तो ये हम लोगों को काम था. उसी दौरान एक बार गिरफ्तार भी हो गए.

-कितनी उम्र थी आपकी उस समय जब आप गिरफ्तार हुए?

-उन्नीस-बीस साल के आस-पास रहा हूंगा. हम लोग आजमगढ़ जेल में हम बन्द रहे. वहां काफी लोग बन्द थे. कई बहुत अच्छे लोग मिले. वहां डॉक्टर कन्हैया सिंह थे जो डीएवी डिग्री कॉलेज आजमगढ़ में हिन्दी के विभागाध्यक्ष थे. रामनरेश यादव उसी जेल में थे जो बाद में यूपी के मुख्यमन्त्री बने. दो अन्य व्यक्ति भी वहां थे जो बाद में पत्रकार बने- एक जयशंकर गुप्त और दूसरे मिथिलेश सिंह. मैं और मिथिलेश साथ साथ ही गिरफ्तार हुए थे. हम लोगों के साथ करीब आठ-नौ बच्चे भी गिरफ्तार हुए. हम सभी लोगों ने अपने कॉलेज से जुलूस निकाला था. डीपीएस के डिग्री कॉलेज से. जुलूस थाने तक आते-आते करीब चार-पांच हजार लोगों की भीड़ जुट गई. हजारों लोग सिर्फ देखने आ गए थे कि इस इमरजेंसी में वे कौन बच्चे हैं जो जुलूस निकालने और नारे लगाने जैसा दुस्साहस कर रहे हैं. थाने के पास पुलिस ने चारों तरफ से घेरकर लाठीचार्ज कर दिया. लाठीचार्ज हुआ तो सब भाग गए. जिनको गिरफ्तार होना था,  हम नौ-दस बच्चे, जो परिचय के थे, खड़े रह गए, पिटते रहे और गिरफ्तार होकर जेल गए. हम सभी लोग उस श्रेणी में थे जिन्हें पता था कि हम लोग क्या कर रहे हैं और इसका अंजाम क्या होगा. तो इस तरह से आठ-दस लोग गिरफ्तार हुए थे. गिरफ्तार लोगों में बहुतों के नाम मुझे याद नहीं हैं. काफी दिन हो गए उस घटना के. जेल से बाहर आने के बाद ग्रेजुएशन पूरा किया. संयोग से वह भी फर्स्ट क्लास हो गया.

ग्रेजुएशन की पढ़ाई के बाद साइकोलॉजी से एमए करने गोरखपुर यूनिवर्सिटी गया. मेरे बैच में 35-36 बच्चे थे, यहां भी सबसे ऊपर मेरा नाम था. लेकिन दुर्योग से वहां भी मेरी पढ़ाई पूरी नहीं हुई. 76-77 का समय रहा होगा. मैंने पढ़ाई छोड़ दी. वहां मेरी असहमति विभाग के क्रिया-कलाप से थी. जो विभागाध्यक्ष थे, उनका नाम नहीं लूंगा, वे अपनी जाति के लोगों का ज्यादा ध्यान रखते थे. क्लास में जितने बच्चे थे, उसमें 50 प्रतिशत से ज्यादा उन्हीं की जाति के थे. लगा कि जब यहां इतना पक्षपात है तो पढ़ाई करना ठीक नहीं. मैं एडजस्ट नहीं कर पा रहा था. मैं और मेरे साथ लालजी त्रिपाठी जो अब गोरखपुर यूनिवर्सिटी में ही प्रोफेसर हैं, ने पढ़ाई ड्राप कर दी. मैं छोड़ने के बाद घूमता रहा. फिर मऊ आ गया. मऊ में मेरे कई चाहने वाले थे. एक सज्जन हैं मंगनू सिंह जी, जिनका स्नेह मेरे उपर अब भी लगातार बना हुआ है, उन्हीं के यहां मैं पड़ा रहा. वे प्रतिष्ठित व्यक्ति तब भी थे. इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र में एमए किया था उन्होंने और जहां से मैंने इंटर की पढ़ाई की थी, वे वहीं अध्यापक थे. उन्हीं के यहां एक बार डॉक्टर कन्हैया सिंह जी का आना हुआ, जो हम लोगों के साथ जेल में थे. उन्होंने मुझे सलाह दी कि तुम मेरे यहां आ जाओ और एमए कर लो. एमए कर लोगे तो तुम्हारी कहीं न कहीं नियुक्ति हो जाएगी. मैं गया. वहां पर एडमिशन भी लिया. डीएल डिग्री कॉलेज में. हिन्दी से. पर वहां भी मेरी पढ़ाई पूरी नहीं हुई. वहां एक अध्यापक थे जो प्रगतिशील धारा के शीर्ष कवियों में शुमार किए जाते, श्रीराम वर्मा जी. उन्होंने मुझे कुछ दिन आब्जर्व किया. उन्हें लगा कि यह लड़का बोलने-लिखने में ठीक-ठाक है. उन्होंने पहले सत्र के आधे में ही मुझे सलाह दी कि तुम इलाहाबाद चले जाओ. वहां अच्छा काम कर सकते हो. मैंने कहा कि मुझे इलाहाबाद में जानता कौन है. मैं वहां जाकर क्या करूंगा. उन्होंने कुछ लोगों को चिटि्ठयां लिखी, परिचय बताए. इस तरह मैं इलाहाबाद पहुंच गया. इलाहाबाद आने के बाद फिर संघर्ष शुरू हो गया. मैं उन सब लोगों से मिला जिनको चिटि्ठयां लिखीं थी. सबने मदद का आश्वासन भी दिया.

-आपने पत्रकारिता की शुरुआत इलाहाबाद से की. कैसे शुरू किया इलाहाबाद में लिखना?

– मेरा संपर्क ‘भारत’ अखबार से हुआ. यह लीडर ग्रुप का अखबार था. वहां से मैंने पत्रकारिता की शुरुआत की थी. ‘भारत’ अखबार में कुछ दिन काम करने के बाद मैं वहां के ‘अमृत प्रभात’ नाम के अखबार में आ गया. मैंने 80 के आस-पास अमृत प्रभात ज्वाइन किया. वहां से मैंने विधिवत पत्रकारिता प्रारंभ की.

-अखबार में किसलिए आए?

-अखबार में आने के दो कारण थे. एक तो मेरी रुचि थी. दूसरा जो बड़ा कारण था, उसे मैं संयोग कहता हूं. मैं चाहता था कि कुछ पढ़ाई करूं लेकिन आर्थिक संकट आड़े आ रहा था. इमरजेंसी के आंदोलन के कारण घर से संबन्ध खराब हो गए थे. घर से पैसे नहीं मिलते थे. घर की नज़र में मैं नालायक बच्चा बन चुका था. कुछ मित्र थे जिन्होंने उस समय मेरी मदद सुभाष रायकी. ‘प्रगति मंजूषा’ नाम की पत्रिका में नियमित लिखता था. उससे कुछ पैसे मिल जाते थे. रतन दीक्षित उसके संपादक हुआ करते थे. कुछ धन आकाशवाणी से मिल जाता था. वहां कैलाश गौतम थे. बड़े कवि थे. मेरे पर उनका बड़ा स्नेह रहता था. वहां से कुछ मदद होती थी. लेकिन यह सब इतना पर्याप्त नहीं होता था कि मैं पढ़ाई कर सकूं और अपने को वहां खड़ा कर सकूं. तब तक मेरा वहां अच्छा-खासा ग्रुप बन गया था. इस ग्रुप में सभी पढ़ने-लिखने वाले बच्चे थे. बहुत तेज थे. उसी ग्रुप में से एक प्रोफेसर राजकुमार इन दिनों बीएचयू में हिन्दी विभाग में प्रोफेसर हैं. एक डॉक्टर शिवशंकर मिश्र हैं जो अजीतमल औरैया में हिन्दी के विभागाध्यक्ष हैं. एक हरीश मिश्र हैं जिनसे मेरा संपर्क इन दिनों नहीं हैं. संभवतः वे मध्य प्रदेश में किसी बड़ी सरकारी नौकरी में हैं. वे पीसीएस करके गए थे. एक राजेन्द्र मंगज हैं जो इनकम टैक्स कमिश्नर हैं लखनऊ में. ये सभी लिखने-पढ़ने में बड़े अच्छे थे. एक त्रिलोकी राय थे जो गाजीपुर के मठ में बड़े महन्त हो गए हैं. यह तेज-तर्रार ग्रुप साहित्यिक लेखन में बहुत सक्रिय था. जहां कहीं भी गोष्ठी होती, हम सब वहां पहुंच जाते. उसमें से कोई एक तो जरूर बोलता. जो भी बोलता,  बहुत अच्छा बोलता.  पिछले दिनों मेरे यहां प्रोफेसर राजकुमार और शिवशंकर आए हुए थे. दोनों एक गोष्ठी में आए थे. काफी बातचीत हुई. हम लोग अपने आपको इलाहाबाद में तब पूरी तरह अभिव्यक्त कर पा रहे थे.

-अमृत प्रभात में आपको कितनी तनख्वाह मिलती थी?

–उस समय अमृत प्रभात में मुझे 500 रुपये मिलते थे. बाद में पालेकर अवार्ड लागू कर दिया गया तो 1300 रुपये हो गए. जब मैंने 86 में वहां से जॉब छोड़ी तो करीब 1800 या 1900 रुपये मिलते थे.

-आपने वहां से नौकरी क्यों छोड़ी?

अपनी पत्नी के साथ सुभाष राय-असल में 86 में मेरी शादी हो गई थी. मेरे साथ पत्नी भी रहने के लिए इलाहाबाद आ गईं. तब तक मैंने दो तीन धाराओं में काम करना शुरू कर दिया था. उसमें एकेडेमिक्स में काम करने के साथ-साथ योग व तन्त्र की धारा में रम गया. इस धारा में मैंने एक गुरु तलाशा. साधना की. प्रयाग तो वैसे भी साधना की भूमि है. गुरु ने मुझे दीक्षा दी. उन्होंने कई उच्चस्तरीय दीक्षाएं भी मुझे दी. तन्त्र की साधना में कई विधियां होती हैं. अलग-अलग तान्त्रिकों, सिद्धों व महात्माओं भिन्न-भिन्न विधियां होती हैं। मेरे जो गुरू थे, उनकी पंच ‘म’ कार की साधना थी. मैंने इस साधना के सात्विक स्वरूप को अपने जीवन में स्वीकार किया.

…जारी…

सुभाष राय से संपर्क 09927500541 के जरिए किया जा सकता है.

सुभाष राय को इन वीडियो के जरिए भी देख-सुन सकते हैं-

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Comments on “वे केमिस्ट्री पूछते, मैं कविता सुनाता : सुभाष राय

  • अपने दफ्तर में जब आपकी वेबसाइट देख रहा था..तो अचानक राय साहब को देखा..अच्छा लगा..राय साहब के साथ काम करने का मौका तो मुझे नहीं मिला लेकिन इतना ज़रूर है कि वे प्रिंट मीडिया के सुलझे हुए सहाफी हैं..मैं खुद आगरा से हूं..एकाध बार मुलाकात भी हुई है..[s][/s]

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  • dis small presentation exhibits the basic freedom of thought and fresh air which is salient of SRI.SUBHASH RAI’S personality.

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  • Waise to ye sahaj hi hai ki har beta apne pita ka aadar kare, unke vyaktitva se prabhavit ho, mai bhi koi apvaad nahi, khaas tab hota hai jab aap baar baar prabhavit ho, sochte reh jaen, har baar ek alag wajah se ek alag pehlu se, mai kuch aisa hi mehsoos karta hoon

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  • Dr. Anand Rai says:

    Maine abhi tak Dr. Rai ko unke lekhon aur kuch mulakaton se hi jana hain. Par is interview ko padh kar unke bahut se unchue pahluon ke bare men bhi gyat hua. Padh kar achhe laga. Yeh ek jamin se mehnat aur imandari se apane bal par uthe hue karmsheel insan ki katha hai. Age barhane ke liye kuch samjhaute to kiye par apane sanskar, maulik/imandar soch aur sambandhon ki kimat par nahin. Apani nishpaksh kalam se patrakarita ko ek mukam diya hai. Aj is desh ko aise hi jujharoo aur mehnati patrakaron ki bahut jarurat hai. Mai shiksha se jura raha hun is liye mujhe lagata hai ki agar Dr. Rai kisi achhe vishvavidhalaya men pradhyapak hote to avashya hi is desh ko apane jaise uchhkoti ke bahut se yuva patrakaron ki saugaat deta. Is desh ki belagam rajniti aur naukarshahi ko aj aisi hi avshyakta hai. Meri shubhkamnayen Dr. Rai ke sath hai aur prarthana karta hun ki unko aur uncha naam aur mukam mile.

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  • anurag singh says:

    we have worked mr. rai in amar ujala agra,then iwas a young chap and joined amar ujala as circulation executive, as i belongs to varanasi & from allahabad university therefore mr. subhash rai has supported me .i used to know about him through my seniors as sh. yadvesh kr.,sh mahendra jain but after a long time we came to know about mr rai.

    anurag singh

    cir manager rashtriya sahara,patna 09386615299

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  • SNEH MADHUR says:

    Subhash ji ko pahli baar saarvjanik hone ke liyey badhai. Main unhe tab se jaantaa hoon jab unhone khamoshi key saath Patrakarita ke chhetra mein dastak di thi. Bahut hi khamosh tabiat ke insaan hain aur vaise hi patrakar bhi. Bolte nahi hain lekin apne bheeter barood rakhte hain . Ek baar unhone ek khabat page one top per lagai thi, six column mein…DIG koa naa kahne ki saja thappad…. Badi charcha hui thi. kursi per jab baith jaate thhey toa sir uthakar nahi dekhte thhey. Us samay teleprinter per taar aate thhey, khud hi phaad laate thhey aur khud hi banate thhey, apne juniors sey kaam kum lete thhey. chair per baithney ke baad bahut rare hi uthkar jaaate dekha jata thhaa. Gapbazi kaa toa sawal hi nahi uthhta thha. Aaisi shakshiyat bahut kum hoti hai. Unhe toa aur bhi aage jana chahiye. Hame aise patrakaro ki jaroorat hai jisse log prerna ley sakein. Inspire karne vale patrakar kaha milte hain. Unhe toa aur likhna chahiye apni khamosh lekin patrakarita ki lambi yatra ke baare mein. Badhai!
    Sneh Madhur
    Lucknow

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  • UPENDRA NATH RAI says:

    Bade Bhaia,
    Pranam
    entarveu padhkar sangharsh karate rahane ki prerana milati hai
    UPENDRA NATH RAI
    ALLAHABAD[b][/b]

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  • sudhanshu upadhyaya says:

    Aaj k daur me, jab patrakarita lagbhag ‘chaakari’ aur jugadu ban chuki hai, shri subhash rai jaise log andhere me tani hui mashaal ki tarah hain. mujhe garwa hai ki is mashaal k saath mai bhi lambe arse tak rahaa hu aur aaj bhi subhash ki dosti par fakra hota hai. hi is a perfect humanbeing, a down 2 earth man and a poorna bharosemand mitra.

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  • अविनाश वाचस्‍पति says:

    यशवंत भाई। आपने देर से मिलाया। पर मैं खुद खोजता चला आया हूं डॉ. सुभाष राय को। मिल तो पहले से रहा हूं और जुल भी रहा हूं। जितना पढ़ा है, सच उससे भी कहीं अधिक है। यह प्रिय भाई सुभाष जी से मिलकर आप भी जान गए हो और मैं भी।

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  • umesh shukla says:

    Maavani aur aadidev shiv ki vishesh evam ati utkrishat kripa ka sakshat bodh hota hai Sri Rai sahib ke belaus vyaktitva se. Unki sahajata ki mishal kanhi aur nahi. Dusharon ko gadhkar tarashne aur nikharne ki unki swabhavik shaily aur pravritt aur kanhi parilakshit nahi hoti hai. jab bhagwan ki vishesh kripa hoti hai to aishe mahan shakhshiyat se sakshatkar ka mauka milta hai. Yashwantji aap badhai ke Patra hain kyonki aap ko Sri Rai sahib se roobroo hone ka suawashar mila. unke jiwan ke vividh pahaluon ko pathkon ke beech parosane ka suyog bhi hasil hua. bahut-bahut dhanywad achche interview ke liye.[i][/i]

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  • BHAVANA TIWARI says:

    Bahut achchha lagaa padhkar…..aisey jeevat vayktitvon ke saakshaatkaar naye lekhakon ke liye prernaadai siddh hongey …..ishwar SHUBHAASH ji kalam ko aur SHAKTI SAMPANN kare …..!!

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