इन्दौर के एक पत्रकार के करोड़पति होने की गंदी कहानी

इन्दौर के एक पत्रकार के करोड़पति होने की कहानी को मैं गंदी कहानी इसलिए कह रहा हूं कि इस पत्रकार ने करोड़पति होने के लिए जो रास्ता चुना वह तो नगरवधुओं और चंबल के डाकुओं से भी गया गुजरा था। मुफलिसी में पले और बढ़े इस पत्रकार ने, जो कि पहले नईदुनिया फिर चौथासंसार में काम करके थोड़ा बहुत नाम कमा चुका था, अपने ही पत्रकार साथियों को संवादनगर एक्सटेंशन में प्लाट देने का सपना दिखाकर उन्हें 1993 में सदस्य बनाना आरंभ किया।

समाज की पत्रिकाओं के नाम पर लाखों लुटा रहा है जनसम्‍पर्क विभाग

मध्यप्रदेश का जनसम्पर्क विभाग इन दिनों लूट का सबसे बड़ा केन्द्र बना हुआ है। रिश्वतखोरी और लेनदेन के बगैर यहां कोई काम नहीं हो सकता। यदि आपको भी इस लूट में शामिल होना है तो तुरंत समाज की एक पत्रिका निकाल लीजिए। इन्दौर के एक पत्रकार,  जो संवादनगर घोटाले का आरोपी भी हैं,  ने एक समाज की पत्रिका निकाल कर जनसम्पर्क विभाग से हजारों रुपए के विज्ञापन प्रतिमाह कमाने का जुगाड़ कर रखा है।

क्या हिन्दी अखबारों को सम्पादक की जरूरत है?

सम्पादक की दम तोड़ती हुई परम्परा के मद्देनजर यह सवाल उठाना बेहद जरूरी हो गया है कि क्या हिन्दी अखबारों को सम्पादक की जरूरत है? और सम्पादक से आशय पत्रकारिता की समझ रखने वाले लोगों से है ना कि मैनेजमेंट वालों से। एक समय था जब हिन्दी पत्रकारिता अपने सम्पादकों के कारण जानी और पूजी जाती थी।

अखबार निकालो, फोकट में बांटों, पत्रकारिता का भला करो!

इन दिनों इन्दौर में अखबार फोकट में बांटने की परम्परा चल रही है। बड़े-बड़े समूह के अखबार इन्दौर से निकले और फोकट में बंटते चले गए। अब इनका नाम भी क्या लें जिनके घर भी फोकट में अखबार आए हैं,  वे समझ सकते हैं कि कौन से अखबार थे? सवाल इसी बात का है कि कागज से लेकर छपाई और वेतन से लेकर हॉकरों के कमीशन तक देने के बाद कोई भी अखबार फोकट में क्यों बांटा जाए?