पत्रकारिता और धंधेबाज़ी के बीच धुंधलाती रेखा

प्रणव रॉय, राजदीप सरदेसाई, बरखा दत्त, अरुण पुरी, रजत शर्मा, राघव बहल, चंदन मित्रा, एमजे अकबर, अवीक सरकार, एन राम, जहांगीर पोचा और राजीव शुक्ला का परिचय क्या हैं? ये पत्रकार हैं या व्यवसायी? बहुत सारे लोगों को ये सवाल बेमानी लग सकता है. लेकिन भारतीय मीडिया में नैतिकता का संकट जहां पहुंचा है, उसकी पड़ताल के लिए इन सवालों का जवाब तलाशना बहुत ज़रूरी हो गया है. इस लिहाज़ से पत्रकारीय मूल्यों और धंधे के बीच के अंतर्विरोधों का ज़िक्र करना भी ज़रूरी है.

मुनाफ़ाखोरों और सत्ता के दलालों का मीडिया

भूपेन्‍द्र पत्रकारों और नेताओं के साथ कॉरपोरेट दलाल नीरा राडिया की बाचतीत के टेप सामने आने के बाद कई सफ़ेदपोशों के चेहरे से नकाब उतर गए हैं. ये बातचीत मई-जुलाई दो हज़ार नौ की है जब केंद्र में यूपीए के मनमोहन सिंह दूसरी बार सरकार बनाने की क़वायद में जुटे थे. इन टेपों की ट्रांसक्रिप्ट्स से ज़ाहिर होता है कि किस तरह कॉरपोरेट घराने और राजनेता, मीडिया के साथ मिलकर सत्ता का सौदा कर रहे थे.