Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

कहिन

मुनाफ़ाखोरों और सत्ता के दलालों का मीडिया

भूपेन्‍द्र पत्रकारों और नेताओं के साथ कॉरपोरेट दलाल नीरा राडिया की बाचतीत के टेप सामने आने के बाद कई सफ़ेदपोशों के चेहरे से नकाब उतर गए हैं. ये बातचीत मई-जुलाई दो हज़ार नौ की है जब केंद्र में यूपीए के मनमोहन सिंह दूसरी बार सरकार बनाने की क़वायद में जुटे थे. इन टेपों की ट्रांसक्रिप्ट्स से ज़ाहिर होता है कि किस तरह कॉरपोरेट घराने और राजनेता, मीडिया के साथ मिलकर सत्ता का सौदा कर रहे थे.

भूपेन्‍द्र पत्रकारों और नेताओं के साथ कॉरपोरेट दलाल नीरा राडिया की बाचतीत के टेप सामने आने के बाद कई सफ़ेदपोशों के चेहरे से नकाब उतर गए हैं. ये बातचीत मई-जुलाई दो हज़ार नौ की है जब केंद्र में यूपीए के मनमोहन सिंह दूसरी बार सरकार बनाने की क़वायद में जुटे थे. इन टेपों की ट्रांसक्रिप्ट्स से ज़ाहिर होता है कि किस तरह कॉरपोरेट घराने और राजनेता, मीडिया के साथ मिलकर सत्ता का सौदा कर रहे थे.

राडिया की फोन रिकॉर्डिंग को वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने टू जी स्पेक्ट्रम घोटाले में याचिका दर्ज करते हुए सुप्रीम कोर्ट में जमा किया है. हैरत की बात ये है कि ओपन और आउटलुक पत्रिका को छोड़कर मुख्यधारा के किसी भी समाचार संगठन ने इस ख़बर को नहीं उठाया. दूसरे शब्दों में इतनी बड़ी ख़बर को जान-बूझकर दबाने का काम किया. इस घटना से पद्मश्री बरखा दत्त की भी पोल खुल गई है. नीरा राडिया के साथ उसकी बातचीत के टेप सामने आने के बाद साफ़ हो गया है कि ए राजा को मंत्री बनाने के लिए बरखा दत्त ने किस तरह राजनीतिक लॉबीइंग की थी. स्पेक्ट्रम घोटाले में विवादों से घिरने की वजह से राजा को तो संचार मंत्री के पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा लेकिन बरखा अब भी शान से एनडीटीवी में ख़बरें बांच रही है. ये घटना समाचार मीडिया और राजनीतिज्ञों के घृणित गठजोड़ की एक बानगी भर है. इससे समझा जा सकता है कि पैसे के खेल में ताक़तवर लोग मीडिया का सहारा लेकर किस तरह जनता को बेवकूफ़ बनाते हैं. सारी हक़ीक़त सामने आ जाए तो हमाम में और कितने नंगे हैं, ये भी साफ़-साफ़ दिखने लगेगा.

क़रीब एक दशक पहले बरखा दत्त ने कारगिल युद्ध के दौरान घटनास्थल से रिपोर्टिंग कर शोहरत कमाई थी. तब उसे इस तरह स्थापित किया गया कि जैसे उसने पत्रकारिता में कोई अभूतपूर्व उदाहरण पेश किया हो. जबकि हक़ीक़त ये थी कि वो राष्ट्रवाद से नहाई एक एम्बेडेड जर्नलिस्ट की तरह सेना के साथ कारगिल पहुंची थी. युद्ध की विभीषिका और निरर्थकता को बताने की बजाय उसने युद्धोन्माद भड़काने वाले दृश्य टेलीविजन स्क्रीन पर परोसे थे. उसकी इस बात को लेकर भी आलोचना होती रही है कि युद्ध के दौरान कैमरा लाइट ऑन करने की वजह से दूसरे पक्ष के सैनिकों ने भारतीय सैनिकों को लक्षित कर बमबारी शुरू कर दी थी, जिस वजह से कई सैनिकों को अपनी जान गंवानी पड़ी.

कारगिल से रिपोर्टिंग करने की वजह से बरखा रातों-रात मशहूर हो गई. पाकिस्तान विरोध की धुरी पर खड़ी भारतीय युद्ध पत्रकारिता को एक नया नाम मिला. उसकी कंपनी एनडीटीवी ने भी उसे स्थापित करने में अपनी पूरी ताक़त लगा दी. फिर, बरखा ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. उसे पत्रकारिता के नाम पर देश-विदेश के कई पुरस्कार मिल चुके हैं. सत्ता की राजनीति करने वाली बड़ी-बड़ी हस्तियों से उसकी नज़दीकी बढ़ती गई. कभी दूरदर्शन पर छोटा-सा कार्यक्रम बनाने वाले प्रणय रॉय की कंपनी नई दिल्ली टेलीविजन (एनडीटीवी) को क़ामयाबियों की सीढ़ियां चढ़ाने में उसके इन संपर्कों का इस्तेमाल नहीं हुआ होगा ये कहना आसान नहीं है. गौरतलब है कि बरखा दत्त इस चैनल में ग्रुप एडिटर होने के साथ ही शेयर के एक बड़े हिस्से की मालकिन भी हैं.

एक दौर में गंभीर पत्रकारिता का ब्रैंड बनने की कोशिश करने वाले एनडीटीवी की असलियत भी अब जग ज़ाहिर हो चुकी है. इस चैनल में ज़्यादातर ख़बरों का मतलब क्रिकेट और घटिया मुंबइया फिल्में हैं. एनडीटीवी ने मुनाफ़ाखोरी की दौड़ में आगे बढ़ते हुए सस्ते मनोरंजन के चैनल भी शुरू किए हैं. राखी सावंत जैसी फूहड़ और बेहूदा औरत का इस्तेमाल एनडीटीवी लगातार अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए कर रहा है. लोग भूले नहीं हैं कि हाल ही में एनडीटीवी इमेजिन के एक रियलिटी शो में राखी की अपमानजनक टिप्पणी की वजह से एक शख़्स ने ख़ुदकुशी कर ली थी. पत्रकारिता से मनोरंजन उद्योग में उतरे प्रणय रॉय को तब भी कोई शर्म नहीं आई. बेशर्मी जब इतनी बढ़ जाए तो फिर बरखा के कुकर्मों का भी उन पर क्या असर पड़ना है! माना, बरखा एनडीटीवी से बाहर भी हो जाती है तो उसके लिए नया टेलीविजन साम्राज्य खड़ा करना कितना मुश्किल होगा? राजदीप सरदेसाई इस काम को पहले ही अंजाम दे चुके हैं.

जब ये तथाकथित बड़े पत्रकार सत्ता की चासनी में इस तरह मुंह मारते रहते हैं तो इनके लिए नाम और दाम कमाना कितना कठिन हो सकता है? क्या देश की कैबिनेट में मंत्री बनाने में अहम भूमिका निभाने वाला पत्रकार अपने लिए एक भारत रत्न या राज्य सभा की सीट नहीं जुटा सकता? गौरतलब है कि बरखा पहले से ही पद्मश्री हालिस कर देश का गौरव बढ़ा रही है. इस संदर्भ में कुछ वक़्त पहले राज्य सभा की सीट पाने के लिए कुछ चर्चित पत्रकार जिस तरह लॉबिइंग करते दिख रहे थे. वे और कोई नहीं बरखा के ही पेशेवर अग्रज हैं.

अब ज़रा बरखा की सहेली नीरा राडिया के बारे में भी बात कर ली जाए. नीरा का नाम उसके राजनीतिक संपर्कों और सत्ता की दलाली के लिए जाना जाता है. नीरा पर आरोप है कि उसने दो हज़ार आठ में टू जी स्पेक्ट्रम डील के वक़्त नीलामी को प्रभावित करने के लिए संचार मंत्री ए राजा पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल किया था. बरखा और नीरा राडिया के बीच बातचीत के टेप सामने आने के बाद ये साफ़ हो गया है कि बरखा और राडिया की लॉबीइंग की वजह से ही राजा को ये मंत्रालय मिला था. स्पेक्ट्रम घोटाले से पता चलता है कि किस मक़सद के लिए बरखा-नीरा राजा को मंत्री बनाने की क़वायद में जुटे थे. इससे पहले भी कई विवादों में नीरा राडिया का नाम आ चुका था. इसके रतन टाटा से भी क़रीबी रिश्ते रहे हैं. हाल ही में रतन टाटा ने एक बयान दिया था कि उनकी एयरलाइंस को शुरू करने से पहले तब के उड्डयन मंत्री ने उनसे घूस मांगी थी. इसकी एक हक़ीक़त ये भी है कि तब जिस सिंगापुर एयरलाइंस के साथ टाटा गठजोड़ करने जा रहे थे, उसके मूल में भी नीरा राडिया का ही हाथ था. इससे समझा जा सकता है कि पैसे इस खेल में टाटा का पक्ष भी कोई दूध का धुला नहीं.

नीरा राडिया पिछले एक दशक से भारतीय मीडिया को अपनी अंगुली पर नचा रही है. इसका मुख्य काम कॉर्पोरेट कंपनियों के आपसी विवाद की आग में घी डालकर पैसा बनाना है. इसके लिए वो पत्रकारों को लुभाकर अपना उल्लू सीधा करती थी. अंबानी बंधुओं के विवाद में भी नीरा राडिया की अहम भूमिका रही है. हिंदुस्तान टाइम्स के संपादकीय निदेशक वीर सांघवी को मुकेश अंबानी के पक्ष में ख़बर डिक्टेट करवाने का टेप भी अब सार्वजनिक हो चुका है. जिससे वीर सांघवी की पत्रकारिता की हक़ीक़त और अच्छी तरह सामने आ चुकी है. ओपन मैगजीन ने बरखा और सांघवी से नीरा के बातचीत के टेप सार्वजनिक किए हैं. इसके अलावा अंग्रेजी दैनिक मेल टुडे और भड़ास फॉर मीडिया नाम की साइट ने भी इनके बीच बातचीत के टेप का ट्रांस्क्रिप्शन प्रकाशित किया है.

नीरा साम-दाम-दंड-भेद अपनाकर अपना काम निकलवाती रही है. विरोधी कॉरपोरेट घरानों को घेरने के लिए नीरा ने एक एनजीओ भी बनाया था जिससे माध्यम से वो कोर्ट में याचिका दायर करती थी. वीकिपीडिया ने नीरा के बारे में लिखा कि पश्चिम बंगाल के माकपाई मुख्यमंत्री ने भी सिंगूर-नंदीग्राम के आंदोलनों के वक़्त मीडिया को अपने पक्ष में करने के लिए उसकी मदद ली थी. इससे समझा जा सकता है कि बरखा दत्त और एनडीटीवी ने सिंगूर-नंदीग्राम के वक़्त किस तरह की भूमिका निभाई होगी. इस संदर्भ में ये बात भी महत्वपूर्ण है कि प्रणय रॉय और सीपीएम महासचिव प्रकाश आपस में साढ़ू भाई हैं. नीरा राडिया के डीएमके सुप्रीमो करुणानिधि से भी क़रीबी संबंध हैं. ए राजा को केंद्र में संचार मंत्री बनाने के लिए राडिया ने करुणानिधि से लेकर मीडिया और कांग्रेस में अपने संबंधों का पूरा इस्तेमाल किया. जिस वजह से देश को स्पेक्ट्रम घोटाले में 1.76 लाख करोड़ का चूना लगा है.

बरखा-नीरा राडिया और वीर सांघवी-नीरा के बीच की बातचीत जैसे ही ओपन मैगजीन की वेबसाइट में प्रकाशित हुई, सांघवी ने सफ़ाई देने की कोशिश की कि उनकी बातचीत कुछ भी साबित नहीं करती है. लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि ये बातचीत आज की पत्रकारिता के विरूपित चेहरे को हमारे सामने लाती है. कोई कितनी ही सफ़ाई क्यों न दे पैसे के बल पर अपनी छवि का पुनर्निमाण क्यों न कर ले, उच्च स्तर पर किस तरह बौद्धिक भ्रष्टाचार फलता-फूलता है इसकी एक झलक जनता को मिल चुकी है. बरखा दत्त की तरफ़ से एनडीटीवी के सीईओ नारायण राव ने चेतावनी दी है कि बरखा को दलाल कहने वालों पर वे कार्रवाई कर सकते हैं. उनका कहना है कि पत्रकार का अपने स्रोत से बात करना कोई अपराध नहीं है. इससे एक बात और साफ़ होती है कि पत्रकारिता की आड़ में बेशर्मी से अपने कामों को सही साबित करने का खेल जारी है. बेवजह किसी के भी पीछे हाथ धोकर पड़ने वाला मुख्यधारा का ज़्यादातर मीडिया इस मामले में बरखा का मौन समर्थन जारी रखे हुए है. चोर-चोर मौसेरे भाई वाली कहावत यहां पर पूरी तरह चरितार्थ होती है.

विकीपीडिया पर भी नीरा राडिया का परिचय लगातार बदल रहा है. उन्नीस नवंबर को उसमें नीरा की दलाली के किस्से थे लेकिन इक्कीस तारीख़ की सुबह एक उद्यमी के तौर नीरा का गुणगान छपा था. दिन में फिर नीरा की कहानी बदली और टू जी स्पेक्ट्रम घोटाले में उसके जुड़े होने की बात बहुत ही बच-बचकर दी गई. इसमें बताया गया है कि गृह मंत्रालय से अनुमति लेने के बाद इनकम टैक्स विभाग ने दो हज़ार आठ-नौ में तीन सौ दिन तक नीरा राडिया के फ़ोन टेप किए थे. जिनमें नीरा, बरखा और सांघवी के अलावा पत्रकार प्रभु चावला, राजदीप सरदेसाई, एमके वेणु और एनडीटीवी की बहसों में दिखने वाले मार्केटिंग के धंधे से जुड़े सुहैल सेठ और पूर्व प्रधानमंत्री अटल विहारी वाजपेई के मुंहबोले दामाद रंजन भट्टाचार्य से भी बातचीत कर रही है. अब तक बातचीत के सभी टेप सार्वजिक नहीं हो पाए हैं.पाठकों की सुविधा के लिए बता दें कि विकीपीडिया एक इंटरनेट पर एक ऐसा इनसाइक्लोपीडिया है जिसे लगातार अपडेट किया जा सकता है.

नीरा राडिया के साथ बरखा और बाक़ी पत्रकारों की बातचीत से ज़्यादा कुछ साबित हो पाए या न हो पाए लेकिन इतना साफ़ हो गया है कि सत्ता के दलालों के साथ आज के पत्रकार कितने गहरे जुड़े हैं. सारे परिस्थितिजन्य सबूत इस बात की तरफ़ इशारा कर रहे हैं कि इन पत्रकारों के नीरा राडिया जैसे दलालों से गहरे रिश्ते हैं. वरना जो पत्रकार ये सफ़ाई दे रहे हैं कि अपने समाचार सूत्र से बात करना अपराध नहीं, उन्हें बताना चाहिए कि इस ‘सूत्र’ से बात कर उऩ्होंने कौन सी ख़बर ब्रेक की थी. उन्होंने नीरा राडिया का पर्दाफ़ाश क्यों नहीं किया?

लेखक भूपेन पत्रकार हैं. उनका यह लेख समयांतर के दिसंबर अंक में प्रकाशित हो चुका है. इसे उनके ब्‍लॉग ‘कॉफी हाउस’ से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

0 Comments

  1. Neeraj Bhushan

    December 14, 2010 at 1:57 pm

    क्यूँ नहीं करते सभी पत्रकार अपने भ्रष्ट सहयोगियों का नामों का खुलासा, अब भी? मैंने समाचार एजेंसी पीटीआई में लंबी लड़ी है, अभी तक लड़ रहा हूँ. वही मुद्दे थे जो आज टेपों के जरिये बाहर आ रहे हैं. मुझे बाहर कर दिया गया, मुक़दमे ठोक दिए गए ताकि ‘मेरी’ लड़ाई कमजोर पड़ जाए. सभी पत्रकार संगठनों ने भी पी.टी.आई. का ही साथ दिया. वहाँ उनके स्वार्थ जुड़े थे, जुड़े हैं.

    परन्तु राडिया देवी की कृपा से सच सामने आ रहा है, सब कुछ साबित हो रहा है. मैं खुश हूँ — मैं सही था, सही हूँ. किस तरह से पी.टी.आई. में नंगा नाच चल रहा है वह गाथा PTI DIARY में लिख भी रहा हूँ.

    सच कहूँ तो पी.टी.आई. मीडिया में करप्शन कि ‘गंगा’ है. और उसके सूत्रधार हैं इसके चीफ श्री एम.के.राजदान. उनकी दलाली करने में साथ देने वाले बिजनेस विभाग के चीफ श्री राकेश हरी पाठक और चमचा युनियन चलाने वाले श्री एम.एस.यादव मिलकर देश को बुद्धू बना रहे हैं. श्री विनोद मेहता जी के आऊटलुक पर ज्यादा भरोसा नहीं क्यूंकि वह भी इन तीनों के पार्टी में शामिल हैं. एक पार्टी में तो उन्होंने ने भी जाम थाम रखा था.

    उफ़. बड़ी तकलीफ होती है. सब राडिया वाली मीडिया से ही हैं.

  2. sunil dutt

    December 14, 2010 at 10:24 pm

    maheswar prasad and om prakash both sr. editor in daily punjab kesri jal.are sick. maheswar prasaad is in the hospital in critical position on the other side om prakash got mejor heart attack. both served fo punjab kesari for 35 years. now who will take care of them? they are alone, nobody knows them in the the media line. god give them long life. jindgi or mout kuda ke hath hai.par dukh tab hota hai jab apno ko dard hota hai.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास तक खबर सूचनाएं जानकारियां मेल करें : [email protected]

भड़ास के वाट्सअप चैनल से जुड़ें और नवीनतम खबरें पाएं : Bhadas Whatsapp

भड़ास लीगल टीम : किसी किस्म की लीगल हेल्प के लिए संपर्क करें- Bhadas Legal Team

You May Also Like

Uncategorized

भड़ास4मीडिया डॉट कॉम तक अगर मीडिया जगत की कोई हलचल, सूचना, जानकारी पहुंचाना चाहते हैं तो आपका स्वागत है. इस पोर्टल के लिए भेजी...

Uncategorized

भड़ास4मीडिया का मकसद किसी भी मीडियाकर्मी या मीडिया संस्थान को नुकसान पहुंचाना कतई नहीं है। हम मीडिया के अंदर की गतिविधियों और हलचल-हालचाल को...

हलचल

[caption id="attachment_15260" align="alignleft"]बी4एम की मोबाइल सेवा की शुरुआत करते पत्रकार जरनैल सिंह.[/caption]मीडिया की खबरों का पर्याय बन चुका भड़ास4मीडिया (बी4एम) अब नए चरण में...

Uncategorized

मीडिया से जुड़ी सूचनाओं, खबरों, विश्लेषण, बहस के लिए मीडिया जगत में सबसे विश्वसनीय और चर्चित नाम है भड़ास4मीडिया. कम अवधि में इस पोर्टल...