बीसी खंडूरी की ईमानदारी पर विकीलीक्स का तमाचा

घपले-घोटालों को लेकर निशंक की घेराबंदी करने में बीसी खंडूरी ने हर वो दांव चला जो उन्हें सीएम की कुर्सी पर पुनः बैठा सकता था। सो उत्तराखंड में भाजपा में कथित तौर पर ईमानदार चेहरे के रूप में जाने जाने वाले खंडूरी इन दिनों राज्य को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने के दावे दर दावे कर रहे हैं। लेकिन खंडूरी खुद दूध के धुले नहीं है। जी हां, यह पूरी तरह सच है।

निशंक की तानाशाही और बड़े अखबारों की नंगई

उत्तराखंड में सीएम रमेश पोखरियाल निशंक के आगे बड़े मीडिया घराने दुम हिला रहे हैं। निशंक जैसा चाहते हैं, नाम के ये बड़े अखबार उन्हीं के इशारे पर तय कर रहे हैं कि उन्हें अपने पाठकों को कौन खबर देनी है, और किसे छुपाना है। पत्रकार उमेश कुमार के घर की कुर्की प्रकरण इसका ताजा उदाहरण है। अमर उजाला और दैनिक जागरण, दोनों ने ही चार जून को देहरादून में हुई इस पुलिसिया कार्रवाई की कोई कवरेज नहीं की।

निर्वाचन आयोग की नाक के नीचे करोड़ों का घोटाला

दीपक आजादउत्तराखंड में भ्रष्टाचार की जड़े कहीं गहरे तक धंसी हुईं हैं। यह किसी सरकार या किसी चेहरे तक सीमित नहीं है। निर्वाचन आयोग के मातहत काम करने वाले राज्य निर्वाचन विभाग भी इस बीमारी से बचा नहीं है। भ्रष्ट और बेइमान किस्म के नौकरशाह इसे भी अपनी काली कमाई का जरिया बनाने में नहीं चूक रहे हैं। जिस निर्वाचन आयोग पर गर्व करने के लिए इस मुल्क की जनता के पास बहुत सारी वजहें मौजूद हैं, उसी आयोग के दिशा-निर्देशन में उत्तराखंड में चुनाव के नाम पर करोड़ों का घोटाला खुलकर सामने आया है।

बाबा रामदेव के दामन पर भी कम नहीं हैं दाग

दीपक आजाद: तहलका और संडे पोस्‍ट ने खोली पोल : स्विस बैंकों में जमा काली कमाई को स्वदेश लाने और देश में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ योग गुरु बाबा रामदेव के मुकाबले शायद ही कोई दूसरा शख्स इतना मुखर हो। रामदेव की इस मुखरता का हर वह आदमी कायल है, जो इस देश में भ्रष्टाचार रूपी राक्षसों से लड़ना चाहता है। इस मुखरता का मैं भी सम्‍मान करता हूं। लड़ाई अन्ना हजारे भी लड़ रहे है।

कैग ने बनाई रेल, निशंक जा सकते हैं जेल

दीपक आजादहरिद्वार कुंभ के लिए नोबेल प्राइज पाने की लालसा रखने वाले मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक के दावों की पोल खुल गई है। कैग की रिपोर्ट से खुलासा हुआ है कि किस तरह आंख मूंदकर कुंभ के नाम पर निशंक की छत्रछाया में उनके चहेते नौकरशाहों ने करोड़ों के वारे-न्यारे किए। न केवल कुंभ में अनाप-शनाप खर्च किया गया, बल्कि कमीशनखोरी के लिए ठेकेदारों को करोड़ों का लाभ पहुंचाया गया।

नेहरू की देहरादून जेल यात्रा : पत्रकार राजू गुसांई ने खोजी असल जेल बैरक

[caption id="attachment_18358" align="alignleft" width="63"]दीपक आजाददीपक आजाद [/caption]: हरकत में आई प्रदेश सरकार : देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अंग्रेजों से लड़ते हुए कई साल जेल की कोठरियों में कैद रहे। वर्ष 1932-33 में अंग्रेजों ने नेहरू को गिरतार कर देहरादून जेल में रखा। उस दौरान कई और स्वतंत्रता सेनानी भी नेहरू के साथ दून जेल में रहे। नेहरू जेल की जिस बैरक में रखे गए उसकी ऐतिहासिकता को देखते हुए सरकार से उसे संरक्षित करने की मांग उठती रही है।

उत्‍तराखंड में सरकारी चाटुकारिता का ठेका ईएमएस को

दीपक आजाद: पिछले पांच सालों में 32 लाख का भुगतान : यह अपने उत्तराखंड में ही हो सकता है कि सरकार मीडिया संस्थानों को अपनी चाटुकारिता में लगाने के लिए सालाना लाखों रुपयों का ठेका देने में भी किसी तरह की कोई शर्म या हया महसूस नहीं करती। सूचना महकमे में सालों से अपनी खबरों के लिए कम, धंधेबाजी के लिए कुख्यात एक्सप्रेस मीडिया सर्विस के साथ मिलकर सूचना विभाग के बाबू यह कमाल दिखा रहे हैं।

सैफ विंटर गेम्‍स के नाम पर यह कैसा तमाशा!

[caption id="attachment_18358" align="alignleft" width="63"]दीपक आजाददीपक आजाद[/caption]‘जंगल में मोर नाचा किसने देखा’, यह कहावत उत्तराखंड में इन दिनों खासा गरम है। सैफ विंटर गेम्‍स के नाम पर देहरादून से लेकर औली तक में जो कुछ हुआ, उसके केंद्र में यह फिट बैठती है। कंपकंपाती ठंड के बीच हुए सैफ विंटर गेम्स, कॉमनवेल्थ की तर्ज पर सवाल उठाते हैं कि आखिर इन खेलों की जरूरत किसको है? इंडिया को या भारत को।

सहारा के संपादक और ब्‍यूरोचीफ भिड़े, नौबत पहुंची हाथापाई तक

देहरादून। लगता है राष्ट्रीय सहारा के स्थानीय संपादक का विवादों के साथ चोली दामन का साथ है। ताजा मामले में तो सारी हदें ही पार हो गई। खबर रिपीट होने से उपजा विवाद इतना बढ़ा कि मामला हाथापाई तक पहुंच गया। बताते हैं कि भरी मीटिंग में हुए विवाद में संपादक एलएन शीतल, ब्यूरो चीफ अमरनाथ पर ऐसे उखड़े कि उन्होंने संपादक की गरिमा का भी खयाल नहीं रखा और अपने ही ब्यूरो चीफ पर हाथ उठाने के लिए अपनी सीट से खड़े हो गए।

सीएम और सीजे की हवाई यात्रा से उठ रहे सवाल

दीपकदेहरादून। हाईड्रो पॉवर, स्टर्डिया और मेडिकल कॉलेज जैसे जमीन घोटाले हाईकोर्ट की टेबल पर पहुंचने के साथ ही उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के भविष्य का सफर मानों दांव पर लग गया था। अदालत की चौखट से इनके पहुंचने से उपजे शोर-शराबे के बीच पिछले दिनों सरकारी हेलीकॉप्टर से पहाड़ों की सैर पर निकले हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बारेन घोष पर केंद्रित मुंहजबानी कानाफूसियों ने नई चर्चाओं को जन्म दे दिया।

निशंक का फर्जी हलफनामा और माया की उछाल!

निशंक : मुख्यमंत्री ने दो साल में दो हजार फीसदी की रफतार से बढ़ाया बैंक बैलेंस : दिल्ली से महाराष्‍ट्र-आंध्र, कनार्टक से उत्तराखंड तक भ्रष्ट नेता-नौकरशाहों का पापी गठजोड़ दिन दूनी-रात चौगुनी रफ्तार से घोटालों की गंगा में डुबकी लगा रहा है, बगैर किसी लोकलाज या भय के। बात उत्तराखंड की हो तो दस साल का यह हिमालयी राज्य देश के भ्रष्ट राज्यों से कहीं भी पीछे नहीं है।

हे प्रतापी निशंक इस ‘पापी विवेक’ का भांडा तो फूटना ही था!

दीपक अरबों के भूमि घोटाले में घिरे उत्तराखंड के पत्रकार मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक की अदा भी निराली है। पहले कायदे कानूनों को ठेंगा दिखा घोटाला करो और फिर सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो समझो हो गई बल्ले-बल्ले। लेकिन पाप का घड़ा फूटने लगे तो बचाव के लिए बेशर्मी की हद तक उतर जाने में भी कोई संकोच नहीं। एक के बाद एक घोटालों में घिरते देख निशंक की अब तक की शैली यही है। लेकिन आखिर काली करतूतों पर पर्दा भी चढ़े रहे तो कब तक, वह तो कभी न कभी बेपर्दा हो ही जाती है।

सूचना विभाग का हाथी, चोरी का संपादकीय और प्रकाशक निशंक

दीपककिसी सूबाई सरकार के लिए सूचना महकमा उसके आंख-कान की भूमिका में होता है, जो उसकी योजनाओं को, उसके क्रियाकलापों को जनता तक पहुंचाने के लिए मीडिया के बीच एक कड़ी की भूमिका अदा करता है। इसका एक काम और भी होता है सरकार के पक्ष-विपक्ष से तालुक रखने वाली अखबारी कतरनों को समेटते रहना, ताकि सत्तासीन खुली आंखों से देख सकें। पर आज के राजाओं का सत्ता के मद में चूर होने का ही तकाजा है कि वे अपनी आलोचना बर्दाश्त नहीं कर पाते और जो ऐसा करते हैं, उनके कान मरोड़ने के लिए सूचना विभाग जैसे विशालकाय हाथी की कमान उनकी मुठठी में होती है।

हे महान संपादक अश्विनी कुमार महज कोरे उपदेश मत दो!

दीपक आजादअश्विनी कुमार संभवतः इकलौते ऐसे संपादक हैं जो अपने संपादकीय में हर सुबह शायरी और कविताओं के जरिये तल्खी के साथ उपदेशक की भूमिका में अपने पाठकों के बीच हाजिर होते हैं, पर उनके पंजाब केसरी का रंग-ढंग कम चौंकाने वाला नहीं है। शायद यह पंजाब केसरी में ही हो सकता है कि एक पत्रकार जो पूरे एक दशक से केसरी का चेहरा हो, लेकिन उसका ही अखबार उसे पहचानता तक न हो। उत्तराखंड में पंजाब केसरी को ढो रहे एक पत्रकार की कहानी हैरान करने वाली तो है ही, केसरी की धंधेबाजी वाला चेहरा भी बेपर्दा करती है।

प्रवासी पंछी हैं प्रभात डबराल

दीपक आजाददेहरादून। पत्रकार से सूचना आयुक्त बने प्रभात डबराल के उत्तराखंडी प्रेम को लेकर राज्य के मीडिया हलकों में एक तल्ख बहस चल रही है। कहा जा रहा है कि डबराल एक ऐसे प्रवासी पंछी हैं जो अपना बुढ़ापा काटने के लिए उत्तराखंड चले आए हैं। ऐसे में अब प्रभात को ही साबित करना होगा कि उन्होंने महज बुढ़ापा काटने भर के लिए दिल्ली से देहरादून के लिए उड़ान नहीं भरी है। वे ऐसा कर पाते हैं या नहीं, यह समय बताएगा।

मर्सिया पढ़ना हो तो उत्तराखंड चले आइये

दीपकझूठ के पांव नहीं होते, यह अतीत का फलसफा सा लगता है। पर झूठ के पांव तलाशने हों तो देव-प्रेतात्माओं की ‘मरू-भूमि’ उत्तराखंड में इसके दर्शन किए जा सकते हैं, वह भी बिना किसी लागलपेट के। तहलका को दिए उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के इंटरव्यू के कुछ अंश सच-झूठ की सियासत का मर्सिया पढ़ने जैसे किसी दर्शन पर सिर खुजाने जैसा है।

अजय नावरिया और अनीता भारती को सम्मान

देहरादून। दलित साहित्य एवं सांस्कृतिक अकादमी, देहरादून की ओर से प्रति वर्ष दिया जाने वाला ‘डॉ अम्बेडकर राष्ट्रीय साहित्य सम्मान’ इस बार युवा कहानी व उपन्यासकार डॉ. अजय नावरिया और ‘वीरांगना झलकारी बाई वीरता सम्मान’ दलित स्त्री आंदोलन की अगुवा लेखिका अनीता भारती को दिया जाएगा। दलित साहित्य एवं सांस्कृतिक अकादमी के कार्यकारी अध्यक्ष रूपनारायण सोनकर ने बताया कि अकादमी की ओर से प्रतिवर्ष एक साहित्यकार को ‘डॉ. अम्बेडकर राष्ट्रीय साहित्य सम्मान’ दिया जाता है।

जागरण, देहरादून में महसूस होने लगी जनवाणी की आहट

: कई अन्‍य अखबारों के पत्रकार नये ठिकाने की तलाश में : मेरठ से लॉच होने जा रहे दैनिक अखबार ‘जनवाणी’ की आहट देहरादून में भी थोड़ी बहुत महसूस की जाने लगी है। छोटे-बड़े अखबारों में काम रहे कई मीडियाकर्मी जनवाणी के लिए संपर्क सूत्रों की तलाश में जुटे हैं। देहरादून में विशेषकर वे पत्रकार जनवाणी की राह देख रहे हैं, जो अपने संस्थानों में विभिन्न वजहों से भेदभाव का सामना कर रहे हैं या फिर दो वक्त का चूल्हा फूंकने लायक सेलरी से भी महरूम चल रहे हैं।

प्रशासन ने फिर सील किया देहरादून प्रेस क्‍लब

तालाउत्तराखंड में मीडिया कई तरह के संकटों का सामना कर रहा है। कुछ संकट सत्ता की हनक से सियासत ने पैदा किए हैं तो कुछ पत्रकारों की आपसी धींगामस्ती उसे आलोचनाओं और विश्वसनीयता के ह्रास के भंवर में धकेल रही है। पत्रकारों के आपसी टकरावों के चलते दो साल से सीलबंद प्रेस क्लब का ताला पत्रकारों के एक धड़े ने दिवाली मिलन पर कानून की परवाह किए बगैर तोड़ दिया।

जाति न पूछो ‘हिंदुस्तान’ की!

दीपक आजाददेहरादून। ब्राहमणवादी वर्णव्यवस्था के घेरे में जकडे़ भारतीय समाज में क्या कभी जाति नाम की बीमारी का क्षय हो पाएगा? जातीय चश्मे से जिस प्रकार की खबरें परोसी जा रही हैं, उससे धुंध छंटने के बजाय और घनी ही होती है. उत्तराखंड में देहरादून से प्रकाशित एचटी मीडिया घराने के दैनिक हिन्दुस्तान में 29 अक्टूबर को पेज नंबर दो पर बाक्स आइटम में ‘कांग्रेस के दलित कार्ड से भाजपा को राहत’ हेडलाइन से एक खबर छपी है.

निशंकनामा पढ़ेंगे तो आप भी शरमा जाएंगे

[caption id="attachment_18358" align="alignleft" width="63"]दीपक आजाददीपक आजाद[/caption]देहरादून। पैसे लेकर खबरें छापना यानी पेड न्यूज सिंड्रोम को लेकर मीडिया घरानों पर आलोचनाओं का कोई असर होता नहीं दिख रहा है। जाति-धर्म की संकीर्णताओं से लेकर सत्तासीनों की चाटुकारिता से आगे बढ़कर अखबारों में बैठे चारणाभाट अब नंगई पर उतर आए हैं। चाटुकारिता के स्पेशल पेज छापे जा रहे हैं, बिना कहीं एडीवीटी लिखे।

जागरण की नीतियों से नाराज होकर इस्तीफा दिया

देहरादून। संघ परिवार की उग्र हिन्दुत्व की विचारधारा से खाद पानी लेकर पला-बढ़ा दैनिक जागरण द्वारा अयोध्या विवाद मामले पर सांप्रदायिक चश्मे से खबरें प्रकाशित करने के खिलाफ देहरादून में सब एडिटर दीपक आजाद ने इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने तीस सितम्बर से ही दैनिक जागरण दफ्तर जाना बंद कर दिया था। चौदह अक्टूबर को दीपक ने डाक के जरिये संपादक को अपना इस्तीफा भेजा। दीपक पिछले तीन साल से दैनिक जागरण, देहरादून से जुड़े हुए थे।  दीपक लोकसभा चुनाव के बाद पेड न्यूज के मामले में जागरण द्वारा अपने पत्रकारों को कालेधन के रूप में लिफाफे में हिस्सा बांटने का भी विरोध कर चुके हैं।