: मुख्यमंत्री ने दो साल में दो हजार फीसदी की रफतार से बढ़ाया बैंक बैलेंस : दिल्ली से महाराष्ट्र-आंध्र, कनार्टक से उत्तराखंड तक भ्रष्ट नेता-नौकरशाहों का पापी गठजोड़ दिन दूनी-रात चौगुनी रफ्तार से घोटालों की गंगा में डुबकी लगा रहा है, बगैर किसी लोकलाज या भय के। बात उत्तराखंड की हो तो दस साल का यह हिमालयी राज्य देश के भ्रष्ट राज्यों से कहीं भी पीछे नहीं है।
कांग्रेस राज में हुए 56 घोटालों की जांच के लिए एक आयोग पहले से ही यहां काम कर रहा है, लेकिन अब भाजपाई राज में हो रहे घपले-घोटालों को लेकर फिर एक और जांच आयोग के लिए झाड़ियां उग आई हैं। इस बार किसी तरह की कोई जांच हुई तो संभव है राज्य के पत्रकार, साहित्यकार, मुख्यमंत्री अपने चुनावी हलफनामे और नोटों के मायावी संसार को लेकर खुद उसके दायरे में हों। पहले निर्वाचन आयोग और अब राज्य विधानसभा सचिवालय को दिए हलफनामे और उनके बैंक बैलेंस मे करीब दो साल में करीब दो हजार फीसदी का उछाल तो इसी ओर इशारा करता है। 2012 में राज्य विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी माहौल अभी से गरमाने से संभव है आय से अधिक संपत्ति और अपने चुनावी हलफनामे में तथ्यों की लुका-छिपी का खेल निशंक के लिए परेशानी का सबब बन सकता है।
पत्रकार से मुख्यमंत्री बने निशंक के कामकाज के तरीकों को लेकर कई तरह की चर्चाएं होती रही हैं। हालांकि सत्ता के शीर्ष पुरुष को लेकर मुंहजुबानी होने वाली किसी भी फुसफुसाहट के तब तक कोई मायने नहीं होते, जब तक उनका कोई पुख्ता आधार न हो। पर इधर कुछ ऐसे तथ्य सामने आए हैं जो कई सवाल खड़ा करते हैं। आरटीआई के मार्फत पता चला है कि मुख्यमंत्री ने राज्य विधानसभा सचिवालय में अपनी आय और देनदारियों का जो ब्योरा पेश किया है वह गंभीर गड़बड़ियों की ओर इशारा करता है। वर्ष 2007 में राज्य विधानसभा के चुनाव के वक्त निर्वाचन आयोग को दिए हलफनामे में निशंक ने बताया कि उनका बैंक बैलेंस महज एक लाख 55 हजार रुपये है और उनके पास दस ग्राम सोना है। इधर सितम्बर 2009 में राज्य विधानसभा सचिवालय को दिए अपनी संपत्ति और देनदारियों के ब्योरे में निशंक ने खुलासा किया कि उनका बैंक बैलेंस करीब इन दो वर्षों में 1 लाख 55 हजार से बढ़कर 25 लाख रुपये और सोना दस ग्राम से बढ़कर दो सौ ग्राम पहुंच गया है। इसमें उन्होंने 2 लाख 80 हजार रुपये की बैंक देनदारी भी बताई है।
जून 2010 में फिर दिए अपने हलपफनामे में उन्होंने बताया कि उन पर भवन ऋण के रूप में 35 लाख रुपये की देनदारी हो गई है। विधानसभा सचिवालय को दिए ब्योरे में लखनऊ में किस्तों पर आवंटित आवास के साथ निशंक ने बताया कि निशंक प्रकाशन पौड़ी, निशंक प्रिंटिग प्रेस और दैनिक अखबार सीमांत वार्ता का स्वामित्व भी करीब दो दशक से उनके पास है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि मुख्यमंत्री ने वर्ष 2007 में निर्वाचन आयोग को दिए हलफनामे में निशंक प्रकाशन, प्रिंटिंग प्रेस और सीमांत वार्ता के स्वामित्व का कोई जिक्र नहीं किया है। पेन नम्बर की अनिवार्यता के बावजूद निशंक ने निर्वाचन आयोग को इस मामले में भी अंधेरे में रखा है। ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि निशंक को अपने स्वामित्व वाली सर्वज्ञात फर्मों को निर्वाचन आयोग से छुपाने की क्या जरूरत पड़ी?
जाहिर है निशंक ने इन फर्मों से होने वाली आय पर भी निर्वाचन आयोग को दिए अपने हलफनामे में पर्दा डाले रखा है। ऐसे में निर्वाचन आयोग और राज्य विधानसभा सचिवालय को दिए हलफनामे की सत्यता ही संदिग्ध लगती है। इससे बढ़कर एक अहम सवाल खड़ा होता है कि आखिर मुख्यमंत्री के पास ऐसी कौन सी जादुई मशीन है, जिसके बूते महज दो साल में उनका स्वघोषित बैंक बैलेंस लाखों की देनदारी के बावजूद दो हजार फीसदी की रफ्तार से छलांग लगा बैठा। सरकार से मिलने वाले मामूली वेतन से यह संभव नहीं है। बता दे कि मुख्यमंत्री को उत्तराखंड में मासिक दस हजार रुपये के आसपास ही वेतन मिलता है। यह भी कुछ महीने पहले ही दस हजार तक पहुंचा है। करीब आठ माह पहले तक यह इससे भी आधा ही था। इसमे भत्ते शामिल नहीं हैं।
खैर, तथ्यों की लुका-छिपी का यह खेल यहीं खत्म नहीं होता। मुख्यमंत्री ने अपने पारिवारिक उत्तरदायित्व के संबंध में भी कोई जिक्र नहीं किया, जबकि उनकी ही सरकार के मंत्रियों, विधायकों और विपक्षी नेताओं ने निर्वाचन आयोग से लेकर राज्य विधानसभा सचिवालय तक में जो हलफनामा दिया है, उसमें उन पर आश्रित परिजनों का भी पूरा ब्योरा दिया गया है। यही नहीं निशंक के बैंक बैलेंस और अन्य विधायक व मंत्रियों के बैंक बैलेंस पर गौर करें तो मुख्यमंत्री की संपत्ति में अभूतपूर्व उछाल खुद सवालों के घेरे में आ जाती है।
मसलन, निशंक सरकार में मंत्री मदन कौशिक का बैंक बैलेंस 7 लाख, दिवाकर भट्ट का 3 लाख, बलवंत सिंह भौंर्याल का 5 लाख, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष व मंत्री रहे विधायक बिशन सिंह चुफाल का 1 लाख, कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष यशपाल आर्य का 2 लाख, नेता प्रतिपक्ष हरक सिंह रावत का 5 लाख, मंत्री मातबर सिंह कंडारी का 2 लाख, मंत्री प्रकाश पंत का 5 लाख, विधानसभा अध्यक्ष हरबंश कपूर का 1 लाख, यूकेडी से विधायक पुष्पेश त्रिपाठी का 40 हजार और मुख्यमंत्री रहे बीसी खंडूडी का 20 लाख रुपये है। बैंक बैलेंस के मामले में दूसरे पायदन पर खड़े बीसी खंडूड़ी, निशंक से इस मायने में भिन्न हैं कि उन्होंने निर्वाचन आयोग को 2004 के आम चुनाव में अपने हलफनामे में मौजूदा 20 लाख रुपये से थोड़ा ही कम 16 लाख रुपये के करीब बैंक बैलेंस बताया है, जबकि निशंक की कहानी इससे जुदा है।
हालांकि निशंक के इस हलफनामे को कुछ इस तरह भी समझा जा सकता है कि ऐसे दौर में जब मायावाती से लेकर मधु कोड़ा और ए राजा छाप नेता देखते ही देखते अथाह दौलत का साम्राज्य खड़ा कर जाते हैं, तो खाकपति से कुछ लाख जुटा लेना बहुत ज्यादा मायने नहीं रखता? लेकिन जब मायावती वर्ष 2003 और 2007 के अपने अलग-अलग चुनावी हलफनामे में में दिए ऐसे ही संपत्ति के ब्योरों को लेकर कानून के कठघड़े में खड़ी हो सकती है तो निशंक को क्यों नहीं इन सवालों का सामना करना चाहिए? हालांकि विधायक व मंत्रियों के इन हलपफनामों को अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता है।
यह नेताओं पर ही निर्भर है कि वे कितनी मात्रा में सच बोलना चाहते हैं। इस अबूझ से लगने वाले सवाल से हटकर इसका एक पहलू दूसरा भी है, जैसा कि एक वरिष्ठ पत्रकार बताते हैं कि दस साल पहले वजूद में आए उत्तराखंड और झारखंड के दो चर्चित चेहरों में कुछ समानताएं हैं, तो कुछ ऐसी असमानताएं भी हैं जो उन्हें एक दूसरे से जुदा करती हैं। जैसे एक का बुलबुला इसलिए फूट पड़ा कि वे आदिवासी संस्कारों से युक्त पृष्ठभूमि के चलते अपने पाप-पुष्य की पोटली को लम्बे समय तक सहेजपाने में सफल नहीं हो पाए, जबकि दूसरे ऐसे शख्स हैं जो चतुराईयुक्त ब्राह्मणी संस्कारों की उपज हैं। यही भिन्नता उनके सुरक्षा कवच का काम कर रही है।
लेखक दीपक आजाद हाल-फिलहाल तक दैनिक जागरण, देहरादून में कार्यरत थे. इन दिनों स्वतंत्र पत्रकार के रूप में सक्रिय हैं.












narayan
December 18, 2010 at 10:55 am
hi kabar thik hai
Ramesh kediyal
December 20, 2010 at 2:36 am
श्रीमान इन दीपक जी ने तो मुख्या मंत्रीजी की छवि ख़राब करने का ठेका उठा रखा है ये मुख्य मंत्री के किसी विरोधी के इशारे पर यह सब कर रहे हैं या शायद किसी के पे रोल पर काम कर रहे हैं क्या मुख्य मंत्री जी के आलावा और कोई इन्हें देखाए नहीं देता , कहावत है न सावन के अंधे को हरा है हरा नज़र आता है तो इन्हे केवल निशंक जी ही नज़र आते हैं पुराने मुख्य मंत्री खंडूरी इमानदारी का लबादा पहने घूम रहे हैं लेकिन उनसे जयादा तगड़ा हाजमा था किसे और का जो सारंगी की आड़ मैं पूरा भूतल परिवहन मंत्रालय तथा उत्तराखंड का sara paisa hazam कर gaye लेकिन dakar tak नहीं mari और bane हैं sabse emandar neta wah bhai wah
ram singh
December 22, 2010 at 5:02 am
Ramesh kediyal shayad mukhyamantri ke rishtedar hain. is waqt cm Nishank ke rishtedaron ke alawa koi bhi uneh imandaar uahi manta. deepak ji ki khabar 100% sahi hai. ex cm khanduri ko crupt catane wale uttrakhand ka apman karne wale hain.
Thapa
December 27, 2010 at 4:03 pm
रमेश केदियल, जोकि १००% फर्जी नाम है, तुमने तो निशंक की दलाली का ठेका उठा रखा है, और नारायण तुझे मै कई बार समझा चूका हूँ हाकर था, है, और रहेगा.. यंहा पत्रकारों के मंच पर आकर कमेन्ट को सही और गलत मत बताया कर.
सही तो कह रहा है दीपक. २ लाख का बैंक बैलेंस दिखने वाले निशंक ने अब सदियों से चले आ रहे अपने अख़बार को रंगीन भी कर दिया है.. आयुर्वेदिक कॉलेज भी खड़ा कर दिया है, गोवा में होटल भी ले लिया है
Arun
February 14, 2011 at 12:00 pm
निशंक जी को बिना पूछे जांचे डाक्टर कहना मीडिया के लिये शर्म की बात है। वास्तव में निशंक जी की साहित्य साधना और डाक्टरेट की एक ही कहानी है। जिस तरह वह एक ही साल में कई साहित्यिक पुस्तकों को जादू की छड़ी घुमा कर लिख देते हैं या लिखवा देते हैं उसी प्रकार बिना शोध के ही उनकी डाक्टरेट की डिग्री भी मिल जाती है। सभी पत्रकार उन्हें डाक्टर निशंक कह रहे हैं या लिख रहे हैं मगर ये कोई नहीं जानता कि निशंक जी ने कहा से और किस विषय पर डाक्टरेट की है। यह अपने आप में सीबीआइ जांच का मामला हैं। बिक गये हैं उत्तराखण्ड के पत्रकार। खास कर ईटीवी तो पत्रकारिता के नाम पर वैश्यावृत्ति कर रहा है। ईटीवी वालों को शर्म तक नहीं आती कि आखि इतनी भाएडगिरी करने से उत्तराखण्ड की जनता इस चैनल के बारे में क्या सोचती होगी। निशंक जी का प्रचार विभाग खुद ही दावा करता है िकवह 24 में से 18 घण्टे राजकाज में जनसेवा करते रहते हैं। इसके बाद उनके पास 4 घण्टे बचते हैं। उन चार घण्टों में वह सोते भी हैं और किताबें भी लिखते हैं। धन्य हैं निशंक जी और धन्य हैं उनके चाटुकार गोविन्द कपटियाल। जो लोग उनके लिये किताबें लिखते हैं वे भी अपनी प्रतिभा बेच कर अपना शरीर बेचने का जैसा गन्दा धन्धा करते हैं। चाहे वे कालिदास रोड वाले हों या फिर श्रीनगर गढ़वाल वाले हों।