हरिवंश की कलम से- ‘कहां गइल मोर गांव रे’

पर इस बार 11 अक्तूबर को जेपी के जन्मदिन पर गांववालों ने अनुभव सुनाये. कहा मीडियावाले तो ऐसे-ऐसे सवाल पूछ रहे थे, मानो यूपी-बिहार के गांव ‘भारत-पाक’ जैसे दो देश हों. जेपी का जन्म कहां, घर कहां? वगैरह-वगैरह. गांववालों ने कहा, हमने तो इसके पहले जाना ही नहीं कि हमारा गांव, दो राज्यों और तीन जिलों में है. हम तो एक बस्ती हैं. एक शरीर जैसे. उसे आप बांट रहे हैं, ऊपर से बता या एहसास करा रहे हैं.

25 जून पर विशेष (4) : भ्रष्ट आचरण, नाचते कूदते नंदीगण और इंदिरा गांधी का (अ)न्याय

वरिष्ठ पत्रकार और जाने-माने पत्रकार स्वर्गीय राजेंद्र माथुर ने एक लेख लिखा था. 12 जून 1975 को. इंदिरा गांधी के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद. इसे आप पढ़ेंगे तो महसूस करेंगे कि देश में हालात सुधरे नहीं बल्कि बदतर हुए हैं. काले धन की समस्या और विकट हो गई है. सिस्टम का पतन और ज्यादा हो चुका है. कांग्रेसियों का लोकतंत्र विरोधी आचरण और ज्यादा दिखने लगा है.

25 जून पर विशेष (3) : उस दौर के कुछ कार्टून और तस्वीरें

आज के ही दिन देश में आपातकाल लगा था. सन 1975 की बात है. अखबारों का गला घोंट दिया गया था. प्रेस सेंसरशिप के भयावह दौर से गुजरा भारत का मीडिया. कई पत्रकार जेल गए और कई सरकार के तलवे चाटने लगे. साफ साफ विभाजन दिखा. जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में संपूर्ण क्रांति का बिगुल बजा दिया गया. उस दौर के कई नायक आज भी हमारे सामने हैं. उस दौर में कई अखबारों और मैग्जीनों ने अपने अपने अंदाज में आपात काल का विरोध किया.

25 जून पर विशेष (2) : इंदिरा बनाम जेपी और सोनिया बनाम अन्ना

: इस लोकतंत्र को समझिए : इन दिनों जन आंदोलन की खेती से नई राजनीति की फसल लहलहाने के आसार दिखते ही प्रणब मुखर्जी जैसे अनुभवी और समझदार कांग्रेसी इमरजेंसी की मनोग्रंथि से ग्रस्त हो जाते हैं। उनको तुरत-फुरत 1974 की परिस्थितियां सताने लगती हैं। यह दिखाता है कि विदेशों में जमा कालेधन की वापसी और भ्रष्टाचार को रोकने के लिए पैदा हुए जन उभार से कांग्रेस के नेताओं के होश उड़ गए हों। वैसे ही जैसे 12 जून 1975 को हुआ।

25 जून पर विशेष (1) : अघोषित आपातकाल तो आज भी लागू है

: इमरजेंसी 36 साल बाद : अगर आपातकाल का मतलब है- कुछ कानूनों के हाथों नागरिकों की आजादी का ठप हो जाना, नागरिक-अधिकारों के हनन पर सवाल उठाने वालों का निरंतर इस सदमे में जीना कि कहीं राजद्रोह का अपराधी ठहराने वाले कानूनों की कैद में जकड़ न लिया जाये और खुद को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहने वाले मीडिया का नागरिक-अधिकारों के हनन पर ज्यादातर चुप्पी साधे रहना, तो फ़िर एक अघोषित आपातकाल आज भी लागू है…