सवाल हिसार में कांग्रेस की गई या बची ज़मानत का नहीं

: हरियाणा को गुजरात हुआ समझिए : सवाल हिसार में कांग्रेस की गई या बची ज़मानत का नहीं, हरियाणा में नेस्तनाबूद हुई अस्मत का है. जैसे उसने कभी महाराष्ट्र में मराठों, यूपी में ब्राह्मणों और पंजाब में सिखों को खोया वैसे ही उसने हरियाणा में जाटों और गैरजाटों दोनों को खो दिया है. हिसार के चुनाव और उसके परिणाम को मतदाताओं के जातिगत तौर पर हुए बंटवारे के रूप में देखिए.

जैसा मैंने पहले भी लिखा संगोत्र विवाह के मुद्दे पर उन से हुए व्यवहार के बाद पहले तो जाटों की खापें ही खफा थीं. आरक्षण के मुद्दे पर जाट कांग्रेस से समाज के तौर पर भी नाराज़ थे. खापों और जाटों के कांग्रेस के खिलाफ फतवे उस जिले रोहतक से भी आ रहे थे जो खुद मुख्यमंत्री का गृहजिला है. उन्हीं के रोहतक के करीब जला गोहाना अभी बुझा नहीं था कि मिर्चपुर में खुद दलित ही जिंदा जले दिए गए. जले हुए ताज होटल में फिल्मकार रामू को साथ ले जाने पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को हटा देने वाली कांग्रेस ने हरियाणा के मुख्यमंत्री के खिलाफ कोई कारवाई तो क्या कोई जांच तक नहीं बिठाई. नतीजा कि दलित भी गए उसके हाथ से.

वो भी चलो एक आपराधिक घटना थी. और घटनाएं हो भी जाया करती हैं. लेकिन उसके बाद? उसके बाद जो भी हुआ वो सारी की सारी प्रशासनिक विफलता थी. इस हद तक कि देश की सर्वोच्च अदालत तक को आपकी प्रशासनिक व्यवस्था पे कोई भरोसा नहीं रहा. मिर्चपुर का मुक़दमा हरियाणा से बाहर दिल्ली ट्रांसफर हो गया. आपने तब भी अपनी नैतिक पराजय स्वीकार नहीं की. और फिर आपने एक के बाद एक राजनीतिक भूल भी की. कांग्रेस की सब से बड़ी राजनीतिक भूल तो ये थी कि उसने सन 2005 में नब्बे में से चौसठ सीटें लाकर देने वाले भजन लाल को तब भी दरकिनार कर दिया कि जब वो ताबड़तोड़ बहुमत साफ़ तौर पर हरियाणा की तीन चौथाई गैरजाट जनता के कांग्रेस के साथ आ जाने का परिचायक था.

उस भूपेंद्र सिंह हुड्डा को तब भी मुख्यमंत्री बना देने का फैसल कांग्रेस ने किया जिसे उसने खुद विधानसभा का चुनाव नहीं लडवाया था इस डर से कि अगर उनके मुख्यमंत्री हो सकने का शक जनता को हो गया तो कांग्रेस हार भी सकती है. और फिर अगर भजन लाल को किसी भी वजह से सही, किनारे करने का मन कांग्रेस ने बनाया भी तो मौका तब तक लगातार पांच बार विधानसभा चुनाव जीत चुके किसी कैप्टन अजय यादव को नहीं बनाया. चौटाला के जाटों में ज़बर न हो जाने के डर से जाट ही अगर ज़रूरी था हुड्डा से बहुत सीनियर बिरेन्द्र सिंह को भी नहीं बनाया. उस ने फिर हुड्डा को मुख्यमंत्री बनाया कि जब वे अगले चुनाव में कांग्रेस को बहुमत नहीं दिला सके.

कांग्रेस गलती पे गलती करती रही. वो तब भी नहीं चेती कि जब भाजपा ने हिसार उपचुनाव से पहले कुलदीप बिश्नोई से गठबंधन किया. उस भाजपा ने गैरजाटों में जिसकी जितनी भी सही पैठ के कारण देवीलाल जैसा महानायक और बंसीलाल भी गठबंधन करते और हर बार सरकार बनाते रहे. फिर इस बार तो भाजपा उन भजन लाल के बेटे के साथ आई जिन्हें खुद कांग्रेस भी हरियाणा के गैरजाटों का निर्विवाद नेता मानती रही. खापें नाराज़ थीं. गोहाना और मिर्चपुर हो ही चुके थे. कांग्रेस को जरा ख्याल नहीं आया कि अगर बचे खुचे गैरजाट भी चले गए तो क्या होगा. उसने आरक्षण को लेकर सरकार को नाकों चने चबवा चुके जाटों के सामने जाट मुख्यमंत्री के भरोसे एक जाट उम्मीदवार झोंक दिया. ये कांग्रेस में हुड्डा विरोधियों की किसी चाल में आ कर किया तो और अगर जैसे तैसे जाटों को खुश रख करने के लिए तो भी घातक सिद्ध हुआ. जाट जो साथ थे. वो भी जाते रहे.

शुद्ध वोट बैंक की बात करें तो कांग्रेस नंगी हो गई. हिसार परिणाम ने साबित कर दिया कि न उसके साथ जाट, न दलित, न पंजाबी, न बनिए. मकसद अगर हुड्डा के उम्मीदवार को हरवा कर हुड्डा को हटाने का बहाना खोजना था तो इसकी क्या ज़रूरत थी. वैसे ही हटा देते. और मकसद अगर पोलराइज़ेशन रोकना था तो फिर कुलदीप की काट किसी गैरजाट उम्मीदवार से क्यों नहीं की? सोचा होगा कि गैरजाट को लाएंगे तो सारे के सारे जाट चौटाला ले जाएंगे. ये शायद बेहतर होता. चौटाला का बेटा जीत जाता तो कुलदीप से ज्यादा बेहतर होता. दो कारणों से. एक कि अजय लोकसभा में होते भी तो ऐसे किसी तीसरे मोर्चे में होते जिसका कि आज कोई वजूद नहीं है. और दो कि भाजपा हरियाणा की आबादी में तीन चौथाई गैरजाटों को लामबंद करके आपको कल को हरियाणा की दस की दस सीटों पे टक्कर देने की हालत में न होती.

बहरहाल, पार्टियां अपने तरीके से सोचती हैं और कई बार उनकी सोच पत्रकारों से अलग भी होती है. वे अक्सर बहुत अलग नज़रिए से देखती हैं. लेकिन जो अब हरियाणा में दरअसल किसी अंधे को भी दिख रहा है वो ये कि इस जीत से उत्साहित भाजपा हरियाणा को गुजरात बनाएगी. हिंसा या दंगों के सन्दर्भ में नहीं. वोटगत राजनीति के अर्थ में. वो कहेगी तो छत्तीस बिरादरी मगर लामबंद करेगी गैरजाटों को. आखिर तीन चौथाई से भी ज्यादा हैं गैरजाट हरियाणा में. गैरजाट वो ये मान कर चलेगी कि जब तीं चौथाई की सरदार वो बन गई तो बहुत से एक चौथाई वाले भी साथ आ लेंगे अपनी ज़रूरतों की वजह से. इस तरह का पोलराइज़ेशन कुलदीप को भी सूट करता है. राष्ट्रीय और प्रदेश के स्तर पर भाजपा जैसी किसी पार्टी के साथ चलना उनकी राजनीतिक मजबूरी भी है. सो, हुड्डा को इतिहास और हरियाणा को देर सबेर गुजरात हुआ समझिए.

चंडीगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार जगमोहन फुटेला का विश्लेषण.

हिसार में खामखा वाहवाही लूटेंगे अन्नावाले

जगमोहन फुटेला: क्योंकि हिसार कभी कांग्रेस का था ही नहीं : मैंने एक न्यूज़ चैनल पे देखा. सी वोटर के एग्जिट पोल के सहारे वो बता रहा था कि हिसार में अन्ना टीम के हक़ में फैसला आता है या कांग्रेस के! ये अन्ना आन्दोलन की प्रशंसा है तो ठीक हैं. भक्ति है तो भी ठीक है और चमचागिरी हो तो तब भी उनकी मर्ज़ी. लेकिन ये व्यावहारिक नहीं है. ये सच नहीं है.

बल्कि मैं कहूँगा कि ये जिम्मेवार पत्रकारिता नहीं है. एक पत्रकार के नाते जब आप किसी का दोष किसी और के माथे नहीं मढ़ सकते तो किसी और का श्रेय भी किसी और को कैसे दे सकते हो? वैसे भी ये जो पब्लिक है वो सब जानती है. ज़मीनी सच्चाई इस न्यूज़ चैनल की जानकारी और अब हो रहे इस प्रचार से अलग है. खुद टीवी में स्ट्रिंगर से सम्पादक तक के अपने अनुभव से मैं ये कह सकता हूँ कि ज़मीनी सच्चाई या जन-धारणा के खिलाफ आप जब रिपोर्ट करते हो तो अपनी ही विश्वसनीयता और यों टीआरपी (अगर वो कोई है) तो उसका नुकसान करते हो.

मुझे अन्ना के आन्दोलन या उनके लोगों को कोई क्रेडिट जाता भी हो तो इस पर ऐतराज़ नहीं है. लेकिन मुझे दुःख होगा ये जान कर कि अगर वे या उनके साथी भी किसी ऐसी घटना के लिए वाहवाही बटोरते हैं जो उनके आगमन से बहुत पहले और उनके बिना भी घट ही रही थी. मुझे लगता है कि खुद अकेले अन्ना पर छोड़ दिया जाए तो वे शायद हिसार परिणाम का कोई श्रेय नहीं लेना चाहेंगे. इसके कारण हैं. हिसार या तो भजन लाल का था या ओमप्रकाश जिंदल का. कांग्रेस का तो वो कभी था भी नहीं. चौटाला के उम्मीदवार के रूप में सुरेन्द्र बरवाला और खुद अब कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में लड़े यही जयप्रकाश भी यहाँ से सांसद रह चुके हैं.

तो पहली बात तो ये मान के चलिए कि हिसार भी किसी ग्वालियर या रायबरेली की तरह पार्टियों से अधिक व्यक्तियों का संसदीय क्षेत्र रहा है. इसे विशुद्ध पार्टी के नज़रिए से अगर देखें भी तो वो शायद चौटाला की पार्टी का तो रहा हो सकता है (दो बार जीती उनकी पार्टी यहाँ से). लेकिन कांग्रेस का वो कभी नहीं रहा. कांग्रेस के साथ कभी वो रहा तो इस लिए कि भजन लाल उसके साथ थे. हिसार अगर कांग्रेस की ही जागीर होती तो हिसार के रहने वाले नवीन जिंदल भी कुरुक्षेत्र से जा के चुनाव न लड़ते होते. तो सबसे पहली बात ये कि हिसार न कांग्रेसी कभी था. न हिसार से पिछला सांसद ही कांग्रेस से था.

दूसरी बात. हिसार में कांग्रेस जीतती तो वैसे भी नहीं रही. मगर इस बार उसकी हार तो तभी हो गई थी जब से हरियाणा में ये आम धारणा बनी कि मौजूदा मुख्यमंत्री हुड्डा को हरियाणा में सिर्फ रोहतक दिखाई देता है. पिछले विधानसभा चुनावों में भाजपा के बिना भी चौटाला का 90 में से 32 (एक अकाली समेत) सीटें जीत जाना इसका प्रमाण है. हरियाणा का इतिहास गवाह है कि चौटाला की पार्टी ने जब जब भी भाजपा के साथ मिल के चुनाव लड़ा है, हरियाणा में सरकार बनाई है.

पिछली बार वे मिल के लड़े होते तो उनकी सीटें हो सकती थीं साथ के पार और कांग्रेस शायद बीस के नीचे. इस न्यूज़ चैनल समेत जिन मेरे पत्रकार बंधुओं ने कभी हरियाणा देखा, सुना या पढ़ा न हो उन्हें बता दें भाजपा के ऐन वक्त पे इनेलो-भाजपा गठबंधन और उधर जनहित कांग्रेस-बीएसपी गठबंधन टूट जाने से मिली ज़बरदस्त मदद के बावजूद कांग्रेस 90 में से महज़ 40 सीटें ही जीत पाई थी. दोनों विपक्षी गठबन्धनों में से कोई एक भी बचा रहता और सिर्फ दो तीन सीटें भी इधर की उधर हो गईं होतीं तो हरियाणा में आज कांग्रेस की सरकार नहीं होती.

पर, कोई कह सकता है कि बुआ के अगर मूंछें होतीं तो क्या वो तय न होती?..ठीक. माना कि राजनीति में काल्पनिक कुछ नहीं होता. जो होता है वही होता और जो होता है वो ही दिखता है. अब अगर इस आधार पर भी देखें तो अब हिसार का श्रेय अन्ना को देने वालों को जाटों की खापों का वो आन्दोलन क्यों नहीं दिखता जो उन्होनें संगोत्र विवाह के खिलाफ कानून बनाने के लिए चलाया था? उसके बाद आरक्षण के लिए उनक वो आन्दोलन क्यों दिखता मेरे इन पत्रकार मित्रों को जिसकी वजह से कोई तीन हफ्ते तक उत्तर भारत की रेल सेवाएं बाधित रहीं थीं. जाट कांग्रेस से बहुत दूर जा चुके मित्रो. ठीक वैसे ही जैसे कमलापति त्रिपाठी, ललित नारायण मिश्र और शुक्ल बंधुओं के पतन के बाद यूपी, बिहार और मध्य प्रदेश के ब्राह्मण चले गए थे. और आपरेशन ब्ल्यू स्टार के बाद किसी हद तक सिख आज भी हैं.

ऊपर से इस सब कारणों का बाप, मिर्चपुर. हरियाणा के दलित तो सन 96 मायावती के उफान पे होने के बावजूद एक अकेले जगन्नाथ की वजह से बंसीलाल की हविपा के साथ भी चले गए थे. वे किसी मायावती या कांग्रेस को नहीं, अपना हित अहित देखते हैं. वैसे भी आम तौर पर धारणा ये है कि हरियाणा में आमतौर पर जाटों को पोषित करने वाली पार्टी या नेता के साथ दलित जाते नहीं हैं. ऐसे में हुड्डा वाली कांग्रेस के साथ दलितों के जा सकने की कोई संभावना बची थी तो वो मिर्चपुर में जल कर स्वाहा हो गई थी.

कोई समझता हो या न समझता हो, अरविंद केजरीवाल ये बखूबी समझ रहे थे. वैसे भी वे हरियाणा के ही हैं. उन ने दिमाग लगाया. सोचा कि कांग्रेस जब हिसार में लुढ़क ही रही है तो क्यों उसका श्रेय बटोर लें. वे कांग्रेस नहीं तो फिर क्या जैसे सवालों में घिरे. सफाई देते फिरे कि उनके समर्थकों ने उन्हीं की तरह एक सवाल खड़ा करने वाले को क्यों पीटा. मेरी समझ से हिसार के क्रेडिट बटोरने के चक्कर में टीम अन्ना अपने मुख्य एजेंडे से भटकी, जाने अनजाने उस पे भाजपा समर्थित और समर्थेक होने के आरोप लगे, छवि कुछ तो संदिग्ध हुई. इसके चर्चा फिर कभी.

लेकिन एक बात तय है कि कांग्रेस का विरोध करने जब गई हिसार में अन्ना टीम तो वो बस यूं ही नहीं चल दी होगी. मैं तारीफ़ करूंगा उनकी कि उन्होंने हिसार संसदीय क्षेत्र की वोटगत ज़मीनी सच्चाई को ठीक से समझा और फिर अपनी रणनीति के तहद कांग्रेस की पहले जर्जर और ढहती हुई दीवार में एक लात मारने का प्रयास उन्होंने भी किया. लेकिन हिसार में कांग्रेस उनकी वजह से तीसरे नंबर पे आ ही रही है तो वो उन्हीं की वजह से कतई नहीं आ रही है.

सो, मेरे पत्रकार मित्रो, आप अन्ना के कसीदे पढो मगर हरियाणा में जाटों और दलितों दोनों के आन्दोलनों और कांग्रेस से विमुख होने के असल कारणों से मुंह न मोड़ो. सिर्फ आपके कह देने से वो तबके आप से सहमत नहीं हो नहीं हो जाएंगे जो अन्ना के आन्दोलन के भी बहुत पहले से आन्दोलन की राह पे और कांग्रेस से नाराज़ हैं. रही अन्ना के कांग्रेस के खिलाफ जाने की बात तो वे जाएँ. बेशक ये तर्क दे के कि सरकार उसकी है तो जन लोकपाल बिल पास करना उसी की जिम्मेवारी है.

लेकिन मेरा मानना ये है कि वैचारिक द्रष्टिकोण से कांग्रेस अन्ना की राजनैतिक विचारधारा के ज्यादा नज़दीक होनी चाहिए. इसे हम प्रशांत भूषण पर हमला करने वाली फासीवादी शक्तियों के सन्दर्भ में देखें तो और भी बेहतर तरीके से समझ सकते हैं. फिर भी वे करें कांग्रेस का विरोध तो करते रहें. लेकिन पकी पकाई दाल पर हरा धनिया छिड़क भर देने से जैसे कोई कुक नहीं हो सकता, वैसे ही हिसार में पहले से तय कांग्रेस की पराजय उन ने कराई इसका कोई तुक भी नहीं हो सकता.

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लेखक जगमोहन फुटेला हरियाणा की राजनीति और पत्रकारिता के जानकार हैं. फुटेला ने चंडीगढ़ समेत कई जगहों पर रहते हुए कई बड़े अखबारों के लिए बड़े पदों पर काम किया है. इन दिनों न्यू मीडिया के साथ पूरे तन-मन-धन से सक्रिय हैं. जगमोहन फुटेला अपने बेबाक विश्लेषण और व्यवहार के लिए जाने जाते हैं.

हिसार चुनाव में दो रीजनल न्यूज चैनलों की राजनीति

जगमोहन फुटेला: टोटल तो एक बहाना है… : टोटल टीवी या उस के मालिकों में इतना दम नहीं है कि हरियाणा में अपना प्रसारण बंद होने पर वे खापों की पंचायत बुलवा कर उन से सरकार के खिलाफ संघर्ष का ऐलान करा सकें. ये मान लेना भी सरासर गलत होगा कि चैनल चौटाला का है या कि टोटल के हक़ में खाप का फतवा उन ने जारी कराया होगा. सहानुभूति हो सकती है.

मगर टोटल चौटाला का होता तो पिछले विधानसभा चुनावों के सर्वेक्षण में बहुमत उसे चौटाला का बताना चाहिए था. कभी चौटाला का मीडिया सलाहकार रहने भर से विनोद मेहता न टोटल टीवी के मालिक हो गए थे, न टोटल चौटाला की रखैल ही हो गया था. और अब तो वो विनोद मेहता चला भी नहीं रहे टोटल का काम काज. एक पत्रकार के रूप में अपना मानना है कि कमोबेश टोटल के खासकर हरियाणा की राजनीति को लेकर हुए आकलन सकारात्मक और सही साबित हुए हैं. न मानों तो इस बार हिसार के मामले में भी देख लेना. मगर झगड़ा दरअसल टोटल का हिसार पे सर्वे का नहीं, कुछ और है.

टोटल चलता रहता या अब बंद है तो भी हिसार का नतीजा बदलने नहीं वाला. ये लड़ाई हिसार या उस की जीत हार की नहीं, चैनल वार की है. हिसार में, सब जानते हैं कि सवाल सिर्फ सांसद की एक सीट नहीं, खुद हुड्डा की कुर्सी का है. सो दांव पे बहुत कुछ लगा है. ऐसे में इस चुनाव से पहले आमद वहां गृह राज्य मंत्री गोपाल कांडा के हरियाणा न्यूज़ की भी हो गई थी. टोटल के चिर परिचित चेहरे उमेश जोशी को टोटल से ले आया गया होगा ये सोच के चाल चरित्र चेहरा वैसा ही दिखेगा. मगर उमेश जोशी के वहां होने न होने का कोई मतलब नहीं है. वे वहां हैं भी तो नहीं हैं.

आप खोल के देख लो. इस चैनल पे सरकारी विज्ञापन के अलावा जो दस खबरें चलतीं हैं उनमें से सात तो जैसे सीधे सीधे जन संपर्क विभाग ने बना के भेजी लगती हैं और बाकी तीन में तीन चौथाई से ज्यादा समय तक हुड्डा साहब दिखाई दे रहे हैं. नीचे स्ट्रिप में गोपाल कांडा के कार्यक्रमों का हवाला भी है. ऐसे में टोटल कैसे चले? एक म्यान में दो तलवारें रह सकती हैं, एक गली में दो कुत्ते भी. लेकिन हरियाणा के केबल नेटवर्क पर जब एक चैनल गृह राज्य मंत्री का भी हो तो उस से मिलता जुलता कोई दूसरा चैनल कैसे चल सकता है? सवाल चैनल के बिजनेस नहीं, हरियाणा न्यूज़ अगर हिसार सीट जितवा सके तो कांडा के कांग्रेस पे एहसान का भी है.

सच्चाई हालांकि इसके उलट है. ये मान लेना कि कोई भी चैनल या अखबार चार दिन में आते ही जनता की सोच बदल देता है, गलत है. ये सही होता तो लाला जगत नारायण कभी चुनाव नहीं हारते. पंजाब केसरी में तब भी आज जितनी धमक थी जब लाला जी कालका से चुनाव लड़े. रोज़ अख़बार में समर्थन देने वालों की फोटुएं छपती थीं. बड़ी बड़ी खबरें भी. लगता था कि और कोई है ही नहीं मैदान में. सिर्फ लाला जी हैं. मगर जब नतीजा आया तो लाला जी की शायद ज़मानत भी नहीं बची थी. उसके बाद उन के परिवार में किसी ने कभी चुनाव नहीं लड़ा. अब वे प्रोफेशनल तरीके से अखबार निकालते हैं और सरकार किसी की भी हो, राज वो करते हैं. अकाली पत्रिका को देख लो, नवां ज़माना, लोक लहर, पाञ्चजन्य, जन्संदेश या खुद कांग्रेस के कांग्रेस वीकली या कांग्रेस साप्ताहिक को. कहाँ हैं वो सब?

तो, हरियाणा न्यूज़ के आने या टोटल के जाने से हिसार का परिणाम या उसके बाद का घटनाक्रम नहीं बदल जाएगा. न मिर्चपुर का मतलब बदलेगा, न खापें ही ये मान लेंगी कि संगोत्र विवाह से ले के आरक्षण तक के मामले में उन के साथ जो हुआ वो ही सही था. मान्यताएं और अवधारणायें आसानी से नहीं बदला करतीं. सरकारी और ज्यादा दिखने वाले चैनल ही अगर असरकारक होते तो सरकारें कभी न बदलतीं. विरोध और विद्रोह तो उन राजसत्ताओं में भी हुए हैं जहां कोई प्राइवेट मीडिया है ही नहीं. जनता सब जान लेती है. और हरियाणा में कोई तीन दशक तक तक गाँव गाँव विचरण के अनुभव से अपना मानना है कि हरियाणा की जनता तो इस मामले में बहुत ज्यादा सचेत और परिपक्व है. खाप ने टोटल के बहाने से धमकी टोटल को चलाने के लिए नहीं दी है. जानती है खाप कि सरकार केबल वाले को टोटल केबल में नहीं डालने देगी तो खाप नहीं डाल देगी तार को खम्भे से उतार के. खाप ने टोटल के बहाने से जाटों को आन्दोलन याद दिलाना था, दिला दिया है !

एक पुरानी कहावत है- आटा गूंथती है तो हिलती क्यों है? हिसार में सरकार वही कर रही है. टोटल पे वार के ज़रिये वो नहीं, उसकी कुंठा बोल रही है. गिरी वो गधी से है, गुस्सा कुम्हार पे निकाल रही है. हिसार में उसके पिछड़ने के कारण और हैं. दोष वो अपने माफिक न चल रहे मीडिया को दे रही है. शुकर मनाओ कि हिसार का चुनाव ठीक से निबट जाए. वरना हिसार की हार प्रहार तो कोई भी, किसी पर भी कर सकती है. मान के चलो हिसार में लोक सभा की एक सीट नहीं, फैसला तो हुड्डा और हरियाणा में कांग्रेस के आर या पार का होना है.

लेखक जगमोहन फुटेला चंडीगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई अखबारों में वरिष्ठ पदों पर रहने के बाद इन दिनों न्यू मीडिया में जर्नलिस्टकम्युनिटी.कॉम समेत कई पोर्टलों के जरिए सक्रिय हैं. इनसे संपर्क journalistcommunity@rediffmail.com के जरिए किया जा सकता है.

दीपक चौरसिया ने अन्ना का अपमान किया!

जगमोहन फुटेलासन अस्सी के दशक के शुरू में मेरी पहली नौकरी लगी तो मैं उपसंपादक था और मेरी पहली तालीम ये कि जब भी किसी मसले पर किसी भी संस्था का सहमति या विरोध में कोई प्रेस नोट आए तो उसमें लिखे नामों में से कम से कम आधे ज़रूर छाप देना. बाकी आधे अगली बार.

इसके पीछे सोच ये कि कल कम से कम पांच अखबार वो हर आदमी खरीदेगा, अपनों में दिखाने बांटने के लिए और कुछ फिर वो भी जिन्हें वो फोन कर कहेगा कि देखो आज के अखबार में मेरा नाम छपा है. मुझे याद है कि ऐसे कुछ लोगों को उनका नाम छप रहा होने की जानकारी फोन से रात को ही दे दी जाती थी. ताकि वे अपने लिए अपनी आवश्यकता की प्रतियां हाकर से कह के पहले ही सुनिश्चित और सुरक्षित कर लें.

समय के प्रवाह के साथ वो अखबार बहुत बड़ा हो गया और मेरा ये यकीन पक्का कि अखबार मुद्दों नहीं, नामों के सहारे भी छपते और बिकते हैं. फिर नब्बे के दशक में मैं इस देश के पहले प्राईवेट टीवी चैनल में रिपोर्टर हुआ तो देखा कि मीडिया अपनी सुविधा और ज़रूरत के लिए खबरें कवर ही नहीं करता, उन्हें गढ़ता भी है. मुझे एक घटना याद आती है… मैं ब्यूरो देखता था एक न्यूज़ चैनल में. कहीं किसी शहर में एक हत्या हुई.

मुझे जनसत्ता के दिनों से इंडियन एक्सप्रेस के मेरे एक मित्र ने फोन किया. बताया कि हमारा स्ट्रिंगर मृतक की पत्नी से ऐसे बैठने वैसे बैठने, इधर देखने उधर देखने, और फिर जैसे ही इशारा करे वैसे ही रोना शुरू कर देने की हिदायतें दे रहा था. मेरे मित्र जैसे प्रिंट मीडिया के लोगों ने इस पर आपत्ति की तो उसने कहा कि भाई समझो, हम विजुअल मीडिया में हैं. आपने आंसू हों न हों लिखने हैं, मुझे दिखाने भी पड़ेंगे. अम्बाला में पुलिस एक ऐसे पत्रकार की धुनाई कर चुकी है जिसने रिपोर्ट दर्ज न होने से दुखी थाने में आई एक महिला से कहा कि तू अपने कपड़े फाड़ ले, इन सबकी वर्दियां तो मैं उतरवा दूंगा. आपने पढ़ा सुना ही होगा कि कैसे एक बड़ी खबर के चक्कर में एक महिला को उकसा कर कुछ टीवी पत्रकारों ने जिंदा जला दिया था.

मेरा ये अनुभव है कि पत्रकारों के मौके पर पंहुचने से पहले लोग खामोश और उनके कैमरे देखते ही चिल्लाने लगते हैं. वे अगर चिल्ला चिल्ला के थक चुके हों तो बाद में पंहुचे कैमरों के लिए उन्हें फिर से चिल्लाना पड़ता है. और अगर उसके भी बाद पंहुचे कैमरों को मौके से सब जा चुके मिलें तो फिर खुद कुछ लोग जुटा कर चिल्लाहट करानी पड़ती है. कभी कभार तो उनकी भी बाईट ली, भेजी और चलाई जाती है जिनका उस मुद्दे या उस संस्था से कोई ताल्लुक ही नहीं होता.

छोटी खबर को बड़ा करना व्यावसायिक मजबूरी हो गई है और बड़ी खबर को उस से भी बड़ी बताना खुद को बड़ा बताने की कोशिश. जैसा दीपक चौरसिया ने संसद पर हुए हमले के दौरान किया. वे दो घंटे तक चीख चीख के बताते रहे कि संसद परिसर में बम फटा है. बड़ी जोर का धमाका हुआ है. उनने खुद सुना है. उनने खुद देखा है. धुंआ है. भगदड़ है. पुलिस है. बम निरोधी दस्ते हैं. भय का माहौल है. वगैरह वगैरह… अब आप ज़रा दिल्ली पुलिस, खुद संसद या बाद में अदालत में चली कारवाई का रिकार्ड उठा के देख लीजिये. उसमें संसद पे हमले का ज़िक्र तो है. बाहर किसी बम के फटने का कोई ज़िक्र कहीं नहीं है.

तब दीपक आजतक में थे. अब स्टार में हैं. वे वही हैं. उनकी सोच, आदत और समझ भी वही है. ज़ाहिर है पत्रकारिता का स्तर भी. अन्ना की रिहाई वाले दिन ‘हमने बीस कैमरे’ लगाने का दम भरने और बरसात के बावजूद सुबह शाम तिहाड़ से लेकर वाया राजघाट रामलीला मैदान तक डटे रहने और निरवरत अन्ना के कसीदे पढ़ने वाले श्रीमान दीपक चौरसिया बीती रात अभिषेक मनु सिंघवी के घर पर थे. वन टू वन कर ये दिखाने कि जिसे बरखा, राजदीप या अरनब गोस्वामी तक नहीं पकड़ पाए, वे उन अभिषेक मनु के साथ उनके घर, उनके सोफे पे, उनके साथ बैठे हैं. और फिर जैसा मैंने कहा, खबर अगर न हो तो बनानी पड़ती है. खबर यहाँ भी नहीं बन रही थी. वो ही न बने तो मज़ा ही क्या. सो लगे दीपक चौरसिया अभिषेक मनु के मुंह में शब्द ठूंसने.

एकाध नहीं कई बार पूछा, क्या आपको नहीं लगता कि अन्ना टकराव पैदा कर रहे हैं संसद के साथ? अब अभिषेक सिंघवी भी आखिर अभिषेक सिंघवी हैं. राजनीति और शब्दों के चयन का सलीका उन्हें पहली बार अपने पिता का अंगूठा चूसने के समय से तब से है जब शायद दीपक के पिता जी की शादी भी नहीं हुई होगी. वे नहीं बोले अन्ना के खिलाफ एक शब्द भी. दीपक ने बहुत कोशिश की. अभिषेक ने हर बार कहा, आप स्वतंत्र हैं, कुछ भी कह सकते हैं, मैं वैसा नहीं कहूँगा.

और फिर दीपक ‘स्वतंत्र’ हो गए. चाय वो शायद पहले पी चुके होंगे. उसके साथ शायद कुछ नमकीन और उस नमक का असर रहा हो. वो उन पे तारी हुआ. और वे बोले,” मुझे तो ये अन्ना का मज़ाक लगता है”. अभिषेक फिर कुछ नहीं बोले. वकालत के पेशे ने उन्हें बखूबी समझा दिया है कि जब सामने वाला ज्यादा बोलने के चक्कर में अपने पैरों पे खुद कुल्हाड़ी मार लेने पे आमादा हो तो उसे मार ही लेने देनी चाहिए. वे चुप रहे. दीपक को लगा मैदान खाली है. एक शाट और मारो. बोले, “मुझे तो लगता है, अन्ना आन्दोलन नहीं मखौल कर रहे हैं”.

जब ये इंटरव्यू चैनल पे चला तो इसके आगे उसने काट दिया. मुझे नहीं मालूम इसके आगे दीपक ने अन्ना को और क्या क्या कह कर निरादरित किया होगा. कोई पूछे इन भाईसाहब से कि भैया, आप इंटरव्यू लेने गए थे कि देने? और अगर आपको लगता है कि अन्ना भारतीय संविधान, संसद या जनता के साथ मज़ाक कर रहे हैं तो आप क्या कर रहे हैं उनके साथ तिहाड़ से लेकर रामलीला मैदान तक? इन से भी बड़ा सवाल ये है कि जब आप अपनी बुद्धि, दिमाग, सोच और प्रतिबद्धता से हैं ही नहीं अन्ना या उनकी सोच के साथ तो उनके लिए सुबह सुबह बिना नहाए धोये रामलीला मैदान आ के सिटी रिपोर्टर की तरह उनकी रिपोर्टिंग क्यों कर रहे हो?

पी7 न्यूज़ के एक रिपोर्टर को मैंने देखा टीवी पर. पीस टू कर रहा था. कल. सर पे ‘मैं अन्ना’ वाली टोपी लगा के. अरे भैया, इतना ही शौक है अन्ना का साथी दिखने का तो पहले वही कर लो. चैनल की नौकरी और रिपोर्टिंग बाद में कभी कर लेना… तुम्हीं बताओ कैसे भरोसा करें तुम्हारी रिपोर्ट पर? क्या भरोसा है कि जो तुम बोल और बता रहे हो वो सब निष्पक्ष है. कैसे मान लें कि तुम आस पास वैसी टोपी वालों को खुश करने के लिए या फिर उनसे डर के नहीं बोल रहे हो?

कल रात आशुतोष ने और भी गज़ब किया. एक कमाल का शो करते हैं करन थापर उनके चैनल IBNCNN पर. आशुतोष चूंकि चैनल के सम्पादक मंडल में हैं सो आशुतोष को आजकल बिठाना ही पड़ रहा है कार्यक्रम में. कल का प्रोग्राम अन्ना आन्दोलन में मीडिया की भूमिका पर था. करन ने पूछा आशुतोष से कि क्या मीडिया ने अपनी ज़रूरतों के लिए कुछ ज्यादा ही बढ़ा चढ़ा कर पेश नहीं किया है आन्दोलन को?… अब पत्रकारिता में करन थापर का कद देखिए, आशुतोष का भी और फिर आशुतोष का जवाब देखिए. पलट कर बोले, “ये उन अंग्रेजीदां पत्रकारों की सोच है जिन्हें पत्रकारिता के बाद सरकार की मदद से कोई पी.आर.ओ. टाईप नौकरी चाहिए.” उनके ये कह लेने के बाद आशुतोष का मुंह हमेशा की तरह काफी देर तक खुला ही रहा कि जैसे करन थापर को अभी के अभी निगल ही जाएंगे. हद हो गई है. हम रसातल में ले गए हैं पत्रकारिता को. और फिर अपने भी लोगों को सुनने को तैयार नहीं हैं!!

लेखक जगमोहन फुटेला चंडीगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार हैं, जर्नलिस्टकम्युनिटी.कॉम के संपातक हैं. इनसे संपर्क journalistcommunity@rediffmail.com के जरिए किया जा सकता है.

यों पतन को प्राप्त हुआ चंडीगढ़ प्रेस क्लब

अपन प्रेस क्लब और उसके पतित पथ की बात करें, उस से पहले एक छोटा, सच्चा किस्सा. आखों देखा, मेरे गाँव का. कोई बीस तीस शिकारी कुत्ते ले के शिकारियों ने हांका लगाया हुआ था कि गन्ने के खेतों से जान बचाता एक हिरन निकला. जान जाती देख शायद जानवर को भी अकल आई. उधर खेतों में कहीं एक बुज़ुर्ग किसान था. हिरन सीधा उसके पास आ बैठा. किसान मेंड़ बना रहा था. बनाता रहा.

इतने में देखा तो शिकारी और उनके कुत्ते दौड़े चले आ रहे हैं. किसान को माजरा में समझ में आया. उसने फावड़ा चलाया और अपनी शरण में बैठे हिरन की गर्दन अलग कर दी. शिकारी आये तो बोला, शिकार मेरा है. किसान हिरन को घर लाया, काटा, बनाया और पूरे परिवार को खिलाया. इसके बाद डेढ़ हफ्ते में उसका पोता चल बसा, डेढ़ महीने में बेटा. बहु पागल हो गयी, पोती भाग गई और डेढ़ साल के अन्दर अन्दर उसकी ज़मीन बिक गई. उसके कोई छ: महीने बाद लोगों से बीड़ियाँ मांगता मांगता वो खुद भी चल बसा.

सबक ये कि भरोसे और सुपुर्ददारी में कभी गद्दारी नहीं करनी चाहिए. चंडीगढ़ प्रेस क्लब ने वही किया है. इस शहर, समाज और सरकार ने पत्रकारों पे एक भरोसा किया कि इनको मिल बैठने सोचने विचारने लिखने बोलने की कोई जगह देंगे तो ये चौथे स्तम्भ का काम करेंगे. फिर पत्रकारों ने अपने में से कुछ चुना कि इस संस्था व्यवस्था सुचारू तरीके से चलती रह सके. और उन ने क्या किया इसकी एक बानगी देखिए.

क्लब छोटे से बड़ा और कुछ लोगो की हसरतें उस से भी बड़ी होती चली गईं. सरकारें, मंत्री, मुख्यमंत्री, राष्ट्रपति और विदेशी राजदूत तक ये मान के क्लब आने लगे कि क्लब में आ के कही उनकी बात उनके प्रतिष्ठानों के ज़रिए समाज, देश और दुनिया तक पंहुचेंगी. क्लब के पदाधिकारियों ने इनसे अपने उल्लू सीधे किए. जो भी आता कुछ दे के जाता. मायावती ने एक बार एक ही किश्त में तीस लाख रूपये तक दिए. पांच पांच लाख देने वालों की तो कोई गिनती ही नहीं है. क्लब की ज़मीन क्लब को एक रूपये सालाना की लीज़ पर चंडीगढ़ प्रशासन ने दी. आज इस जगह की कीमत कम से कम पचास करोड़ तो ज़रूर होगी. क्लब ने अपने स्थानीय सांसद पवन कुमार बंसल को पकड़ा. उनसे कहा कि किचन बनानी है. कुछ पैसे दे दो. चार लाख रूपये मांगे. बंसल ने कहा, दे देंगे.

क्लब ने किचन बना डाली. ये सोच कर कि बंसल साहब ने बोला है. फिर भी उन्हें यहीं रहना और यहीं से चुनाव भी लड़ना है. पैसे तो आ ही जाएगे. सांसद के निधि कोष से पैसे दरअसल जिला मजिस्ट्रेट के ज़रिए खर्च होने होते हैं. उनका जब अमला जगह की नाप तोल करने आया तो देखा कि किचन तो बन भी चुकी. उसने रिपोर्ट दी. बंसल ने कहा भैया बनी हुई किचन के पैसे तो नहीं दे सकता मैं. कभी और कुछ बनाना होगा तो बताना, देख लेंगे. क्लब वालों ने कहा चलो कोई बात नहीं लायब्रेरी के लिए दे दो. बंसल ने कहा, ले लो. बंसल ने करीब सात लाख रूपये अपने सांसद कोटे से एप्रूव कर के चिट्ठी जिला मजिस्ट्रेट (उसको इधर डीसी बोलते हैं) को लिख दी.

क्लब ने डीसी के साथ सांसद कोष से लायब्रेरी बनाने का एक एग्रीमेंट किया. इस एग्रीमेंट के मुताबिक़ लायब्रेरी क्लब की पहली मंजिल पे बननी थी. उसपे तब के क्लब प्रधान, डीसी और गवाह के तौर पर जनरल सेक्रेटरी रमेश चौधरी के साइन हैं. डीसी ने कहा एस्टीमेट और नक्शा दो. कायदे से सांसद निधि कोष से मिले पैसे वाली किसी भी परियोजना पर काम सिर्फ सरकारी विभाग यानी पीडब्ल्यूडी ही कर सकती है. मगर क्लब ने गुरिंदर सिंह नाम के एक ठेकेदार से करीब सात लाख रूपये का एस्टीमेट बनवाया, भेज दिया. डीसी ने सरकारी एसडीओ से जांच कराई. पलट के चिट्ठी लिखी कि एस्टीमेट बहुत ज्यादा बनाया गया है. इतने रेट हो नहीं सकते. लेकिन इसके बावजूद क्लब ने जोड़ तोड़ कर के एस्टीमेट पास करा लिया. लायब्रेरी ‘बनने’ लगी.

बीच बीच में प्रोग्रेस रिपोर्ट जाने लगी. इनमें से एक में कहा गया कि शटरिंग हो चुकी,छत डालनी बाकी है. ये रिपोर्ट सरकारी एसडीओ ने दी. जब लायब्रेरी ‘बन’ चुकी तो डीसी ने कम्लीशन रिपोर्ट मांगी. इसे तकनीकी भाषा में यूटीलाईज़ेशन रिपोर्ट कहते हैं. उस पे क्लब के प्रधान या जनरल सेक्रेटरी के ही दस्तखत होने चाहिए थे. मगर क्लब ने शहर के एक कांग्रेसी नेता के एक सीए भानजे को पकड़ा और उस से रिपोर्ट भिजवा दी. डीसी ने मान भी ली. पूरे पैसो का भुगतान हो गया.

अब इसमें सवाल ये है कि…

(एक) जब सांसद कोष से कोई रकम किसी सहकारी संस्था को दी ही नहीं जा सकती तो दी गई क्यों? क्लब आखिर एक सोसायटी है और बाकायदा चंडीगढ़ के रजिस्ट्रार आफिस से रजिस्टर्ड है.

(दो) जब सांसद कोष से मिली किसी रकम से होने वाले किसी भी निर्माण को कोई प्राइवेट ठेकेदार कर ही नहीं सकता तो यहाँ गुरिंदर सिंह का एस्टीमेट देख लेने और खुद सरकारी एसडीओ से वो झूठा पाए जाने के बावजूद प्रोजेक्ट एप्रूव कैसे किया गया?

(तीन) क्लब के तब ज्वाइंट सेक्रेटरी सतीश भारद्वाज ने खुद पवन बंसल को चिट्ठी लिख कर इस घोटाले की जानकारी दी. बंसल ने भरद्वाज को पत्र लिख कर धन्यवाद तो दिया. जांच कोई उन ने भी नहीं कराई. क्यों? (बता दें कि पवन बंसल मनमोहन सरकार में संसदीय कार्य मंत्री हैं.) क्या इस चुप्पी की वजह ये है कि कम्पिलीशन सर्टिफिकेट उनके एक कांग्रेसी नेता के भांजे ने दिया था. जांच होती तो वो भी फंसता?

(चार) सतीश भारद्वाज ने इस घपले घोटाले की डीसी से शिकायत की. इसके बावजूद कोई जांच या कारवाई क्यों नहीं हुई? और..

(पांच) लायब्रेरी जब पहले से थी. ग्राउंड फ्लोर पे वो भी कोई पन्द्रह साल पहले से (शौक़ीन सिंह के नाम पर) तो फिर नई लायब्रेरी की ज़रूरत क्या?

जवाब कोई नहीं देगा. क्योंकि जवाब कोई है ही नहीं. सच ये है कि पहली मंजिल पे लायब्रेरी बनाने की बात कही ही इस लिए गई क्योंकि ग्राउंड फ्लोर पे वो पहले से थी, आज भी है. और पहली मंजिल पे जो लायब्रेरी बनाने का एग्रीमेंट हुआ, जिसका एस्टीमेट गया और मंज़ूर हुआ, जिसे देख कर सरकारी एसडीओ भी कहता और बताता रहा कि बिल्डिंग कितनी बनी, कितनी बाकी बची, वो लायब्रेरी क्लब में पहली मंजिल तो क्या नीचे, ऊपर, अगल, बगल, क्लब के ऊपर आसमान या नीचे पाताल में भी कहीं नहीं है..! लायब्रेरी कभी बनी ही नहीं. इसी लिए कम्लीशन रिपोर्ट पे क्लब के पदाधिकारियों ने खुद साइन करने की बजाय किसी सीए से करा दिए. सात लाख रूपये लेकर ठेकेदार गुरिंदर सिंह चलता बना. क्लब में जब कुछ सदस्यों ने ठेकेदारों और पदाधिकारियों के बीच रिश्ता जगजाहिर कर दिया तो उन्हें क्लब से सस्पेंड कर दिया गया. अब उस सस्पेंशन और किसी और भी सदस्य को रखने, निकालने के लिए क्लब ने जो कमेटी बनाई है उसमें वो रमेश चौधरी मेम्बर है जिसने बाकायदा स्टाम्प पेपर पे पहली मंजिल पे लायब्रेरी बनाने वाले एग्रीमेंट पे साइन किए हैं.उसने डीसी को पत्र लिख लिख कर कार्य की प्रगति की जानकारी भी दी.

अब सरकारें क्लब को दिए लाखों रुपयों का यूटीलाईजेशन सर्टिफिकेट मांग रही हैं. वो है नहीं. ये श्वेत पत्र कमेटी उसी का विकल्प पैदा करने की चाल है. कहने को वो पिछले दस साल में हुए खर्चों का हिसाब बनाने के लिए बनाई गई है. मगर ज़ाहिर सी बात है खर्चे वो गिनाएगी तो उनके लिए आए धन का ज़िक्र भी उसी ने करना है. वो अगर लायब्रेरी के नाम पर इसके अलावा भी आए और लाखों रुपयों का ज़िक्र नहीं करती तो मरती है. करती है तो क्लब के खाते में अब वो हैं नहीं. इस चालाकी को समझ एकाध को छोड़ कर सभी मेम्बरों ने हाथ खड़े कर दिए हैं.

वैसे भी सदस्यों के निलंबन और भ्रष्टाचार के मामले जब अदालतों में विचाराधीन और सबज्यूडिस हैं तो कोई भी कमेटी उसमें टांग अड़ा भी कैसे सकती है?

लेखक जगमोहन फुटेला चंडीगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार हैं, जर्नलिस्टकम्युनिटी.कॉम के संपातक हैं. जिस खतोकिताबत का ज़िक्र इस आलेख में किया गया है, उस सबके दस्तावेज़ जगमोहन फुटेला के पास सुरक्षित हैं. इनसे संपर्क journalistcommunity@rediffmail.com के जरिए किया जा सकता है.

भ्रष्टचारियों की बजाय व्हिसल ब्लोअर के पीछे हाथ धोकर पड़ने वाला एक पत्रकार

जगमोहन फुटेला: ट्रिब्यून की बेशर्म पत्रकारिता :  परसों सी.बी.आई. ने पंजाब के एक सीनियर भाजपाई मंत्री के लिए रिश्वत लेते संसदीय सचिव को पकड़ा, कल मंत्री को सी.बी.आई. ने पूछताछ के लिए बुलाया है और आज ट्रिब्यून में एक खबर है. खबर में शिकायतकर्ताओं की ऐसी तैसी की गयी है. कहा गया है कि शिकायतकर्ता मनप्रीत उस देवेंदर का दोस्त है जो मंत्री के लिए दलाली करते हुए पकड़ा गया है.

खबर ट्रिब्यून के विशेष संवाददाता और प्रेस क्लब के प्रधान नवीन गरेवाल ने लिखी है. कैसे एहसान उतारा उन्होंने बादल सरकार का, इसकी बात करेंगे. पर पहले खबर का वो हिस्सा देखिए.

“The corruption case registered by the CBI against Raj Khurana, Punjab ’s Chief Parliamentary Secretary (Finance) and BJP MLA from Rajpura today became murkier with the Punjab Automobile Mechanics Association alleging that both co-accused Devinder and CBI complainant Manpreet were partners in many cases of land grabbing and illegal land sales.”

मोटे तौर पे मामला ये है कि चंडीगढ़ के साथ सटे पंजाब के कसबे जीरकपुर में मैकेनिकों ने मिल कर करीब चौदह एकड़ ज़मीन खरीदी. आरोप ये है कि पंजाब के समाज कल्याण मंत्री स्वर्णा राम ने नगर निकाय मंत्री मनोरंजन कालिया को इस प्लाट पर मोटर मार्केट न बनाने देने के लिए एक नोट लिखा (हालांकि समाज कल्याण विभाग का इस से कोई सरोकार नहीं था). उस नोट की मार से बचाने के लिए डेढ़ करोड़ रूपये की रिश्वत मांगी गई. मनप्रीत जब देवेंदर के ज़रिये कालिया से डेढ़ करोड़ में हुई डील में से डेढ़ लाख रूपये देने खुराना के घर गया तो सी.बी.आई. ने खुराना को धर दबोचा. उस देवेंदर को भी. दोनों को अदालत ने जेल भेज दिया. अब सी.बी.आई. ने स्वर्णा राम और कालिया को तलब किया है. उस पूछताछ से एक दिन पहले ये खबर है. नवीन की खबर कहती है खुराना को पकड़वाने वाला मनप्रीत और देवेंदर न सिर्फ दोस्त बल्कि बिजनेस पार्टनर हैं. जिस गाड़ी में देवेंदर खुराना के घर गया वो एक करोड़ की है. ये भी कि एसोसिएशन दोफाड़ है. और ये भी कि ये सारी बातें पत्रकारों को जीरकपुर से आए बीस परिवारों ने बताईं हैं.

आइए, अब ज़रा आकलन कर लें. पहले तो इस खबर की टाईमिंग देखें. एक की गिरफ्तारी और दो की पेशी के बीचोंबीच. दूसरे, ये कि ये जानकारी देने के लिए बीस परिवार इकट्ठे हुए. किसने किए? समझना मुश्किल नहीं है. तीसरे, कि दोनों शिकायतकर्ता देवेंदर और मनप्रीत दोस्त हैं, पार्टनर हैं. और चौथे ये कि एसोसिएशन (के दूसरे धड़े) को पंजाब के किसी नेता या मंत्री की किसी भूमिका की कोई जानकारी नहीं है. खबर का वो हिस्सा भी देखिए….

“Though, the association denies any knowledge about the role of Khurana or any Punjab politician in the CBI raid, they claim that since there were several cases and complaints of the association pending before various authorities, the CBI could be trailing Devinder and others”.

अब इस सारी खबर का एक और दिलचस्प पहलू और भी है. खबर कहती है कि एसोसिएशन (गौर करें, एसोसिएशन) इसका खंडन करती है कि सी.बी.आई. का छापा डलवाने में खुराना या पंजाब के किसी नेता का हाथ हो सकता है. लगे हाथ इसे भी समझते चलें. ये सफाई कौन और क्यों दे रहा है कि सी.बी.आई. को कालिया तक पंहुचाने में पंजाब के किस नेता का हाथ नहीं है. हो सकता है या नहीं ये सफाई भी सरकार दे,पार्टी दे या कुछ अरसा पहले कालिया से सख्त नाराज़ माने जाते रहे सुखबीर बादल दें, एसोसिएशन कैसे दे रही है? और कोई भी दे रहा है तो क्यों दे रहा है? किसको शक है कि ये छापा किसी नेता ने ही डलवाया है?

खबर का ये हिस्सा पूरा किस्सा बयाँ करने के लिए काफी है. खबर का मतलब भी. मकसद भी. मौका भी. पत्रकारिता में सीनियर पोजीशनों पे रह चुके लोगों की समझ से इसे ‘प्लांट’ कहते हैं. वर्ना कोई पूछे नवीन गरेवाल से कि एसोसिएशन पहले से बंटी थी तो उसकी खबर अब क्यों? बीस परिवारों को पत्रकारों से मिलवाने का प्रबंध किसने किए और क्यों? फिर परिवारों ने कहा क्या कि देवेंदर एक करोड़ की गाड़ी में आया? क्या ये भी कोई गुनाह है? दोनों का दोस्त होना भी कोई जुर्म है? या मिल के कोई कारोबार करना? हो सकता है कि दोनों ने मिल के मंत्रियों की औकात नापने और फिर उन्हें नपवाने की स्कीम भी बनाई हो. तो क्या इस से मंत्रियों के गुनाह,गुनाह नहीं रहते?

अगर अपने आप से भी कह रहे हैं तो कितनी बेशर्मी से कह रहे हैं नवीन गरेवाल कि इन बीस परिवारों की समझ से इन नेताओं और मंत्रियों की कहीं कोई भूमिका नहीं है. अरे भाई, मंत्रियों की भूमिका या अपराध है या नहीं इसका फैसला इस देश में क्या ये बीस परिवार या आप करेंगे? क्या चाहते हैं आप कि सी.बी.आई. और अदालतें आपकी खबर को मानें अपील और आपकी इस दलील पर केस को दफ़न कर दें? और फिर खबर लिखनी ही है तो लिखो. सरकार के (ट्रिब्यून के न चाहने के बावजूद) प्रेस क्लब पे किए एहसान उतारने ही हैं तो उतारो. ईमान बेचना ही है तो बेचो. कम से कम खुद अपने आप को तो नंगा न करो ये लिख के कि इन नेताओं की कोई गलती नहीं है. आपको ये बात किसी ने कही तब भी नहीं लिखनी चाहिए. क्या जानते हैं आप,नहीं जानते तो अपने जस्टिस सोढ़ी साहब से पूछ लीजिए कि ऐसा लिख के आप इस देश की न्याय बांचन प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न कर रहे हैं! अपराध भी.

हम सबने देखा, सुना और पढ़ा था कि भ्रष्टाचार का सुराग देने वालों का ये व्यवस्था क्या हाल करती है. मंजुनाथ का मामला अभी कोई बहुत पुराना नहीं है. मगर ये पहली बार हुआ है कि कोई पत्रकार भ्रष्ट की बजाय व्हिसल ब्लोअर के पीछे ही हाथ धो के पड़ा है. ट्रिब्यून के सम्पादकीय प्रबंधन का कहना है कि इस खबर के पीछे की कहानी जानी जाएगी.

लेखक जगमोहन फुटेला चंडीगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

मेरे लिए तो वे भगवान थे

चिरायु हों सभी पत्रकार लेकिन आलोक के साथ एक युग का अंत हुआ है. उन सा न कोई था, न कोई होगा. उस शब्दावली, उस शैली और उस तेवर को दुनिया तरसेगी. मेरे लिए तो वे भगवान थे. उत्तराखंड के एक गाँव से उठ कर जनसत्ता (चंडीगढ़) की मेरिट में मैं उन्हीं का अनुसरण कर टाप कर पाया था.

पहली बार जब मिला उन्हें दिल्ली में आभार व्यक्त करने के लिए तो माँगा था उनसे- आप सा नहीं तो आपका होना चाहता हूँ. बोले, दिक्कत क्या है. गले से लग जाओ यार. एक समय ऐसा भी आया कि चंडीगढ़ जनसत्ता की खबरें दिल्ली डेस्क पर देखी जाने लगीं. वे डेस्क पर नहीं थे. फिर भी वे मेरी स्टोरीज़ देखते. बताते, सुझाते भी.

चौबीस बरस हो गए. उनका वो प्यार और स्नेह मिलता रहा. चंडीगढ़ जनसत्ता बंद हो गया. आलोक भी जनसत्ता में नहीं रहे. मैं जैन टीवी में था. मैंने सीओओ और अपने मित्र सुनील गुप्ता से बात की. आलोक हमारे संपादक हो गए. ये अलग बात है कि जैन टीवी उन्हें पचा नहीं सका. विजय दीक्षित से चंडीगढ़ में पहली ही मुलाक़ात में मैंने आलोक का ज़िक्र किया तो उनकी आखों में एक चमक थी. वे एस1 लाये तो आलोक (मेरे सुझाव नहीं, अपने प्रबल प्रताप के बल पर) उनके सम्पादक थे. वहां जो घटा उसके बारे में आलोक खुद ही बहुत कुछ बता चुके हैं.

होली के दिन मैंने माँ को खोया तो उसके बाद कभी होली नहीं खेली. अब अपने गुरु, अपने मित्र और भाई आलोक तोमर को खोया है तो लगता है शब्दों का चितेरा भी चला गया है. कोशिश करेंगे उनके प्रशंसक कि उनकी बेबाकी, उनके तेवर और उनकी रचनाओं को जिंदा रख सकें. आमीन.

लेखक जगमोहन फुटेला वरिष्‍ठ पत्रकार हैं.

कुछ तो शर्म करो ‘टाइम्स नाऊ’ वालों!

दायें बैठे गेस्ट पे सवाल दाग महान मुख्य सम्पादक का हमेशा बायें देखना ही काफी नहीं था. अब तो उनके चिरकुटों को भी झेलना पड़ रहा है. बाजारू और छिछले अखबारों की तरह सबसे पहले ब्रेक और फिर अपनी खबर का असर बताने के अब आदी हो चुके टाईम्स नाऊ ने 19 जनवरी के दिन तो निहाल ही कर दिया. अपने मुख्य संपादक को खिड़की में लेकर चैनल ने शपथ ग्रहण समारोह से कोई दो घंटे पहले बताना शुरू किया कि उनके हाथ बनने वाले मंत्रियों के नामों की सूची लगी है उनके विभागों के बंटवारे के साथ.

ये भी कि कौन कौन अब धूल फांकेगा. चैनल जिन मंत्रियों को संत्री होते बता रहा था उनमें राजा वीरभद्र सिंह का नाम शामिल था. उनके फोटू समेत. इससे बेखबर कि हिमाचल में कांग्रेस की वो कितनी बड़ी मजबूरी हैं. और तो और चैनल वीरप्पा मोइली को भी बाहर हुआ बता रहा था. अपनी इस खबर को पचवाने के लिए उसने अति विश्वसनीय सूत्रों के हवाले से ये भी बताना शुरू कर दिया था कि अगले क़ानून मंत्री खुर्शीद आलम होंगे.

शपथ ग्रहण हुआ तो ऐसा कुछ नहीं हुआ. चलिए, ये भी माफ़. होता है आपका आकलन या आपकी उत्कट इच्छा जो कभी पूरी नहीं होती. अंदाज़े में सच की संभावना देख लेना या किसी फुकरे को असल जानकार मान लेने की गलती भी चलो माफ़. किसी एक नेता के ज़रिये पार्टी की प्रदेश में हैसियत की बेसिक जानकारी भी चलो न सही. पर भैया, ये तो बताओ कि शपथ समारोह ख़त्म हो जाने और राष्ट्र गीत के बाद सबके सरक लेने के घंटे भर बाद भी आप दुनिया को ये ब्रेकिंग कैसे दिखाते रहते हो कि समारोह शुरू हुआ है? और ये भी कि व्यक्तियों और विभागों के बारे में आपकी भविष्यवाणी पूरी तरह सच साबित हुई है? कुछ तो शर्म करो यार…!!!

जगमोहन फुटेला

वरिष्ठ पत्रकार

चंडीगढ़

It’s all politics, General..!

जगमोहन फुटेलाThe ones who do not die of enemy’s bullet can end up with the kindness of friends, they say. It’s not apparent so far if General Deepak Kapoor applied for a plot in Gurgaon. He might have been approached to have one there, if yes. Or accept at least if generosity of the state government showers upon him. You never know, he might have been wooed to vie for one but not for the reason being given. Fact lies with the politics.

Vote bank politics in pure and practical terms, I say. I wish u refresh your memory with the pre mature Lok Sabha elections in ’99 and Chautala’s even powerful come back in 2000.Kargil had just happened. Chautala in his very first decision as Chief Minister (after the fall of Bansi Lal despite Congress’s ‘politically unwise’ help and humble pie) had decided to enrich every shaheed jawaan’s family by ten lacs of rupees. He did what he promised in less than a quarter and made congress bite dust in less than a year within ‘99 itself. He, in alliance with BJP, routed Congress first in the Lok Sabha elections and then deprived Bhupendra Singh Hooda of the Chief Ministership he was taking for guaranteed ever since he managed save BJP bitten Bansi Lal.

Bansi Lal had played joke with Congress in general and Hooda in particular. He refused to merge or even ally with the then state congress president Hooda’s congress. Promise of transferring power and legacy to Hooda had gone haywire. Frustrated congress’s efforts to break Bansi’s flock to try make it’s own majority had resulted in HVP’s division yes, but failing in keeping hold of many those who preferred Chautala over Bhuppi.Bhuppi would have paid for highest level of political immaturity had Bhajan Lal not annoyed the high command observers during 2005 Assembly polls(he failed to be CM despite having mustered 67 out of 90 seats as state president, but that’s a different story).

Chautala had proved one thing beyond any doubt that Haryanvis do have a very deep emotional attachment with the army and its men serving, retired, sacrificed or still to join. He had not touched even 25 mark ever after the great 85 out of 90 victory in ’87. But Kargil and its aftermath clubbed with Bansi Lal’s jugglery with the congress had made him messiah amongst Haryanvis who have deep passion for army. Army is not simply the source of salaries for them. They, in fact, believe they are born for it. You look and try finding the trend thereafter; they have been with Chautalas.More so, emotionally.

Congress in general and Hooda in particular wanted General for that very reason and need. This is why he was toed and bestowed.  Also living in Haryana his predecessor V.P.Malik might not be of any electoral use. He never aspired or even indicated an iota of love for politics.May be Kapoor could get them some broken Punjabi hearts too. Politicians do have all the right to keep in sight all the weaponry best for fight.

Why General Kapoor alone, I as an army fan, would like every soldier to get a plot in Gurgaon but then they would not do so for the want of domicile certificate and so on. They can but ignore thy own rules for the want of ‘encouraging the Haryanvi youth’ (to join army) as they say. But then what about the rule that you should not have any other property in the state? Not even in the name of your spouse the rule says. It reads further, (sanctioning) authority will ensure and satisfy itself that the applicant is eligible from all aspects. Authority here, I believe, is Administrator HUDA at Gurgaon.It be asked to explain if it adhered to law. But first thing first. Why did the state government desired to deviate from its own policy to allot a plot to one who never asked for it first and then was not eligible in terms of domicile and was also holding property in Haryana.

Congress may or may not be willing to inquire into this. It won’t prefer open all Pandora boxes of fool foxes. It has not been able inquire or act in Ashok Chavhan’s adarsh episode. Not so far. Some say Hooda’s M.P. son is even closer- to Rahul.

By Jagmohan Phutela

शाबास संजीव!

जगमोहन फुटेलामैं ब्यूरो देखता था जब सीधा सादा कुछ अनाड़ी सा दिखने वाला एक लड़का आया मेरे पास. उसके पास भाषा नहीं थी, उच्चारण भी गड़बड़. स्ट्रिंगरों के साथ होने वाले शोषण से भी अनजान. उसके कपड़े-जूते, हाथ में एक छोटा सा पुराना (शायद किसी से माँगा हुआ) कैमरा और हालत देख कर तरस भी आ रहा था. शुरुआती बातचीत में ही मैं समझ गया था कि पत्रकार होने की उसकी ललक ने एक बार उसे बेगारी और बेरोज़गारी के दुष्चक्र में फंसाया तो बांह पकड़ के बाहर निकालने वाला भी उसके परिवार में कोई नहीं. तर्क-वितर्क का जोड़-घटाव लगातार कह रहा था कि उसे साहिर साहब के गुमराह वाले शेर की तरह कोई अच्छा सा मोड़ देकर छोड़ दूं. लेकिन दिल था कि दिमाग की मानने को तैयार नहीं था. मुझसे मिल-सी नहीं पा रहीं थीं पर, उसकी उन छोटी छोटी आँखों के भीतर बहुत भीतर तक दिख रहा एक आत्मविश्वास था.

उसके खिलाफ आ जा रहे सब तर्कों के ऊपर एक दलील दम मारने लगी. वो ये कि चमक और चोंचलों से भरी टीवी की इस दुनिया में मैंने इसका दामन न थामा तो कहीं और किसी दरवाज़े तो शायद पहुँच भी नहीं पायेगा बेचारा. मैंने तय किया कि तजुर्बा ही सही, किया तो जाएगा. दम निकला बच्चे में तो दाम भी मिलने ही लगेगा. था तो वो सिरमौर से. पर, मैंने उसे घुमंतू संवाददाता की तरह हिमाचल से लेकर उत्तराखंड तक विचरने की छूट दी. जो स्टोरीज़ उसने करनी शुरू कीं वो कमाल की थीं. इस अर्थ में कि उसके आईडिया बहुत एक्सक्लूसिव होते थे. शूट, फ्रेम, बाईट और ‘शोट्स जस्टिफाईंग दी स्टोरी’ के मामले में उसका बचपना जल्दी ही जाता रहा. वो अक्सर बात करता, ढेर सारी जिज्ञासा के साथ ढेर सारे सवाल पूछता, बीच में टोकाटाकी के बगैर सुनता और दुबारा कभी टुकाई का मौका नहीं देता. वो हाथ पे भी शूट करता, एक किलोमीटर लम्बा शाट भी मारता तो कैमरे में जर्क नहीं होता था. चेहरे, हाथों, होठों और पलकों के भाव तक वो कैमरे में कैद करने लग गया था.

एक दिन मैंने उसे देहरादून में तैनात कर दिया. जो खबरें उसने कीं उनमें शेरों की नाजायज़ नसबंदी और औरतों की खरीद-फरोख्त और वो भी न हो सके तो उसके पैत्रक घर पे ही उसके रखैल की तरह इस्तेमाल जैसी खबरें शामिल थीं. पर ये खबर तो उसने बड़ी मेहनत से बनाई. उसे जाना था. उसके पास पैसे नहीं थे. मुझसे भी नहीं लिए. बताया भी नहीं. चला गया. थका था. शायद भूखा भी. उसकी थकान उसकी शूट से भी दिख रही थी. शाट्स कम थे. जो थे उनमें भी कहीं-कहीं जर्क था. बदकिस्मती से दो चार जगह पिक्सल भी फट रहे थे. उसे बताया तो वो पौंटा साहिब से दुबारा वहां जाने को तैयार था. पर मैंने रोका. स्क्रिप्ट को जितना संक्षिप्त कर सकता था, किया. खुद एडिट पे बैठा. जो कर सकता किया. और फिर जो बना वो आपके सामने है. मेरा आग्रह है कि इस स्टोरी को देखते समय न सही, बाद में संजीव शर्मा को ज़रूर याद रखियेगा. वो जर्नलिस्टकम्यूनिटी.कॉम में आपके परिवार का सदस्य भी है. स्टोरी का वीडियो Buddha नाम से youtube पर उपलब्ध है. उसी वीडियो को नीचे भी दे रहे हैं.

लेखक जगमोहन फुटेला चंडीगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

 

…तो वो मां, और अब ये बहन हाजिर हैं

: पुलिसिया कहर का शिकार हर चौथे पत्रकार का परिवार :  जबसे मैंने अपने मां के साथ हुए बुरे बर्ताव का प्रकरण उठाया है, मेरे पास दर्जनों ऐसे पत्रकारों के फोन या मेल आ चुके हैं जिनके घरवाले इसी तरह की स्थितियों से दो चार हो चुके हैं. किसी की बहन के साथ पुलिस वाले माफियागिरी दिखा चुके हैं तो किसी के भतीजे के साथ ऐसा हो चुका है. इंदौर से एक वरिष्ठ पत्रकार साथी ने फेसबुक के जरिए भेजे अपने संदेश में लिखा है- ”यशवंत जी, मैं आप के साथ हूं. मेरे भतीजे के साथ भी ऐसा दो बार हो चुका है. मैं आप की पीड़ा समझ सकता हूँ. मैं एक लिंक भेज रहा हूँ, जहाँ मैने आप की ओर से शिकायत की है. सड़क पर मैं आप के साथ हूँ.” इस मेल से इतना तो पता चलता ही है कि उनके भतीजे पुलिस उत्पीड़न के शिकार हो चुके हैं. अब एक मेल से आई लंबी स्टोरी पढ़ा रहा हूं जिसे लिखा है पंजाब के वरिष्ठ पत्रकार जगमोहन फुटेला ने. फुटेला ने अपने राइटअप का जो शीर्षक दिया है, ” …तो वो मां, और अब ये बहन हाज़िर हैं…”, उसे ही प्रकाशित किया जा रहा है. जितने फोन संदेश व मेल संदेश आए, उसमें अगर मैं अनुपात निकालता हूं तो मोटामोटी कह सकता हूं कि हर चौथे पत्रकार का परिजन पुलिस उत्पीड़न का शिकार है. श्रवण शुक्ला वाले मामले से आप पहले से परिचित हैं.

अपराधियों की गिरफ्तारी के वक्त श्रवण के भाई को उनके साथ बैठे होने के कारण उस पर इतने मुकदमें पुलिस ने लाद दिए हैं कि श्रवण उन्हें छुड़ाने के लिए जमानतदार तलाश नहीं पा रहे. रुपये पैसे की तंगी के कारण वह फर्जी जमानतदार भी नहीं खरीद पा रहे. क्या होगा इस लोकतंत्र का! ऐसे ही सब चलता रहा तो फिर हर चौथा मीडियाकर्मी परिवार के मान-सम्मान की रक्षा के लिए कानून हाथ में लेने की ओर चल पड़ेगा.

यशवंत

एडिटर, भड़ास4मीडिया

 


 

…तो वो मां, और अब ये बहन हाज़िर हैं

जगमोहन फुटेला

जगमोहन फुटेलासरनेम के साथ सिर्फ शहर का नाम लिख देने से चिट्ठी जिसे पहुंच जाती है, पैतीस सालों से मुझे राखी बांध रही मेरी उस बहन के परिवार के साथ भुवनेश्वर पुलिस ने वो किया जिस पर (अगर वो इमानदारी से कह रहे हैं तो) वहां के एक सांसद को भी शर्म आती है. मेरी बहन को भी यशवंत की माँ की तरह सारी रात (अलबत्ता महिला पुलिस) थाने में बिठा के रखा गया. बिना किसी आरोप, घर के किसी सदस्य की मौजूदगी या परिवार को किसी लिखित सूचना के. देवरानी की एक शिकायत पर. शिकायत ये कि उसे दहेज़ के लिए प्रताड़ित किया गया.

चलिए, पहले देवरानी को निबटा लें. देवरानी पंजाब की हैं. पहले कम से कम एक पति से तलाकशुदा हैं. उसे ‘छोड़ने’ के लिए लाखों रूपये लेने का उसका किस्सा दिल्ली की एक अदालत के रिकार्ड में दर्ज है. रिपोर्ट दर्ज कराने से पहले माँ बाप के साथ वो भुवनेश्वर के एक आलीशान होटल में करीब एक हफ्ता रहीं. उनकी उसके ससुरालियों से बातचीत हुई. इस बातचीत में शामिल हुए लोगों के मुताबिक़ ससुरालियों से एक करोड़ तीस लाख रुपये की मांग की गयी. नहीं देने पर सबक सिखा देने की धमकी के साथ. शादी पे हुआ सवा लाख रूपये का खर्च वो बता रहे हैं, जो पंजाब में चमड़े का छोटा मोटा कारोबार करते हैं, एक छोटे से घर में रहते हैं और जिनकी सालाना आमदनी खुद उनके मुताबिक़ पांच लाख रूपये से ज्यादा नहीं है. बताया तो यहाँ तक गया कि लड़की मानसिक रूप से अस्वस्थ है. इस हद तक कि अपनी एक अपाहिज किशोर वय बेटी की नग्न तस्वीरें उसने खुद अपने लैपटॉप पे डाउनलोड कर रखी हैं और ये भी कि वो बात बात पे मर जाने या मार देने की धमकी देती है. हो सकता है वो निम्न रक्तचाप या उसकी वजह से किसी डिप्रेशन और फिर इस वजह से असुरक्षा की किसी भावना से ग्रस्त हो. पर सवाल है कि ऐसे माहौल में उसकी चिंता कौन करे.

और फिर धमकी पे अमल हो गया. अगर किसी मानवाधिकार संगठन या सीबीआई जैसी किसी संस्था ने जांच की तो पता चलेगा कि रपट दर्ज कराने से पहले प्रदेश के एक बड़े पुलिस अफसर की बीवी से फोनबाज़ी की गयी. या शायद पत्नी के फोन पे सीधे सीधे साहब के साथ. फरमान जारी हो गया. मेरी बहन को भुवनेश्वर की मशहूर मारूफ दूकान से पुलिस सूरज छुपने के बाद ये कह कर बुला ले गयी कि मामला है और सुलटाना है. थाने पहुँचते ही जुबानी कलामी बता दिया गया कि गिरफ्तारी हो चुकी है. ये भी कि पास फटकने वाले भी बख्शे नहीं जायेंगे. पुलिस ने ये कर भी दिखाया. खैर खबर लेने गए उसकी जेठानी के बेटे को भी पुलिस ने धर दबोचा. बेवकूफ पुलिस ने गिरफ्तारी अगली सुबह साढ़े पांच बजे की बताई. कहाँ से?.. नहीं मालूम. किसके सामने?.. ये भी नहीं पता. घर से की तो फर्द पर परिवार के किसी सदस्य के साइन नहीं हैं.

सुबह तक वकील को वकालतनामे पर साइन कराने तक को मिलने नहीं दिया गया. शाम साढ़े पांच पौने छः बजे पेश भी किया तो ऐसे जूनियर जज के घर पर जिसे कि ऐसे किसी मामले में ज़मानत देने का अधिकार ही नहीं था. ज़मानत अगले दिन मिल गयी. खिसियानी पुलिस खम्भे नोचने लगी. उसने संदेशा भिजवाया-परिवार का जो हाथ लगा, लपेटा जाएगा. ज़ाहिर है सब भाग लिए. दुर्गापूजा जैसी दुकानदारी के दौरान दुकान पे अफरातफरी और घरों पे वीरानी सी छा गयी. उधर, सौदेबाजी होने लगी. समझाया गया, वक्त है अभी भी ले दे कर सुलट लो. मुझे खबर हुई. मैं गया. उत्तर भारत के अपने एक सांसद मित्र के ज़रिये वहां के एक प्रभावशाली सांसद से मिला. सच पूछिए तो उनसे मिलने के बाद अपना दुःख जैसे जाता रहा. सांसद महोदय ने बातचीत माननीय सुप्रीम कोर्ट की उस चिंता से शुरू की कि कुछ ब्याहतायें अपने ससुरालियों को मज़ा चखाने के लिए दहेज़ प्रताड़ना क़ानून का गलत इस्तेमाल करने लगी हैं. उनने ये भी बताया कि संसद और सरकार इसे लेकर चिंतित है.

पर उनने जो आगे बताया वो चौंकाने वाला था. उनने बताया कि ऐसा ही एक वाकया खुद उनके बेटे के साथ दक्षिण भारत के किसी सूबे में हो चुका है. उनने पुलिस के ज़ुल्म का वो सारा किस्सा अपनी पूरी पैतृक पीड़ा के साथ सुनाया. उस प्रांत में जहां उनके बेटे को कोई संभालने तो क्या पहचानने वाला भी नहीं था, उन्होंने कैसे हथकंडों से अपने बेटे को बचाया इसका ज़िक्र मैं (जानबूझकर) नहीं करूंगा. गनीमत है कि उनके बेटे के साथ भी वो सब हुआ था. इसका फायदा ये हुआ कि पुलिस का कहर बरपना बंद हो गया. इस बीच मुख्य आरोपी ने अदालत में समर्पण कर दिया. उसे ज़मानत भी मिल गयी.

justice for मांअपना काम ज्ञान बांचना या न्याय को जांचना नहीं है. तब भी पत्रकारिता पल्ले बांधते समय परमात्मा ने ये तो गुरुओं से कहलवा ही दिया था कि कभी कहीं प्रताड़ना देखो तो उसे व्यवस्था के मद्देनजर ज़रूर कर देना. उसीलिए एक मूल प्रश्न मैं सबके सामने रख देना चाहता हूँ. वो ये कि (गलत या सही) मूल आरोपी के बदले घर के सदस्यों और उनमें भी असहाय महिलाओं को पकड़ के थाने में बिठाने और उन्हें प्रताड़ित करने का बेरोकटोक अख्तियार पुलिस को क्यूं है?.. ज़मानत हो जाने के बाद भी कौन भरपाई करता है उस ज़लालत की जो बेक़सूर रिश्तेदारों की समाज में हो गयी होती है?.. अरे कोई तो एक मिसाल ऐसी भी पेश कर दे कि कोई पुलिसिया किसी मजलूम औरत को पूछताछ की आड़ में नाहक परेशान न कर सके! अगर कोई सत्ता, शासन, संगठन, संस्था या व्यवस्था ये करना चाहे तो यशवंत की माँ और मेरी बहन हाज़िर हैं.

लेखक जगमोहन फुटेला पंजाब के वरिष्ठ पत्रकार हैं. अपने और दोस्तों के मान-सम्मान की रक्षा के लिए हमेशा तत्पर रहने वाले जगमोहन फुटेला अपने इंप्लायर रहे दैनिक जागरण को कोर्ट में लंबी सुनवाई के बाद पटकनी दे चुके हैं.

इतिश्री की ओर अग्रसर चंडीगढ़ प्रेस क्लब!

जगमोहन फुटेलादेश का आकार में सबसे बड़ा, किसी समय सबसे अमीर और ‘सिटी ब्यूटीफुल’ के नाम को सार्थक करता अति खूबसूरत चंडीगढ़ प्रेस क्लब कंगाल हो जाने की कगार पर है. क्यों? कहानी लम्बी है. पहले इस क्लब का इतिहास समझ लें. फिर ताकत. फिर असलियत. मनु शर्मा के दादा और विनोद शर्मा के पिताश्री पंडित केदार नाथ शर्मा के घर से आये प्लेट, गिलासों, चम्मचों के सहारे सफ़रजदा हुआ यह क्लब.

पंजाब और हरियाणा की राजधानी चंडीगढ़ में स्थित यह प्रेस क्लब न सिर्फ खुद चंडीगढ़ केंद्र शासित प्रदेश बल्कि गाहे बगाहे हिमाचल और जम्मू कश्मीर से भी आ टपकने वाले नेताओं को आमद के लिए ज़रूरी लगता रहा है. पंजाब, हरियाणा, जम्मू कश्मीर, हिमाचल और केंद्र के छुटभैय्ये नेताओं, मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों को छोड़िये, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति तक एक अदद स्मृति चिन्ह के बदले मोटे चढ़ावे चढ़ा कर जा चुके हैं यहाँ. बिल्डिंग चंडीगढ़ केन्द्र शासित प्रदेश की है. कुल एक रूपये किराए पर मिली है. बिल्डिंग का डेंट, पेंट सरकारी खर्चे पर होता रहा है.

अब ये अलग बात है कि जिसमें क्लब खुद किरायेदार हैं उस बिल्डिंग का कुछ हिस्सा उसने किराए पे चढ़ा रखा है. सस्ती दारु का प्रबंध चूंकि इतने से नहीं होता सो गैर पत्रकार भी क्लब के मेंबर हैं. कार्पोरेट के नाम पर. किट्टी कोई भी कर सकता है. उसके लिए गैर-पत्रकार सदस्य होना भी ज़रूरी नहीं है. दारु, सस्ते, सुन्दर, स्वादिष्ट भोजन और उपहारों की खातिर तम्बोला जैसे आयोजनों का अक्सर और प्रायोजित भी होना आम बात है. पैसे आते हों तो वाहनों के विज्ञापन क्लब ने लान तक में लगवा लिए हैं.

लान की बात चली तो बताते चलें कि लान में ही एक शिलान्यास लगा है. प्रधानमंत्री की प्रतिष्ठा या अपनी झेंप की खातिर क्लब ने इस पर पहले तो रद्दी अखबार चिपका रखा था. अब चंडीगढ़ का नक्शा सजा रखा है. क्लब यहाँ मीडिया सेंटर बनाना चाहता था. प्रधानमंत्री से नींव का पत्थर रखवा कर. एक ऐसी नींव जो बुनियादी तौर पर ही गलत होती. न कोई नक्शा था. न मंज़ूरी. न धन. न चंडीगढ़ जैसे शहर के वास्तुशिल्प के हिसाब से कोई आकलन. आवेदन तो शायद था. पर उस पर किसी अफसर के दस्तखत नहीं थे. शिलान्यास स्थल पर पत्थर लगा दिया गया. प्रधानमंत्री आये भी. पर शिलान्यास उनने नहीं किया. अवशेष के रूप में खड़ा शिलान्यास का चबूतरा आज भी क्लब को मुंह चिढ़ा रहा है. भाई लोगों ने वक्त आने पर खुन्नस मंज़ूरी की राह में रोड़ा बने गवर्नर पे निकाल ली. मौका हाथ लगने पर उनके खिलाफ जम के भड़ास निकाली गयी. ये अलग बात है कि वे अपने पांच साल के कार्यकाल के बाद भी दो महीने और गवर्नरी कर के गए.

प्रेस क्लब कंगाली की ओर अग्रसर इसलिए है कि उसे अपनों की ही नज़र लग गयी है. क्लब की चुनावी प्रक्रिया में एक संशोधन मैनेजमेंट ने किया था. इसकी सम्बंधित सरकारी महकमे से मंज़ूरी नहीं ली गयी. चुनाव गलत तरीके से हुए मान कुछ लोग इसके खिलाफ कोर्ट चले गए. मैनेजमेंट ने आम इजलास के एक विवादास्पद फैसले की आड़ में इन तीन सदस्यों को क्लब से बाहर कर दिया. ये कह के ये लोग क्लब के खिलाफ कोर्ट गए. अब पंजाब और हरियाणा की सरकारों से सूचना के अधिकार के अंतर्गत जानकारी मांगी गयी है कि क्लब को कितनी रकमें दीं गईं. और क्या हर अगली दान दक्षिणा से पहले पिछली के उसी मद में खर्च का ब्यौरा माँगा गया?

इसके बाद सरकारों से जवाव देते नहीं बन रहा है. क्लब को किसी भी तरह की आर्थिक मदद पे रोक लग गयी है. क्लब की हालत ये है कि सबलेटिंग के किराए, स्वीमिंग पूल जैसी सुविधाओं के ‘गेस्टों’ द्वारा इस्तेमाल और खाने पीने की चीज़ों के दाम बढाने के बावजूद क्लब के पास अपने कर्मचारियों को वेतन देने तक के पैसे नहीं हैं. उस पर तुर्रा ये कि निकाले गए सदस्य आरटीआई से जानकारी मिलते ही सीबीआई जांच के लिए हाई कोर्ट जाने को हैं. खुद किरायेदार होने के बावजूद क्लब परिसर में किरायेदार रख लेने के आधार पर जो लीज़ ही कैंसिल हो सकती है, उसका डर अलग से.

डर ये भी है कि कोई जांच अगर हुई तो चिट्ठे कई खुलेंगे. लायब्रेरी के नाम पर जितने रूपये आये हैं उतने पन्ने वहां मौजूद किताबों में नहीं हैं. आरोप ये भी है कि क्लब में बहुत सारी कंस्ट्रक्शन नक्शा पास कराये बिना हुई है. वो भी बिना टेंडर के. दूसरों पे पत्थर बरसाने वाले पत्रकारों का ये क्लब खुद शीशे का सा हो के रह गया है. चोट खाने वाले पलटवार करने लगे हैं. क्लब की आमदनी ठप्प हो गयी है, उसके कामकाज पे अदालतों की नज़र है, सीबीआई जांच से लेकर लीज़ कैंसिल होने तक के आसार पैदा होने लगे हैं. कभी देश का सबसे अमीर और बाज़ार भाव से कोई पचास करोड़ रूपये की सरकारी ज़मीन पे काबिज़ चंडीगढ़ का प्रेस क्लब जैसे अपनी इतिश्री की ओर अग्रसर है.

लेखक जगमोहन फुटेला वरिष्ठ पत्रकार हैं और इन दिनों वेब मीडिया की दुनिया में सक्रिय हैं.

‘गोल्डन शेक हैण्ड’ चाहते थे संजय गुप्ता

जगमोहन फुटेलानिशिकांत ठाकुर क्लर्क थे, पैसे न होने से मेरे घर में सोते, नहाते, नाश्ता करते : नरेन्द्र मोहन पीठ पीछे भी मेरे नाम के साथ ‘जी’ लगाना नहीं भूलते थे : तसल्ली ये है कि नरेंद्र मोहन दैनिक जागरण की जगहंसाई देखने के लिए दुनिया में नहीं हैं : पंद्रह साल तक चले मुकदमे के दौरान मेरा इकलौता बच्चा जज बन गया, मेरी एक बहन हाई कोर्ट की जज हो गई : हम खुश हैं कि इतने बड़े साम्राज्य के साथ इतने लम्बे संघर्ष से हम एक मिसाल बन के उभरे हैं : पत्रकारिता में मैं इंडियन एक्सप्रेस के अश्विनी सरीन को ये बताने के लिए आया था कि वे अगर पांच हज़ार रूपये में पैंतीस साल की एक अधेड़ महिला को खरीद कर देश व महिलाओं की हालत का पर्दाफाश कर सकते हैं तो मैं सिर्फ सौ रुपये में महज़ सोलह साल की एक लड़की को खरीद सकता हूँ.

इसके बाद मुझे अमर उजाला में नौकरी मिल गयी थी और फिर मेरी पहली बड़ी स्टोरी कईयों के मना कर देने के बाद कमलेश्वर जी ने ‘गंगा’ में छापी. उस स्टोरी में मैंने विस्तार से बताया था कि कैसे दीक्षांत समारोह के बहाने बुला कर इंदिरा जी को पन्त नगर में मारा जाने वाला था. अक्टूबर के शुरू में वो स्टोरी छपी. उसी महीने के आखिरी दिन इंदिरा जी की दिल्ली में हत्या हो गयी. मैं अमर उजाला से जनसत्ता, चंडीगढ़ आ गया था जब एक दिन कमलेश्वर जी का फ़ोन आया. बोले, कुछ महीनों में वे जागरण, दिल्ली के संपादक हो रहे हैं और मुझे उनके साथ काम करना है.

तो, यूं हुआ जागरण से जुड़ना. चंडीगढ़ में दफ्तर से लेकर पंजाब हरियाणा हिमाचल में स्ट्रिंगर जमाने तक के सारे काम मेरे जिम्मे थे. फोन था नहीं. टेलीप्रिंटर का ज़माना था. दिल्ली जाकर जनेश्वर मिश्र से दफ्तर के लिए एक अदद फोन भी मैं ही लेकर आया. रोज़ कोई चार छ: बार तारघर जाकर टीपी की पल्स भी मिल्वानी पड़ती थी. पत्रकारिता के नज़रिए से भी काम आसान नहीं था. आतंकवादियों के प्रेसनोट एडिट कर के छापने पर बड़े बड़े अखबारों तक को पहले पेज पर माफीनामे छापने पड़ रहे थे. छापो तो सरकार अखबारें ज़ब्त करने से लेकर बिजली काट देने तक के हथकंडे अपना रही थी. कम्पनी के लिए विज्ञापन, धन जुटाने वाले लोग भी मैंने ही तलाशे, तराशे.

अखबार जड़ें जमाने लगा था. तभी राजीव गाँधी की हत्या की बुरी खबर आई. मैं ठीक एक हफ्ता पहले १४ मई को उनके साथ एक दिन गुज़ार चुका था. भावुक था. मैंने सुझाया तो मुझे उनके अंतिम संस्कार की कवरेज के लिए दिल्ली बुलाया. सुबह पांच बजे मैनेजिंग एडिटर सुनील गुप्ता का फोन आया. बोले अंग्रेजी अखबारों में कापी है तो टाईम्स आफ इंडिया की और हिंदी में है तो तुम्हारी. उसी दिन मुझे दिल्ली में ब्यूरो चीफ बना दिया गया. दिक्कत यहीं से शुरू हो गई. रोज़ कानपुर से नया तकादा. आज इससे अपाइंटमेंट ले के दो. कल उससे. मैं चंडीगढ़ वापिस चला आया.

उधर पता लगा कि राम मंदिर की कवरेज पे बने दबाव के मद्देनज़र कमलेश्वर जी ने इस्तीफ़ा दे दिया. एक दिन मैनेजिंग डायरेक्टर और मैनेजिंग एडिटर सुनील गुप्ता भी निबटा दिए गए. मुझे नोएडा बुलाया गया. नौकरी के बदले सुनील गुप्ता के खिलाफ कुछ कागजों पे साइन करने को कहा गया. मैंने नहीं किये तो जांच नाम के किन्हीं कागजों पे साइन करने को. मैंने वाशरूम का बहाना बनाया और भाग खड़ा हुआ. चंडीगढ़ पहुंचते पहुंचते रात हो गई. सुबह जा के देखा तो दफ्तर पे मेरे ताले के ऊपर एक और ताला जड़ा है. फिर फरमान आया कि मेरा तबादला नोएडा.

उन्हीं दिनों जनसत्ता के प्रमुख संवाददाता महादेव चौहान को करनाल जैसे जिला मुख्यालय पे तबादले के खिलाफ स्टे मिला था. मैं तो ब्यूरो चीफ था. मेरा तबादला भी तहसील पर. मैंने भी स्टे की अर्जी लगा दी. रात भर भगवान से प्रार्थना की कि किसी तरह अपना भी केस उसी अदालत में लग जाए. लग गया. पर, स्टे नहीं मिला. वकील बोला कहीं कम्पनी टर्मिनेट न कर दे. सो, टर्मिनेशन के खिलाफ भी अर्जी डाल दी. कम्पनी ने कहा कानून के खिलाफ कुछ नहीं करेंगे. कम्पनी का स्टैंड ये कि मुझे तो विज्ञापन वगैरह के लिए रखा गया था. रिपोर्टर का कार्ड तो सिर्फ इस लिए दे दिया कि विज्ञापन जुटाने में मदद मिले.

लेबर कोर्ट बछावत की दी परिभाषा (विशेष संवाददाता या ब्यूरो चीफ वो होता है जो राज्य के विधायी कार्यकलापों-यानी विधानसभा- को कवर करता है) के मुताबिक़ मेरा पद, ओहदा तय कर ही रहा था कि जागरण ने मुझे जांच में बुलाने के लिए नोटिस पे नोटिस छापे. कानूनन ऐसे में वेतन और किराया देना होता है. वो दिया नहीं. मैं गया नहीं. कम्पनी को लगा कि बछावत की दी परिभाषा का कोई तोड़ वो नहीं ढूंढ पाएगी तो उसने मुझे मुम्बई ट्रांसफर कर दिया. कोई दफ्तर, कोई ब्यूरो, कोई रिपोर्टर वहां भी नहीं था. विधानसभा जाने के लिए मान्यता भी सर्कुलेशन के आधार पर नहीं मिलनी थी. मुझे पता था कि मान्यता न मिली तो मैं जा के भी वापिस आ सकता हूँ. मैं मान गया. जाने का किराया कम्पनी को देना होता है. मैंने सामान समेत ट्रक का किराया माँगा. कम्पनी को मेरी स्कीम का पता लग गई. उसने किराया नहीं दिया. मैं नहीं गया.

इधर लेबर कोर्ट ने मुझे १९९४ में ब्यूरो चीफ मान लिया. तब तक का वेतन देने को भी कहा. कम्पनी ने नहीं दिया. मुझे कलक्ट्रेट दफ्तर में उस पैसे की रिकवरी डालनी पड़ी. कम्पनी इसके खिलाफ हाईकोर्ट चली गई. हाईकोर्ट ने पचास हज़ार से ऊपर की रकम कोर्ट में जमा करवा ली. लेबर कोर्ट में बर्खास्तगी का केस चल ही रहा था. मालिक नरेन्द्र मोहन जी समेत दिल्ली के बड़े बड़े वकील और कम्पनी के जी.ऍम. लेवल के लोग बीसियों दफे आये. जांच अधिकारी भी आया. उनकी जांच का धुंआ निकल गया. कोर्ट कहे सबूत लाओ. सबूत कोई आये नहीं. आखिरी मौके तक कोई सबूत नहीं आया तो एक आदेश से लेबर कोर्ट ने कम्पनी की एविडेंस ही क्लोज़ कर दी. अब कम्पनी भागी हाई कोर्ट. वहां मेरा दुर्भाग्य कि केस का नम्बर आने में ही कोई तेरह साल लग गए. जब आया तो छ: महीने में मामला निबटाने के आदेश के साथ आया. कम्पनी ने इन छ: महीनों के आखिरी दिन बिताने के बाद आखिर हथियार डाल दिए. मेरी बहाली मान ली और उसके बदले में पांच लाख रुपये की पेशकश भी की. मेरे लिए ये एक बड़ी नैतिक जीत थी. मैंने पेशकश मान ली.

इन पंद्रह से अधिक सालों में मुझ पे हुए ज़ुल्मों का हिसाब किताब देखते मेरा इकलोता बच्चा जज बन गया. मेरी एक बहन हाई कोर्ट की जज. मैं भी टीवी चैनलों के ज़रिये समाज के लिए जो कर सकता था, करता रहा. हमने जिस हाल में भी ये पंद्रह साल काटे, हम खुश हैं कि इतने बड़े साम्राज्य के साथ इतने लम्बे संघर्ष से हम एक मिसाल बन के उभरे हैं. इस संकल्प के साथ कि पहले हमने ज़ुल्म सहा नहीं, अब होने नहीं देंगे..!!

इन पंद्रह, सोलह बरसों में कभी किसी ने एक बार राजीनामे की कोशिश नहीं की. निशिकांत ठाकुर क्लर्क थे, जब मैंने ज्वाइन किया. सर्कुलेशन के सिलसिले में कभी चंडीगढ़ आते तो किसी छोटे मोटे होटल के लिए भी किराया नहीं होता था उनकी जेब में. अखबार वाली टैक्सी में आते. मेरे दो कमरे के किराए वाले घर में सोते, नहाते, नाश्ता करते. वो जीएम हो गए. अक्सर कोर्ट आते. घूर के देखते. पर, नरेन्द्र मोहन जी हमेशा प्यार से मिले. मैंने सुना, वे मेरी पीठ पीछे भी मेरे नाम के साथ ‘जी’ लगाना नहीं भूलते थे. वे भी कई बार आये अदालतों में. उनके साथ पांच, सात लोग हमेशा होते थे. मैं अकेला. बीच बीच में बेरोजगार भी. खाली हाथ भी. संजय गुप्ता को न कभी मैंने देखा, न मिला. एक बार फोन पे बात हुई थी. ‘गोल्डन शेक हैण्ड’ की बात कह रहे थे. मुझे मंज़ूर भी था. वे पापा से बात कर के कॉल करने वाले थे. पापा नहीं माने होंगे. वे मेरे भी पिता सामान थे. मुझे उनके न रहने का दुःख है. पर ये तसल्ली भी कि आज जागरण की जगहंसाई देखने के लिए वे इस दुनिया में नहीं हैं.

जगमोहन फुटेला

चंडीगढ़

(जगमोहन फुटेला जागरण को अदालत में बुरी तरह हराने के बाद अब करियर की नई पारी प्लान कर रहे हैं. इस नई पारी में वे खुद की एक वेबसाइट लांच करने जा रहे हैं. गिला-शिकवा नाम से. हम चाहेंगे कि www.gilashikva.com वेबसाइट के जरिए जगमोहन फुटेला समाज के ऐसे लोगों को मंच प्रदान करें जो अभावों के बावजूद अपनी लड़ाइयां लड़ रहे हैं और डटे हुए हैं. – एडिटर)

फुटेला ने कोर्ट में जागरण को हराया

जगमोहन फुटेलाबहाली के बदले जागरण ने 5 लाख रुपये दिए : किसी अख़बार और पत्रकार के बीच इस देश में सबसे लम्बा चला मुकदमा आखिरकार पत्रकार ने जीत लिया. तबादले और बर्खास्तगी हुए. सब-जज से लेकर हाई कोर्ट तक आधा दर्जन मुकदमे चले. चंडीगढ़ की लेबर कोर्ट में 15 साल तक यह विवाद चला. आखिरकार अखबार ने हार मान ली. उसे पत्रकार को बहाली के बदले मोटी रकम देनी पड़ी. विवाद दैनिक जागरण और जगमोहन फुटेला के बीच था. फुटेला जागरण,  नोएडा की शुरुआत से ही संपादक कमलेश्वर की टीम में और सन ९० से चंडीगढ़ ब्यूरो चीफ थे. राजीव गांधी के अंतिम संस्कार की कवरेज के लिए उन्हें खासतौर पर दिल्ली बुलाया गया. उनकी उस स्टोरी को उस दिन के हिंदी अखबारों में सबसे बेहतर मानते हुए उन्हें बीच में राष्ट्रीय ब्यूरो प्रमुख भी बनाया गया था.

बाद में निजी कारणों से वे वापिस चंडीगढ़ चले गए थे. राम मंदिर की कवरेज को लेकर बने दबाव के कारण कमलेश्वर ने इस्तीफ़ा दे दिया था. मालिकों में तू तू मैं मैं हो गयी थी. फुटेला के मुताबिक़ उन्हें दिल्ली बुला कर नौकरी के बदले तब तक एमडी और मैनेजिंग एडिटर रहे सुनील गुप्ता के खिलाफ कुछ दस्तावेजों पर साइन करने को कहा गया. उनने नहीं किये तो उन्हें चंडीगढ़ से नोएडा ट्रान्सफर कर दिया गया. फुटेला ने इस तबादले को ये कह कर कोर्ट में चैलेन्ज किया कि बछावत की दी परिभाषा के मुताबिक़ विशेष संवाददाता या ब्यूरो चीफ वो होता है जो राज्य के विधायी कार्यकलापों को कवर करता है सो उसका तबादला राजधानी से किसी तहसील पर नहीं हो सकता.

जागरण प्रबंधन ने फुटेला को ब्यूरो चीफ मानने से ही इनकार कर दिया. उसे लगा कि वो बछावत की दी परिभाषा का तोड़ नहीं ढूंढ पाएगी तो उसने फुटेला को मुम्बई ट्रान्सफर कर दिया. फुटेला ने कहा कि वहां ब्यूरो नहीं है, न सर्कुलेशन के आधार पर जागरण का कोई रिपोर्टर सरकारी मान्यता का हकदार और न राज्य के विधानमंडल में प्रवेश का हकदार है. फिर भी वे जाने को तैयार हैं पर, जागरण से सामान समेत जाने का किराया नहीं मिला. इस कारण वे गए नहीं. उधर, जब तक अदालत ने फुटेला को ब्यूरो चीफ घोषित किया, जागरण ने एक जांच के आधार पर उन्हें बर्खास्त कर दिया. इस बीच अख़बार में कोई दर्जन भर विज्ञापनों के ज़रिये फुटेला पर जांच में शामिल न होने के आरोप अलग से लगे.

जागरण की जांच अदालत की कसौटी पर खरी न उतर सकी. मैनेजमेंट के लोग अदालत से मिले आखिरी मौके तक जब सबूत पेश नहीं कर सके तो अदालत ने उनकी एविडेंस ‘बाय आर्डर’ बंद कर दी. मैनेजमेंट के लोग हाई कोर्ट चले गए. वहां कोई तेरह साल लग गए. हाईकोर्ट ने छ: महीने में मामला निबटाने का निर्देश दिया. जांच पहले ही अवैध करार की जा चुकी थी. शुरू से मुकदमे लड़ते लड़ाते आ रहे नरेन्द्र मोहन जी भी स्वर्ग सिधार चुके थे. जागरण ने हथियार डाल दिए. फुटेला को बहाली की एवज में पांच लाख रुपये की रकम पेशकश की गयी. इस पर फुटेला मान गए. 5 जून को जागरण ने पांच लाख रुपये का ड्राफ्ट दे भी दिया.

फुटेला ने ‘भड़ास4मीडिया’ से कहा,”जहां रफ कागज़ पे ज़रा सी स्याही गिर जाने पे ही कलम- मजदूर को सुबह से दफ्तर न आने का फरमान सुना दिया जाता हो, ऐसे निजाम को ऐसे संघर्ष से कुछ सबक ज़रूर मिलेगा. मेहनतकशों की हालत कुछ बेहतर ज़रूर होगी. भगवान् आदरणीय नरेन्द्र मोहन जी की आत्मा को शान्ति प्रदान करे.”