नक्सली नेताओं के विश्वास की रक्षा करें

किशोर कुमारपुलिस नहीं, पत्रकारों की भूमिका पर बहस हो : पश्चिम बंगाल के लालगढ़ से नक्सली नेता छत्रधर महतो की गिरफ्तारी के बाद पुलिस की भूमिका और पत्रकारिता की चुनौतियों पर बहस छिड़ी हुई है। यह लाजमी भी है। लेकिन मेरा मानना है कि इस प्रकरण में या ऐसे संवेदनशील मामलों में पुलिस से ज्यादा पत्रकारों की भूमिका पर बहस होनी चाहिए। यह आत्म-मंथन का वक्त है। मैं अपनी बात को विस्तार देने से पहले एक घटना का जिक्र करना चाहूंगा। बात पुरानी है। तब मैं नवभारत टाइम्स के पटना संस्करण का धनबाद में संवाददाता था। धनबाद जिले के ही टुंडी और पीरटांड इलाके में नक्सलियों की गतिविधियां बढ़ी हुई थीं। उस समय नक्सलियों के एक बड़े नेता पत्रकारों के संपर्क में रहते थे।

वे अपने आंदोलन के हितों की हिफाजत करते हुए पत्रकारों को वांछित सूचनाएं उनके दफ्तरों में जाकर उपलब्ध कराया करते थे। उक्त नक्सली नेता इस बात के लिए निश्चिंत रहते थे कि पत्रकारों से मिलते-जुलते उनके साथ धोखा नहीं हो सकता। पत्रकार भी इस विश्वास को सदा बनाए रहे। जबकि पुलिस अधिकारी अक्सर अनेक पत्रकारों से उक्त नक्सली नेता को गिरफ्तार करवाने में मदद मांगते रहते थे। कई पुलिस अधिकारी तो कुछ पत्रकारों से अपने निजी संबंधों की दुहाई देकर भी सहयोग मांगते रहते थे। लेकिन उन्हें हमेशा निराशा ही हाथ लगी। एक बार की बात है कि दिल्ली और पटना के कुछ पत्रकार धनबाद पहुंचे नक्सलवाद पर स्टोरी करने। वे उक्त नक्सली नेता का इंटरव्यू भी करना चाहते थे। चूंकि मैंने कुछ समय पहले ही उक्त नेता का इंटरव्यू किया था, इसलिए स्वाभाविक रूप से उन पत्रकारों ने मुझसे आग्रह किया कि मैं उक्त नक्सली नेता का इंटरव्यू करवा दूं।

मेरे सामने बड़ी दुविधा थी। कारण यह था कि मैं दिल्ली से आए पत्रकारों में सभी को नहीं जानता-पहचानता था। मैंने अपनी इस दुविधा से टाइम्स आफ इंडिया के संवाददाता उमेश सिन्हा (अब वह इस दुनिया में नहीं रहे) को अवगत कराया तो उन्होंने सलाह दी कि मैं इन स्थितियों से नक्सली नेता को अवगत करा दूं। यदि उनकी इच्छा हो तभी बाहर से आए पत्रकारों को इंटरव्यू करवाने ले जाऊं। इंटरव्यू के सवाल पर मंथन चल ही रहा था कि उक्त नक्सली नेता नवभारत टाइम्स के दफ्तर में आ गए। उन्होंने इस बार अपना हुलिया बदल रखा था। मैंने उन्हें पूरी बात बताई तो उन्होंने इतना ही कहा– रहने दीजिए और वे तुरंत ही चले गए। इस तरह बाहर से आए पत्रकारों की इच्छा पूरी नहीं कर पाने की मजबूरी हो गई। हालांकि ऐसा नहीं था कि नक्सलियों की गतिविधियां जो हमें गलत लगती थीं उन पर हम टिप्पणी करते थे। पर नक्सली नेताओं से जाने-अन्जाने विश्वासघात किसी ने नहीं किया।

मेरा तात्पर्य यह है कि बहस केवल इस बात को लेकर नहीं होनी चाहिए कि पुलिस ने लालगढ़ में सही किया या गलत। बहस इस बात को लेकर भी होनी चाहिए कि लालगढ़ की घटना के परिप्रेक्ष्य में पत्रकारिता के पवित्र पेशे को अक्षुण बनाए रखने के लिए क्या कुछ किया जाना चाहिए। अनेक लोगों की तरह मैं भी यह नहीं मानता कि लालगढ़ में संबंधित पत्रकार ने छत्रधर महतो के साथ विश्वासघात किया। लेकिन अनजाने में ऐसा हो गया तो उसकी एकमात्र वजह गैरजिम्मेदार कंधे पर पत्रकारिता की बड़ी जिम्मेदारी का होना नहीं तो और क्या है? यदि अखबारों और चैनलों के कर्त्ताधर्त्ता अपने खास एजेंडे के तहत अथवा मुफ्त में काम निकालने की अपनी नीति के तहत गैरजिम्मेदार कंधों पर बड़ी जिम्मेदारी देते रहेंगे और ऐसे गैरजिम्मेदार लोग चंद स्वार्थों के लिए इस्तेमाल होते रहेंगे तो पत्रकारों पर कौन भरोसा करेगा? इसलिए लालगढ़ का मामला कोई मामली घटना नहीं है। यह पूरी पत्रकारिता की विश्वसनीयता से जुड़ा हुआ मामला है।    

इस परिप्रेक्ष्य में विष्णु राजगढ़िया और अनुरंजन झा के दर्द के समझा जा सकता है। लेकिन पत्रकारिता की विश्वसनीयता के मुद्दे पर दोषारोपण केवल पुलिस पर नहीं करके अपने गिरेबां में भी झांकना जरूरी है। जैसा कि अनुरंजन झा ने इशारा भी किया है और तब यह भी स्पष्ट हो जाएगा कि मीडिया घराने लालगढ़ के इस मामले में चुप क्यों हैं।


लेखक किशोर कुमार स्वतंत्र पत्रकार हैं.

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