समाचार माध्यमों खास कर इलेक्ट्रोनिक मीडिया में आपको किसी शहर या संस्थान को स्थापित करने के लिए उसकी पहचान वाले किसी विजुअल को दिखाना होता है. जैसे अगर बात भारत की हो तो चैनलों में सामान्यतः इंडिया गेट को दिखाया जाता है. किसी शहर को दिखाना हो तो वहां के रेलवे स्टेशन को दिखा कर आप उस शहर के बारे में बता सकते हैं. इसी तरह बात अगर छत्तीसगढ़ के मीडिया की की जाय तो निश्चित ही लगभग पांच दशक से प्रदेश के मीडिया में अपना सम्मानित जगह रखने वाले वरिष्टतम पत्रकार रमेश नय्यर को रखा जा सकता है. छोटे कद के बड़े आदमी नय्यर जी से मिलना ना केवल पत्रकारिता बल्कि सौजन्यता सीखना भी है. सन 1965 में शिक्षक की सरकारी एवं अपेक्षाकृत सुरक्षित नौकरी को छोड़ कर उस समय के पत्रकारिता के कंटकाकीर्ण मार्ग का अवलंबन करने वाले नय्यर जी आज तो इस विधा के चलते-फिरते पाठशाला के रूप में ही जाने जाते हैं.
कहते है किसी भी जीवित व्यक्ति की तारीफ़ मत करो. हो सकता है कभी भी आपको अपने निर्णय पर विचार करना पड़ जाय. ऐसा ही अभी हाल में नय्यर जी के सन्दर्भ में हुआ था. एक़ स्वघोषित स्वामी द्वारा नक्सल मामले में नय्यर जी के नाम से एक झूठ गढ़कर कि उन्होंने प्रदेश के मीडिया को बेकार कहा है, उन पर कीचड उछलने का प्रयास किया था. लोग पढ़ कर हतप्रभ रह गए थे कि जिस पत्रकारिता की पूरी पीढ़ी को नय्यर जी ने अपने हाथों से सींचा है और जिस तरह का उनका व्यक्तिगत बातचीत में भी शालीनता का व्यवहार रहा है, वह ऐसा कोई बयान अपने ही नए पीढ़ी के बारे में दे सकते हैं क्या? फ़िर अपने मौलिक स्वभाव के अनुरूप ही बिलकुल सही, सरल एवं सटीक शब्दों में उन्होंने अपना पक्ष रखा और अंततः लोगों को समाधान मिला.
आज जब पुनः साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण से देश बड़ी मुश्किल से बच पाया है, वहां नय्यर जी और प्रासंगिक हो जाते हैं. वास्तव में नयी पीढ़ी के लोग अभी जब नए-नए आज़ाद हुए भारत के नव-निर्माण की प्रसव पीड़ा के बारे में पढ़-सुन या कल्पना ही कर सकते हैं. वहां नय्यर जी उस समय के ना केवल साक्षी रहे हैं बल्कि भुक्तभोगी भी. उनके तमाम लेखन में अपने बाल अनुभव की वह छाप तो देखी ही जा सकती है, जब देश के विभाजन की कीमत पर मिली आज़ादी के समय साम्प्रदायिक़ आग में झुलस कर भी वे जलने से बच गए थे. चूंकि तब उनके लिए दर्द और दवा दोनों देने वाला एक ही समुदाय था, उनकी जान लेने पर उतारू संप्रदाय के ही अनुयायी के परिवार ने ही तब उनकी और पूरे परिवार की प्राण रक्षा भी की थी. तो किसी भी तरह के अतिवाद के विरुद्ध संतुलन, समन्वय, शांति, सौहार्द, स्नेह, सौजन्यता, सद्भाव का जो पाठ शिक्षक रहे नय्यर जी पत्रकारिता में भी पढ़ाते रहे हैं वह उसी बाल अनुभव का परिष्कृत निचोड़ है.
एक अक्टूबर उन्नीस सौ चालीस को पश्चिमी पंजाब (वर्तमान पाकिस्तान) के गुजरात जिले जिले के कुंजाह नामक कस्बे में जन्में श्री नय्यर ने 1947 में अपनी बाल सुलभ आंखों से ही व्यक्ति के दानव बन जाने का मंज़र देखा था. उस मंज़र का जहां किसी के जीवित रहने की शर्त उसका मज़हब या सम्प्रदाय तय करने लगता है. लेकिन उसी सम्प्रदाय के कुछ अच्छे लोगों के सीने में समाकर वहां से भारत, वाया अमृतसर फ़िर वर्तमान छत्तीसगढ़ तक पहुंचना और फ़िर प्रदेश का ही हो कर रह जाना, एक ऐसा इतिहास है जिसकी छाप आपको उनके विभिन्न लेखन में दिखाई देगा. अपने एक संस्मरण में नय्यर जी खुद कहते हैं “ कुंजाह में फसाद भड़कने के दिन से अमृतसर के लिए रवाना होने वाली रात तक की स्मृतियाँ पिछले छह दशक से मेरे मानस में झिलमिलाती रही है. उन्मादियों के झुण्ड के बीच से ‘जैनब’ का किसी फ़रिश्ते की तरह प्रकट होना. ‘कालू खान’ द्वारा जोखिम उठाकर हमारी रक्षा करना. हमें अमृतसर तक सुरक्षित पहुंचाने का बंदोबस्त करना. इन स्मृतियों ने अटल विश्वास दिया कि मनुजता और व्यक्तिगत संबंधों को धार्मिक आस्था डगमगाती नहीं पुष्ट करती है.’’
मनुजता और व्यक्तिगत संबंधों के प्रति इन्ही भरोसा को संजोये नय्यर जी आज भी व्यक्तिगत संबंधों की गर्माहट को कायम रखने में कभी भी अपने कनिष्ठतम पत्रकारों से संपर्क स्थापित करने में भी अपने बड़प्पन को आड़े नहीं आने देते. उनके द्वारा उद्धृत एक वाक्य का नक़ल करके कहूँ तो हरम के किसी पासबानों द्वारा खींची गयी कोई भी लकीर उन्हें लोगों तक पहुंचने से रोक नहीं पाता. बाल मन पर पड़ी घटनाओं का सबक लेकर आपातकाल के दौरान पत्रकारों के घुटनाटेकी दौर में रायपुर के एमपी क्रोनिकल में अपने मेरुदंड को सीधा रखने का प्रयास करते रहना, पंजाब के चरम आतंक के दौर में वहाँ की राजधानी चंडीगढ़ जाकर दैनिक ट्रिब्यून में आतंक के विरुद्ध शान्ति की अलख जगाना, या अभी के नक्सल समस्या के दारुण समय में छत्तीसगढ़ में लोकतंत्र का अलख जगाना हो, नय्यर जी ने खुद को उन चंद लोगों में शुमार किया है, जिन्होंने इस कठिन समय में भी पत्रकारिता को ‘सरोकार’ का पर्याय बनाये रखा.
छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता और साहित्य को ही अपना समग्र देने वाले श्री नय्यर ने प्रदेश के अंग्रेज़ी और हिन्दी के लगभग सभी महत्वपूर्ण समाचार पत्रों में अपना योगदान दे कर, प्रदेश के निर्माण के पहले और बाद में अंचल के विकास को दिशा देने और कर्णधारों को सावधान रखने का काम किया है. न केवल मुख्यधारा की पत्रकारिता अपितु लगभग बारह महत्वपूर्ण पुस्तकों का लेखन-संपादन, अपने व्यंग्य रचनाओं का संकलन, कहानियों का संकलन एवं कई प्रसिद्ध पुस्तकों का अनुवाद कर उन्होंने प्रदेश को एक नयी पहचान दी है. साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार विजेता लेखक वीएस नायपॉल की पुस्तक – ‘इंडिया : अ वुंडेड सिविलाइजेशन’ और उन्हीं की प्रसिद्द उपन्यास ‘मैजिक सीड्स’ का भावानुवाद कर नय्यर जी ने छत्तीसगढ़ को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान देने में अपनी भूमिका का निर्वाह किया है.
नय्यर जी की यही सबसे बड़ी खासियत रही कहीं भी रहे हों नायपॉल उपन्यास के शीर्षक की तरह उन्हें ‘माटी मेरे देश की’ पुनः-पुनः इस छत्तीसगढ़ की माटी में वापस ले ही आता रहा है. वह प्रदेश के उन चंद व्यक्तित्वों में शुमार रहे हैं, जिनके लिए यहां की माटी ‘यशोदा’ की तरह रही है. अपने पत्रकारीय दायित्वों के लिए दर्ज़नों देशों के भ्रमण के दौरान भी अंतर में उनके छत्तीसगढ़ ही रहा सदा. राष्ट्रीय अवसर पर भी भले ही अपनी पहचान स्थापित करने के उनके पास अनेक मौके रहे हों, लेकिन अंततः बार-बार अंचल की इसी धरती पर पुनः-पुनः वापस लौट कर छत्तीसगढ़ महतारी की सेवा को सतत अपने जीवन का साध्य बनाना उनके व्यक्तित्व का परिचय है. नय्यर जी से मिलना ना केवल पत्रकारिता बल्कि निश्चय ही सौजन्यता सीखना भी होता है. मूल्यों के स्खलन के इस कठिन समय में भी नय्यर जी वक्त को एक नयी करवट देने हेतु, ‘मजाज़’ के शब्दों में कहूँ तो- ज़माने से आगे चलते हुए ज़माने को आगे बढ़ाने के अपने उद्यम में अनवरत गतिशील, प्रयत्नशील हैं. प्रदेश में उनके द्वारा गढ़ी गयी पत्रकारिता की कई पीढ़ी उनका अनुसरण करने को तैयार है.
लेखक पंकज कुमार झा रायपुर से प्रकाशित ‘दीप कमल’ के संपादक हैं.












MUKESH AGRWAL
December 15, 2010 at 1:16 pm
लेखक पंकज कुमार झा भी किसी से कम नहीं है!
bablu tiwari
December 16, 2010 at 5:41 am
बहुत बढ़िया परिचय, पंकज जी आपको धन्यवाद.
आर.के. श्रीवास्तव
December 22, 2010 at 6:04 am
‘कहते है किसी भी जीवित व्यक्ति की तारीफ़ मत करो. हो सकता है कभी भी आपको अपने निर्णय पर विचार करना पड़ जाय.’ यह लिखा तो ठीक है पंकज जी। एक पत्रकार तो तटस्थ होकर, पूरी खोजखबर लेकर लिखता है। क्या आपने भी ऐसा ही किया?
पंकज झा.
December 22, 2010 at 6:31 pm
जी श्रीवास्तव जी. वैसे यह कोई व्यक्ति विशेष का प्रमाण पत्र है भी नहीं. अपन अधिकारी भी नहीं हैं किन्ही को सर्टीफिकेट देने का. बस आप इस लेख को अपनी पहली पीढ़ी को दी गयी आदरांजलि समझ सकते हैं…मुकेश जी और बबलू जी….आपको भी धन्यवाद.