छत्‍तीसगढ़ मीडिया की पहचान रमेश नय्यर जी

पंकजसमाचार माध्यमों खास कर इलेक्ट्रोनिक मीडिया में आपको किसी शहर या संस्थान को स्थापित करने के लिए उसकी पहचान वाले किसी विजुअल को दिखाना होता है. जैसे अगर बात भारत की हो तो चैनलों में सामान्यतः इंडिया गेट को दिखाया जाता है. किसी शहर को दिखाना हो तो वहां के रेलवे स्टेशन को दिखा कर आप उस शहर के बारे में बता सकते हैं. इसी तरह बात अगर छत्तीसगढ़ के मीडिया की की जाय तो निश्चित ही लगभग पांच दशक से प्रदेश के मीडिया में अपना सम्मानित जगह रखने वाले वरिष्टतम पत्रकार रमेश नय्यर को रखा जा सकता है. छोटे कद के बड़े आदमी नय्यर जी से मिलना ना केवल पत्रकारिता बल्कि सौजन्यता सीखना भी है. सन 1965 में शिक्षक की सरकारी एवं अपेक्षाकृत सुरक्षित नौकरी को छोड़ कर उस समय के पत्रकारिता के कंटकाकीर्ण मार्ग का अवलंबन करने वाले नय्यर जी आज तो इस विधा के चलते-फिरते पाठशाला के रूप में ही जाने जाते हैं.

माखनलाल : लाल ना रंगाऊं मैं हरी ना रंगाऊं

पंकज कुमार झासन 2001 की एक रात इस लेखक को तत्कालीन प्रधानमंत्री से साक्षात्कार का ‘अवसर’ मिला था. कैमरा टीम और पूरे ताम-झाम के साथ प्रधानमंत्री निवास पहुंच कर पहला सवाल पूछने से पहले ही नींद टूट गयी. लगा, सपने को सच करना चाहिए. पत्रकार बन जाना चाहिए. अखबार में माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय का विज्ञापन देखा तो दौड़ पड़ा सपना पूरा करने भोपाल. निम्न मध्यवर्गीय युवक का सपना. औसत विद्यार्थी का कुछ बड़ा सपना. एक दशक बीत जाने के बाद भी स्वप्न अधूरा है. लेकिन तबसे अब तक या उससे पहले भी इस संस्थान ने उत्तर भारतीय परिवारों से अपनी जेब में पुश्तैनी ज़मीन या घर के जेवरात बंधक रख कर लाये कुछ पैसे और सपने लेकर आने वालों को राह दिखाई है.