न्यूज चैनलों के पक्ष में खड़ी हुई भाजपा

: प्रेस की आजादी पर अपना नियंत्रण बनाना चाहती है सरकार : नई दिल्‍ली : न्यूज चैनलों के लाइसेंस नवीनीकरण पर हुए हाल के सरकारी फैसले से असहमति जताते हुए भाजपा ने स्पष्ट कर दिया है इसका हर मोर्चे पर विरोध किया जाएगा। पार्टी के वरिष्ठ नेता व राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष अरुण जेटली ने फैसले को राजनीति से प्रेरित करार देते हुए आगाह किया कि सरकार प्रेस की आजादी पर प्रहार न करे।

प्रेस हर तरह के प्रलोभन से बचे : प्रेस काउंसिल

प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया ने पांच राज्‍यों में होने जा रहे विधानसभा चुनाव को देखते हुए प्रेस के लिए कुछ दिशा-निर्देश जारी किए हैं. प्रेस काउंसिल ने कहा है कि प्रेस को राजनीतिक दलों या उम्‍मीदवारों की ओर से किसी तरह के प्रलोभन को स्‍वीकार नहीं करना चाहिए और चुनाव पूर्व सर्वेक्षण छापने में सावधानी बरतनी चाहिए.

जागरण ने एकतरफा फैसला दिया

[caption id="attachment_15334" align="alignleft"](खबर पढ़ने के लिए तस्वीर पर क्लिक करें)[/caption]मैं जरनैल सिंह को जानता हूं। जो कुछ उन्होंने किया, बेशक गलत था पर जिस प्रबंधन ने उन्हें दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंका, उसे कहीं से भी उचित नहीं ठहराया जा सकता। दैनिक जागरण प्रबंधन ने जहां तक संभव था, जरनैल का इस्तेमाल किया। जरनैल को याद होगा, जब वह जालंधर आए थे, विधानसभा चुनाव की कवरेज में। अकालियों के समर्थन में तैयार स्टोरी को किस दबाव में अकालियों के खिलाफ किया गया था, यह मैं भी जानता हूं। और जरनैल तो खैर भुक्तभोगी हैं ही। हम जिस पत्रकारिता में इन दिनों हैं, वहां फेस-वैल्यू सबसे अहम है। चिदंबरम की फेस-वैल्यू कांग्रेस आलाकमान ज्यादा मानता है। जब जरनैल ने चिदंबरम की ओर जूता उछाला था तो सन्न मैं भी रह गया था। पर, आप उसके बैकग्राउंड में जाकर देखें कि उसने ऐसा क्यों कर किया। बिना कारण जाने जरनैल को जो सजा मिली, वह उसके साथ ज्यादती है। सरकार ने तो कुछ नहीं किया, जागरण ने जरूर एकतरफा फैसला दे दिया। मैं नहीं मानता कि पत्रकारिता में अब शुचिता बची है। कहीं है भी, तो मैं नहीं देख पाता। संभवतः नेत्र रहते मैं अंधा हूं। पर, होती तो कहीं तो दिखती।

गैंग रेप, प्रेस, पुलिस, नेता और लोकतंत्र

फांस दिए तीन पत्रकार : सोनभद्र की तीन आदिवासी नाबालिग लड़कियों से सामूहिक बलात्कार की कवरेज करने वाले पत्रकार को मिली नौकरी से निलंबन और कोर्ट के चक्कर लगाते रहने की सजा। साथ में दो और पत्रकारों को पुलिस ने फांस दिया है। इतने संगीन मामले की लीपापोती में पुलिस, प्रेस और सत्ताधारी दल के नेता एक हो गए। महिला आयोग की भी भूमिका संदिग्ध रही। इस पूरे घिनौने खेल में उत्तर प्रदेश के राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त एक सीनियर आईपीएस की करतूत सबसे शर्मनाक रही। पुलिस के दबाव में पीड़ित लड़कियों के अनपढ़ और सीधे-सादे पिता को ही पीड़ित पत्रकारों के खिलाफ गवाह बना दिया गया। इस तरह पूरा वाकया ही उलट गया।