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साहित्य

हिंदी को मांजो.. रगड़ो.. बदलो.. और चला दो

: ‘हिंदी बदलेगी तो चलेगी’ विषय पर परिचर्चा : 12 मार्च की शाम, इंडिया हैबिटेट सेंटर के एम्पीथियेटर में हिन्दी को बदलने और बदल कर चलाने की फिक्र में हिन्दी जगत के सुधी पाठक, लेखक और शुभचिंतकों की जमात जमा हुई। कार्यक्रम की शुरुआत वैशाली माथुर की चंद लाइनों से हुई। वैशाली ने हिन्दी के ‘महानुभावों’ का स्वागत करते हुए कार्यक्रम का संचालन पेंगुइन हिन्दी के संपादक सत्यानंद निरुपम को सौंप कर अपना ‘पिंड’ छुड़ाया।

: ‘हिंदी बदलेगी तो चलेगी’ विषय पर परिचर्चा : 12 मार्च की शाम, इंडिया हैबिटेट सेंटर के एम्पीथियेटर में हिन्दी को बदलने और बदल कर चलाने की फिक्र में हिन्दी जगत के सुधी पाठक, लेखक और शुभचिंतकों की जमात जमा हुई। कार्यक्रम की शुरुआत वैशाली माथुर की चंद लाइनों से हुई। वैशाली ने हिन्दी के ‘महानुभावों’ का स्वागत करते हुए कार्यक्रम का संचालन पेंगुइन हिन्दी के संपादक सत्यानंद निरुपम को सौंप कर अपना ‘पिंड’ छुड़ाया।

सत्यानंद निरुपम ने माइक थामते ही एक ‘सत्यनुमा’ सवाल दागा या यूं कहें कि एक बयान दे डाला कि – ‘हिंदी जैसे चल रही है, वैसे नहीं चल सकती।’ दूसरी बात उन्होंने कही कि हिन्दी के साथ कई दिक्कतें हैं, जिन्हें दूर किया जाना चाहिए। सत्यानंद निरुपम के मुताबिक हिंदी के सबसे बड़े हितैषी अकादमिक क्षेत्र के लोग हैं। इसके साथ ही उन्होंने इस बात पर भी चिंता जाहिर की कि हिन्दी में कोई ऐसी पत्रिका क्यों नहीं जिसे एक लाख लोग खरीद कर पढ़ते हों। परिचर्चा के दौरान बीच-बीच में निरुपम कुछ ऐसे ही ‘तराने’ छेड़ते रहे जिससे ‘हिन्दी मन’ उद्वेलित होता रहा। जाहिर है उनके हर बयान से सहमति और असहमति दोनों की पर्याप्त गुंजाइश थी और शायद यही निरुपम का मकसद भी था। बहस चल निकली और बड़ी गर्मजोशी के साथ चलती रही।

दिल्ली विश्वविद्यालय के व्याख्याता आशुतोष कुमार ने पहली पंक्ति में हिन्दी साहित्य का हिन्दी समाज से रिश्ता तोड़ डाला। उनकी माने तो अब साहित्य और समाज में वो जान-पहचान नहीं रही, जो इस भाषा की जान भी थी और पहचान भी। इसके लिए उन्होंने रामचंद्र शुक्ल के हिन्दी साहित्य के इतिहास को अकादमिक क्षेत्र का बुनियादी ग्रंथ बनाए जाने को जिम्मेदार ठहराया। आशुतोष कुमार के मुताबिक रामचंद्र शुक्ल के इतिहास ने खड़ी बोली की परंपरा को हिन्दी के इतिहास से बाहर निकाल दिया। दूसरी तरफ बोलियों के ‘क्लासिकल’ साहित्य को इतिहास में समाहित किया, लेकिन आधुनिक साहित्य को सिरे से खारिज कर दिया। इससे हिन्दी भाषा की रवानगी और उसका सहज विकास बाधित हुआ। इसके साथ ही आशुतोष ने अखबारी हिन्दी में ‘ग्लोबिश भाषा’ के बनते या बिगड़ते स्वरूप को समझने और गंभीरता से देखने की जरूरत पर जोर दिया। उनका धाराप्रवाह विचार कुछ देर और प्रवाहित हो सकता था लेकिन निरुपम ने ‘रुकावट के लिए खेद है’ के अंदाज में दखल दे दिया।

इसके बाद बारी लेखिका नूर जहीर की आई। नूर ने भाषा को मजहब से जोड़ने को लेकर अपनी चिंता जाहिर की। उन्होंने कहा कि मजहब के साथ जुड़कर दोनों ही भाषाओं का नुकसान हुआ है। आज दोनों भाषाओं के पैरोकार अंग्रेजी के करीब जाने में हिचक महसूस नहीं करते लेकिन एक-दूसरे से ‘भाषाई दुश्मनी’ बखूबी निभा रहे हैं। उन्होंने कहा कि उर्दू जबान में ‘सेक्रेटरी’ का इस्तेमाल तो हो सकता है लेकिन ‘सचिव’ से तौबा कर ली गई है। हालांकि उन्होंने इसके लिए ‘राजनीति’ से ज्यादा व्यक्तिगत ‘ईगो’ को जिम्मेदार बताया।

आयोजन

कवयित्री अनामिका ने अपने छोटे से भाषण में प्रेशर कुकर की एक सीटी में पकने वाली ‘भाषा की खिचड़ी’ सिझाई और उसे सुपाच्य बना कर लोगों के गले से नीचे ‘ससार’ दिया। उन्होंने कहा कि हिन्दी में जितने भी भाषा के शब्द ‘फेंटे’ जा सकते हैं, फेंटे जाने चाहिए। उन्होंने अपने वक्तव्य में भी ‘टुईयां’, ‘ठस्सा’ और ‘धड़का’ जैसे शब्द फेंटे और भाषा की ताकत का एहसास कराया। सबसे अच्छी बात ये रही कि उन्होंने भाषा को लेकर, बोली को लेकर मन का ‘धड़का’ खत्म करने की वकालत की। वाकई अगर ये धड़का खत्म हो गया तो फिर हिन्दी और हिन्दीवालों की कई सारी दिक्कतें खुद-ब-खुद हल हो जाएंगी।

‘सराय’ के साथ लंबे वक्त से जुड़े रविकांत ने हिन्दी भाषा की शब्दावली को लेकर अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि कंप्यूटर जैसे नए क्षेत्रों के लिए अपनी जबान की शब्दावली होनी ही चाहिए। उन्होंने ‘इनबॉक्स’ के लिए ‘आई डाक’ और ‘आउट बॉक्स’ के लिए ‘गई डाक’ जैसे शब्द बनाने, तलाशने और तराशने के अपने अनुभव साझा किए। हालांकि दीर्घा में मौजूद फिल्मकार के विक्रम सिंह को उनका ये प्रयोग ‘दकियानूसी’ लगा। के विक्रम सिंह ने ये सवाल उठाया कि आखिर हिन्दी वालों को ‘इन बॉक्स’ और ‘आउट बॉक्स’ से परेशानी क्यों होती है? जाहिर है, विक्रम सिंह जैसे लोगों का एक वर्ग है जो ये मानता है कि अगर चलने के लिए हिन्दी को बदलना है तो उसे ऐसे ‘शब्दों’ या ‘बदलावों’ से परहेज क्यों?

आखिर में हिन्दी के ‘एलिट’ मीडियाकर्मी रवीश कुमार ने ‘हिन्दी में अंग्रेजी झाड़ने’ का अपना अनुभव भी साझा किया और मीडिया में हिन्दी को बतौर भाषा बरतने को लेकर अपनी चिंता भी जाहिर भी की। ‘जापान में कुदरत का डबल अटैक’ जब टेलीविजन की स्क्रीन पर नजर आता है तो हिन्दी जबान और उसकी संवेदनात्मक, भावात्मक अभिव्यक्ति की क्षमता को भी ‘दिल का डबल अटैक’ पड़ता है, लेकिन ये बात कोई समझने को तैयार नहीं। ‘माइग्रेशन’ के साथ भाषा में बन रही खिचड़ी का सौंधापन रवीश कुमार को भी पसंद है लेकिन जब ये भाषा ‘संघर्ष’ के बजाय ‘समझौते पर समझौते’ करने लगती है तो उनका मन कहीं कचोटता जरूर है।

मंच पर आसीन ‘महानुभावों’ के बोल चुकने के बाद दीर्घा में बैठे महानुभावों की बारी आई। इनमें वरिष्ठ पत्रकार अजीत राय की टिप्पणी विशेष तौर पर उल्लेखनीय है। अजीत राय का दर्द ये है कि हिन्दी में नाट्य समीक्षा, फिल्म समीझा की कोई कद्र नहीं है। इसके साथ ही वो ये कहना भी नहीं भूलते- “अगर मैंने हिन्दी में किए अपने काम की तुलना में 5 फीसदी काम भी अंग्रेजी में किया होता तो आज यहां नहीं होता… आज आपका भाषण नहीं सुन रहा होता… कहीं और होता…।” हिन्दी वाले की ‘कहीं ओर चले जाने की ललक’ भी लगता है हिन्दी का थोड़ा बहुत नुकसान तो कर ही रही है।

खैर! बहस दो जाम साथ लगाने की अर्जी के साथ खत्म हो गई। एक जाम शायद उस सवाल के नाम की, जब बहस हिन्दी पर हो रही है तो मंच के पीछे लगे बोर्ड पर हिन्दी का कोई शब्द क्यों नहीं? और दूसरा जाम ‘बदलने का सबक’ सीखने के लिए। आखिर अंग्रेजी के साथ चलने के लिए हिन्दी को कुछ नए ‘दस्तूर’ भी तो सीखने होंगे। वरना हिन्दी पट्टी में किसी संगोष्ठी के बाद खुले तौर पर जाम का न्यौता कहां मिल पाता है?

पशुपति शर्मा की रिपोर्ट.

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