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हिंदी को क्यों नहीं मिलते होलटाइमर

अमिताभ मुझे वह लेखक बता दो हिंदी का, जो सिर्फ लिखता है और उसी पर खा-जी रहा है. मुझे उस हिंदी लेखक से मिला दो, जो आईएएस, आईपीएस, इनकम टैक्स अधिकारी या बैंक का अधिकारी या कर्मचारी, रेलवे विभाग, डाक विभाग, म्युनिसिपेलिटी में सेवा नहीं कर रहा है या किसी प्राइवेट सेक्टर में बड़े या छोटे ओहदे पर नहीं है. और इन सबसे पहले वह विश्वविद्यालय, कॉलेज, स्कूल या ऐसे ही किसी भी शिक्षण या अध्ययन संस्थान में नहीं है. जी हाँ साथियों, ये नहीं हुए तो महाशय या महाशया किसी बड़े या छोटे अखबार और मैगजीन में होंगे ही. नहीं कुछ तो वह ऐसा नेता तो जरूर ही होगा, जिसके अन्दर मेरी ही तरह हिंदी साहित्यकार बनने का कीड़ा नहीं काट रहा हो.

अमिताभ मुझे वह लेखक बता दो हिंदी का, जो सिर्फ लिखता है और उसी पर खा-जी रहा है. मुझे उस हिंदी लेखक से मिला दो, जो आईएएस, आईपीएस, इनकम टैक्स अधिकारी या बैंक का अधिकारी या कर्मचारी, रेलवे विभाग, डाक विभाग, म्युनिसिपेलिटी में सेवा नहीं कर रहा है या किसी प्राइवेट सेक्टर में बड़े या छोटे ओहदे पर नहीं है. और इन सबसे पहले वह विश्वविद्यालय, कॉलेज, स्कूल या ऐसे ही किसी भी शिक्षण या अध्ययन संस्थान में नहीं है. जी हाँ साथियों, ये नहीं हुए तो महाशय या महाशया किसी बड़े या छोटे अखबार और मैगजीन में होंगे ही. नहीं कुछ तो वह ऐसा नेता तो जरूर ही होगा, जिसके अन्दर मेरी ही तरह हिंदी साहित्यकार बनने का कीड़ा नहीं काट रहा हो.

मैं यह नहीं कहना चाह रहा हूँ कि ऊपर बताये गए किसी भी प्रोफेशन से ताल्‍लुक रखने वाला आदमी हिंदी का लेखक नहीं होना चाहिए और इसमें किसी प्रकार के कुछ भी गलत है. मैं यह भी नहीं कहना चाहता कि हिंदी के लेखक को इतना गया-बीता या एकाकी होना चाहिए या उसकी सीमाएं इस प्रकार से तय कर देनी चाहिए कि ना तो वह कोई दूसरा काम करने लायक हो और ना ही समाज से जुड़ा कोई अन्य कार्य करे. मैं तो बस वही प्रश्न उठा रहा हूँ जिससे रूबरू सारे हिंदी वाले हैं, पर जिस पर अक्सर चर्चा नहीं होती. यानी कि ऐसा क्या है जिसके कारण आज के समय कोई आदमी यह नहीं सोचता कि मैं सिर्फ हिंदी का लेखक रहूँगा और उसी में अपना सम्पूर्ण ध्यान केन्द्रित करते हुए अपने आप को स्थापित भी करूंगा, अपने लिए एक अच्छी जीविका की व्यवस्था भी करूंगा और अपना अच्छा जीवन हिंदी की सेवा करते हुए व्यतीत करूंगा?

यह क्यों है कि यदि किसी लड़के या लड़की ने आ कर अपने माँ-बाप से कह दिया कि मैं तो आगे चल कर पूर्ण-कालिक हिंदी लेखक/लेखिका बनूंगा/बनूँगी तो उसके माँ-पिता लगभग बेहोश से हो जायेंगे, क्रोधित हो जायेंगे, बच्चे को या तो समझाने लगेंगे या डांट-फटकार लगायेंगे. खुश तो कत्तई नहीं होंगे. यदि उनकी संतान पहले से ही पढ़ने-लिखने से वास्ता नहीं रखती तब तो फिर भी गनीमत है, पर यदि खुदा न खास्ते मेधावी है तो उन पर मानो बज्रपात सा हो जाएगा और वे भगवान को इस भारी अनर्थ के लिए कोसने लगेंगे. यदि संतान फिर भी अपनी बात पर अडिग रही तो धीरे-धीरे कर के उसके प्रति विमुख हो जायेंगे और दूसरे बच्चों पर अपना ध्यान केन्द्रित करने लगेंगे. इसके विपरीत आस-पड़ोस वाले यह जानकारी पा कर प्रसन्‍न हो जायेंगे कि चलो अच्छा है, गई भैंस पानी में.

प्रश्न यही है कि ऐसी क्या स्थितियां हैं, ऐसे क्या कारक है और ऐसा क्या ताना-बाना है जो हिंदी लेखन और हिंदी लेखकों को इन हालातों में डाल देता है. इस के अलग यदि वही संतान यह कहे कि मैं तो अंग्रेजी का पूर्ण-कालिक लेखक बनूंगा तो शायद माँ-बाप उस बात को उतना अन्यथा नहीं लें. उन्हें नज़र आयेंगे अरुंधति रॉय, सलमान रुश्दी, विक्रम सेठ, वी एस नायपाल, अमिताभ घोष और अन्य कई नाम जो सिर्फ और सिर्फ लेखक हैं और बड़े मजे का जीवन जी रहे हैं. यदि विश्व फलक की बात करें तो ऐसे नामों कि संख्या सैकड़ों नहीं हज़ारों में होगी जो सिर्फ और सिर्फ लेखक हैं, और कुछ नहीं, सिडनी शेलडन, एनिड ब्लाईटन, डैनियल स्टील, जे के रालिंग, जैकी कॉलिन्स, स्टेफेन किंग ये तो चंद ऐसे नाम हैं जो पूरी दुनिया में मशहूर हैं. यदि छोटे-बड़े सारे गिने जाएँ तो संख्या वास्‍तव में काफी होगी.

विकीपीडिया पर उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार विश्व में यदि चौरासी करोड़ लोग मंदारिन भाषा बोलते है तो अंग्रेजी 35 करोड़ के करीब. संख्यात्मक तौर पर हम कोई बहुत कमजोर नहीं ठहरते, क्योंकि संसार में हिंदी बोलने वालों की संख्या भी लगभग 18 करोड़ है. हिंदी में पाठकों की कमी हो यह बात वैसे भी सही नहीं जान पड़ती. हिंदी अखबार और पत्रिकाएं इस बात का गवाह हैं. हिंदी पाठक आपको देहात से शहर तक दिख जायेंगे.

इन हालातों में मुझे तो सिर्फ दो या तीन ही ऐसे कारण दिखते हैं जो हिंदी लेखन पर भारी पड़ रही है. सबसे पहला है प्रकाशकों की नीतियाँ और उनकी सोच. नीति इस रूप में कि एक आम चलन हो गया है हिंदी पुस्तकों को मात्र सरकारी और अर्ध-सरकारी खरीदों के जरिये निकालने का. यह ऐसा धंधा है जो सबों को ठीक दिखता है. अधिकारी प्रसन्न हैं क्योंकि अच्छा पैसा बन जा रहा है, प्रकाशक खुश है क्योंकि वह किताबों के अनाप-शनाप दाम रख कर उन्हें बेच रहा है और उसी में कमीशन देने पर भी उसे भारी बचत हो रही है, कहीं भागना-दौड़ना नहीं पड़ रहा है. दूसरी  बात जो इसी से जुड़ी है वह है किताबों के भारी दाम रखना. हिंदी क्षेत्र अपेक्षाकृत गरीब है, यहाँ खरीद की ताकत सीमित है, ऐसे में यदि प्रकाशक वास्तव में चाहता है कि पाठक सीधे उसकी पुस्तकें खरीदे और पढ़ें तो इन किताबों की कीमत सही आंकनी होगी. यह बहुत जरूरी है और हिंदी पुस्तकों के समुचित प्रसार के लिए आवश्यक. तीसरी बात बेईमानी की है. मैंने पढ़ा था कि कुछ साल पहले निर्मल वर्मा या उनसे जुड़े लोगों ने अपने प्रकाशकों पर किताबें बेच कर रॉयल्टी के पैसे नहीं देने का आरोप लगाया था. मैं मानता हूँ यह बात पूरी सच रही होगी और यदि निर्मल वर्मा जैसे नामचीन लेखक के साथ ऐसा हो सकता है तो जाहिर है किसी के भी साथ हो सकता है.

एक-दो बातें लेखकों से जुडी. यह हम सभी जानते हैं कि हिंदी के लेखक विद्वतजन हैं पर उन्हें यह बात समझनी होगी कि लेखक और पाठक का रिश्ता कुछ-कुछ मास्टर और स्टूडेंट का होता है. आप जो सोच रहे हैं, जो लिख रहे हैं वह पाठकों की समझ में भी आये, ऐसा होना चाहिए. ऐसा नहीं हो कि आप का लेवल इतना ऊंचा हो कि आम पाठक आपसे अपने-आप को पूरी तरह कटा महसूस करें. जब तालमेल ही नहीं बैठेगा तो वह भला पढ़ेगा क्या और क्यों? यह एक ऐसी प्रवृति है जो हिंदी साहित्य में विशेष कर दिख पड़ती है.

विद्वता के प्रबल आवेग में ऐसा लिखा जा रहा है जो अंत में तुलसी की “स्वान्तः सुखाय रघुनाथ गाथा” का मूर्त  स्वरुप ले ले रही है. जो परिभाषा लोकतंत्र के लिए लिंकन ने दी थी- “जनता का, जनता के लिए, जनता के द्वारा”, थोड़ी-बहुत वह प्रवृत्ति हिंदी साहित्य में भी दिखनी ही चाहिए. अन्यथा दूरी इतनी बड़ी है कि जब मेरे जैसा स्वयं को विद्वान (जी हाँ मैं मानता हूँ कि मैं काम भर विद्वान् हूँ और इसकी सार्वजनिक घोषणा भी करता हूँ) मानने वाला व्यक्ति भी इनमें से तमाम कविताओं, कहानियों और उपन्यासों को शुरू करते ही बंद कर देता है कि साले काफी झेलाऊ हैं, तो आप सोच सकते हैं औसत पाठक का क्या होता होगा. मैं नहीं कहता मैंने इन कुछ शब्दों में हिंदी साहित्य के इस आयाम से सम्बंधित सारा ज्ञान उड़ेल दिया हो, पर ये महत्वपूर्ण कारण हैं, मैं ऐसा तब तक मानता रहूंगा जब तक मैं गलत नहीं साबित कर दिया जाऊं.

लेखक अमिताभ ठाकुर पुलिस अधिकारी हैं. इन दिनों अवकाश लेकर शोध, लेखन और घुमक्कड़ी के काम में व्यस्त हैं.

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0 Comments

  1. sikanderhayat

    November 16, 2010 at 9:02 am

    ma koshis kar rha ho sir purnkalik lekhak banne ki kuoki muge bivi bachoo parivar cariyar daulat shohrat ma koi dilchaspi nahi ha sirf ek sapna ha kisi tarah kalam ki thakat se bhartiye samajwad ko jinda karna ki gaas khakar bi ham apni koshis jari rakhege

  2. dhanish sharma

    November 17, 2010 at 4:56 am

    hindi valo main hole hai.par time nai.

  3. dhanish sharma

    November 17, 2010 at 4:57 am

    apki baat main hai dum sir…

  4. saurabh Mishra

    November 17, 2010 at 5:09 pm

    आज का समाज(भारत ) आधुनिकता में डूबा जा रहा है ,मै नहीं कहूँगा की वो ऐसा न करे ,अगर हम ऐसा नहीं करते है तो हम बहुत पीछे रह जायेंगे ,अगर हम वेस्टर्न कल्चर नहीं अपनायेगे तो शायद हम विश्व के उन देशो से कभी मुकाबला नहीं कर पाएंगे जो अपने कल्चर को आगे बढ़ा रहे है और हम पीछे रह जायेंगे | चलिए ये बाते तो सच थी लेकिन अगर हम अमरीका ,ब्रिटेन जैसे देशो की कॉपी कर रहे है तो मै कहूँगा की हमें नक़ल भी करने नहीं आती हम तो सिर्फ उनका कल्चर का ही नक़ल कर पा रहे है जरा सोचिये की वो क्या कर रहे है सच में देखे तो वो अपने कल्चर को उसी दिशा में आगे बढ़ा रहे है जिस दिशा में वो थे और हमें नक़ल भी नहीं करने आता हम तो उस तरह नक़ल कर रहे है जिस प्रकार एक विद्याथी अपनी पारीछा में एक किताब से नक़ल करता है और उत्तर की जगह ये लिख देता है की इस प्रश्न का उत्तर पेज नंबर ४५ पर देखे | सुनने में जरुर अजीब सी लगे मेरी बात लेकिन सच यही है और सच कडवा होता है | अंग्रेजी से दूर मत रहो लेकिन हिंदी को मत भूलो यही हमारी कामना है |
    अंत में यही कहूँगा की भावनाओ में जीने से अच्छा है जो सच है उसमे जिओं

  5. मदन कुमार तिवा्री

    November 17, 2010 at 5:14 pm

    अमिताभ जी आपने दुखती रग पर हाथ रखा है। आम जन तक अपनी बात या विचार को पहुंचाने के लिये हिंदी का सरल उपयोग जरुरी है। मैं आपसे सहमत हुं और एक सुझाव भी देना चाहता हुं । आप जैसे लोगों को आगे आकर एक नई शुरुआत पत्रिका निकालने से करनी चाहीये मैने यशवंत जी को भी यह कहा है । प्रकाशक और ्शोषण करने वाले मीडिया समुहों से लडने और पत्रकारों को हक देने के लिये आज वैसे संस्थानों की जरुरत है जिनका संचालक कोई संवेदनशील पत्रकार हो।

  6. प्रमोद वाजपेयी

    November 25, 2010 at 9:33 am

    अमिताभ जी ने अपने आलेख में जिन बिन्दुओं का उल्लेख किया है उनसे कोई असहमत नहीं हो सकता।मात्र लेखन को जीविकोपार्जन का साधन बनाने वाले लोग हिन्दी जगत में विरले ही होंगे।
    इसका कारण शायद यह भी है कि हमारे “विद्वान” लेखकों को हिन्दी भाषा, व्याकरण एवं वर्तनी का सम्यक ज्ञान नहीं है। वह दूसरी भाषाओं से शब्द आयात करने में अक्सर गलती करते हैं।
    फारसी में शब्द ‘हाल’ का बहुवचन होता है ‘हालात’ किन्तु “विद्वान” लेखक उसे ‘हालातों’ लिखते हैं। इसी प्रकार हिन्दी में ‘बन जाता है’ अथवा ‘बन रहा है’ को “विद्वान” लेखक ‘बन जा रहा है’ लिखें तो कोई क्या कर लेगा…..

  7. akhilesh thakur

    November 25, 2010 at 12:16 pm

    amitabh ji, vakai aaj kal koi hindi me likhkar roji nahi chala sakta. kahne ko hindi kavi sammalen hote hai. mager usme khati hindi kavi aaj tak nahi dikha. hindi kam hasod jayada dikhte hai.

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