विस्मयकारी है आलोक मेहता का कथन

एसएन विनोद: पत्रकारिता नहीं, पत्रकार बिक रहे-3 : नई दुनिया के आलोक मेहता की आशावादिता और दैनिक भास्कर के श्रवण गर्ग का सवाल चिन्हित किया जाना आवश्यक है। आलोक मेहता का यह कथन कि ”पेड न्यूज कोई नई बात नहीं है, लेकिन इससे दुनिया नष्ट नहीं हो जाएगी”, युवा पत्रकारों के लिए शोध का विषय है। निराशाजनक है। उन्हें तो यह बताया गया है और वे देख भी रहे हैं कि ‘पेड न्यूज’ की शुरुआत नई है।

हाल के वर्षों में, विशेषत: चुनावों के दौरान, इसकी मौजूदगी देखी गई है। पहले ऐसा नहीं होता था। आश्चर्य है कि एक ओर जब मीडिया घरानों के इस पतन पर अंकुश के उपाय ढूंढऩे के गंभीर प्रयास हो रहे हैं, पत्रकारीय मूल्यों और विश्वसनीयता के रक्षार्थ संघर्षरत पत्रकार और इससे जुड़े लोग आंदोलन की तैयारी में हैं, आलोक मेहता कह रहे हैं कि इससे दुनिया नहीं नष्ट हो जाएगी। विस्मयकारी है उनका यह कथन।

दुनिया नष्ट होगी या नहीं इसकी भविष्यवाणी तो नहीं की जा सकती किन्तु अगर ‘पेड न्यूज’ का सिलसिला जारी रहा तो वह दिन दूर नहीं जब मीडिया की पवित्र दुनिया अवश्य नष्ट हो जाएगी। पत्रकारीय ईमानदारी, मूल्य, सिद्धांत व सामाजिक सरोकारों के प्रति समर्पण की आभा से युक्त चेहरे गुम हो जाएंगे, नजर आएंगे तो सीने पर कलंक का तमगा लगाए दागदार स्याह चेहरे। इनकी गिनती मीडिया की दुनिया के नुमाइंदों के रूप में नहीं होगी। ये पहचाने जाएंगे रिश्वतखोर के रूप में, दलाल के रूप में और समाज-देशद्रोही के रूप में। निश्चय ही तब पत्रकारीय दुनिया नष्ट हो जाएगी।

वैसे आलोक मेहता समाज पर भरोसा रखने की बात अवश्य कहते हैं लेकिन जब सामाजिक सरोकारों से दूर पत्रकार धन के बदले खबर बनाने लगें, अखबार ‘मास्ट हेड’ से लेकर ‘प्रिन्ट लाइन’ तक के स्थान बेचने लगें, बल्कि नीलाम करने लगें, संपादक पत्रकारीय दायित्व से इतर निज स्वार्थ पूर्ति करने लगें, मालिक ‘देश पहले’ की भावना को रौंद कर सिर्फ स्वहित की चिंता करने लगें तब समाज हम पर भरोसा क्यों और कैसे करेगा? सभी के साथ गुड़ी-गुड़ी और खबरों में बने रहने के लिए सार्वजनिक मंचों से अच्छे-अच्छे शब्दों का इस्तेमाल समाज के साथ छल है। पेशे के साथ छल है। कर्तव्य और अपेक्षित कर्म के विपरीत ऐसा आचरण पवित्र पत्रकारिता के साथ बलात्कार है। कम से कम पत्रकार, वरिष्ठ पत्रकार, कर्म और वचन में समान तो दिखें।

‘दैनिक भास्कर’ के श्रवण गर्ग ने आशंका व्यक्त की है कि ‘पेड न्यूज’ का मामला उठाकर कुछ दबाने की कोशिश की जा रही है। पूरे मीडिया जगत पर यह एक अत्यंत ही गंभीर आरोप है। इसका खुलासा जरूरी है। बेहतर हो गर्ग स्वयं खुलकर बताएं कि ‘पेड न्यूज’ की आड़ में मीडिया क्या दबा रहा है। श्रवण गर्ग ने एक विस्मयकारी सवाल यह उठाया है कि अगर आज देश में आपातकाल लग जाए तो हमारी भूमिका क्या रहेगी। विचित्र सवाल है यह। निश्चय ही गर्ग का आशय इंदिरा गांधी के आंतरिक आपातकाल से है।

आश्चर्य है कि उन्हें यह कैसे नहीं मालूम कि संविधान में संशोधन के बाद 1975 सरीखा कुख्यात आपातकाल लगाया जाना अब लगभग असंभव है। थोड़ी देर के लिए गर्ग के इस काल्पनिक सवाल को स्वीकार भी कर लिया जाए तो मैं जानना चाहूंगा कि वे पत्रकारों की भूमिका को लेकर शंका जाहिर कर रहे हैं तो क्यों? अगर गर्ग का इशारा उस कड़वे सच की ओर है जिसने तब के आपातकाल के दौरान अधिकांश पत्रकारों को रेंगते हुए देखा है, तब मैं चाहूंगा कि गर्ग उन पत्रकारों की याद कर लें जिन्होंने खुलकर आपातकाल का विरोध किया था, रेंगना तो दूर तब की शक्तिशाली प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सत्ता को सड़कों-चौराहों तक पर चुनौती दी थी और 19 महीने तक जेलों में बंद रहे। संख्या में कम होने के बावजूद उन पत्रकारों ने पत्रकारीय दायित्व और मूल्यों को मोटी रेखा से चिन्हित कर दिया था। उनमें से अनेक आज भी सक्रिय हैं। गर्ग उनसे मिल लें, उनके सवाल का जवाब मिल जाएगा।

उनकी एक अन्य जिज्ञासा तो और भी विस्मयकारी है। समझ में नहीं आता कि श्रवण ने यह कैसे पूछ लिया कि हम आज आपातकाल में नहीं जी रहे हैं क्या? पत्रकारिता के विद्यार्थी निश्चय ही अचंभित होंगे। किस आपातकाल की ओर इशारा कर रहे हैं गर्ग? सीधा-सपाट उत्तर तो यही होगा कि आपातकाल की स्थिति में न तो वाणी, न ही कलम गर्ग की तरह बोलने व लिखने के लिए आजाद होती। एक अवसर पर श्रवण गर्ग, अप्रत्यक्ष ही सही, ‘पेड न्यूज’ का समर्थन कर चुके हैं। कुछ दिनों पूर्व दिल्ली में युवा पत्रकारों के एक समूह को संबोधन के दौरान उन्होंने ‘पेड न्यूज’ के पक्ष में सफाई देते हुए कहा था कि आर्थिक मंदी के दौर में मीडिया घरानों ने इसका सहारा लिया था। अपने तर्क के पक्ष में उन्होंने शाकाहारी उस व्यक्ति का उदाहरण दिया था जो राह भटक जाने के बाद भूख की हालत में उपलब्ध मांस खाने को तैयार हो जाता है। इससे बड़ा कुतर्क और क्या हो सकता है।

सभी जानते हैं कि ‘पेड न्यूज’ की शुरुआत तब हुई थी जब देश में आर्थिक मंदी जैसा कुछ भी नहीं था। अखबारों ने निर्वाचन आयोग द्वारा उम्मीदवारों के लिए निर्धारित चुनावी खर्च की सीमा को चकमा देने के लिए उम्मीदवारों के साथ मिलकर ‘पेड न्यूज’ का रास्ता निकाला था। जाहिर है कि इसका सारा लेन-देन ‘नंबर दो’ अर्थात् कालेधन से हुआ। दो नंबर की कमाई से अपना घर भरने वाले राजनीतिकों की चर्चा व्यर्थ होगी, ऐसे काले धन के लेन-देन को प्रोत्साहित करने वाले पत्र और पत्रकारों को इस पवित्र पेशे में रहने का कोई हक नहीं। स्वयं नैतिकता बेच दूसरों को नैतिकता नहीं सिखाई जा सकती। यह तो ऐलानिया बेईमानों को संरक्षण-प्रश्रय देना हुआ। निश्चय ही यह पत्रकारिता नहीं है। ईमानदार, पवित्र पत्रकारिता तो कतई नहीं!

…जारी…

लेखक एसएन विनोद वरिष्ठ पत्रकार हैं.

सत्य वचन नहीं है राहुल देव का कथन

एसएन विनोद: पत्रकारिता नहीं, पत्रकार बिक रहे-2 : यह ठीक है कि आज सच बोलने और सच लिखने वाले उंगलियों पर गिने जाने योग्य की संख्या में उपलब्ध हैं। सच पढ़-सुन, मनन करने वालों की संख्या भी उत्साहवर्धक नहीं रह गई है। समय के साथ समझौते का यह एक स्याह काल है। किन्तु यह मीडिया में मौजूद साहसी ही थे जिन्होंने सत्यम् घोटाले का पर्दाफाश कर उसके संचालक बी. रामलिंगा राजू को जेल भिजवाया।

आईपीएल घोटाले का पर्दाफाश भी मीडिया के इसी साहसी वर्ग ने किया। आईपीएल को कारपोरेट जगत से जोड़ कर ही देखा जा रहा है। इसमें राजनेताओं के साथ-साथ ललित मोदी और उद्योगपति शामिल हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था को खतरनाक रूप से नुकसान पहुंचाने वाले कालेधन के इस्तेमाल के आरोप आईपीएल की टीमों में निवेश करने वालों पर लग रहे हैं। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जब मीडिया ने कारपोरेट जगत के गोरखधंधों का पर्दाफाश किया है, इसलिए राजदीप सरदेसाई की बातों से पूरा सहमत नहीं हुआ जा सकता। कारपोरेट को एक्सपोज नहीं करने के पीछे की ताकतों के सामने समर्पण करने या रेंगने वाले पत्रकार निज अथवा किसी अन्य के स्वार्थ की पूर्ति करते हैं। पत्रकारीय मूल्यों का सौदा करने से ये बाज नहीं आते।

विडम्बना यह है कि ऐसे पत्रकार रसूखदार हैं, व्यापक सम्पर्क वाले हैं। बड़ी संख्या है इनकी। अपनी संख्या और प्रभाव के बल पर ईमानदार, साहसी पत्रकारों की आवाज को ये दबा देते हैं। चूंकि इनकी मौजूदगी प्राय: सभी बड़े मीडिया संस्थानों में उच्च पदों पर है, ये अपनी मनमानी करने में सफल हो जाते हैं। राजदीप की यह बात बिल्कुल सही है कि आज के युवाओं में काफी संभावना है लेकिन जब वह देखता है कि उसके ‘रोल माडल्स’ गलत हैं तो वह कुछ समझ नहीं पाता। नि:संदेह आज के युवा पत्रकारों में वह चिंगारी मौजूद है जिसे अगर सही दिशा में सही हवा मिल गई तो वह आग का रूप धारण कर इन कथित ‘रोल माडल्स’ को जला कर भस्म कर देगी। अब यक्ष प्रश्न यह कि इस वर्ग को ऐसी ‘हवा’ उपलब्ध करवाने के लिए कोई तैयार है?

पिछले दिनों राजनेताओं और कार्पोरेट जगत के बीच सक्रिय देश की सबसे बड़ी ‘दलाल’ नीरा राडिया के काले कारनामों को मीडिया के एक वर्ग ने उजागर किया था। इस दौरान मीडिया के 2 बड़े हस्ताक्षर बरखा दत्त और वीर सांघवी के नाम भी राडिया के साथ जोड़े गए। दस्तावेजी सबूतों से पुष्टि हुई कि बरखा और वीर ने अपने संपर्कों के प्रभाव का इस्तेमाल कर दलाल राडिया के हित को साधा। एवज में इन दोनों को राडिया ने ‘खुश’ किया। बरखा और वीर दोनों युवा पत्रकारों के ‘रोल माडल’ हैं। भारत सरकार के पद्म अवार्ड से सम्मानित इन पत्रकारों के बेनकाब होने के बाद भी बड़े अखबारों और बड़े न्यूज चैनलों की चुप्पी से पत्रकारों का युवा वर्ग स्वयं से सवाल करता देखा गया। वे पूछ रहे थे कि मीडिया ने बरखा व वीर के कारनामों को वैसा स्थान क्यों नहीं मिला जैसा ऐसे समान अपराध के दोषी अन्य दलालों को मिलता आया है। मीडिया के इस दोहरे चरित्र से युवा वर्ग संशय में है।

मीडिया यहीं चूक गया। अवसर था जब युवा वर्ग में मौजूद चिंगारी को हवा दे उस आग को पैदा किया जाता जो बिरादरी में मौजूद काले भेडिय़ों को तो झुलसा देती किन्तु व्यापकता में मीडिया तप कर कुन्दन बन निखर उठता। यह तो एक उदाहरण है, ऐसे अवसर पहले भी आए हैं और आगे भी आएंगे जब मीडिया की परीक्षा होगी। राहुल देव कार्पोरेट सेक्टर की ताकत के सामने असहाय दिखे। मीडिया को कार्पोरेट सेक्टर का प्राकृतिक हिस्सा निरूपित करते हुए राहुल देव यह मान बैठे हैं कि मीडिया चाह कर भी इससे बाहर नहीं निकल सकता।

राहुल देव का यह निज अनुभव आधारित मन्तव्य हो सकता है किन्तु यह पूर्ण सत्य नहीं है। हिन्दी के सर्वाधिक प्रसारित 2 बड़े अखबार ‘दैनिक जागरण’ व ‘दैनिक भास्कर’ तथा 2 बड़े न्यूज चैनल ‘आज तक’ और ‘इंडिया टीवी’ उदाहरण स्वरूप मौजूद हैं। इनका पाश्र्व वह ‘कार्पोरेट’ नहीं रहा है जिसकी चर्चा हम कर रहे हैं। इन संस्थानों ने अपनी व्यवसाय कुशलता और कंटेंट के कारण विशाल पाठक व दर्शक वर्ग तैयार किए। इनकी विशिष्ट पहचान बनी। आर्थिक रूप से मजबूत भी हुए ये। अब भले ही इन्हें ही कार्पोरेट जगत में शामिल कर लिया जाए किन्तु इनकी उपलब्धियां कार्पोरेट पाश्र्व के कारण कतई नहीं हैं। इन चार समूहों को आक्सीजन मिला तो पाठकों व दर्शकों द्वारा।

…जारी… (इससे पहले का पार्ट पढ़ने के लिए क्लिक करें- पार्ट 1)

लेखक एसएन विनोद वरिष्ठ पत्रकार हैं.

प्रसून, अपने शब्दों में संशोधन करें!

एसएन विनोद: पत्रकारिता नहीं, पत्रकार बिक रहे-1 : नहीं! ऐसा बिल्कुल नहीं! पत्रकारिता नहीं बिक रही, बिक रहे हैं पत्रकार। ठीक उसी तरह जैसे कतिपय भ्रष्ट शासक-प्रशासक, जयचंद-मीर जाफर देश को बेचने की कोशिश करते रहे हैं, गद्दारी करते रहे हैं। किन्तु देश अपनी जगह कायम रहा।

नींव पर पड़ी चोटों से लहूलुहान तो यह होता रहा है किन्तु अस्तित्व कायम। पत्रकारिता में प्रविष्ट काले भेडिय़ों ने इसकी नींव पर कुठाराघात किया, चौराहे पर अपनी बोलियां लगवाते रहे, अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए सौदेबाजी करते रहे, कलमें बेचीं, अखबार के पन्ने बेचे, टेलीविजन पर झूठ को सच-सच को झूठ दिखाने की कोशिश की, किसी को महिमामंडित किया तो किसी के चेहरे पर कालिख पोती, इसे पेशा बनाया, धंधा बनाया, चाटुकारिता की नई परंपरा शुरू की। बावजूद इसके, पत्रकारिता अपनी जगह कायम है, पत्रकार अवश्य बिकते रहे। प्रसून (पुण्य प्रसून वाजपेयी) निश्चय ही अपने शब्दों में संशोधन कर लेंगे।

खुशी हुई कि ‘लॉबिंग, पैसे के बदले खबर और समकालीन पत्रकारिता’ पर अखबारों और न्यूज चैनलों के कतिपय वरिष्ठ पत्रकारों ने (आत्म) चिंतन की पहल की। पत्रकारों के पतन पर चिंता जताई। अवसर था उदयन शर्मा फाउंडेशन द्वारा आयोजित संवाद का। इस पहल का स्वागत तो है किन्तु कतिपय शर्तों के साथ। एक चुनौती भी। पत्रकार, विशेषकर इस चर्चा में शामिल होने वाले पत्रकार पहले ‘हमाम में सभी नंगे’ की कहावत को झुठलाकर दिखाएं। इस बिंदु पर मैं पत्रकारीय मूल्य के पक्ष में कुछ कठोर होना चाहूंगा। बगैर किसी पूर्वाग्रह के, बगैर किसी दुराग्रह के और बगैर किसी निज स्वार्थ के मैं यह जानना चाहूंगा कि क्या संवाद में शामिल हो बेबाक विचार रखने वाले वरिष्ठ पत्रकारों ने मीडिया में प्रविष्ट ‘रोग’ के इलाज की कोशिशें की हैं? अवसर मिलने के बावजूद क्या ये तटस्थ नहीं बने रहे? बाजारवाद, कार्पोरेट जगत की मजबूरी आदि बहानों की ढाल के पीछे स्वयं कुछ पाने की कोशिश नहीं करते रहे?

राजदीप सरदेसाई ‘पेड न्यूज’ के लिए बाजारीकरण को जिम्मेदार अगर ठहराते हैं तो उन्हें यह भी बताना होगा कि मीडिया पर बाजार के प्रभाव को रोका जा सकता है या नहीं? हां, राजदीप की इस साफगोई के लिए अभिनंदन कि उन्होंने स्वीकार किया कि आज मीडिया राजनेताओं को तो एक्सपोज कर सकता है लेकिन कार्पोरेट को नहीं। क्यों? बहस का यह एक स्वतंत्र विषय है। कार्पोरेट को एक्सपोज क्यों नहीं किया जा सकता? वैसे पत्र और पत्रकार मौजूद हैं जो निडरतापूर्वक कार्पोरेट जगत को एक्सपोज कर रहे हैं।

अगर राजदीप का आशय पूंजी और विज्ञापन से है तो मैं चाहूंगा कि वे इस तथ्य को न भूलें कि पूंजी का स्रोत आम जनता ही है। हालांकि वर्तमान काल में पूंजी, जो अब कार्पोरेट जगत की तिजोरियों की बंदी बन चुकी है, हर क्षेत्र को ‘डिक्टेट’ कर रही है। स्रोत से जनता को जोड़कर देखने की चर्चा नक्कारखाने में तूती की आवाज बनकर रह जाती है। किन्तु मीडिया जगत, मीडिया कर्मी जब स्वयं को औरों से पृथक, ज्ञानी, समाज-देश के मार्गदर्शक के रूप में पेश करते हैं तब उन्हें परिवर्तन और पहल के पक्ष में क्रांति का आगाज करना ही होगा। कार्पोरेट के सामने नतमस्तक होने की बजाय शीश उठाकर चलने की नैतिकता अर्जित करनी होगी। यह मीडिया ही कर सकता है। संभव है यह। सिर्फ सच बोलने और सच लिखने का साहस चाहिए।

…जारी….

लेखक एसएन विनोद वरिष्ठ पत्रकार हैं.

‘विधवा विलाप’ न करें : राहुल देव

: पसीना पोछता समाजवादी पत्रकार और एसी में जाते कारपोरेट जर्नलिस्ट : परिचर्चा ने बताया- फिलहाल बदलाव की गुंजाइश नहीं : जैसा चल रहा है, वैसा ही चलता रहेगा : कॉरपोरेट जगत अपनी मर्जी से मीडिया की दशा और दिशा तय करता रहेगा :

11 जुलाई को सुप्रसिद्ध पत्रकार स्वर्गीय उदयन शर्मा का जन्म दिन था। हर साल की तरह इस साल भी ‘संवाद 2010’ के तहत एक परिचर्चा ‘लॉबिंग, पेड न्यूज और समकालीन पत्रकारिता’ का आयोजन किया गया था। इस परिचर्चा में देश के कई जाने-पहचाने पत्रकार दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब के स्पीकर हॉल में जुटे और अपने विचार रखे। इस तरह से कार्यक्रमों की विशेषता यह होती है कि वक्ता और श्रोता किसी न किसी रूप में मीडिया से जुड़े लोग ही होते हैं। ऐसे अवसरों पर मीडिया के लोग अपने आप को कसौटी पर कसते हैं। लेकिन कभी भी कसौटी पर खरे नहीं उतरते। दरअसल, जो पत्रकार ऐसे आयोजनों में शामिल होते हैं, वे ‘आजाद’ नहीं होते बल्कि मालिकों के ‘नौकर’ होते हैं। कल हुई परिचर्चा में यही बात उभर कर सामने आयी। और कल क्यों, जब भी कहीं पत्रकारिता के गिरते स्तर की बात होती है, यही बात सामने आती है।

‘सीएनईबी’ के राहुल देव ने कल कुछ भी नहीं छिपाया। उन्होंने साफ कहा कि ‘पत्रकारिता के स्तर की बात हो तो अखबारों और चैनलों के मालिकों की भी भागीदारी होनी चाहिए। और मालिक लोग कभी यहां पर आएंगे नहीं।” मतलब साफ था कि पत्रकार अखबार या चैनल को उसी तरह से चलाने के लिए मजबूर हैं, जैसा मालिक चाहते हैं। उन्होंने साफ कहा कि ‘विधवा विलाप’ करने का कोई फायदा नहीं है।

इस परिचर्चा में सीएनएन-आईबीएन के राजदीप सरदेसाई भी वक्ता के रूप में मौजूद थे। वह पत्रकार होने के साथ-साथ मालिक भी हैं। उन्होंने कहा कि कॉरपोरेट जगत को माइनस करके अखबार और चैनल नहीं चलाए जा सकते। उन्होंने एक उदहारण देकर कहा कि ‘उनके एक चैनल ने एक कॉरपोरेट घराने के खिलाफ कैम्पेन चलाई। इसके नतीजे में उस कॉरपोरेट ने हमारे सभी नेटवर्क के चैनलों से अपने विज्ञापन वापस ले लिए।’

मतलब साफ है कि मीडिया कॉरपोरेट जगत के खिलाफ जाएगा तो चैनलों और अखबारों पर ताले लटक जाएंगे। ऐसे में भला मीडिया उन सत्तर प्रतिशत लोगों की बात क्यों करे, जो रोजाना पन्द्रह से बीस रुपए रोज पर अपना गुजारा करने के लिए मजबूर हैं। मीडिया को कॉरपोरेट जगत के हितों की बात करनी ही होगी।

‘नई दुनिया’ के प्रधान सम्पादक आलोक मेहता ने कहा कि मीडिया पर हमेशा से दबाव रहा है। उन्होंने पटना की एक घटना का जिक्र करते हुआ बताया कि जब हमने ‘नवभारत टाइम्स’ में पशुपालन घोटाला की खबर छापी तो लालू यादव ने हमारे ऑफिस में आग लगवा दी थी। उन्होंने कहा कि हमारा काम खबर छापना है, हमें हर हाल में इस काम को जारी रखना होगा। उनका कहना था कि आज ही नहीं, पहले भी मीडिया पूंजीपतियों के हाथों में रहा है। उन्होंने बीसी वर्गीज और एचके दुआ का उदाहरण देकर कहा कि मालिकों से अलग हटकर चलने पर सम्पादकों को सड़कों पर ही बर्खास्त किया जाता रहा है। उन्होंने कहा कि ‘अखबार का मालिक अखबार चलाने के लिए कहां से पैसा लाता है, सम्पादक को इससे कोई मतलब नहीं होता।’

आईबीनएन-7 के मैनेजिंग एडीटर आशुतोष ने कहा कि पेड न्यूज सिर्फ वही नहीं, जो पैसे लेकर छापी जाती है। उन्होंने किसी विचारधारा के तहत लिखी गयी खबर को भी पेड न्यूज जितना ही गलत बताया। यहां यह बात बताना भी प्रांसगिक है कि जब भी किसी सेमिनार में आशुतोष मौजूद रहे हैं, अक्सर समाजवादी पत्रकारिता की बात करने वाले लोगों से उनकी बहस होती रही है। लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। लेकिन उन्होंने समाजवादी पत्रकारिता की बात करने वालों पर यह कहकर कटाक्ष किया कि समाजवाद की बात करने वाले पत्रकारों के दिल में भी क्या यह नहीं होता कि दिग्विजय सिंह कहीं कोई बंगला दिलवा दें?

‘दैनिक भास्कर’ समूह के श्रवण गर्ग का कहना था कि खराब अखबार निकालने का दोष मालिकों पर मढ़ना ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि पत्रकारों को ऐसे कामों से बचना चाहिए, जिससे पाठकों में उसकी इमेज खराब हो। उन्होंने आलोचना को ज्यादा जगह देने की बात कही। उनके विचार से किसी भी कानून से ज्यादा जनता और पाठक की नजर हालात को सही करने में अपनी भूमिका निभा सकती है। उनका कहना था कि कानून बन जाएगा तो पेड न्यूज का सिलसिला दूसरे रास्तों से शुरू हो जाएगा।

पुण्य प्रसून बाजपेयी का कहना था कि पत्रकारिता अब खुलेआम बिक रही है. पत्रकारिता की बिक्री से निपट पाना बहुत मुश्किल हो गया है. पेड न्यूज के लिए और कोई नहीं बल्कि कॉरपोरेट जगत प्रमुख रूप से जिम्मेदार है. राजनीति और मीडिया, दोनों ही क्षेत्र इसके प्रभाव में हैं.

परिचर्चा में बतौर मुख्य अतिथि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने कहा कि कानून की दीवार बना देने से कुछ नहीं होगा। उन्होंने कहा कि पेड न्यूज के लिए सिर्फ पत्रकार ही जिम्मेदार नहीं है। इसके लिए राजनीति भी जिम्मेदार है। उन्होंने कहा कि मुझसे खबर के बदले पैसों की डिमांड किसी अखबार या पत्रकार ने नहीं की।

कुल मिलाकर परिचर्चा में यह बात उभर सामने आयी कि फिलहाल बदलाव की कोई गुंजाइश नहीं है। जैसा चल रहा है, वैसा ही चलता रहेगा। कॉरपोरेट जगत अपनी मर्जी से मीडिया की दशा और दिशा तय करता रहेगा। परिचर्चा में ‘जी न्यूज’ के सलाहकार सम्पादक पुण्य प्रसून वाजपेयी, जी न्यूज के सम्पादक सतीश के सिंह, ‘प्रथम प्रवक्ता’ के रामबहादुर राय, इमेज गुरु के दिलीप चेरियन ने भी अपने विचार रखे। संचालन ‘नई दुनिया’ के राजनीतिक सम्पादक विनोद अग्निहोत्री ने किया। इनके अलावा ‘न्यूज 24’ के अजीत अंजुम, एचके दुआ, ‘इंडिया न्यूज’ के कुरबान अली, उर्दू साप्ताहिक ‘नई दुनिया’ के सम्पादक शाहिद सिद्दीकी, ‘चौथी दुनिया’ के प्रधान सम्पादक संतोष भारतीय, सुमित अवस्थी, पारांजय गुहा ठाकुरता, अमिताभ सिन्हा, विनीत कुमार, अविनाश सहित कई लोग थे।

अंत में कॉरपोरेट मीडिया और समाजवादी मीडिया का अंतर भी समझ लीजिए। परिचर्चा के बाद जब मैं, मेरे साथ आए धर्मवीर कटोच और मदनलाल शर्मा कांस्टीट्यूशन क्लब के बाहर निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन जाने के लिए बस स्टॉप पर बस का इंतजार कर रहे थे, वहीं एक समाजवादी पत्रकार भी पसीना पोंछते हुए बस की इंतजार में थे। दूसरी ओर कॉरपोरेट मीडिया के लोग शानदार एसी कारों में बैठकर जा रहे थे। शायद इसीलिए आशुतोष समाजवादी पत्रकारिता से लगभग नफरत और कॉरपोरेट मीडिया से प्यार करते हैं। आशुतोष एसी न्यूज रूम में बैठकर नक्सवादियों को इसलिए कोस सकते हैं क्योंकि सलीम अख्तर सिद्दीकीउनको कोसने से विज्ञापन जाने का डर नहीं होता। लेकिन यदि वे आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन को हथियाने वाले पूंजीपतियों के खिलाफ कुछ कहेंगे तो उनके चैनल के विज्ञापन बंद हो जाएंगे। राजदीप सरदेसाई भी तो यही कह रहे थे। आशुतोष भला राजदीप सरदेसाई के खिलाफ कैसे जा सकते हैं? आखिर आशुतोष उनके चैनल में ही तो काम करते हैं।

लेखक सलीम अख्तर सिद्दीक़ी हिंदी के सक्रिय ब्लागर, सिटिजन जर्नलिस्ट और सोशल एक्टिविस्ट हैं. उदयन शर्मा से बेहद प्रभावित सलीम मेरठ में निवास करते हैं. विभिन्न विषयों पर वे लगातार लेखन करते रहते हैं.