अंग्रेजी के भाषाई साम्राज्यवाद के विरूद्ध संघर्ष की जरूरत

भोपाल के संभागायुक्त मनोज श्रीवास्तव का कहना है कि मातृभाषाओं की कीमत पर कोई भी भाषा स्वीकारी नहीं जानी चाहिए। दुनिया के तमाम देश अपनी भाषाओं के संरक्षण के लिए काम कर रहे हैं और अंग्रेजी के भाषाई साम्राज्यवाद के खिलाफ कानून बनाने जैसे कदम उठा रहे हैं। हमें भी अपनी भाषाओं के सम्मान और संरक्षण के लिए आगे आना होगा।

बात तो साफ हुई कि मीडिया देवता नहीं है!

संजय: वर्षांत-2010 : यह अच्छा ही हुआ कि यह बात साफ हो गयी कि मीडिया देवता नहीं है। वह तमाम अन्य व्यवसायों की तरह ही उतना ही पवित्र व अपवित्र होने और हो सकने की संभावना से भरा है। 2010 का साल इसलिए हमें कई भ्रमों से निजात दिलाता है और यह आश्वासन भी देकर जा रहा है कि कम से कम अब मीडिया के बारे में आगे की बात होगी। यह बहस मिशन और प्रोफेशन से निकलकर बहुत आगे आ चुकी है।

इलेक्‍ट्रानिक मीडिया में अच्‍छे लोगों की कमी

: मनोज मनु ने की जनसंचार के विद्यार्थियों से बातचीत : बेशक इलेक्ट्रानिक मीडिया में चुनौतियां तो बढ़ी हैं, पर अभी भी इस क्षेत्र में अच्छे लोगों की कमी है। मीडिया के विद्यार्थियों को चाहिए कि वह इस कमी को दूर करें। ये विचार प्रख्यात एंकर एवं सहारा समय-छत्तीसगढ़ -मध्य प्रदेश के चैनल प्रमुख मनोज मनु ने माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग के विद्यार्थियों को सम्बोधित करते हुए व्यक्त किए।

राज्‍यपाल ने दिया संजय को वांगमय पुरस्‍कार

पुरस्‍कारमध्यप्रदेश के राज्यपाल रामेश्वर ठाकुर ने युवा पत्रकार एवं लेखक संजय द्विवेदी को वांगमय पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया. भोपाल स्थित हिंदी भवन के सभागार में आयोजित समारोह में संजय को यह पुरस्‍कार उनकी नई किताब ‘मीडियाः नया दौर- नई चुनौतियां’ के लिए दिया गया. स्व. हजारीलाल जैन की स्मृति में प्रतिवर्ष यह पुरस्‍कार किसी गैर-साहित्यिक विधा पर लिखी गयी किताब पर दिया जाता है.

विचार को समर्पित रहा उनका जीवन

रामशंकर अग्निहोत्री: श्रद्धांजलि : रामशंकर अग्निहोत्री ने मन, वचन और कर्म से निभाया एक ध्येयनिष्ठ पत्रकार होने का धर्म :  भरोसा नहीं होता कि कोई विचार किसी को इतनी ताकत दे सकता है कि वह उसी के सहारे पूरी जिंदगी काट ले। लेकिन दुनिया ऐसे ही दीवानों से बेहतर बनती है। यह दीवानगी ही किसी को खास बना जाती है।

इलेक्ट्रानिक मीडिया को धंधेबाजों से बचाइए

संजय द्विवेदीमीडिया में आकर, कुछ पैसे लगाकर अपना रूतबा जमाने का शौक काफी पुराना है किंतु पिछले कुछ समय से टीवी चैनल खोलने का चलन जिस तरह चला है उसने एक अराजकता की स्थिति पैदा कर दी है। हर वह आदमी जिसके पास नाजायज तरीके से कुछ पैसे आ गए हैं, वह टीवी चैनल खोलने या किसी बड़े टीवी चैनल की फ्रेंचाइजी लेने को आतुर है। पिछले कुछ महीनों में इन शौकीनों के चैनलों की जैसी गति हुयी है और उसके कर्मचारी- पत्रकार जैसी यातना भोगने को विवश हुए हैं, उससे सरकार ही नहीं सारा मीडिया जगत हैरत में है। एक टीवी चैनल में लगने वाली पूंजी और ताकत साधारण नहीं होती किंतु मीडिया में घुसने के आतुर नए सेठ कुछ भी करने को आमादा दिखते हैं। अब इनकी हरकतों की पोल एक-एक कर खुल रही है। रंगीन चैनलों की काली कथाएं और करतूतें लोगों के सामने हैं, उनके कर्मचारी सड़क पर हैं। भारतीय टेलीविजन बाजार का यह अचानक उठाव कई तरह की चिंताएं साथ लिए आया है।