हिंदुस्तान बरेली में इस्तीफों का क्रम जारी, संजय को प्रमोशन

हिंदुस्तान, बरेली से मार्केटिंग एक्‍जीक्‍यूटिव रवींद्र शर्मा ने रिजाइन कर दिया है. उन्‍होंने अपनी नई पारी दैनिक जागरण, मुरादाबाद के साथ शुरू की है. उन्‍होंने सीनियर एक्‍जीक्‍यूटिव के रूप में ज्‍वाइन किया है. यह जागरण के संग उनकी दूसरी पारी है. रवींद्र ने अपने करियर की शुरुआत दैनिक जागरण, मुरादाबाद से की थी तथा इसके बाद हिंदुस्‍तान ज्‍वाइन थे. कुछ दिनों पहले ही हिंदुस्तान, बरेली से इवेंट मैनेजर मुकुल गुप्ता ने इस्तीफा देकर गाजियाबाद में एक मोबाइल कंपनी के साथ जुड़ गए.

 

आज समाज का गुड़गांव एडिशन लांच कराएंगे संजय त्यागी

[caption id="attachment_18124" align="alignleft" width="65"]संजय त्यागीसंजय त्यागी[/caption]: अपडेट : संजय त्यागी ने आज समाज, गुड़गांव संस्करण के सिटी एडिटर के रूप में नई पारी की शुरुआत की है. वे पत्रिका, जयपुर के स्टेट ब्यूरो में कार्यरत थे. पारिवारिक कारणों के कारण कई महीनों से अवकाश पर चल रहे थे.

‘अल्ताफ की रिपोर्ट के लिए माफी मांगे बीबीसी’

[caption id="attachment_15985" align="alignleft"]कुमार संजय त्यागीकुमार संजय त्यागी[/caption]विदेशी संचार माध्यमों में बीबीसी को एक विश्वसनीय संचार माध्यम माना जाता है। बीबीसी की विश्वसीयता कितनी विश्वसनीय है इसे उसकी हिंदी वेबसाइट पर आज प्रकाशित हुई एक कश्मीर संबंधी रिपोर्ट में देखा जा सकता है। बीबीसी के कश्मीर संवाददाता ने भारतीय कश्मीर यानि हमारे कश्मीर को अपनी रिपोर्ट में ‘भारत प्रशासित कश्मीर’ बताकर अक्षम्य अपराध किया है। ऐसे कुत्सित विचार रखने वाले शख्स को पत्रकारिता में रहने का कोई हक नहीं है। पत्रकार के साथ-साथ अंग्रेजों के इस संचार माध्यम को भी अपने इस क्रत्य के लिए माफी मांगनी चाहिए। बीबीसी की हिंदी वेबसाइट पर ‘एक नजर इधर’ सेक्शन में ‘कश्मीर में हिंसा में कमी’ शीर्षक से उनके श्रीनगर संवाददाता अल्ताफ हुसैन की रिपोर्ट छपी है।

‘योग्यतम संपादकों में से हैं शशि शेखर’

कुमार संजय त्यागीहे मठाधीशों, कुंठा को हथियार मत बनाओ : भाई यशवंत, ब्लाग, वेब और पोर्टल की दुनिया का प्रसार और पसंद बढ़ती देख खुशी तो होती है लेकिन इस दुनिया में कुछ अज्ञानी और कुंठित किस्म के लोगों के आने से संताप भी होता है। आजकल ब्लाग, वेब और पोर्टल दिन दूनी रात चौगुनी गति से उन्नति कर रहे हैं। यह बहुत ही सुखद है। लेकिन मीडिया के इस रूप को कालसर्प योग ग्रसित कर रहा है। मीडिया के इस अवतार को कुछ लोगों ने अपनी कुंठा निकालने का हथियार बना लिया है। यही नहीं, कुछ अल्पज्ञानी लोग भी इस क्षेत्र में मठाधीश बन बैठे हैं। यही कारण है कि अनेक पोर्टल और ब्लॉग जब-तब विवादित होकर शर्मसार होते-करते रहते हैं। लेकिन उन मठों के धीशों को तब भी शर्म नहीं आती। अगर कोई संपादक उनके कहने से किसी को नौकरी न दे या उनकी कोई बात अथवा राय न माने तो मठाधीशों के हाथ में कलमरूपी लाठी तुरंत आ जाती है। ऐसे लोग उस संपादक को अपने कुतर्कों के सहारे देश का सबसे घटिया संपादक सिद्ध करने पर तुल जाते हैं।

सवालों के जवाब नहीं दे पाया जूता

कुमार संजय त्यागीदेश के सबसे बडे हिंदी अखबार दैनिक जागरण के एक सीनियर पत्रकार के जूते ने कई सवाल खड़े किए हैं। 1984 में दिल्ली में सिख दंगों को समाज का कोई वर्ग किसी भी रूप में आज तक सही नहीं ठहराता है। इन दंगों में अनेक औरतों के सुहाग उजड़ गए और बहुत सी गोदें सूनी हो गईं। उस समय जो कुछ भी घटा वह बहुत ही खौफनाक और शर्मनाक था। उससे भी शर्मनाक है कि 25 साल बाद भी इन दंगों को भड़काने में जिनकी भूमिका थी, देश की सबसे बडी जांच एजेंसी उनका नाम नहीं तय कर पाई है।