बिनायक के साथ खड़े न हुए तो हमारे साथ भी यही होगा

[caption id="attachment_19006" align="alignleft" width="113"]बिनायक सेनबिनायक सेन[/caption]छत्तीसगढ़ में रायपुर की एक अदालत ने मानवाधिकार नेता डॉ. बिनायक सेन को आजीवन कारावास की सज़ा सुना दी. पुलिस ने डॉ. सेन पर कुछ मनगढ़ंत आरोप लगाए हैं लेकिन उन पर असली मामला यह है कि उन्होंने छत्तीसगढ़ रियासत के शासकों की भैंस खोल ली है. बिनायक सेन बहुत बड़े डाक्टर हैं, बच्चों की बीमारियों के इलाज़ के जानकार हैं. किसी भी बड़े शहर में क्‍लीनिक खोल लेते तो करोड़ों कमाते और मौज करते.

क्या हिन्दी रीजनल भाषा है?

शेष जीहिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार अजय ब्रह्मात्मज ने एक दिलचस्प विषय पर फेसबुक पर चर्चा शुरू की है. कहते हैं कि सारी पीआर कंपनियां हिंदी समेत सभी भारतीय भाषाओं को रीजनल मीडिया कहती हैं. कोई विरोध नहीं करता. वक्‍त आ गया है कि उन्‍हें भारतीय भाषा कहा जाए. आगे कहते हैं कि मैं उनकी राय से सहमत नहीं हूं और उन सभी पीआर कंपनियों की भर्त्‍सना करता हूं जो सभी भारतीय भाषाओं को रीजनल कैटेगरी में डालती हैं.

यूं ही खिलाएं हैं हमने आग में फूल

शेष नारायण सिंह : न उनकी हार नई है, न अपनी जीत नई : भड़ास के संकट के बारे में जानकारी मिलने के बाद थोड़ा दुखी था. भड़ास और उसके जैसे कई अन्य पोर्टल मीडिया के जनवादीकरण के नायक हैं. इनमें कई नौजवानों को मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ. इनके पास अपने कंधे पर लटके हुए झोले में रखे कम्प्यूटर के अलावा कुछ नहीं है. ज़्यादातर अपने उसी कमरे से काम चला रहे हैं जिसमें वे रहते हैं. ऐसे ही एक नायक ने पिछले दिनों  अपना ज़्यादातर वक़्त दोस्तों के घर में या सड़कों पर बिताया. दिल्ली की मई-जून की गर्मी उन्होंने अपने स्कूटर पर सवार होकर बिताई.

मीडिया को शर्म से सिर झुका लेना चाहिए

शेष नारायण सिंहहत्यारी पुलिस, सांप्रदायिक सरकार, गैर-जिम्मेदार मीडिया : एक बहुत बडे़ टीवी न्यूज चैनल के न्यूज सेक्शन के कर्ताधर्ता, जो उस वक्त तक मेरे मित्र थे, ने जब इशरत जहां की हत्या को इस तरह से अपने चैनल पर पेश करना शुरू किया जैसे देश की सेना किसी दुश्मन देश पर विजय करके लौटी हो, तो मैंने उन्हें याद दिलाया कि खबर की सच्चाई जांच लें। इतना सुनते ही वे बिफर पडे़ और कहने लगे कि उनके रिपोर्टर ने जांच कर ली है और उन्हें अपने रिपोर्टर पर भरोसा है। मैं न सिर्फ चुप हो गया बल्कि उनसे दोस्ती भी खत्म कर ली। वे श्रीमानजी टीवी के सबसे वरिष्ठ पत्रकारों में शुमार किए जाते हैं। टीवी के कारण उनकी संकुचित हो गई सोच पर मुझे घोर आश्चर्य हुआ। बात सिर्फ सबसे बड़े न्यूज चैनल की ही नहीं है। उस दौर में इशरत जहां को ज्यादातर टीवी न्यूज चैनलों ने पाकिस्तानी जासूस बताया।

सुधरिए, वरना बाबू लोग मीडिया चलाएंगे

शेष नारायण सिंहयह पब्लिक है, सब जानती है : समाज के हर वर्ग की तरह मीडिया में भी गैर-जिम्मेदार लोगों का बड़े पैमाने पर प्रवेश हो चुका है। भड़ास4मीडिया से जानकारी मिली कि एक किताब आई है जिसमें जिक्र है कि किस तरह से हर पेशे से जुड़े लोग अपने आपको किसी मीडिया संगठन के सहयोगी के रूप में पेश करके अपना धंधा चला रहे हैं। कोई कार मैकेनिक है तो कोई काल गर्ल का धंधा करता है, कोई प्रापर्टी डीलर है तो कोई शुद्ध दलाली करता है। गरज़ यह कि मीडिया पर बेईमानों और चोर बाजारियों की नजर लग गई है। इस किताब के मुताबिक ऐसी हजारों पत्र-पत्रिकाओं का नाम है जो कभी छपती नहीं लेकिन उनकी टाइटिल के मालिक गाड़ी पर प्रेस लिखाकर घूम रहे हैं।

‘उर्दू है जिसका नाम’ नहीं देख सकते

शेष नारायण सिंहकभी उर्दू की धूम सारे जहां में हुआ करती थी, दक्षिण एशिया का बेहतरीन साहित्य इसी भाषा में लिखा जाता था और उर्दू जानना पढ़े लिखे होने का सबूत माना जाता था। अब वह बात नही है। राजनीति के थपेड़ों को बरदाश्त करती भारत की यह भाषा आजकल अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। वह उर्दू जो आज़ादी की ख्वाहिश के इज़हार का ज़रिया बनी आज एक धर्म विशेष के लोगों की जबान बताई जा रही है। इसी जबान में कई बार हमारा मुश्तरका तबाही के बाद गम और गुस्से का इज़हार भी किया गया था। आज जिस जबान को उर्दू कहते हैं वह विकास के कई पड़ावों से होकर गुजरी है। 12वीं सदी की शुरुआत में मध्य एशिया से आने वाले लोग भारत में बसने लगे थे। वे अपने साथ चर्खा और कागज भी लाए।