सुब्रत राय सहारा, आपके मीडियाकर्मियों को भी फोर्स की जरूरत है

सुब्रत राय बड़ा दाव खेलना जानते हैं. वे छोटे मोटे दाव नही लगाते. इसी कारण उन्हें अपने छोटे-मोटे तनख्वाह पाने वाले मीडियाकर्मी याद नहीं रहते. और जिन पर इन मीडियाकर्मियों को याद रखने का दायित्व है, उन स्वतंत्र मिश्रा जैसे लोगों के पास फुर्सत नहीं है कि वे अपनी साजिशों-तिकड़मों से टाइम निकालकर आम सहाराकर्मियों का भला करने के बारे में सोच सकें. इसी कारण मारे जाते हैं बेचारे आम कर्मी.

इसी का नतीजा है कि इस दीवाली पर सहारा के मीडियाकर्मियों को सिर्फ 3500 रुपये का बोनस देने का निर्णय लिया गया है. इतना कम बोनस तो राज्य सरकार के चतुर्थ ग्रेड कर्मियों को भी नहीं मिलता. सहारा में साल भर से न कोई प्रमोशन मिला है और न ही इनक्रीमेंट. प्रमोशन-इनक्रीमेंट के लालीपाप देने के कई बार कई लोगों ने वादे किए पर अमल किसी ने नहीं किया. सहारा के पास अपने इंप्लाइज को देने के लिए पैसे नहीं होते, लेकिन जब खेलकूद की बात आती है तो इनके पास अथाह पैसा जाने कहां से आ जाता है. ताजी सूचना आप सभी ने पढ़ी होगी कि सहारा इंडिया परिवार ने विजय माल्या के स्वामित्व वाली फॉर्मूला-वन टीम में 42.5 फीसदी हिस्सेदारी खरीद ली है.

इस खरीद के लिए सहारा इंडिया परिवार ने 10 करोड़ डालर का निवेश किया है. इसके बाद फोर्स इंडिया का नाम बदलकर सहारा फोर्स इंडिया कर दिया गया है. देश में खेलों के सबसे बड़े प्रमोटर और संरक्षक के रूप में सहारा इंडिया का नाम लिया जाता है. पर जब बात सहारा मीडिया की आती है तो प्रबंधन के पास पैसा नहीं होता. सहारा के लोग कई तरह की परेशानियों में जी रहे हैं. पीएफ से लेकर हेल्थ तक के मसले पर सहारा के कर्मी खुद को ठगा हुए महसूस करते रहते हैं. पर उनकी कहीं कोई सुनवाई नहीं होती क्योंकि सहारा में प्रबंधन के खिलाफ मुंह खोलने का मतलब होता है नौकरी से हाथ धोना.

उपेंद्र राय और स्वतंत्र मिश्रा के बीच की रार में आम सहाराकर्मी खुद को पिसा हुआ पा रहा है. जो लोग कथित रूप से उपेंद्र राय के खास थे, वे अब किनारे लगाए जा चुके हैं और जो लोग स्वतंत्र मिश्रा के करीबी माने जाते थे उन्हें फिर से बड़े पदों व बड़े दायित्वों से नवाजा जा रहा है. देखना है कि इन सब तिकड़मों-चालबाजियों के बीच सहारा प्रबंधन अपने कर्मियों पर धनबौछार करना याद रखता है या फिर 3500 रुपये की छोटी रकम देकर ही अपने दायित्व से पल्ला झाड़ लेता है.

सहारा में कार्यरत एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. अगर इस पत्र के मजमून पर किसी को आपत्ति हो तो वह  अपना विरोध नीचे दिए गए कमेंट बाक्स के जरिए दर्ज करा सकता है या फिर bhadas4media@gmail.com के जरिए भड़ास संचालकों तक पहुंचा सकता है.

उपेंद्र राय को लेकर अफवाहों का दौर जारी

सहारा मीडिया के डायरेक्टर न्यूज उपेंद्र राय के बारे में तरह-तरह की अफवाहें कई दिनों से उड़ रही हैं. कभी इनको सहारा से निकाले जाने की चर्चा उड़ती है तो कभी सीबीआई द्वारा गिरफ्तार किए जाने की. कभी चर्चा उपेंद्र राय के अंडरग्राउंड हो जाने की होती है. लेकिन अब तक सारी अफवाहें झूठ साबित हुई हैं. ताजी चर्चा उपेंद्र राय के डिमोशन की है. चर्चा के मुताबिक सहारा मीडिया के सर्वेसर्वा उपेंद्र राय को सहाराश्री के एमसीसी (मैनेजिंग वर्कर्स कारपोरेट कोर) से अटैच कर दिया गया है.

इस एमसीसी में सहाराश्री के प्रबंधन से जुड़े कोर कमेटी के लोग सदस्य होते हैं. एमसीसी का मुख्यालय लखनऊ में है और इसके कैंप कार्यालय लखनऊ, दिल्ली व मुंबई में स्थित हैं. चर्चा है कि उपेंद्र राय द्वारा 2जी स्कैम मामले में जांच प्रभावित करने के लिए प्रवर्तन निदेशालय के एक अधिकारी राजेश्वर सिंह को रिश्वत देने के प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट के कोप से बचने हेतु सहाराश्री सुब्रत राय सहारा ने कार्रवाई करते हुए उन्हें मीडिया से हटाकर एमसीसी के साथ संबद्ध कर दिया है. सहारा से जुड़े उच्च पदस्थ सूत्र इस खबर को कनफर्म तो कर रहे हैं लेकिन सभी का कहना है कि इस बारे में अभी तक कोई आंतरिक निर्देश या लेटर जारी न होने के कारण कुछ भी पुष्ट तौर पर नहीं कहा जा सकता.

वहीं, उपेंद्र राय से जुड़े करीबी लोगों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2जी स्कैम मामले के खुद संज्ञान में लेने और जांच को मानीटर किए जाने के कारण उपेंद्र राय के फंसने की पूरी आशंका है. इसी वजह से सहारा समूह यह संदेश देना चाहता है कि उसने गलत कार्य करने वालों को दंडित कर दिया है. पर उपेंद्र राय पर कार्यवाही इतना आसान नहीं है. सहारा समूह के ढेर सारे राज जानने वाले उपेंद्र राय को सहाराश्री सुब्रत राय सहारा का विश्वस्त माना जाता है और यह भी कहा जाता है कि उपेंद्र राय ने जो कुछ किया वह सब सहारा समूह के हित में, सहारा के शीर्षस्थ लोगों के संज्ञान में लाकर किया. ऐसे में अगर सहारा प्रबंधन की कार्यवाही से नाराज होकर उपेंद्र राय मुंह खोलते हैं तो बड़ा नुकसान सहारा समूह का होगा. तब संभव है कि सहारा प्रबंधन उपेंद्र राय को भरोसे में लेकर उनके खिलाफ कोई कार्रवाई करे ताकि सहारा की लाज भी बच जाए और उपेंद्र राय को बुरा भी न लगे.

जो भी हो, इन दिनों सहारा समूह में उपेंद्र राय की ही चर्चा है. उपेंद्र राय से पीड़ित सैकड़ों लोग जहां उपेंद्र राय को सहारा से निकलवाने में लगे हैं तो सहारा प्रबंधन उपेंद्र राय को किसी भी कीमत पर खोने को तैयार नहीं है. भरोसेमंद सूत्रों ने बताया कि उपेंद्र राय के खिलाफ सहारा में कोई कार्रवाई होना मुश्किल है क्योंकि उपेंद्र राय सहारा के कई मामलों को उपरी स्तर पर फैसलाकुन मोड़ पर ले जा चुके हैं और काफी कुछ अब उनके ही हाथ में है. ऐसे में सहारा उन्हें बाहर निकालकर या डिमोट कर कोई खतरा मोल नहीं लेना चाहता.

कुछ लोगों का कहना है कि आज रात आठ बजे तक सहारा में उपेंद्र राय की किस्मत को लेकर कोई फैसला नहीं हुआ था. आईपीएल में पुणे वारियर्स का मैच होने के कारण सहारा के उच्च पदाधिकारियों की टीम दिल्ली में डेरा डाले हैं. संभव है आज देर शाम कोई फैसला उपेंद्र राय के बाबत हुआ हो. फिलहाल उपेंद्र राय को लेकर जो चर्चाएं हैं, जो अफवाह है, उसमें दम कितना है यह तो वक्त बताएगा लेकिन सहारा में इन दिनों उपेंद्र राय गले की फांस बन चुके हैं जिन्हें निगलना और उगलना, दोनों सहारा प्रबंधन के लिए काफी कष्टकारी साबित हो रहा है.

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रतन टाटा, अनिल अंबानी, प्रशांत रुईया, दयालू अम्मा, सुब्रत रॉय सहारा और नीरा राडिया को बचा रही है सीबीआई

: टू जी तंरग घोटाले की जांच कमोवेश 1991 में सामने आए हवाला कांड जैसा होता दिख रहा है जिसमें शामिल सभी रसूखदार आरोपी कानूनी फंदे से निकल गए : सुप्रीम कोर्ट के बरसते डंडे के बीच टूजी तरंग घोटाले की सख्त जांच को मजबूर हुई सीबीआई रतन टाटा, अनिल अंबानी, प्रशांत रुईया, दयालू अम्मा, सुब्रत रॉय सहारा और नीरा राडिया को बचा रही है।

बड़ी साफ इबारत में लिखा पढा जा रहा है कि सीबीआई की जांच सत्ता प्रतिष्ठान से आ रही आंच की लौ में झुलस रही है। अब सुप्रीम कोर्ट पर निर्भर है कि वह जांच एजेंसी को तेज आंच की तपन से कैसे बचा पाती है और सीबीआई को एक हजार 76 सौ करोड़ रुपये के घोटाले की जांच में दूध का दूध और पानी का पानी करने दे पाती है या नहीं। सीबीआई से बचने वाले रसूखदारों के नाम अब अदालत के संज्ञान में है। सुप्रीम कोर्ट और सीबीआई की विशेष अदालत को आने वाले दिनों में इस पर फैसला करना है। मशहूर कहावत है, खेत खाए गदहा, मार खाए जुलाहा। यानी जिसने हजम किया वो तो बच गया पर साथ लगा बेचारा जुलाहा फंस गया। तिहाड़ जेल में सड़ रहे रिलायंस अनिल धीरुभाई अंबानी कंपनी के गौतम घोष, सुरेन्द्र पिपरा और हरि नायर ऐसे ही जुलाहा हैं जो करोड़ों रुपए की खेत चट गए गदहे के साथ थे। गदहे के भरोसे पल रहे थे इसलिए सीबीआई ने गदहे पर डंडा बरसाने के बजाए गदहे के इन मुलाजिमों को पकड़ कर जेल में ढूंस दिया है।

इसी तरह शाहिद उस्मान बलवा को जिस स्वॉन टेलीकॉम का प्रमोटर होने की जुर्म में टू जी तरंग घोटाले में शामिल किया गया है उस स्वॉन टेलीकॉम में अनिल अंबानी और ईस्सार ग्रुप के कर्ताधर्ता प्रशांत रुईया का पैसा लगा है। घोटाले का आर्थिक फायदा भी इन दोनों को ही सबसे ज्यादा हुआ है। अनिल अंबानी और प्रशांत रुईया को सीबीआई ने आरोपी नहीं बनाया है। रुईया का सत्ता प्रतिष्ठान पर असर है और अनिल अंबानी के बारे में खबर है कि मां कोकिला बेन के निर्देश पर भाई मुकेश अंबानी में छोटे भाई के प्रति असीम प्रेम फूटने लगा है। मुकेश अंबानी ने प्रंधानमंत्री मनमोहन सिंह से लेकर वित्ता मंत्री प्रणव मुर्खजी और अंबानी के पैसे पर पले बढे पूरे तंत्र को अनिल अंबानी को बचाने के लिए झोंक दिया है।

यही हाल नीरा राडिया को गवाह बनाने की कहानी में है। गवाह बनकर सुपर दलाल राडिया ने खुद के साथ अपने अजीज रतन टाटा पर मेहरबानी की। सीबीआई के अस्सी हजार पेज की चार्जशीट के पहले खेप में साफ लिखा है कि टू जी लाइसेंस लेने के साथ ही रतन टाटा ने बतौर दलाली श्तमिल मेयमश् संस्था को करोडों रुपए का अनुदान दे दिया। एनजीओ श्तमिल मेयमश्  मुख्यमंत्री करुणानिधि की पत्नी दयालू अम्मा और सांसद बेटी कनिमोझी की एनजीओ है। महादानी टाटा ने यह दान किस हित में किया यह समझने बूझने के बावजूद सीबीआई की चार्जशीट में न तो रतन टाटा और न ही उनकी सहेली नीरा राडिया आरोपी बनाया गया हैं। शायद टाटा का रसूख सीबीआई के हौसले को पस्त कर गया।

82 साल की दयालू अम्मा के साथ सीबीआई का सलूक तो और भी हस्यास्पद है। चार्जशीट में लिखा है कि बूढी अम्मा को एकमात्र तमिल भाषा जानने की वजह से आरोपी नही बनाया गया। मासूमियत को उकेरते हुए अनकहे में कह दिया गया है कि इस देश में हिंदी और अंग्रेजी नहीं जानने वाला यानी सिर्फ तमिल समझने वाला शख्स अपराधी नहीं हो सकता है। यह सत्तर की दशक में राष्ट्रभाषा के खिलाफ हिंसक आंदोलन करके सत्ता के केंद्र में आए करुणानिधि के लिए बड़े सकून की बात है। उनको चालीस-पचास साल के बाद आंदोलन के स्लोगन का निजी सिला मिल रहा है।

ऐसे में तमिल बोलने वालों की मदद से रेंगती केंद्र सरकार को आगे किसी एक ही भाषा  यानी तमिल में बोलने समझने वाले को अपराधी ठहराने में मुश्किल आनी चाहिए। खैर तब की तब देखी जाएगी। तथ्य है कि कलैगनार टीवी में दयालू अम्मा की साठ फीसदी हिस्सेदारी है। टीवी को दो सौ करोड रूपए टूजी स्पेक्ट्रम के लाभान्वितों से मिला। घोटाले का पर्दाफाश होने के बात तुरंत गिरफ्तारी और पैसे को वसूलने की तैयारी होनी चाहिए थी। यह जांचकर्ताओं की मेहनत का असली सिला होता पर सीबीआई को कसूरवार कलैगनार टीवी में साठ फीसदी के हिस्सेदार को छोडकर बस बीस-बीस फीसदी की हिस्सेदारी कनिमोझी और शरत कुमार को आरोपी नजार आ रहे हैं। इस मजबूरी को क्या कहेंगे?

इतना ही नही आरोपी कनिमोझी को गिरफ्तार करने गई सीबीआई को अब तक के सबसे बडे नाटक को झेलना पडा है। आरोपपत्र के आधार पर सीबीआई की विशेष अदालत में जब आरोपी कोनिमोझी को गिरफ्तार कर जेल में भरने की बारी आई तो कोनिमोई ने ए राजा पर खुद को बरगलाने का आरोप खुद के वकील के जरिए ही लगवा लिया। शनिवार को भरी अदालत में लोगों ने देखा कि किस तरह से कनिमोझी के वकील सामने बैठे कैदी राजा पर कनिमोझी को फंसाने का आरोप लगा रहे थे और मंद मंद मुस्कुराते ए राजा को बखूबी समझ आ रहा था कि यह सच नहीं बल्कि कानूनी दांवपेंच है। कनिमोझी के वकीलों ने अदालत को बचाव की बहस में पूरे दो दिनों तक उलझाए रखा। अब कनिमोझी की गिरफ्तारी पर अदालत के सुरक्षित फैसले की घोषणा तमिलनाडु विधानसभा चुनाव नतीजा आने के बाद वाले दिन यानी 14 मई को की जाएगी।

कई गवाह हैं जब कोनिमोझी के सौतेले भाई अजागिरी ने ए राजा को सरेआम कालर पकडकर धमकाया था कि वो कनिमोझी से दूर रहे और उनकी सबसे छोटी बहन को बरगलाने की जुर्रत नहीं करे। कन्याकुमारी इलाके में अजागिरी का खौफ है। अजागिरी के कहने का मतलब होता है कि वो जो कह रहे हैं वही होगा। पर कनामोझी के सहारे उतरोत्तर चढे जा रहे ए राजा को अजागिरी की बात समझ में नहीं आई। जाहिर है कनिमोझी को भी अजागिरी ने समझाई होगी। काश कनिमोझी मान गई होती। तो शायद मोहब्बत के रास्ते मिल रहे रुपयों के लिए जेल जाने की नौबत नही आती। पर सब जानते हैं कि प्यार और पैसे के खेल में ऐसा होता नहीं है। पर जो हो रहा है वह और भी भयंकर है और टू जी तंरग घोटाले की जांच कमोवेश 1991 में सामने आए हवाला कांड जैसा होता दिख रहा है जिसमें शामिल सभी रसूखदार आरोपी कानूनी फंदे से निकल गए।

लेखक आलोक कुमार सरोकार वाले पत्रकार हैं. उनका यह लिखा ‘डेटलाइन इंडिया’ से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.

सहारा का संकट और शिवराज का विज्ञापन

सहारा के संकट के दिनों में शिवराज सरकार के एक विज्ञापन ने उसके निवेशकों को सावधान कर दिया है. कहते हैं कि संकट आए तो अपने भी मुंह फेर लेते हैं. ऐसा ही हाल सहारा ग्रुप का है. मध्य प्रदेश में सहारा को राज्य सरकार हर महीने करीब पचास लाख का विज्ञापन देती है. और इतना ही विज्ञापन छत्तीसगढ़ से भी मिल जाता है.

स्ट्रिंगर्स भी तीस-चालीस लाख का विज्ञापन अलग से कर देते हैं. कुल मिलाकर चाँदी ही चाँदी रहती है सहारा की. लेकिन हाल ही में जबसे सहारा ग्रुप संकट में आया है, सहारा पैरा बैंकिंग के डिपाजिटर्स भागने लगे हैं. इसका एक कारण तो कुछ ”शुभचिंतकों” का यह एसएमएस था कि शायद सुब्रत रॉय भी 2जी-3जी मामले में जेल जा सकते हैं, ऐसे में सहारा से अपना पैसा निकाल लेना उचित है. बची खुची कसर प्रदेश की शिवराज सरकार ने नईदुनिया, दैनिक भास्कर और पत्रिका सहित सभी प्रमुख अख़बारों में एक विज्ञापन छपवाकर पूरी कर दी जिसमें यह बताया गया है कि किसी भी ”आयाराम गयाराम फाइनेंस कंपनी में अपना पैसा न लगाएँ क्योंकि यह सुरक्षित नहीं”.

सभी जानते हैं कि सहारा का आधार ग्रामीण इलाकों के वे निवेशक हैं जिन्होंने बैंक से ज़्यादा ब्याज के लालच में वहाँ धन लगा रखा है. विज्ञापन में कहीं भी सहारा का नाम नहीं है लेकिन लोग जानते हैं कि ब्लैकमेलिंग के शिकार शिवराज को यही बेहतर मौका मिला सहारा से हिसाब बराबर करने के लिए. विज्ञापन और एसएमएस का असर यह हुआ कि सहारा पैरा बैकिंग का नियमित होने वाला कलेक्शन बुरी तरह प्रभावित हुआ है. अब इसे कहते हैं दुबले और दो आषाढ़. विज्ञापन की प्रतिलिपि संलग्न है.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित

सहारा ने खुद को बेदाग बताया

: ईडी अधिकारी पर दबाव बनाने का मामला : राजेश्वर सिंह से पत्रकार सुबोध जैन ने पूछे थे 25 सवाल : सहारा इंडिया के कॉरपोरेट कम्युनिकेशन्स का कहना है कि वह सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का सम्मान करता है। मामले से संबंधित प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारी के खिलाफ वह तब तक कुछ कहने की स्थिति में नहीं है जब तक कि सुप्रीम कोर्ट से उसे इसकी इजाजत न मिल जाए। कॉरपोरेट कम्युनिकेशन्स की ओर से लखनऊ में जारी एक बयान में यह भी कहा गया है कि इस मामले में सहारा बेदाग है।

2 जी स्पेक्ट्रम मामले या अन्य किसी प्रकरण में उसका मेसर्स स्वान से कोई लेना-देना नहीं है। उसने मीडिया की उन रिपोर्टों का भी खंडन किया है जिनमें कहा गया है कि सहारा ने मेसर्स स्वान में 150 करोड़ रुपये का निवेश किया है। कॉरपोरेट कम्युनिकेशन्स ने सहारा पर लगाए गए आरोपों को निराधार और बदनीयती भरा बताया है। उसने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट की अनुमति मिलने के बाद वह मामले की सच्ची तस्वीर सबके सामने प्रस्तुत करेगा। उसने कोर्ट से यह भी निवेदन किया है कि यदि सहारा पर लगाए गए आरोप झूठे और निराधार साबित होते हैं तो वह इसके लिए जिम्मेदार लोगों को भी सजा दे।

उल्लेखनीय है कि सहारा ग्रुप के सीएमडी को मनी लांड्रिंग निवारण अधिनिमय के तहत दो फरवरी और उसके बाद समन जारी किए जाने के बाद प्रवर्तन निदेशालय के सहायक निदेशक राजेश्वर सिंह को जिस घटिया तरीके से डराया-धमकाया गया और ब्लैकमेल करने की कोशिश गई, उसे पीठ ने बहुत गंभीरता से लिया। व्यक्तिगत रूप से सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर करने वाले प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के अधिकारी राजेश्वर सिंह ने कोर्ट से कहा है कि पत्रकार सुबोध जैन ने उन्हें 25 सवाल भेजे हैं।

ये सवाल उनकी व परिवार की संपत्ति, संपर्क और अन्य मुद्दे से जुडे़ हैं। इसके साथ ही उनके खिलाफ सिलसिलेवार खबरें प्रकाशित-प्रसारित कराने का अभियान चलाने की धमकी दी। पत्रकार सुबोध जैन द्वारा सिंह को पत्र लिख कर व्यक्तिगत सवाल पूछने को अदालत ने बहुत गंभीर मामला माना है। अदालत ने कहा कि यह बहुत हास्यास्पद है कि सहारा के सीएमडी को नोटिस जारी करने के बाद जांच अधिकारी राजेश्वर सिंह की निजी जिंदगी को कलुषित करने का प्रयास किया गया। पीठ ने कहा कि मामला जितना नजर आता है, उससे कहीं अधिक है। एक अधिकारी को रिश्वत देने की कोशिश भी की गई। अदालत ने कहा कि सीबीआइ, ईडी और आयकर विभाग बगैर किसी से प्रभावित हुए अपनी जांच करेंगे। कितनी भी बड़ी ताकत इसमें बाधा डालने की कोशिश करेगी तो उससे कठोरता से निपटा जाएगा।

2जी स्पेक्ट्रम प्रकरण की जांच में अड़ंगेबाजी को सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए सुब्रत रॉय और दो पत्रकारों उपेंद्र राय और सुबोध जैन को अवमानना नोटिस जारी कर छह हफ्ते के अंदर जवाब तलब किया है। न्यायाधीश जीएस सिंघवी और एके गांगुली की पीठ ने कहा-‘दस्तावेजों को देखने के बाद प्रथम दृष्ट्या हमारा मानना है कि राजेश्वर सिंह द्वारा की गई जांच में हस्तक्षेप की कोशिश की गई है। इसलिए हमने स्वत: संज्ञान लिया और उन्हें नोटिस भेजा है।’

पीठ ने सहारा इंडिया न्यूज नेटवर्क और उसकी आनुषांगिक इकाइयों द्वारा राजेश्वर सिंह से संबंधित किसी भी कार्यक्रम या खबर के प्रकाशन या प्रसारण पर प्रतिबंध लगा दिया है। पीठ ने कहा कि कोई भी स्टोरी प्रकाशित नहीं होनी चाहिए। यदि ऐसा होता है तो कोई बड़ा आदमी ‘सरकारी मेहमान’ बनेगा। उन्हें मालूम होना चाहिए कि ‘लक्ष्मण रेखा’ क्या है। पीठ ने इस पर दुख जताया कि ईडी द्वारा सुब्रत रॉय को चेन्नई की कंपनी एस-टेल के साथ लेन-देन के दस्तावेजों के साथ पेश होने के लिए नोटिस जारी करने के बाद पत्रकार उपेंद्र राय और सुबोध जैन इस जांच में हस्तक्षेप करने के लिए सक्रिय हो गए। राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे को लेकर एस-टेल सीबीआइ के जांच के दायरे में है।

बेसहारा होने की राह पर चल पड़ा है सहारा समूह!

यशवंत सिंहभर पेट विज्ञापन दे देकर मीडिया हाउसों का मुंह बंद करने में अब तक सफल रहे सहारा समूह के खिलाफ न जाने क्यों एचटी ग्रुप के अखबार सच्चाई का प्रकाशन करने में लग गए हैं. यह सुखद आश्चर्य की बात है. हो सकता है हिंदुस्तान को सहारा समूह से नए विज्ञापन दर पर बारगेन करना हो या फिर शोभना भरतिया व सुब्रत राय में किसी बात को लेकर तलवारें खिंच गई हों.

और, जनता के पैसे से दुनिया भर की एय्याशियों को प्रायोजित करने वाले सुब्रत राय सहारा खुद के समूह में सैकड़ों-हजारों छेद होने के कारण दूसरों से क्या पंगा लेंगे, सो शोभना भरतिया ने इशारा कर दिया हो तो हिंदुस्तान वाले एकतरफा सहारा से मोहब्बत करने लगे हों. कारण चाहें जो हो लेकिन यह सुखद है कि सहारा समूह की सच्चाई सामने आने लगी है. बीर बहादुर सिंह समेत कई नेताओं के संरक्षण और निवेश की सैकड़ों सही-गलत कहानियों के बल पर लगातार टिके रहने वाले सहारा समूह और इसके सर्वेसर्वा सुब्रत राय सहारा के लिए आगे आने वाले दिन काफी मुश्किल भरे हैं.

पटाने और पंगा लेने की रणनीति पर चलने वाले सहारा ग्रुप की पोल खुलती जा रही है. यह समूह जिस चिटफंड के धंधे से आने वाले पैस के बल पर शहंशाह बना हुआ है, उसकी मियाद भी अगले माह जून में खत्म होने वाली है. रिजर्व बैंक आफ इंडिया ने 15 जून 2011 तक के लिए चिटफंड का धंधा करने की अनुमति दे रखी है. वजह, सहारा की चिटफंड कंपनी का मानक न पूरे करना और तमाम तरह के गड़बड़झाले के लिप्त होना. सहारा के बड़े पदों पर आसीन पत्रकार, मैनेजर, मालिक सब एड़ी चोटी का जोर लगा बैठे हैं कि आरबीआई चिटफंड के धंधे की अवधि को विस्तार दे दे.

सूत्रों पर भरोसा करें तो इसके लिए वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी तक से सहारा श्री सुब्रत राय सहारा की बैठक कराई जा चुकी है. भारतीय क्रिकेट टीम का प्रायोजित कर अरबों खरबों रुपये फूंकने वाले सहारा समूह के लिए शीर्षतम नेताओं को पटा लेना कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन कई एक संस्थाएं सहारा समूह से बुरी तरह नाराज हो चुकी हैं. इनकम टैक्स वाले अधिकारी तो कसम खाए बैठे हैं कि सहारा वाले जहां मिलें, वहां रगड़ो. वजह यह कि एक इनकम टैक्स अधिकारी को सहारा वालों ने बहुत जलील किया था और उसी कारण उस बैच के सभी अफसरों ने कसम खा रखी है कि इसका बदल लिया जाएगा. इसी तरह आरबीआई को चैलेंज करने वाले सहारा समूह की अकल ठिकाने लगाने के लिए आरबीआई के अधिकारियों ने भी कमर कस रखी है.

न्यायपालिका का भी एक हिस्सा सहारा से खफा है. सहारा वाले की एक खास आदत है. वो ये कि पहले तो वे सामने वालों को मैनेज करने की कोशिश करते हैं. और जब वो मैनेज होने से इनकार करता है तो उस पर उसके उपर के बासेज से दबाव डलवाते हैं, फिर भी नहीं वो मानता है तो फिर सामने वाली की हिस्ट्रीशीट पता करके उसे प्रचारित और विज्ञापित करने लगते हैं और एक बड़े कुप्रचार अभियान के बल पर उसे दंडित कराने और हटवाने में सफल रहते हैं. पिछले दिनों दिल्ली हाईकोर्ट के एक जज के खिलाफ राष्ट्रीय सहारा अखबार और सहारा समय चैनलों पर चला कंपेन ताजा उदाहरण है. इस जज अजय पांडेय ने सहारा वालों की जबरदस्त वाट लगाई थी. कई वारंट और आदेश जारी कर दिए थे. सो, अजय पांडेय के खिलाफ सहारा समूह ने अभियान सा चला दिया.

सोचिए, सहारा समूह कितना देशभक्त समूह है. क्रिकेटरों, फिल्म स्टारों, नेताओं, होटलों की खरीद इत्यादि पर नोटों की बरसात करने वाला यह समूह देश की संस्थाओं की किस तरह बैंड बजा रहा है, यह अपने आप देशद्रोह है. लेकिन एक तरफ चरम राष्ट्रभक्ति का दिखावा करने वाले और दूसरी ओर अपना काम न निकलने पर राष्ट्र के आंख-नाक-कान की तरह काम करने वाली संस्थाओं के ईमानदार लोगों को बेइज्जत व पनिश कराने वाले सहारा समूह का जो ‘कारपोरेट खेल’ खेलने का तरीका है, वो लोगों-जनता को कनफ्यूज किए हुए हैं. बाजार वालों की कृपा से क्रिकेट जब राष्ट्रभक्ति का चरम प्रतीक बन गया हो, आस्था का प्रतीक बन चुका हो तो सहारा छाप टीशर्ट भी सहारा समूह को राष्ट्रभक्ति और आस्था का लाइसेंस दिलाने के लिए काफी है. इस लाइसेंस के बल पर जनता से पैसा उगाहना आसान हो जाता है.

इस लाइसेंस के बल पर ईमानदार संस्थाओं और ईमानदार अफसरों को धमकाना आसान हो जाता है. इस लाइसेंस के बल पर हर कहीं खुद को पवित्र और महान बताना आसान हो जाता है. दुर्भाग्य तो देखिए कि जब भारत की टीम विश्वकप क्रिकेट का मैच जीतती है तो सहारा में काम करने वाले कर्मचारियों का दिल धक से होकर रह जाता है. वजह यह कि विजेताओं पर सहारा समूह नोटों की अतिरिक्त बरसात करेगा और इसे सहारा के कर्मियों से वसूला जाएगा. भूकंप आए या विश्वकप जीते, सहारा समूह पैसे बरसाने में आगे रहता है लेकिन इसकी भरपाई अपने कर्मियों की सेलरी काट के करता है.

इनक्रीमेंट, पेंशन, भुगतान के लिए परेशान सहारा के पत्रकार, रिटायर पत्रकार, स्ट्रिंगर जब रोते-कलपते हैं तो लगता है कि नोटों की बारिश करने वाले ग्रुप के अंदर यह हालत क्यों है. फिर याद आता है वो मुहावरा. दूर के ढोल सुहावने होते हैं. सहारा के नजदीक जाने पर पता चलता है कि ताश के पत्तों पर खड़ा ये साम्राज्य है जिसका विस्तार विदेश तक हो चुका है. लंदन में होटल करके भले सहारा ने एक नया इतिहास रचा है लेकिन कुछ लोग ये भी कहने लगे हैं कि भारत में धंधा कोलैप्स होने पर विदेश भागने और रहने का पुख्ता इंतजाम कर चुके हैं सहाराश्री. पता नहीं ये जुमला-जोक, कितना सच है लेकिन कुछ तो है.

क्योंकि  सेबी (सिक्योरिटी एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया) की पाबंदी के बावजूद सहारा इंडिया परिवार समूह की दो कंपनियां सहारा हाउसिंग इनवेस्टमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड व सहारा इंडिया रियल एस्टेट कॉरपोरेशन लिमिटेड अभी भी जिस तरह से आम लोगों से पैसा बटोर रही हैं, वो बता रहा है कि सहारा समूह कितना ढीठ ग्रुप है और उसने शीर्ष स्तर पर नेताओं को किस कदर पटा रखा है. न कोई डर न भय. बता दें कि सेबी ने सहारा की इन दोनों कंपनियों पर नवंबर में आम लोगों से पैसा एकत्र करने पर रोक लगाई थी. तब सहारा ने इलाहाबाद हाईकोर्ट से स्टे ले लिया था.

बाद में स्टे निरस्त हो गया तो सेबी की पाबंदी सात अप्रैल से पूरी तरह से अस्तित्व में आ गई. सहारा का कहना है कि हाईकोर्ट के फैसले की जानकारी चार दिन पहले मिली है और कंपनी ने पैसा एकत्र करने की प्रक्रिया पर रोक के लिए कह दिया है. सहारा समूह के मुताबिक कोर्ट के निर्णय की जानकारी कंपनी को 11 अप्रैल को हुई. 11 व 12 अप्रैल को छुट्टी रहने के चलते इस प्रक्रिया पर पूर्ण रूप से रोक नहीं लगाई जा सकी. रोक लगाने के लिए कंपनी को उचित समय चाहिए. सहारा की आधिकारिक एजेंसी के अनुसार उच्च न्यायालय के आदेशों का उल्लंघन करने की कंपनी की कोई मंशा नहीं है. कंपनी उच्च न्यायालय के आदेशों का पालन करने के लिए वचनबद्ध है.

देखा आपने. ये है सहारा की भाषा. किसी कूटनीतिक नेता की भाषा है इस समूह की. पैसे बटारते रहने का काम ग्राउंड लेवल पर जारी है और पब्लिक में स्टेटमेंट दे रहे हैं कि पैसा बटोरने का काम बंद करने के लिए वक्त चाहिए. हिंदुस्तान अखबार ने इसी बात का खुलासा किया है कि प्रतिबंध के बावजूद अब भी पूरे देश में सहारा समूह के एजेंट्स विवादित डिबेंचर्स बेंच रहे हैं. इन डिबेंचर्स को आम तौर पर सहारा की दो कंपनियों द्वारा जारी हाउसिंग बांड के रूप में जाना जाता है. उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र व गुजरात में सैकड़ों एजेंट्स के अनुसार उन्हें कंपनी से इन डिबेंचर्स की बिक्री रोकने के संबंध में अब तक कोई निर्देश नहीं मिले हैं. सेबी के सलाहकार आरएन त्रिवेदी के अनुसार यह पूर्ण रूप से उच्च न्यायालय के निर्देशों का उल्लंघन है. यदि हमें किसी प्रकार के सबूत मिलते हैं कि सहारा की इन फर्मों द्वारा अभी भी आम लोगों से पैसा एकत्र किया जा रहा है तो हम उच्च न्यायालय के निर्देशों के उल्लंघन का मामला उठाएंगे.

सुनिए, यूपी के गोरखपुर में सहारा के एजेंट जीएन दीक्षित क्या कहते हैं. दीक्षित जी बताते हैं कि कंपनी ने अब तक बांडों की बिक्री रोकने के लिए कुछ नहीं कहा है. इसी कारण हम लोग निर्माण, अबोड व हाउसिंग बांड बेच रहे हैं.ज्ञात हो कि सहारा समूह की फर्मों के लिए तीन स्कीमों अबोड बांड, निर्माण व रियल एस्टेट स्कीमों के जरिए पैसा एकत्र किया जाता है. पूरे देश में सहारा के एजेंट किसी प्रकार की रोक के बारे में नहीं जानते हैं और लगातार आम लोगों से पैसा एकत्र कर रहे हैं. सहारा इंडिया रियल स्टेट व सहारा हाउसिंग इनवेस्टमेंट द्वारा कंपनी रजिस्ट्रार के यहां दी गई पिछली वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार इन्होंने बाजार से जून 2009 तक बांडों के जरिए 4843 करोड़ रुपए जुटाए.

सहारा के इन बांडों में पैसा लगाने वाले कितना बड़ा रिस्क उठा रहे हैं, इसका उन्हें कतई अंदाजा नहीं होगा. सेबी का कहना है कि सहारा के इन डिबेंचर्स को जारी करने में किसी भी नियम का पालन नहीं किया गया है. मुम्बई स्थित इनवेस्टर एंड कंज्यूमर गाइडेंस सोसाइटी के जनरल सेक्रेट्री अनिल उपाध्याय का तो यहां तक कहना है कि यहां आम लोगों का काफी पैसा डूबता दिख रहा है. इसके चलते यहां एक एडमिनिस्ट्रेटर नियुक्त करने की मांग भी की जाएगी.

आपको पता ही होगा कि शुक्रवार को सेबी ने सार्वजनिक सूचना के जरिये निवेशकों को यह सूचित किया कि सहारा समूह की कंपनियों को ‘वैकल्पिक रूप से पूरी तरह परिवर्तनीय डिबेंचर'(ओएफसीडी) के जरिये कोष जुटाए जाने से प्रतिबंधित किए जाने का आदेश इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ न्यायपीठ द्वारा बरकरार रखा गया है। न्यायालय ने 7 अप्रैल 2011 को इस संबंध में आदेश जारी किया था। सेबी से  नवंबर 2010 में सहारा इंडिया रियल एस्टेट कॉरपोरेशन और सहारा हाउसिंग इन्वेस्टमेंट कॉरपोरेशन को अगला आदेश नहीं आने तक जनता से जुटाए जाने से प्रतिबंधित कर दिया था.

इन कंपनियों पर यह आरोप लगाया था कि हालांकि उन्होंने ओएफसीडी के जरिये धन जुटाया था, लेकिन बाजार नियामक द्वारा इसकी इजाजत हासिल नहीं थी. बाजार नियामक ने सुब्रत रॉय सहारा और रवि शंकर दुबे समेत इन कंपनियों के प्रवर्तकों को भी नया आदेश नहीं आने तक जनता से धन जुटाए जाने से प्रतिबंधित कर दिया. इन प्रवर्तकों को इस मामले में सख्ती नहीं बरते जाने के लिए कारण बताओ नोटिस जारी किया गया. सार्वजनिक अधिसूचना के अनुसार हालांकि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के लखनऊ पीठ ने 13 दिसंबर 2010 को सेबी के आदेश को बरकरार रखा और नियामक को अपनी जांच बरकरार रखने को कहा गया. इस बीच सेबी ने सर्वोच्च न्यायालय में भी एक विशेष अनुमति याचिका दायर कर दी है. सर्वोच्च न्यायालय ने इन कंपनियों से किसी भी तरह की जानकारी मांगने की अनुमति दे दी है.

कुल मिलाकर फिलहाल कानूनी झमेले और पचड़े में फंस चुके सहारा समूह का बाल बांका होता नहीं दिख रहा है क्योंकि सहारा समूह के खिलाफ एक्शन लेने वाली संस्थाओं के उपर ऐसे भ्रष्ट नेताओं का हाथ है जो एक्शन लेने के लिए आगे बढ़ने वाले अफसरों-संस्थाओं के पैरों में बेड़ियां जकड़ देते हैं और मामला ठंडा पड़ जाता है. इस प्रकार सहारा समूह चुपचाप एक कदम और आगे बढ़ चुका होता है.

लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ जाग चुकी देश की जनता को अब सहारा का खेल समझने में वक्त नहीं लगेगा. जिन भी कुछ वजहों से हिंदुस्तान अखबार ने सहारा के खिलाफ अभियान चलाया है, और मुंबई में कई एक्टिविस्ट किस्म के लोग सहारा की असलियत सामने लाकर बैंड बजाने के अभियान में लगे हुए हैं, उससे उम्मीद बंधती है कि जल्द ही सहारा को बेसहारा होना पड़ सकता है. मीडिया के ईमानदार लोगों, खासकर न्यू मीडिया से अपील है कि वे सहारा समूह की वास्तविकता जनता के सामने ले आएं, अन्य गड़बड़झालों को उजागर करें, पीड़ितों को सामने लाएं और जनता को ठगे जाने से बचाएं.

सवाल एक और भी है. सिर्फ एचटी मीडिया के ही अखबार क्यों सहारा समूह से जुड़ी खबरें छाप रहे हैं. बाकी अखबारों को सेबी के आदेशों और दो कंपनियों द्वारा जनता से जबरन धनउगाही की परिघटना नहीं दिखाई देती है. न्यूज चैनल क्यों सोए पड़े हैं. इसलिए कि मालिक-मालिक एक होता है. इसलिए कि सहारा समूह इतना विज्ञापन दे देता है कि ये मीडिया हाउस इतनी बड़ी रकम को खोना नहीं चाहते.

देर-सबेर बाकी मीडिया हाउसों को भी ये जवाब देना होगा. यहां यह बताना सही रहेगा कि मीडिया हाउसों के गलत कामों को आमतौर पर दूसरे मीडिया हाउस नहीं छापते लेकिन इधर के दिनों में एक नई परंपरा शुरू हुई है. कुछ मीडिया हाउस दूसरे मीडिया हाउसों के कारनामों को जमकर छापने लगे हैं. भास्कर समूह के जिन प्रोजेक्ट्स के खिलाफ छत्तीसगढ़ की जनता सड़कों पर है, उसकी सच्चाई का प्रकाशन द हिंदू, हिंदुस्तान, पत्रिका समेत कई अखबारों ने किया. यह अच्छा संकेत है. इसे जारी रहना चाहिए. लेकिन सहारा वाले मामले में दूसरे मीडिया हाउसों की खौफनाक चुप्पी रहस्यमयी है.

(इस आलेख में हिंदुस्तान में प्रकाशित दो खबरों से कुछ इनपुट लिए गए हैं)

लेखक यशवंत अमर उजाला, दैनिक जागरण और आई-नेक्स्ट में करीब 12 वर्षों तक कई शहरों में कई पदों पर काम करने के बाद पिछले चार वर्षों से दुनिया के सबसे बड़े हिंदी कम्युनिटी ब्लाग भड़ास और हिंदी के सबसे चर्चित और तेवरदार पोर्टल भड़ास4मीडिया डॉट कॉम के संपादक के रूप में कार्यरत हैं. यशवंत से संपर्क yashwant@bhadas4media@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

इन महानुभावों ने सुब्रत राय सहारा को ही चूना लगाने की हिम्मत दिखा दी!

ठगी और चोरी के सैकड़ों-हजारों किस्से जिस सुब्रत राय सहारा के नाम से जुड़े हों और जिसने कई तरह के दंद-फंद के जरिए सहारा समूह नामक विशाल साम्राज्य खड़ा कर दिया हो और जो अपने विरोधियों को परास्त करने के लिए किसी भी लेवल पर जाने के लिए कुख्यात हो, उस सुब्रत राय सहारा को कोई चूना लगाने की सोच ले तो उसे वाकई हिम्मती कहा जाएगा.

अब यह नहीं पता चल पा रहा है कि चूना लगाने वालों को यह अंदाजा था या नहीं कि वे उस व्यक्ति को चूना लगाने जा रहे हैं जिसे इस समय के कुछ बड़े खिलाड़ियों में से माना जाता है. दैनिक भास्कर के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित अभिषेक रावत की इस बाइलाइन खबर को पढ़िए…

सहारा प्रमुख राय के दस्तावेज से वीजा लेने की कोशिश

अभिषेक रावत

नई दिल्ली. देश के प्रमुख औद्योगिक घराने सहारा समूह के प्रमुख सुब्रत राय सहारा ने शायद ही कभी सोचा होगा कि कोई ट्रक चालक व लुटेरा उनके निजी बैंक खाते व इनकम टैक्स रिटर्न को आधार बनाकर ब्रिटेन का वीजा पाने के लिए आवेदन कर सकता है। लेकिन, हकीकत में ऐसा ही हुआ है। इस बात की जानकारी मिलने पर सहारा समूह के अधिकारियों के होश फाख्ता हो गए। तुरंत ही मामले की जानकारी दिल्ली पुलिस को दी गई, जिसके बाद पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर तीन लोगों को गिरफ्तार कर लिया है।

नई दिल्ली जिला पुलिस के एक अधिकारी ने बताया कि 29 मार्च को सहारा इंडिया परिवार के सुरक्षा प्रभारी कुलदीप शर्मा ने सूचना दी कि उन्हें ब्रिटिश उच्चायोग की ओर से एक ई-मेल मिला है। इसमें बताया गया है कि दो युवकों पलविंद्र सिंह व गुरताज ने यूके के वीजा के लिए खुद को सहारा इंडिया परिवार का कर्मचारी बताया है। इसके साथ ही सहारा इंडिया परिवार के दो पहचान पत्रों के अलावा सहारा प्रमुख सुब्रत राय सहारा के आईसीआईसीआई बैंक, लखनऊ शाखा के निजी खाते की स्टेटमेंट व इनकम टैक्स रिटर्न भी संलग्न किया गया है।

इसके अलावा, एक लेटर भी है, जिसमें बताया गया है कि दोनों युवकों को सुब्रत राय सहारा के साथ यूके जाना है। इस ई-मेल के बाद सहारा प्रबंधन ने जांच की तो मालूम हुआ कि वीजा का आवेदन करने वाले उनके कर्मचारी ही नहीं हैं और उनके पहचान पत्र भी फर्जी हैं। लेकिन, सुब्रत राय सहारा के बैंक स्टेटमेंट व रिटर्न की डिटेल जरूर असली हैं। शिकायत के आधार पर चाणक्यपुरी पुलिस थाने में एफआईआर दर्ज कर ली गई तथा जांच स्पेशल स्टाफ के सुपुर्द की गई। जांच के दौरान पुलिस ने कुरुक्षेत्र निवासी पलविंदर को गिरफ्तार किया।

उसने बताया कि वह पेशे से ट्रक चालक है। वह कुरुक्षेत्र निवासी महेंद्र नामक युवक से मिला था, जिसने उसे ब्रिटेन का वीजा दिलाने की बात कही थी। उसे बंगला साहिब गुरुद्वारे के पास अमित नामक युवक से मिलने के लिए भेजा गया, जहां एक अन्य युवक गुरताज भी आया था। इसके बाद अमित ने दोनों के पासपोर्ट ले लिए और उन्हें कुछ दिन बाद मिलने के लिए बुलाया। कुछ दिन बाद जब दोनों अमित से मिले तो उसने दोनों के नाम के सहारा इंडिया परिवार के पहचान पत्र, सुब्रत राय सहारा की बैंक स्टेटमेंट व इनकम टैक्स रिटर्न आदि के दस्तावेज थमाए तथा दोनों को ब्रिटिश उच्चायोग में वीजा आवेदन के लिए भेज दिया।

इसकी निशानदेही पर पुलिस ने अमित को गिरफ्तार किया, जिसने खुलासा किया कि वह अशोक मेहता नामक एक ट्रैवल एजेंट के लिए फील्ड ब्वॉय का काम करता था। अशोक मेहता सहारा इंडिया परिवार के प्रमुख व उनके कर्मचारियों के लिए वीजा आवेदन जैसे काम करता है। जबकि, अमित को वीजा कलेक्ट करने के लिए भेजा जाता था। कुछ माह पूर्व सहारा के 30-32 उच्चधिकारी इंग्लैंड गए थे। उस समय अमित ने सुब्रत राय सहारा व अन्य अधिकारियों के दस्तावेजों की फोटो कॉपी अपने पास रख ली थी। इसके बाद ही उसने फर्जी वीजा दिलाने का काम शुरू कर दिया।

पुलिस ने अमित की निशानदेही पर एक साइबर कैफे मालिक को भी गिरफ्तार किया है, जिसने पलविंदर व गुरताज के फर्जी पहचान पत्र तैयार करने के अलावा सुब्रत राय सहारा की असली बैंक स्टेटमेंट व इनकम टैक्स रिटर्न की कॉपी को स्कैन कर प्रिंट तैयार किया था। पुलिस ने बताया कि गुरताज फरार है, जिसकी तलाश की जा रही है। वह ऊधम सिंह नगर (उत्तरांचल) का रहने वाला है और उसके खिलाफ उत्तरांचल में लूट का मामला भी दर्ज है। पुलिस यह पता लगा रही है कि सहारा प्रमुख की असली बैंक स्टेटमेंट व रिटर्न अमित तक कैसे पहुंची। साभार : दैनिक भास्कर

यशवंत और हरेराम की सोच संकीर्ण है

: सुब्रत रॉय बड़ी सोच व अंतरराष्ट्रीय समझ वाले : हरेराम मिश्रा का पत्र एवं यशवंत जी आपका लेख (सम्पादकीय) पढ़ा। सुब्रत रॉय की भावनात्मक अपील भी अखबारों में पढ़ी। दिलचस्प बात यह लगी कि मुझे न तो सुब्रत रॉय और न आप और न ही हरेराम गलत दिखाई दिये।

हां, सबकी सोच-समझ में अंतर जरूर दिखा। जहां आपकी और हरे राम मिश्रा की सोच संकीर्ण और बचकानी लगी, जो कि अपनी जगह सही है, रॉय की सोच बड़ी और अन्तरराष्ट्रीय समझ से परिपूर्ण लगी। यशवंत जी, एक घर के एक व्यक्ति ने घर में आग लगा दी तो सारे घर वाले उसे मारने लगे और जोर-जोर से गालियां देने लगे थे। किसी ने पूछा ‘अरे भाई तुम लोग अपने घर की आग क्यों नहीं बुझाते। इस व्यक्ति को तो एक आदमी पकड़कर रख सकता है और इसका फैसला बाद में हो सकता है। ‘घर फूंक तमाशा’ करने से क्या फायदा? – यही बात अगर सुब्रत रॉय जैसा व्यक्ति कहता है तो यशवंत जी इसमें क्या बुरा है? मगर हरे राम मिश्रा जी की सोच तो उनके महंगे होते आलुओं से ऊपर जा ही नहीं सकती, जो अपनी जगह सही भी है, मगर अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की गरिमा और प्रगति को दर्शाने वाला कोई भी समारोह, जो याद रहे, इस देश में नये रोजगार और अवसर के लिए आकर्षित कर सकता है, उसको कैसे दर्शाया जाए?

रॉय ने यह अच्छी बात की है कि मीडिया ने एक अच्छा काम किया है। इस धांधली को उजागर करके, मगर जैसा कि हम आपस में जानते हैं कि मीडिया की आपस की होड़ ब्रेकिंग न्यूज़ व इक्सक्लूसिव स्टोरी का चस्का, बाईलाइन का नशा और दिल में महंगे आलुओं का गम अगर इस धांधली की खबर को इतना बड़ा बना दे कि भारत की छवि को गर्क करने की, जांच-पड़ताल में बाधा पहुंचाने और कॉमनवेल्थ गेम की तैयारियों को सुस्त करके अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर मजाक बनने जैसे दिव्य कार्य को अगर अंजाम दे रहा है, तो मेरी समझ से यह अति निन्दनीय है। आरुषि केस में सुप्रीम कोर्ट मीडिया की ऐसी ही टुच्ची हरकतों पर फटकार लगा चुका है। दो महीने बाद जब देश-विदेश के विख्यात खिलाड़ी, हजारों-लाखों में विदेशी दर्शक जब भारत में होंगे तो क्या यह जरूरी नहीं कि एक अच्छा आयोजन करने का बीड़ा जब देश ने उठाया है, उसमें सहयोग किया जाए!

रॉय ने अपनी अपील में सब ही नहीं प्रत्येक नागरिक से सहयोग की बात कही थी, जो अनसुनी रह गयी क्योंकि भारत का एक काक्रोच दूसरे काक्रोच की टांग खीचने में मगन है – चाहें वह बोफोर्स काण्ड या भोपाल त्रासदी हो या हजारों अन्य घोटाले हों। ‘श्वेताम्बरी’ मीडिया ने क्या उखाड़ लिया। खबर पुरानी होते ही सारे श्वेताम्बर त्याग दिये जाते हैं और टीआरपी का नंगा नाच फिर शुरू हो जाता है। इस केस में मीडिया को यही डर है कि कहीं यह खबर पुरानी न हो जाए और बाद में इसे कवर करने में मस्त करने वाली टीआरपी और कवर-स्टोरी से वंचित रह जाएं।

मैं कोई सहारा का भक्त नहीं हूं, न ही कभी सुब्रत रॉय से मिला हूं या न तो मिलने की कोई इच्छा है, मगर यदि कोई भी व्यक्ति एक बड़ी सोच व भविष्य की समझ के अंतर्गत एक बात सामने रखता है तो सकारात्मक कार्रवाई और विचार-विमर्श की आवश्यकता होनी चाहिए।

यशंवत जी, हमें, मिश्रा जी को और हम सबको न सिर्फ अपनी बल्कि हमारी आगामी पीढ़ी को ध्यान में रख के एक सार्थक चिन्तन करना चाहिए। राजा दशरथ के राज दरबार में नृत्य कोई बुरी बात नहीं, केवल राज्य की सम्पदा का शक्तिशाली प्रदर्शन और एक आवश्यकता है – यह एक राजा ही समझ सकता है। हम सिर्फ नृत्य देखते हैं और वह इसके पीछे छिपी नीति समझता है।

मृत्युंजय कुमार

mkamrita78@gmail.com


यह पत्र भड़ास4मीडिया पर प्रकाशित ”सहाराश्री की राष्ट्रभक्ति पर संदेह करें या ना करें?” के जवाब में आया है. लेखक ने अपने परिचय में सिर्फ अपना नाम व मेल आईडी भेजा है, जिसे प्रकाशित करा दिया गया है. -एडिटर

सहाराश्री की राष्ट्रभक्ति पर संदेह करें या ना करें?

सुब्रत राय उर्फ सहाराश्री आजकल चर्चा में हैं. सड़क से शिखर (आर्थिक मामलों में) तक की यात्रा करने वाला यह आदमी अपना अच्छा खासा मीडिया हाउस होते हुए भी अपनी बात दूसरे मीडिया हाउसों के अखबारों-चैनलों में विज्ञापन देकर प्रकाशित प्रसारित कराता है. पिछले दिनों सहाराश्री का ऐसा ही एक विचारनुमा विज्ञापन विभिन्न अखबारों में प्रकट हुआ. इसमें उन्होंने कई इफ बट किंतु परंतु लेकिन अगर मगर करते हुए संक्षेप में जो कुछ कहा वह यह कि… अभी कामनवेल्थ के घपलों-घोटालों पर बात न करो, ऐसा राष्ट्रहित का तकाजा है, अभी कामनवेल्थ की जय जय कर खेलों को सफल बनाओ ताकि दुनिया में अपने देश की इज्जत बढ़ाने वाली बातें फैले, बदनामी फैलाने वाली हरकतें बंद करो. सुब्रत राय उर्फ सहाराश्री ने मुंह खोला है तो कौन उनकी बात काटे. ज्यादातर ने चुप्पी साध रखी है. अपने देश में रिवाज रहा है राजाओं-महाराजाओं की बात न काटने का और उनकी हां में हां करने का. आजकल के राजा-महाराजा ये बिजनेसमैन ही तो हैं.

सहाराश्री बहुत बड़े आदमी हैं. अखबार, न्यूज चैनल, मनोरंजन चैनल, मैग्जीन… ढेर सारे हथियार उनके हाथ में हैं. जाने किस पत्रकार को उनके यहां नौकरी करनी पड़ जाए, सो, सभी चुप रहना बेहतर समझते हैं. बिना किसी बात एक दूसरे की पैंट उतारने पर आमादा रहने वाले पत्रकार सहाराश्री के विज्ञापनी भाषण पर चुप हैं. अन्य अखबार-चैनल वाले इसलिए नहीं बोल रहे क्योंकि उनके अखबारों-चैनलों में सहाराश्री के विचार को विज्ञापन की शक्ल में परोसा जा चुका है. मतलब, मुंह बंद करने में समर्थ यथोचित मुद्रा का जाल पहले ही फेका जा चुका है. वैसे भी सहारा वाले दूसरे अखबारों चैनलों को साल में कुछ एक बार विज्ञापन जरूर दे देते हैं, कई पन्नों के, ताकि, जरूरत पड़ने पर सहारा समूह के खिलाफ किसी जेनुइन खबर को ड्राप कराया जा सके, चिटफंड बैंकिंग के धंधे के गड़बड़ घोटाले से जुड़ी खबरें प्रकाशित होने से रोकी जा सकें. इस बार सहाराश्री ने एक दाम में दो काम कर दिया है. विज्ञापन देकर मीडिया मालिकों को खुश कर दिया, साथ में अपने विचार की थोक मात्रा में सप्लाई भी कर दी. विज्ञापन का पैसा गया मीडिया मालिकों की जेब में, विचार की खुराक का प्रवाह हो गया देश की जनता के कपार में.

विचारों की अधकपारी से पीड़ित ढेर सारे लोग बड़े असमंजस में हैं. वे राष्ट्रभक्ति की परिभाषा फिर से जानने की कोशिश कर रहे हैं. उन्हें अपने ज्ञान पर संदेह होने लगा है. वैसे भी, बाजारीकरण में डुबकी लगाकर कई शब्दों की परिभाषाएं नई-नवेली हो गई हैं. पुरानी परिभाषाओं को आर्काइव कर दिया गया है, म्यूजियम में. जिन्होंने जनता के बीच रहकर समाज, देश और राष्ट्र की परिभाषा समझी है, उनके मन भी शंकालु हो उठे हैं. ऐसे लोग मन ही मन सवाल उठा रहे हैं- ये कैसी राष्ट्रभक्ति है जो भ्रष्टाचार पर बाद में बात करने की बात कहती है. कहीं ये भरे पेट वालों की तो राष्ट्रभक्ति नहीं. लूट-खसोट जारी रहे, लुटेरे कायम रहें, लुटेराराज कायम रहे, जनता की दौलत पर अंधेरगर्दी मची रहे, सहाराश्री मार्का राष्ट्रभक्ति का तो यही कहना है. सहाराश्री यहीं नहीं रुकते. वे मीडिया वालों से भी अपील कर डालते हैं कि मत दिखाओ बदनाम करने वाली खबरें. अंडरप्ले करो भ्रष्टाचार की खबरें. खेल खत्म हो जाएगा तो खेल के नाम पर हुए खेल की खोल में घुसा जाएगा.

फेसबुक पर एनडीटीवी वाले रवीश कुमार अपने स्टेटस को व्यंग्यात्मक अंदाज में अपडेट करते हैं, बिना किसी का नाम लिए हुए- ”राष्ट्रहित में भ्रष्टाचार इतना न उजागर कर दें कि कॉमनवेल्थ को लेकर बनने वाली भारतीयों की शान ही खत्म हो जाए। संकट में राष्ट्रवाद अक्सर भावुकता से खुराक पाता है। मात्र तीन चार सौ साल पुराने इस राष्ट्रवाद की ऐसी दुर्गति की उम्मीद तो थी लेकिन इतनी जल्दी ये नहीं सोचा था। पत्रकारों को देशहित में लुटेरे ठेकेदारों से हाथ मिला लेना चाहिए।”

सहाराश्री की राष्ट्रभक्ति की परिभाषा से असहमत कई लोग अब लिखने-मुंह खोलने को तैयार होने लगे हैं. एक चिट्ठी लखनऊ से आई है, हरेराम मिश्रा की तरफ से. उन्होंने सहाराश्री की मार्मिक अपील पर उनको एक जवाबी पत्र लिखा है. क्या लिखा है, आप भी पढ़ें. फिर बताइए, क्या सहाराश्री की राष्ट्रभक्ति पर संदेह करें या ना करें? क्या राष्ट्रभक्ति भी वर्गीय चरित्र लिए हुए है? गरीब की राष्ट्रभक्ति अलग. धनपशु की राष्ट्रभक्ति अलग. एक की राष्ट्रभक्ति कहती है कि भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई करो, तुरंत. दूसरे की राष्ट्रभक्ति भ्रष्टाचार पर बात फिलहाल रोकने की वकालत करती है.

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया


सुब्रत राय सहारा की मार्मिक अपील पर उन्हें एक खुला खत

प्रिय सुब्रत राय साहब,

सप्रेम नमस्कार

आपके द्वारा समाचार पत्रों मे कामन वेल्थ गेम 2010 के लिए आम जनता के नाम की गयी मार्मिक अपील हमने पढी है। आपकी यह मार्मिक अपील उस समय समाचार पत्रों में प्रकाशित हुई है जब चारों ओर से कामन वेल्थ गेम आयोजन समिति पर भ्रष्टाष्टाचार और बेइमानी के सीधे आरोप लगे हैं। आपको और हमको यह नहीं भूलना चाहिए कि भ्रष्टाचार के आरोप प्रथम दृष्टया ही ऐसे हैं कि जिसे कोई नजरंदाज नहीं कर सकता। कृपया ध्यान दें कामन वेल्थ गेम के नाम पर आम आदमी के पैसे की बंदरबांट 2006 से ही आरंभ हो गयी थी। यह बात अलग है कि उस समय कई सामाजिक कार्यकर्ताओं की बात नजरंदाज करते हुए कलमाडी एण्ड कंपनी ने लगातार मनमानी की। आपने अपनी मार्मिक अपील में लिखा है कि इस खेल का आयोजन इस देश के लिए गर्व की बात है। आप यह बताएं कि इस खेल आयोजन से भारत की कौन सी समस्या हल होती देख रहे है। जिस समय आम जनता भारी महंगाई में पिस रही हो और जिस 76 प्रतिशत जनता के लिए दोनों जून रोटी का भरोसा तक ना हो, वह देश पर और उसके इस आयोजन पर कैसे गर्व कर सकती है।

अपनी मार्मिक अपील में आपने यह लिखा है कि हजारों आयोजक और 23000 स्वयंसेवी चौतरफा आलोचना से गहरी निराशा में जा रहे हैं। आप यह बताएं कि आम आदमी का पैसा मनमानी खर्च करके वे हिसाब देने की जिम्मेदारियों से क्यों बच रहे हैं। अगर आयोजन समिति इतनी ही पाक साफ है तो वह यह सिद्ध क्यों नही करती कि कहीं किसी किस्म का कोई घपला नहीं हुआ है। इसमें निराशा में जाने जैसा क्या है। अगर वो पाक साफ है तो आम जनता को खर्च का पूरा हिसाब तत्काल दे।

आपकी अपील में लिखा है कि अगर किसी तरह की अनियमितता हुई हो तो इस खेल के आयोजन के बाद हर कार्यवाही अवश्य हो। क्या आपको अभी भी अनियमितता होने के बारे मे संदेह है। जबकि जांच एजेंसियां इस आयोजन में प्रथम दृष्टया ही भारी अनियमितता मान चुकी हैं। दरअसल कई सामान्य बातें ही आयोजन समिति को गंभीर सवालों के कटघरे में खड़ा कर देती है। जिस समय कलमाडी चौतरफा घिर गये हैं और जिस तरह से आप की मार्मिक अपील कलमाडी की काली करतूतों के साथ खड़ी है, उसे हम बखूबी समझ सकते हैं।

दरअसल आपकी इस मार्मिक अपील में भी आपकी मुनाफे की गंध छुपी है। आप भी इस खेल के खेल में भागीदार होकर प्रसारण अधिकार लेकर मलाई खाना चाह रहे हैं। और यह काम केवल हां जी हुजूरी से ही हो सकता है। क्योंकि अभी तक सारे टेंडर केवल उसके परिचितों को ही मिले थे। आपको लगता है कि इस तरह उसके साथ खडे़ होने से आप भी कुछ लाभ कमा सकते हैं। जहां तक खेल होने के बाद कार्यवाही की बात है, ठीक नहीं है। तब तक मामला ही ठंडा हो जाएगा। कार्यवाही तत्काल हो। उन्हें आयोजन समिति से बाहर करके तत्काल उन पर एफआइआर दर्ज हो।

जहां तक मीडिया की अति का सवाल है यह एक अलग और गंभीर विचार का विषय है। और मीडिया ने इस खेल को उजागर कर कुछ भी गलत नही किया है। उसने तो वही कहा है जो उसने देखा है। और इसमें बदनामी जैसा क्या है।

मैं आपको एक सलाह दूंगा। अगर आप भी किसी किस्म का टेंडर चाहते हैं तो आप भी कलमाडी साहब को घूस दीजिए, व्यक्तिगत रिश्ते कायम कीजिए, लेकिन देश को बरगलाने की घटिया कोशिश न कीजिए क्योंकि गुलामी के इस प्रतीक का आयोजन देश को विश्वास में लेकर नहीं किया जा रहा है।

आपका

हरेराम मिश्र

लखनऊ