सुब्रत राय सहारा, आपके मीडियाकर्मियों को भी फोर्स की जरूरत है

सुब्रत राय बड़ा दाव खेलना जानते हैं. वे छोटे मोटे दाव नही लगाते. इसी कारण उन्हें अपने छोटे-मोटे तनख्वाह पाने वाले मीडियाकर्मी याद नहीं रहते. और जिन पर इन मीडियाकर्मियों को याद रखने का दायित्व है, उन स्वतंत्र मिश्रा जैसे लोगों के पास फुर्सत नहीं है कि वे अपनी साजिशों-तिकड़मों से टाइम निकालकर आम सहाराकर्मियों का भला करने के बारे में सोच सकें. इसी कारण मारे जाते हैं बेचारे आम कर्मी.

इसी का नतीजा है कि इस दीवाली पर सहारा के मीडियाकर्मियों को सिर्फ 3500 रुपये का बोनस देने का निर्णय लिया गया है. इतना कम बोनस तो राज्य सरकार के चतुर्थ ग्रेड कर्मियों को भी नहीं मिलता. सहारा में साल भर से न कोई प्रमोशन मिला है और न ही इनक्रीमेंट. प्रमोशन-इनक्रीमेंट के लालीपाप देने के कई बार कई लोगों ने वादे किए पर अमल किसी ने नहीं किया. सहारा के पास अपने इंप्लाइज को देने के लिए पैसे नहीं होते, लेकिन जब खेलकूद की बात आती है तो इनके पास अथाह पैसा जाने कहां से आ जाता है. ताजी सूचना आप सभी ने पढ़ी होगी कि सहारा इंडिया परिवार ने विजय माल्या के स्वामित्व वाली फॉर्मूला-वन टीम में 42.5 फीसदी हिस्सेदारी खरीद ली है.

इस खरीद के लिए सहारा इंडिया परिवार ने 10 करोड़ डालर का निवेश किया है. इसके बाद फोर्स इंडिया का नाम बदलकर सहारा फोर्स इंडिया कर दिया गया है. देश में खेलों के सबसे बड़े प्रमोटर और संरक्षक के रूप में सहारा इंडिया का नाम लिया जाता है. पर जब बात सहारा मीडिया की आती है तो प्रबंधन के पास पैसा नहीं होता. सहारा के लोग कई तरह की परेशानियों में जी रहे हैं. पीएफ से लेकर हेल्थ तक के मसले पर सहारा के कर्मी खुद को ठगा हुए महसूस करते रहते हैं. पर उनकी कहीं कोई सुनवाई नहीं होती क्योंकि सहारा में प्रबंधन के खिलाफ मुंह खोलने का मतलब होता है नौकरी से हाथ धोना.

उपेंद्र राय और स्वतंत्र मिश्रा के बीच की रार में आम सहाराकर्मी खुद को पिसा हुआ पा रहा है. जो लोग कथित रूप से उपेंद्र राय के खास थे, वे अब किनारे लगाए जा चुके हैं और जो लोग स्वतंत्र मिश्रा के करीबी माने जाते थे उन्हें फिर से बड़े पदों व बड़े दायित्वों से नवाजा जा रहा है. देखना है कि इन सब तिकड़मों-चालबाजियों के बीच सहारा प्रबंधन अपने कर्मियों पर धनबौछार करना याद रखता है या फिर 3500 रुपये की छोटी रकम देकर ही अपने दायित्व से पल्ला झाड़ लेता है.

सहारा में कार्यरत एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. अगर इस पत्र के मजमून पर किसी को आपत्ति हो तो वह  अपना विरोध नीचे दिए गए कमेंट बाक्स के जरिए दर्ज करा सकता है या फिर bhadas4media@gmail.com के जरिए भड़ास संचालकों तक पहुंचा सकता है.

सहारा ने अपनी ही खबर का खंडन क्यों छापा? शिवराज ने गद्दार सिंधिया को क्यों बचाया??

आज दो अखबारों में दो ध्यान देने वाली खबरें छपी हैं. राष्ट्रीय सहारा में प्रथम पेज पर जोरदार खंडन व खबर है. यह खंडन व खबर उन अफसरों को खुश करने के लिए प्रकाशित किया गया है जिससे उपेंद्र राय के राज में सीधे-सीधे पंगा लिया गया था. तब भड़ास4मीडिया ने संबंधित दो खबरें प्रकाशित की थीं, जिन्हें इन शीर्षकों पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं- एक आईपीएस को निपटाने में जुटा राष्ट्रीय सहारा और सहारा से भिड़े राजकेश्वर की बहन हैं मीनाक्षी.

अब राष्ट्रीय सहारा ने बैकफुट पर आते हुए मीनाक्षी से माफी मांग ली है. और स्टोरी ऐसी लगाई है जिससे लग रहा है कि राष्ट्रीय सहारा रूपी अदालत ने फैसला सुना दिया है कि मीनाक्षी जी निर्दोष हैं और उनके खिलाफ कुछ दुष्ट किस्म के लोगों ने साजिश की है. दरअसल राष्ट्रीय सहारा के इस यू टर्न लेने को इससे समझा जा सकता है कि उपेंद्र राय ने अपने कार्यकाल में अतिशय तेजी के तहत सहारा समूह का हित साधने में जिन कई अफसरों व सरकारी विभागों से पंगा ले लिया, उससे सहाराश्री व सहारा समूह की धड़कने बढ़ गईं. सरकारी अफसरों और सरकारी विभागों ने मिल कर सहारा समूह की बैंड बजाने की ठान ली. उपेंद्र राय पहले से ही सुप्रीम कोर्ट से लेकर अन्य कई जांच एजेंसियों के लिए जांच के विषय बने हुए थे क्योंकि उन्होंने सहाराश्री का फेवर चाहने के चक्कर में कइयों को धमकवाया था और देख लेने की बात कह दी थी.

सहारा समूह ने अंततः अपना अस्तित्व बचाने के लिए शीर्ष स्तर पर फेरबदल कर दिया ताकि अफसरों, विभागों, एजेंसियां, न्यायालयों आदि का एक साथ शांत किया जा सके और उन्हें पुचकार कर खिलाफ बन रहे माहौल ठंडा किया जा सके. इसी के तहत स्वतंत्र मिश्रा ने आते ही डैमेज कंट्रोल शुरू कर दिया है. सहारा समूह के बारे में कहा जाता है कि यहां सहारा के हित में या सहारा के खिलाफ, दोनों ही स्थितियों में बहुत तेज चलने वाले ज्यादा दिन टिक नहीं पाते. यही हाल उपेंद्र राय का हुआ. आज जो राष्ट्रीय सहारा में खंडन छपा है, वह यह बतला रहा है कि सहारा समूह कितना बेचैन है डैमेज कंट्रोल के लिए.

यह सभी जानते हैं कि स्वतंत्र मिश्रा और उपेंद्र राय के छत्तीस के आंकड़े रहे हैं. अब जब सत्ता स्वतंत्र मिश्रा को मिल गई है तो असंभव नहीं है कि कुछ दिनों में उपेंद्र राय के कथित घपले घोटाले सामने आने लगे. सूत्रों का कहना है कि उपेंद्र राय के कार्यकाल के छोटे बड़े सभी फैसलों, मेलों, कागजातों की छानबीन वृहद स्तर शुरू हो गई है. इस छानबानी से ठीक पहले विभिन्न विभागों के मुखियाओं को हटा दिया गया. बताया जा रहा है कि गोरखपुर से संजय पाठक नामक कंप्यूटर इंजीनियर को नोएडा आफिस बुलाया गया है जो यहां कंप्यूटर में पड़े दस्तावेजों, मेलों आदि को छानबीन के लिए उपलब्ध कराएगा.

कहने वाले यहां तक कह रहे हैं कि उपेद्र राय को साइडलाइन तो किया ही गया है, अगर कोई घपला-घोटाला या अनियमितता पकड़ में आ जाती है तो उन्हें टर्मिनेट या सस्पेंड भी किया जा सकता है. इस टर्मिनेशन या सस्पेंशन से सहारा समूह को दो फायदा मिलेगा. एक तो असंतुष्ट अफसरों, सरकारी विभागों, जांच एजेंसियों, न्यायालयों आदि को यह बताया जा सकेगा कि जो आरोपी उपेंद्र राय हैं उनके खिलाफ समुचित कार्रवाई कर दी गई है, जिससे उनका गुस्सा खत्म हो जाए और दूसरे सहारा समूह के खिलाफ चल रही जांचों को नरम तरीके से प्रभावित करने का रास्ता खुल सकेगा.

राष्ट्रीय सहारा अखबार में फ्रंट पेज पर टाप बाक्स में कई कालम में प्रकाशित खबर व खंडन इस प्रकार है…

आयकर अधिकारी के खिलाफ फर्जी शिकायतों का मामला

फोरेंसिक जांच में फर्जी निकले जनप्रतिनिधियों के शिकायती पत्र

खुलासा : जालसाजों ने मंत्री, सांसद व विधायक के लेटर पैड हासिल कर किये थे जाली हस्ताक्षर, ईमानदार अधिकारी को फंसाने की थी साजिश, आयकर आयुक्त बीपी सिंह के खिलाफ पुलिस ने की चार्जशीट दाखिल

नई दिल्ली (एसएनबी)। लखनऊ में एडिशनल कमिश्नर इनकम टैक्स के पद पर तैनात रहीं श्रीमती मीनाक्षी सिंह के विरुद्ध की गई शिकायतों के मामले में चौंकाने वाले तथ्य प्रकाश में आए हैं। फोरेंसिक जांच में सामने आया है कि श्रीमती सिंह को झूठे मामलों में फंसाने के लिए मंत्री, सांसदों व विधायक के लेटर पैड पर उनके फर्जी दस्तखत पर शिकायतें की गई थीं। यह पूरा खेल महज इस वजह से खेला गया था ताकि श्रीमती मीनाक्षी सिंह को व्यावसायिक रूप से हानि पहुंचाई जा सके। जालसाजी के इस खेल में विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी की हठधर्मिता और भी मददगार बन गई।

फर्जी दस्तखत वाले जनप्रतिनिधियों के लैटर पैड फोरेंसिक जांच के लिए पुलिस को समय पर नहीं दिए। फर्जीवाड़े के इस खेल का आश्चर्यजनक पहलू यह रहा कि साजिश किसी और ने नहीं विभाग के ही एक वरिष्ठ अधिकारी ने रची थी। जांच में सामने आए तथ्यों के बाद पुलिस ने आयकर आयुक्त बीपी सिंह, कानपुर समेत दो लोगों के खिलाफ आरोप पत्र अदालत में दाखिल किया है। मामले की शुरुआत श्रीमती मीनाक्षी सिंह के खिलाफ महानिदेशक सर्तकता आयकर व विभिन्न कार्यालयों में मंत्री, सांसद व विधायक के अलावा अन्य जनप्रतिनिधियों के लैटर पैड पर भेजे गए शिकायती पत्रों से हुई थी। मंत्री वेदराम भाटी, सांसद जफरअली नकवी व विधायक सुन्दर सिंह स्याना आदि के लैटर पैड पर भेजी गई शिकयतों में कई आरोप लगाए गए थे।

जांच के दौरान ही सनसनीखेज खुलासा तब हुआ जब शिकायतकर्ता जनप्रतिनिधियों से सम्पर्क किया गया। पता चला कि उन्होंने श्रीमती मीनाक्षी सिंह के खिलाफ कोई शिकायत ही नहीं की है। इसके साथ ही यह साफ हो गया कि उनके नाम वाले लैटर पैडों का जालसाजों ने दुरुपयोग किया है। सांसद जफर अली नकवी बताते हैं कि श्रीमती मीनाक्षी सिंह के खिलाफ कभी कोई शिकायत की ही नहीं, इससे साफ है कि किसी ने मेरे नाम वाले लैटर पैड पर मेरा फर्जी दस्तखत किया होगा। श्री नकवी के अनुसार उन्होंने यह जानकारी आयकर विभाग के जांच अधिकारियों को शुरुआती जांच के दौरान ही दे दी थी, लगभग यही कहना है मंत्री वेदराम भाटी व विधायक सुन्दर सिंह स्याना का।

यह चौंकाने वाले तथ्य सामने आने पर श्रीमती मीनाक्षी सिंह ने इस मामले में अज्ञात जालसाजों के खिलाफ अपने विभाग को सूचित करते हुए हजरतगंज कोतवाली में रिपोर्ट दर्ज कराई थी। उधर पुलिस ने भी पड़ताल शुरू की तो उसे सबसे पहले जरूरत पड़ी जनप्रतिनिधियों के उन लैटर पैडों की जिन पर फर्जी हस्ताक्षर कर श्रीमती मीनाक्षी सिंह के खिलाफ शिकायतें की गई थीं। हस्ताक्षरों की फोरेंसिक जांच कराने के लिए लैटर पैड की मूल प्रति की पुलिस को सख्त जरूरत थी। इसके लिए कई बार आयकर विभाग के जांच अधिकारी से सम्बन्धित लैटर पैड मांगे गए लेकिन मिल नहीं सके। यह रवैया देख पुलिस को अंतत: अदालत की शरण में जाना पड़ा।

अदालत के आदेश के बाद भी जब लैटर पैड उपलब्ध नहीं कराए गए तब अदालत ने दस्तावेजों को हासिल करने के लिए सर्च वारंट जारी किया। अन्ततोगत्वा दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश के बाद उक्त फर्जी हस्ताक्षर वाले लैटर पैड की मूल प्रति सम्बन्धित पुलिस अधिकारियों को विलम्ब से उपलब्ध कराई गई। श्रीमती मीनाक्षी सिंह एक ऐसी अधिकारी हैं जिन्होंने आयकर विभाग के कई सफल सर्वे व सर्च कार्यवाहियों को बाखूबी अंजाम दिया है। यह वही कर्त्तव्यनिष्ठ अधिकारी हैं जिन्होंने उत्तराखण्ड के एक बड़े स्टील ग्रुप से 10 करोड़ रुपए की अघोषित आय पकड़ी थी। श्रीमती मीनाक्षी सिंह ने लखनऊ में एक प्रमुख पान मसाला व्यवसायी के यहां छापे की कार्रवाई में 8 करोड़ की अघोषित नकदी, ज्वैलरी व एफडीआर इत्यादि जब्त किये थे और सम्बन्धित कंपनी ने करीब 17 करोड़ की अघोषित आय का सरेण्डर किया था। यह लखनऊ में अब तक की आयकर विभाग की सबसे सफल कार्यवाही रही है।

इन महत्वपूर्ण उपलब्धियों के चलते ही श्रीमती मीनाक्षी सिंह का नाम एक कर्तव्यनिष्ठ व ईमानदार अधिकारी के रूप में विभाग में लिया जाता है, लेकिन जालसाजों ने उन्हें परेशान करने की अपनी पूरी कोशिश की, लेकिन पुलिस तफ्तीश में उनकी करतूतों की कलई खुल गई। फोरेंसिक जांच में हस्ताक्षरों के फर्जी पाए जाने के साथ ही पुलिस ने जब गहराई से छानबीन शुरू की तो षडयंत्र की कहानी परत-दर-परत खुलती गई। पुलिस के जांच अधिकारी को विधायक सुन्दर सिंह स्याना से पता चला कि उनके लैटर पैड को उनके मित्र व बुलन्दशहर निवासी बृजमोहन अग्रवाल के माध्यम से आयकर आयुक्त कानपुर बीपी सिंह के पास पहुंचाया गया था।

इस तथ्य के आधार पर पुलिस ने जब और साक्ष्य एकत्र किये तो चौंकाने वाला एक और खुलासा हुआ। तफ्तीश के दौरान पता चला कि श्री बीपी सिंह ने अपने ही विभाग की एक अन्य अधिकारी के साथ 10 माह में करीब 16 सौ बार मोबाइल पर बात की है। डीआईजी (लखनऊ) के प्रवक्ता पीके श्रीवास्तव ने बताया कि सारे सबूतों के आधार पर पुलिस इस निष्कर्ष पर पहुंची कि श्रीमती सिंह के खिलाफ षड़यंत्र किसी और ने नहीं बल्कि उनके ही विभाग के अफसर व आयकर आयुक्त कानपुर ने रचा था। तमाम साक्ष्यों के आधार पर पुलिस ने आयकर आयुक्त बीपी सिंह व उन तक लैटर पैड पहुंचाने वाले व्यक्ति के खिलाफ अदालत में आरोप पत्र दाखिल कर दिया है।

खेद प्रकाश

3 जून 2011 के अंक में प्रथम पृष्ठ पर ‘ये हैं आईपीएस राजीव कृष्ण, पद का दुरुपयोग करना कोई इनसे सीखे’ शीषर्क से प्रकाशित समाचार में हमारे संवाददाता पंकज कुमार ने तथ्यों की ठीक ढंग से जांच-परख नहीं की। यह बात इस प्रकरण में बाद में की गई जांच में सामने आई। संवाददाता के इस कृत्य के लिए हमें खेद है व उसके खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई की जा रही है। इस समाचार से श्रीमती मीनाक्षी सिंह व उनके परिवार की प्रतिष्ठा को जो ठेस पहुंची है, उसके लिए हमें हार्दिक खेद है। – स्थानीय सम्पादक


अब दूसरी खबर. इसे प्रकाशित किया है जनसत्ता अखबार ने. वही प्रभाष जोशी वाला जनसत्ता. अब यह जनसत्ता लगभग मृतप्राय है. कभी कभार इसमें स्पार्क सा नजर आता है, बाकी दिनों में यह मुर्दा अखबार नजर आता है. ओम थानवी का नाम इतिहास में इसलिए भी दर्ज किया जाएगा क्योंकि वह एक मुर्दा अखबार को बड़ी मुर्दनी के साथ ढो पाने में सफल हैं. तो इस मुर्दा अखबार ने आज जिंदा करने वाली खबर बाटम में छापी है.

खबर है कि मध्य प्रदेश सरकार ने अपने यहां पाठ्यपुस्तकों से सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता से वह एक लाइन हटवा दी है जिससे सिंधिया राजघराने के अंग्रेजों के मित्र होने का पता चलता है, जिससे पता चलता है कि सिंधिया राजघराने ने रानी लक्ष्मीबाई का नहीं बल्कि अंग्रेजों का साथ दिया था, जिससे पता चलता है कि सिंधिया राजघराने ने आजादी के आंदोलन के दिनों में गद्दारी की थी और गोरों का साथ दिया था.

आजादी के बाद इन्हीं सिंधियाओं ने चोला बदलकर कांग्रेस से लेकर भाजपा तक की टोपी पहन ली और सत्ता-सिस्टम के पार्ट बन गए.

चूंकि मध्य प्रदेश में भाजपा की सरकार है और भाजपा में ज्यादातर राजे-रजवाड़े-सामंत किस्म के लोग ही नेता, सांसद, मंत्री बनते हैं, सो लगता है कि सिंधिया राजघराने के नए नेताओं ने शिवराज सरकार को प्रभाव में लेकर अपनी बदनामी वाली कहानी को डिलीट करा दिया है. यहां कविता की वो लाइन बोल्ड में दी जा रही है जिसे पाठ्यपुस्तक से हटाया गया है…

रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।
अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

तो मध्य प्रदेश के बच्चे सुभद्रा कुमारी चौहान की प्रसिद्ध कविता झांसी का रानी में इस लाइन ”अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी” को नहीं पढ़ेंगे क्योंकि वहां की सरकार ने इसे हटवा दिया है. सोचिए, कितने नीच लोग हैं. अगर कविता पसंद नहीं है तो पूरा का पूरा हटा दो. या पसंद है तो पूरा का पूरा लगा लो. ये क्या कि उसमें छेड़छाड़ कर देंगे. यह घोर अपराध है और इसके लिए शिवराज सरकार की निंदा का जानी चाहिए. जनसत्ता को यह खबर छापने के लिए बधाई. अब आप सुभद्रा कुमारी चौहान लिखिति झांसी का रानी कविता का पूरा पाठ कीजिए… और सिंधियाओं के साथ साथ शिवराजों पर भी थू थू करिए…

यशवंत

एडिटर, भड़ास4मीडिया

yashwant@bhadas4media.com


झांसी की रानी

-सुभद्राकुमारी चौहान-

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में भी आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।

चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कानपुर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।

वीर शिवाजी की गाथायें उसको याद ज़बानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवाड़|

महाराष्ट्र-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,
सुघट बुंदेलों की विरुदावलि-सी वह आयी थी झांसी में,

चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव को मिली भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,
रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।

निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।

अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।

रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठूर में, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपुर, तंजौर, सतारा,कर्नाटक की कौन बिसात?
जब कि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।

बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी रोयीं रनिवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,
सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार,
‘नागपुर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार’।

यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।

हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,
मेरठ, कानपुर,पटना ने भारी धूम मचाई थी,

जबलपुर, कोल्हापुर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।

लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वंद असमानों में।

ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।

अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी,
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।

पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये सवार,
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार।

घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी,

दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।

तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

स्वतंत्र मिश्रा ने आते ही सहारा में फेरबदल शुरू किया

सहारा मीडिया से खबर है कि स्वतंत्र मिश्रा ने मीडिया डिवीजन का हेड बनते ही फेरबदल शुरू कर दिया है. सहारा नोएडा कैंपस के सर्विस डिविजन के सर्वेसर्वा विजय वर्मा, ट्रांसपोर्ट डिविजन के हेड सैफुद्दीन, सहारा टीवी के ट्रांसपोर्ट इंचार्ज वली और सहारा के नोएडा कैंपस के सिक्योरिटी इंचार्ज कुलदीप शर्मा को तत्काल प्रभाव से एचआर डिपार्टमेंट से अटैच कर दिया गया है. सहारा में एचआर से अटैच किए जाने को डिमोशन और पनिशमेंट के तौर पर लिया जाता है.

स्वतंत्र मिश्रा और उनके लोगों ने अब उपेंद्र राय के करीबियों पर तगड़ी नजर रखने का काम शुरू कर दिया है. इससे उपेंद्र राय के कार्यकाल के दौरान सहारा में भर्ती किए गए लोग खासतौर पर आशंकित हैं. विजय राय, मनोज मनु, रजनीकांत, राजेश कौशिक, प्रबुद्ध राज, संतोष राज, दुर्गेश उपाध्याय, मयंक मिश्रा आदि को उपेंद्र राय का बेहद करीबी माना जाता है और इन लोगों पर उपेंद्र ने खुलकर भरोसा किया व इन्हें कामकाज करने की पूरी छूट दी. चर्चा अब यह भी हो रही है कि सहारा के ही एक वरिष्ठ आदमी ने उपेंद्र राय की शिकायत प्रवर्तन निदेशालय के अफसरों के जरिए कराई.

यह आदमी उपेंद्र राय के कार्यकाल के दौरान साइडलाइन कर दिया गया था और अपनी सत्ता फिर पाने के लिए प्रयासरत था. तीन-तिकड़म में माहिर इस शख्स ने उपेंद्र राय के खिलाफ शिकायतों का सही-गलत पुलिंद इकट्ठा कर यहां वहां दूसरों के जरिए शिकायत कराई और अंततः सहारा श्री पर यह दबाव बनवाने में कामयाब रहा कि अगर कुछ दिनों के लिए उपेंद्र राय को मीडिया डिवीजन से न हटाया गया तो सुप्रीम कोर्ट से लेकर सेबी तक, कई जगहों पर सहारा की किरकिरी हो सकती है.

पिछले कुछ माह से सहारा कई मोर्चों पर फंसता और पीछे हटता नजर आ रहा है. इसी कारण फौरी इलाज के तौर पर अंतरिम व्यवस्था यह की गई है कि उपेंद्र राय को कुछ दिनों के लिए सहारा मीडिया के काम से मुक्त रखा जाए और स्वतंत्र मिश्रा को अपना जौहर-जलवा दिखाने की पूरी छूट दी जाए ताकि सहारा जिन जिन जगहों पर फंसा हुआ है वहां वहां उसके संकट का शमन हो सके. अगर स्वतंत्र मिश्रा अपनी दूसरी पारी में प्रबंधन द्वारा दिए गए टारगेट को यथाशीघ्र पूरा नहीं कर पाते हैं तो उनको फिर से हटाया जाना तय है. पर यह सब इतना जल्दी नहीं होने वाला. प्रबंधन की तरफ से पूरी छूट मिलने के बाद स्वतंत्र मिश्रा अब सहारा मीडिया के हर विभाग पर अपने लोगों को आसीन कराने में लगे हैं.

इसी कड़ी में कई विभागों के हेड को एचआर से अटैच किया गया है. उधर, उपेंद्र राय ने अपने बारे में प्रबंधन के फैसले को उसी भाव से लिया है जिस भाव से उन्हें सहारा मीडिया डिवीजन का सीईओ बनाया गया. सहारा में पंद्रह सौ रुपये से अपना करियर शुरू करने वाले उपेंद्र ने सीईओ की कुर्सी मिलने के बाद भी अपना जमीनी स्वभाव जिस तरह से बचाए-बनाए रखा, और नए बदलाव को भी जिस सकारात्मक भाव से लिया, वह बताता है कि उपेंद्र किसी तात्कालिक जंग से अलग लंबी रेस का घोड़ा बनने में यकीन रखते हैं.

सहारा से स्वतंत्र मिश्रा और अनिल अब्राहम सस्पेंड

: उपेंद्र राय एंड कंपनी की ताकत बढ़ी : सहारा ग्रुप से दो बड़ी खबरें हैं. स्वतंत्र मिश्रा और अनिल अब्राहम को सस्पेंड कर दिया गया है. स्वतंत्र मिश्रा के बारे में पता चला है कि उन्हें 19 मई को ही सस्पेंड कर दिया गया था. उनके सहारा के किसी भी आफिस में प्रवेश करने पर पाबंदी लगा दी गई है. स्वतंत्र के पास कंपनी का जो कुछ सामान था, सभी ले लिया गया है.

अनिल अब्राहम के बारे में जानकारी मिली है कि उन्हें 27 मई को सस्पेंड किया गया. कल खुद अनिल अब्राहम ने अपना इस्तीफा भी प्रबंधन को सौंप दिया. स्तवंत्र मिश्रा राष्ट्रीय सहारा अखबार के प्रिंटर पब्लिशर रह चुके हैं. एक जमाने में लखनऊ में उनकी तूती बोलती थी और सहाराश्री के खासमखास माने जाते थे. बाद में उनका तबादला दिल्ली कर दिया गया और उनका कद बढ़ाते हुए उन्हें राष्ट्रीय दायित्व सौंपे गए. पर अचानक ही स्वतंत्र मिश्र को शंट करते हुए उन्हें सहारा मीडिया से बाहर सहारा की किसी अन्य कंपनी में भेज दिया गया. इससे उपेक्षित व खफा स्वतंत्र मिश्र काफी दिनों से सहारा के मेनस्ट्रीम में आने की कोशिश कर रहे थे पर उनकी रणनीति व योजना सफल न हो सकी.

सहारा प्रबंधन ने स्वतंत्र मिश्रा को हटाने का कड़ा फैसला ले लिया. अब देखना है कि स्वतंत्र मिश्रा निकाले जाने के बाद भी सहारा के प्रति निष्ठा निभाते हुए चुप्पी साधे रहते हैं या फिर अपना पक्ष व अपनी बात मजबूती से सबके सामने रखते हैं. उधर अनिल अब्राहम को निकाले जाने पर सहारा के कई लोग हैरत में हैं. सहारा मीडिया के हेड रहे इस शख्स को सहारा के जहाज वाली कंपनी से ट्रांसफर कर मीडिया में लाया गया. बाद में इन्हें मीडिया से हटा कर कोई और जिम्मेदारी दे दी गई. पर अचानक उन्हें सस्पेंड किए जाने के कारण को कोई समझ नहीं पा रहा है.

सूत्रों का कहना है कि दरअसल सहारा में इन दिनों सिर्फ और सिर्फ उपेंद्र राय की तूती बोल रही है. सहाराश्री सुब्रत राय सहारा जिस पर भी भरोसा करते हैं, कुछ वर्षों तक आंख मूंद कर भरोसा करते हैं और उसे पूरा अधिकार देते हैं. बताया जा रहा है कि उपेंद्र राय और उनके करीबी जन सहारा प्रबंधन को ये समझाने में कामयाब रहे कि मुश्किलों से घिरे सहारा ग्रुप को बचाने की बजाय कुछ वरिष्ठ पदाधिकारी साजिशें कर सहारा को फंसाने और बदनाम करने की कोशिशें कर रहे हैं. इससे संबंधित कुछ प्रमाण भी सहारा श्री को दिखाए गए. सूत्रों के मुताबिक इसी के बाद सहाराश्री ने स्वतंत्र मिश्रा और अनिल अब्राहम को सस्पेंड कर देने का आदेश दिया.

सहारा के बारे में ये चर्चित है कि प्रबंधन जब किसी बड़े पद पर आसीन व्यक्ति से खफा होता है तो उनके घर का परदा, तकिया सब उठवा लेता है. ऐसा अतीत में भी हो चुका है कइयों के साथ. जानकारों का मानना है कि स्वतंत्र मिश्रा और अनिल अब्राहम को निपटाने के बाद उपेंद्र राय और ज्यादा ताकतवर होकर उभरे हैं. और, यह स्पष्ट संदेश भी सभी को चला गया है कि इस दौर में उपेंद्र राय का विरोध करने का मतलब है सहाराश्री का विरोध करना.

माना जा रहा है कि प्रवर्तन निदेशालय वाले प्रकरण में उपेंद्र राय के फंसने को सहारा ग्रुप ने अपना नाक का मुद्दा बना लिया है. जो कुछ भी उपेंद्र राय ने किया, वह सब प्रबंधन की जानकारी और मर्जी के मुताबिक किया. इसलिए इस मामले में उपेंद्र राय को कंपनी का पूरा सपोर्ट है और दो वरिष्ठों को निकाले जाने से स्पष्ट कर दिया गया है कि जो नीतियों के साथ नहीं चलेगा, छिपकर साजिशें करेगा, उन्हें बहुत देर तक अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. फिलहाल दो बड़ों के निलंबन से सहारा ग्रुप में चर्चाओं का बाजार कई दिनों से गर्म है. कोई इन चर्चाओं को निराधार बता रहा है तो कोई इन्हें पुष्ट घोषित कर रहा है.

भड़ास के पास भी इस बारे में कई दिनों से सूचनाएं आ रही थीं पर कहीं से आधिकारिक तौर पर कनफर्म नहीं हो पा रहा था. लेकिन अब स्पष्ट हो गया है कि इन दोनों स्वतंत्र व अनिल का सहारा में काम तमाम हो चुका है. इनके निपटने से उपेंद्र राय के कई दूसरे विरोधी खौफजदा हो गए हैं. इन लोगों को भी डर सता रहा है कि कहीं उनके दिन भी अब गिने चुने न रह गए हों.

स्वतंत्र मिश्रा का नोएडा से लखनऊ तबादला

सहारा मीडिया से खबर है कि स्वतंत्र मिश्रा का तबादला नोएडा से लखनऊ कर दिया गया है. उनसे समूह संपादक (वेब पोर्टल) का भी काम ले लिया गया है.

नई जिम्मेदारी क्या है, यह पता नहीं चल पाया है पर सूत्रों का कहना है कि वर्तमान समय में स्वतंत्र मिश्रा की पोजीशन ठीक नहीं चल रही है. कभी सहारा के मालिकों के बेहद करीबी रहे स्वतंत्र को आजकल दुर्दिन देखने पड़ रहे हैं. संभवतः नया काम जो उन्हें सौंपा गया है, वो मीडिया से संबंधित नहीं है.