यशवंतजी, संपादक पद की गरिमा का खयाल रखें

प्रिय यशवंत जी, बहुत ही प्रचलित हो चुकी आपकी साईट के आप संपादक भी हैं, इस नाते मैं एक बात कहना चाह रहा हूं. आपकी साईट में जितने भी कमेन्ट आते हैं उनको प्रकशित करने के पूर्व ये जरुर देखें कि वो किसी कि मान प्रतिष्ठा पर प्रहार तो नहीं है. मैं ये मानता हूँ कि कई संपादक थोड़े दूसरे किस्म के होते हैं लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि उनको गरियाया जाये. ये कतई उचित प्रतीत नहीं हो रहा है. संपादक पद की एक गरिमा है और जो भी व्यक्ति उस पद को गाली देता है, मेरे विचार से वो कभी पत्रकार हो ही नहीं सकता है. व्यक्तिगत परेशानियों को लेकर आप उस व्यक्ति के बारे में कुछ कह सकते हैं, लेकिन चुटकुले के नाम पर संपादक को गाली देना, पत्रकारिता के धर्म से परे की चीज़ आपके साईट के माध्यम से प्रचारित की जा रही है.

सिंह साहब, शर्म तो आपको आनी चाहिए

उदय शंकर खवारेप्रिय यशवंत जी, आज अपने अखबार का काम ख़त्म करके रात को ग्यारह बजे बी4एम को देखा. लेखक शेष नारायण सिंह, वरिष्ठ पत्रकार, का आलेख पढ़ा, पढ़कर खुशी नहीं, मायूशी हुई. उन्होंने लिखा है कि “मोदी एक ऐसी जमात से ताल्लुक रखते हैं जो मुसलमानों को तबाह करने की राजनीति पर काम करती है।”  बहुत ही गलत लिखा उन्होंने। फिर आगे लिखा है- ”1925 में अपनी स्थापना के बाद आरएसएस. ने 1927 में नागपुर में योजनाबद्ध तरीके से पहला दंगा करवाया था। तबसे मुसलमानों के खिलाफ इनका ‘प्रोग्राम’ चल रहा है। गुजरात में सरकार बनी तो गोधरा कांड करके राज्य में मुसलमानों को तबाह करने की योजना पर अमल किया गया। जब अफसरों ने देखा कि मुख्यमंत्री मुसलमानों के खून से खुश होता है तो उन्होंने भी निरीह सीधे-साधे और गरीब लोगों को आतंकवादी बताकर मारने का सिलसिला शुरू कर दिया।”