15 साल बाद गांव में मेरी होली : सम्मति-घोंघी मइया का दुबलापन और दयाराम का नौवां बच्चा

विकास मिश्र: बउरइलू छिनार बउरइलू छिनार, बाबा दुअरवा का गइलू….. : अपने भतारे के मउसी हो, पंचगोइठी द.. : सलीम बहू जब अइलिन गवनवा पतरे पीढ़ा नहायं… : करीब 15 साल बाद होली पर गांव गया था। वजह सिर्फ व्यस्तता ही नहीं रही, जहां रहा, वहां ये रंगीन त्योहार साथियों के साथ मनाने का भी अपना लुत्फ था।

…दीपावली भी ऐसे ही चली जाएगी

[caption id="attachment_15884" align="alignleft"]विकास मिश्रविकास मिश्र[/caption]कोई प्राचीन भारत का इतिहास नहीं लिख रहा हूं। दफ्तर में काम करते-करते आंखों के सामने दशहरा बीत रहा है, एक आम दिन की तरह। साल का सबसे खास दिन, देखिए कैसे आम दिन की तरह ढलता जा रहा है। 1978 में आठ साल का था, तबसे लेकर अब तक का दशहरा याद आ रहा है। आठ आने में छोटी वाली गेंद मिलती थी, रबर की। आठ आने में ही सौ ग्राम जलेबी मिलती थी। हर मंगलवार को बगल के गांव में मंगरहिया बाजार लगता था। उसी गांव में स्कूल भी था। हर मंगलवार को आठ आने मिलते थे। कभी जलेबी खाते थे, कभी गेंद खरीदते थे और कभी अठन्नी बचा लेते थे, दशहरे के लिए। ये मिशन दशहरा होता था। क्योंकि दशहरे के बाद दीपावली आती है। जितने पैसे होंगे, उतने ही पटाखे आएंगे, उतनी ही अच्छी पिस्तौल आएगी।

आग मुकाबिल हो तो कैमरा निकालो…

[caption id="attachment_15297" align="alignleft"]ज्ञान प्रकाशज्ञान प्रकाश[/caption]माफ कीजिएगा, किसी शायर की पंक्तियों को दाएं-बाएं करके हेडिंग बना दी। आग यूपी कांग्रेस की अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी के घर में लगाई गई थी। बकौल कांग्रेसी आग लगाने वाले बीएसपी के लोग थे और बकौल बहनजी.. कांग्रेसियों ने खुद फूंका है रीता का घर…। पुलिस तमाशबीन थी, ये चैनलों ने भी खूब दिखाया। लेकिन पुलिस खुद आग लगवा रही थी, ये कहानी बयान की तस्वीरों ने। जब आग लगाई जा रही थी, तो वहां पहुंचे थे अमर उजाला लखनऊ के जांबाज फोटोग्राफर ज्ञान प्रकाश (प्यार से लोग ज्ञान को स्वामी कहते हैं यही प्रचलित नाम भी है ज्ञान का)। गुंडे आग लगा रहे थे, पुलिस उनकी मदद कर रही थी। ज्ञान अपना काम कर रहे थे..। जरा सोचिए रात में अगर तस्वीर ली जा रही हो तो फ्लैश भी जरूर चमकेगा। और आगजनी में वर्दीवाले गुंडों की सामने से भी तस्वीरें खींचीं ज्ञान प्रकाश ने। बिना इसकी परवाह किए कि यूपी के जंगलराज में उनका क्या होगा।

यूं जाना एक ‘कबीर’ का

विकास मिश्राधनराज यादव नहीं रहे। इतना बड़ा नाम नहीं था और न ही इतना आभामंडल कि लोग धनराज यादव को जानें। प्रोफाइल इतनी है कि यूपी में जब-जब बीजेपी की सरकार बनी, तब-तब वो मंत्री थे। कभी राज्यमंत्री तो कभी कैबिनेट मंत्री। मेरा उनसे दोहरा नाता था। एक तो वो जिस नौगढ़ विधानसभा क्षेत्र से चुनकर मंत्री और विधायक बनते थे, उसी क्षेत्र में मेरा गांव भी था। हमारे परिवार से उनका गहरा जुड़ाव था। दूसरा रिश्ता व्यक्तिगत था। 1996 में मेरी उनसे पहली मुलाकात हुई थी।

जरूरी है ये ‘ब्रेक’!

book cover

वक्त है एक ब्रेक का। दौड़ती हांफती इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में दौड़ते-हांफते पत्रकारों का ब्रेक…। कुछ अपने लिए ब्रेक और कुछ अपनी दुनिया के लोगों के लिए ब्रेक। 25 कहानियों का ब्रेक। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की चकाचौंध भरी दुनिया के भीतर के स्याह अंधेरे, भरी पूरी जिंदगी के खोखलेपन, आसमान के तारे तोड़ लाने वाली बहादुरी के पीछे बैठे भय का मुकम्मल दस्तावेज है- ‘वक्त है एक ब्रेक का‘।

ये एक किताब है, जिसे प्रकाशित किया है राजकमल प्रकाशन ने।

कोई लौटा दे वो बीते हुए दिन…

yaadenकरीब 14 साल बाद हम एक बार फिर आईआईएमसी में थे। बहुत कुछ बदला था, लेकिन शायद कुछ नहीं बदला था। संस्थान की एक एक ईंट जैसे हमसे बातें करना चाहती थी। सभी अपने-अपने बैच के साथियों की तलाश में थे। वहां पहुंचते जैसे पिछले 14 साल जिंदगी से घट गए। वही 24-25 साल वाली नौजवानी की तरंग दिल में हिलोरें मार रही थीं। मंच सजा था तो भाषणबाजी भी चालू थी। कुछ तो वाकई माइक के लाल थे। माइक पकड़ा तो छोड़ने के लिए राजी नहीं थे।