कुत्ते भी डांस देखने आए थे

गांव से लौटा (4) : गांव के लोग नाचते कैसे होंगे? मैं भी तो गांव का ही हूं. शहर में अब ज्यादा वक्त गुजरता है, टीवी देख लेता हूं, फिल्में देखता हूं, सो मटकने के कुछ दांव-पेंच दिमाग में घुस जाते हैं और मौका मिलने पर उन दांव-पेचों का मुजाहरा कर देता हूं. लेकिन प्रोफेशनल डांसर तो हम लोग हैं नहीं. सो, सिवाय कमर मटका कर हाथ पांव लहराने के, और कुछ नहीं आ पाता. परिवार में एक बच्चे के मुंडन का समारोह था. खाने-पिलाने के बाद लोगों ने नाच की व्यवस्था कर रखी थी.

यहां बकरियां भी ताड़ी पीती हैं

गांव से लौटा (3) : गांव गया तो गांव से भागा नहीं. दुखी मन से दिल्ली लौटा. दिल में दबी आवारगी की हसरत जो पूरी हुई. लोग कहते हैं कि शहर में आवारगी भरपूर होती है लेकिन मुझे तो लगता है कि आवारगी के लिए गांव ज्यादा अच्छे अड्डे हैं. आवारगी बोले तो? अरे वही, पीना, खाना, नाचना, गाना, मन मुताबिक जीना. शहर में बार, माल, कार में बैठकर दारू पीने से ज्यादा अच्छा है गांव में पेड़ के नीचे बैठकर ताड़ी पीना. जितनी भयंकर गर्मी पड़ती है उतनी ही ज्यादा मात्रा में ताड़ी का धंधा चलता है.

गौतम बुद्ध वाली बुढ़िया

[caption id="attachment_17557" align="alignleft" width="241"]दिल्ली में जख्मी शराबी युवकदिल्ली में जख्मी शराबी युवक[/caption]गांव से लौटा (2) : गरीबी और गर्मी दिमाग में अभी तक हलचल मचाए हैं. गांव जाने और गांव से लौटने के बीच कई दृश्य ऐसे दिखे जिससे मन बेचैन होता गया. हालांकि बेचैनी कुछ लोगों के जीवन का सहज स्वभाव है पर मन को दुखी करने वाली घटनाओं-दृश्य से अवसाद की ओर यात्रा शुरू हो जाती है. गांव में एक बूढ़ी महिला दिखी. कमर झुकी हुई. लाठी ले ठक ठक कर चलती हुई.

स्प्रिट पीती लड़कियां

गांव से लौटा (1) : पिछले दिनों गांव गया था. ढेर सारी चीजें-अनुभव-खट्टे-मीठे संस्मरण साथ लेकर दिल्ली वापस आया हूं. पर सबसे ज्यादा हतप्रभ मैं लौटते वक्त वाराणसी रेलवे स्टेशन पर हुआ. ‘गरीब रथ’ ट्रेन पकड़ने के लिए प्लेटफार्म पर पहुंचा तो गाड़ी स्टेशन पर लगने में देरी को देखते हुए प्लेटफार्म पर टहलने लगा. दो गरीब बच्चियां, जो स्टेशन पर कूड़ा-बोतल आदि बीनने का काम करती हैं, प्लेटफार्म पर एक जगह बैठे हुए आपस में बतियाने में जुटी हुईं थीं. उत्सुकता वश मैं उनके पास पहुंचा. जामुन खरीदकर खा रहा था मैं.