43 साल के विजय जाधव का यूं चले जाना

आज अचानक एक खबर देखी. नेशनल फिल्म आर्काइव ऑफ इंडिया के निदेशक विजय जाधव की ह्रदय गति रुकने से मृत्यु. 43 वर्षीय जाधव भारतीय सूचना सेवा के अधिकारी थे और नेशनल फिल्म आर्काइव ऑफ इंडिया के साथ-साथ प्रेस इन्फोर्मेशन ब्यूरो, पुणे के भी प्रभारी थे. मूल रूप से इंजिनीयरिंग स्नातक जाधव 1994 बैच के भारतीय सूचना सेवा के अधिकारी थे. दूरदर्शन, आकाशवाणी तथा प्रेस इन्फोर्मेशन ब्यूरो में अपने काम की बदौलत अपने लिए एक अच्छा स्थान बना चुके थे.

जिस स्थान पर जाधव का वास्तव में मन लगा और जहां उन्होंने अभूतपूर्व कार्य करे शुरू किये थे वह फिल्म आर्काइव था जहां वे सबसे कम उम्र के निदेशक बने थे. यहां आते ही उन्होंने पुराने फिल्मों को डीजीटाईज करने और उन्हें डिजिटल रूप में संचयित करने का कार्य शुरू कर दिया था. साथ ही उन्होंने जनता तो फिल्मों के बारे में जागरुक करने के लिए शॉर्ट-टर्म फिल्म अप्रेशिएशन कोर्स तथा क्षेत्रीय भाषाओं में छोटे शहरों में फिल्म समारोह शुरू कराये थे.

संगीत के बेहद शौकीन जाधव खुद भी एक अछे तबला वादक थे और उस्ताद अल्लाह रक्खा की शागिर्दगी में पन्द्रह साल तबला वादन सिखा था. इतने काबिल और बहु-आयामी व्यक्तित्व के अचानक से अस्त हो जाने से स्वाभाविक रूप से गहरा आघात सा लगता है और यह मृत्यु भी एक अपूरणीय क्षति है. उनके पीछे उनके शोक-संतप्त परिवार में उनकी माँ, पत्नी साधना और दो बच्चियां हैं जिनको अचानक से यह भयानक हादसा झेलना पड़ा है. कुछ पीछे चलते हैं और जाधव द्वारा दिए कुछ बयान और उनसे जुड़ी कुछ खबरें पढ़ते हैं-

8 जून 2009-  एनएफएआई के निदेशक विजय जाधव ने कहा, ‘हमारे पास 1930 से फिल्में हैं और उनकी लाइफ सीमित होती है। हमें इन्हें कम से कम अगले 200 साल तक संरक्षित रखना है। स्क्रीनिंग के लिए ये फिल्में देश के कई फिल्म क्लबों तक जाती हैं। हम इस पर रोक लगाना चाहते है जिससे लंबी अवधि में इन्हें बचाया जा सके।’

नवंबर 23, 2009-  गोवा में सोमवार से शुरू हो रहे 40वें भारत अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (आईएफएफआई) में वर्ष 1913 से लेकर अब तक के 350 फिल्मों के दुर्लभ चित्र लगाए जाऐंगे। भारतीय राष्ट्रीय फिल्म अभिलेखागार (एनएफएआई) के विजय जाधव ने आईएएनएस को बताया,” जिन फिल्मों के चित्र प्रदर्शित किए जाएंगे उनमें प्रमुख रूप से ‘राजा हरिश्चंद्र’ (1913) ‘कल्यानचा खजिना’ (1924) और ‘सती सवित्री’ (1927) शामिल हैं।”

सितम्बर 26, 2010- “भारतीय फिल्मों की लोकप्रियता दिनों दिन बढती जा रही है और ऐसे में यह बात महसूस की जाने लगी है कि फिल्मों की लोकप्रियता के साथ-साथ उसकी समीक्षा के स्तर को भी उसी अनुपात में बढ़ाए जाने की जरूरत है। इसके अंतर्गत फिल्म समीक्षा से जुड़े पाठ्यक्रम को जल्द ही शुरू किया जाना है। पुणे स्थित नेशनल फिल्म आर्काइव ऑफ इंडिया (एनएफएआई) और फिल्म इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एएफटीआईआई) ने इस काम के लिए कदम बढ़ाया है।“ एनएफएआई के निदेशक विजय जाधव ने बताया, इस दिशा में काम करने के लिए, जिसमें फिल्म समीक्षा के काम से जुड़े लोग शामिल होंगे, एनएफएआई और एएफटीआईआई ने अखिल भारतीय स्तर पर सिनेमा की रिपोर्टिग से जुडे़ पाठ्यक्रम को अक्टूबर से शुरू करने का फैसला किया है।

दिसम्बर 06, 2010- “भारत में पैसों के लिए फिल्में बनाई जा रही है, अवार्ड के लिए नहीं। निर्माता एक फिल्म बनाने के बाद दूसरी का निर्माण शुरू कर देता है। जिस कारण फिल्मों का सही प्रकार से रख-रखाव नहीं हो पा रहा है। इस वजह से अधिकांश फिल्मों की सीडी व डीवीडी खराब हो जाती है। ये कहना है नेशनल फिल्म आर्काइव्स ऑफ इंडिया के निदेशक विजय जाधव का। श्री जाधव तीसरे हरियाणा अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह के दौरान पत्रकारों स बात कर रहे थे।“

ऊपर लिखे गए इन सब ख़बरों से एकदम अलग आज अखबारों में पढ़ी गयी यह सूचना मुझे स्तब्ध करने वाली थी. दो कारणों से- पहला तो यह कि कई परस्पर मित्रों के जरिये मैं विजय जाधव जी के बारे में जानती थी और उनके एक अत्यंत उद्यमी और तेज अधिकारी होने की बात से भली भांति परिचित थी. दूसरा यह कि वे अभी कुछ दिन पहले ही चर्चा में थे जब उन्होंने फिल्म आर्काइव की दशा को सुधारने के सम्बन्ध में कई सारी बातें और अपनी कार्य योजना प्रकट की थी. फिर यह भी कि मौत के समय उनकी उम्र ही कितनी थी- मात्र तैतालीस साल. इतनी कम उम्र में ही विजय जाधव जी ने काफी कुछ ऐसे कार्य कर दिए थे जिन्हें सराहनीय और कुछ मायने में ऐतिहासिक माना जा सकता है.

लेखिका डॉ नूतन ठाकुर, पीपल’स फोरम, लखनऊ की संपादक हैं.

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