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छिनाल प्रकरण : …थू-थू की हमने, थू-थू की तुमने…

ज्ञानपीठ की प्रवर परिषद से हटा दिए जाने, केंद्रीय मंत्री से माफी मांग लेने और सार्वजनिक तौर पर अपने कहे पर खेद जताने के बाद भले ही विभूति नारायण राय का ‘छिनाल प्रकरण’ ठंडा पड़ता दिख रहा हो लेकिन इसकी टीस अब भी ढेर सारे लोगों के मन में है. खासकर कई महिलाएं इस बवाल और विवाद के तौर-तरीके से आहत हैं. इनका मानना है कि विभूति नारायण राय ने जो कहा, उससे उनका छोटापन दिखता है, लेकिन विरोध करने वालों ने कोई बड़प्पन नहीं दिखाया.

ज्ञानपीठ की प्रवर परिषद से हटा दिए जाने, केंद्रीय मंत्री से माफी मांग लेने और सार्वजनिक तौर पर अपने कहे पर खेद जताने के बाद भले ही विभूति नारायण राय का ‘छिनाल प्रकरण’ ठंडा पड़ता दिख रहा हो लेकिन इसकी टीस अब भी ढेर सारे लोगों के मन में है. खासकर कई महिलाएं इस बवाल और विवाद के तौर-तरीके से आहत हैं. इनका मानना है कि विभूति नारायण राय ने जो कहा, उससे उनका छोटापन दिखता है, लेकिन विरोध करने वालों ने कोई बड़प्पन नहीं दिखाया.

विरोध करने वाले कई लोगों ने जिस भाषा का इस्तेमाल किया, उससे उनकी कुंठित मानसिकता का पता चलता है.  पटना से लीना (संपादक, मीडिया मोर्चा) ने एक कविता भड़ास4मीडिया के पास मेल से भेजा है, जिसे आप पढ़कर उनकी भावना महसूस कर सकते हैं. -एडिटर

विभूति राय प्रकरण की नजर एक छोटी सी कविता

-लीना-

थू- थू की हमने
थू- थू की तुमने
जिसे मिला मौका
गाली दी उसने
ऐसे संस्कारहीनों को
हटाओ
नजर से गिराओ।
पर धिक्कारते धिक्कारते
भूल गए हम
अपनी भी धिक्कार में
वैसी ही भाषा है
वैसे ही संस्कार
जिसके लिए तब से
उगल रहे थे अंगार।।

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0 Comments

  1. rajesh

    August 4, 2010 at 2:43 pm

    lina ji kirpya aap nya jhyanodya ka pura ank padhiyee. phir pata chalega ki kase nri mard ki vistar garm karti hain….

  2. कुमार सौवीर, ब्यूरो प्रमुख, महुआ न्यूज, लखनउ

    August 4, 2010 at 3:34 pm

    कोई बात नहीं लीना जी। अब चूंकि वीएन राय प्रकरण पर चल रहे विरोध के तौर-तरीकों की शुचिता का झंडा आपने उठा लिया है, इसलिए हमारे ज्यादा बोलने की जरूरत भी नहीं बची। हम अपने मकसद में कामयाब हुए हैं। हमारा फर्ज था वीएन राय की दारोगागिरी की भाषा और अंदाज को मात देना और एक मैसेज देना कि साहित्य के क्षेत्र में किसी भी तरह की डण्डाक्रेसी नहीं चलने दी जाएगी। दारोगा वीएन राय भारतीय ज्ञानपीठ से हटाये गये और अब उनकी कुलपतिगिरी भी संकट में है। बावजूद इसके कि उन्हीं के तलवे चाट कर उन्हीं की वाह-वाही कर दारोगा राय को वर्धा में महात्मा गांधी हिन्दी विश्वद्यालय के कुलपति तक पहुंचाने वालों ने उन्हें बचाने की कोई भी कोशिश नहीं छोडी। प्रयास तो आज भी जारी है।
    बहरहाल, क्षमा कीजिएगा। क्या आप चाहती हैं कि किसी बलात्कारी पर मुकदमा भी न चलाया जाए। उससे कैफियत भी ना पूछी जाए। उसे और उसके आकाओं को यह भी न बताया जाए कि उसने कितनी घिनौनी हरकत की है। क्या उसकी बलात्कारी प्रवृत्ति को आप महज छेडछाड करने वाले हिन्दी साहित्य-सेवी की उपाधि देना चाहती हैं।
    कुछ भी हो, आप भले ही अपने विशालमना हृदय से दारोगा वीएन राय को क्षमा करने का साहस कर लेंद्व लेकिन अविनाश दास जैसे हमारे लोगों के लिए यह सम्भव नहीं। याद रखियेगा कि हमने अगर यह आंदोलन न छेडा होता तो होती तो यह दारोगा अपनी करतूतों की माफी तक नहीं मांगता, बल्कि सीना ठोंककर अपनी उसी घिनौनी मर्दानगी का प्रदर्शन करता रहता। उसकी माफी की वजह यह है कि हमने अपने तरीकों से इस आंदोलन को एक मुकाम तक पहुंचाया है, यह काम आप शायद अपने तरीके से हर्गिज नहीं कर सकती थीं। फिर भी आप ही नहीं, सभी की भावनाएं हमारे लिए सम्मान का विषय हैं और सर्वोच्च हैं। अब हम अपने तरीके से जब आंदोलन खडा कर चुके हैं, आप अपने तरीके से अडिग रहें। हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।

  3. निर्मल गुप्त

    August 4, 2010 at 6:03 pm

    विभूति जी के छिनाल वाले बयान पर इतनी थू -थू हो चुकी है कि अब यदि अगले कुछ सालों तक थूकने की कोशिश भी करेगा तो उसके सूखे मुह से बस गर -गर की आवाज़ ही निकलेगी .
    वैसे भी पुलिसिया अतीत कोई कहाँ भुला पाया है .

  4. anil pande

    August 4, 2010 at 7:13 pm

    सिर्फ वीएन राय ही क्यों, आलोक मेहता क्यों नही?

    आलोक मेहता ने जो नीच कर्म किया है, वह जन संस्कृति मंच के लिए मुद्दा क्यों नही है?

    क्या जन संस्कृति मंच विभूति नारायण राय के मुद्दे पर पेट्रोल इसलिए डाल रहा है, ताकि लोग आलोक मेहता जैसे इंसानियत के दुश्मन को भूल जाएँ?

    अनिल पांडे

  5. leena,editor,www.mediamorcha.co.in

    August 5, 2010 at 4:55 am

    प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद। मेरी कविता छि….वाद के जनक विभूति राय के समर्थन में कतई नहीं है, जो इसे समझ रहे हैं वह उनकी अपनी सोच है। विभूति राय ने जो किया वह केवल माफी से कतई खत्म नहीं हो सकता। लेकिन जो धारा साहित्य में है क्या उसके खिलाफ लोग एकजुट है ? इस दोगली साहित्यिक व्यवस्था में हमेषा एक दूसरे को लेकर सवाल उठाते रहते हैं। रचना छपने-छपाने के मामले में महिला पे्रमी संपादकों की पोल खुलती रहती है। मैं यहां किसी साहित्यिक संस्था का नाम नहीं लूंगी, सभी ने देखा है कि किस तरह से और कहां से बयान आये। होना यह चाहिये था कि सभी साहित्यिक संस्थाओं को गोलबंद हो कर विभूति राय और नया ज्ञानोदय के संपादक को केवल पद से हटाने या माफी मांगने नहीं बल्कि पूरी तरह से सामाजिक-साहित्यिक विरादरी से बहिष्कार किया जाना चाहिये। क्या ये होगा ? याद कीजिये खेमें में बंटे पत्रकार-साहित्यकार, अनिल चमड़िया मामले में किस तरह से सामने आये थे, चुप रहे थे ! मेरा मकसद यह है कि विभूति राय जैसे लोगों का सामाजिक बहिष्कार हो न कि केवल गाली देकर छोड़ दिया जाये। और विभूति राय के छि….वाद का जवाब छि….वाद से न देकर सामाजिक-साहित्यिक से बहिष्कार हो ?

  6. santosh rai

    August 5, 2010 at 5:03 am

    कुमार सौवीर जी…आप सौ वीर हैं…आपका प्रयास रंग लाया..। बधाई हो। मैं तो कहूंगा सारा काम छोड़कर जुट जाइये वीएन राय की कमियां ढूढने। जरूर कुछ मिलेगा।
    लेकिन मुझे क्यों लगता है आप लोग पूर्वाग्रह से पीड़ित हैं। वीएन राय को हटाने तक का आंदोलन चला रखा है लेकिन उस पत्रिका के बारे में एक बार भी एक बार भी कोई एक शब्द नहीं बोल रहा। आपको पता है-बेवफाई विशेषांक-2 धड़ल्ले से बिक रहा है। उसके पन्ने में अब भी वही शब्द अंकित है जिसको लेकर बवेला मचा है। उस शब्द को या फिर वी एन राय के इंटरव्य को हटवाने का भी साहस दिखाइये सौवीर जी। फालतू की बहस कर अपने आपको चर्चित कराने का मोह छोड़ दीजिए। कुछ नेक काम कीजिए…।

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