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पत्रकारिता और महिला पत्रकारों की संघर्ष गाथा

[caption id="attachment_16550" align="alignleft"]माधवीश्रीमाधवीश्री[/caption]जब पत्रकारिता में पुरुषों का वर्चस्व था और किसी महिला का इस पेशे में होना दुर्लभ बात मानी जाती थी तबसे इस पेशे से जुडी नीरजा चौधरी आज दिल्ली में स्थित महिला पत्रकारों के प्रेस क्लब की अध्यक्ष हैं. इस क्लब की 550 से अधिक महिला पत्रकार सदस्य हैं. 35 वर्षों से आधिक के अपने लम्बे सफ़र में नीरजा ने कई उतर-चढ़ाव देखे हैं. अपने पुराने दिनों को याद करती हुई नीरजा कहती हैं कि 60 के दशक में जब मुंबई में वे “हिम्मत” से जुड़ी थीं तब दी स्टेट्समैन के तत्कालीन संपादक कुलदीप नैय्यर ने एक समारोह में कहा था कि हम महिलाओं को प्रेफर नहीं करना चाहते क्योंकि प्रशिक्षित करने के बाद वे शादी करके चली जाती हैं. उनके लिए नौकरी वेटिंग रूम की तरह होता है. 70 के दशक में यही तस्वीर यू टर्न लेती है. 70 के दशक में दी स्टेट्समैन के तत्कालीन संपादक सीआर ईरानी कहते हैं कि हम महिलाओ को पत्रकारिता में प्रेफर करते हैं क्योंकि वो सीरियस, समर्पित और भरोसेमंद होती हैं. नीरजा मानती हैं कि यह एक दशक का बहुत बड़ा क्रान्तिकारी बदलाव है.

माधवीश्रीजब पत्रकारिता में पुरुषों का वर्चस्व था और किसी महिला का इस पेशे में होना दुर्लभ बात मानी जाती थी तबसे इस पेशे से जुडी नीरजा चौधरी आज दिल्ली में स्थित महिला पत्रकारों के प्रेस क्लब की अध्यक्ष हैं. इस क्लब की 550 से अधिक महिला पत्रकार सदस्य हैं. 35 वर्षों से आधिक के अपने लम्बे सफ़र में नीरजा ने कई उतर-चढ़ाव देखे हैं. अपने पुराने दिनों को याद करती हुई नीरजा कहती हैं कि 60 के दशक में जब मुंबई में वे “हिम्मत” से जुड़ी थीं तब दी स्टेट्समैन के तत्कालीन संपादक कुलदीप नैय्यर ने एक समारोह में कहा था कि हम महिलाओं को प्रेफर नहीं करना चाहते क्योंकि प्रशिक्षित करने के बाद वे शादी करके चली जाती हैं. उनके लिए नौकरी वेटिंग रूम की तरह होता है. 70 के दशक में यही तस्वीर यू टर्न लेती है. 70 के दशक में दी स्टेट्समैन के तत्कालीन संपादक सीआर ईरानी कहते हैं कि हम महिलाओ को पत्रकारिता में प्रेफर करते हैं क्योंकि वो सीरियस, समर्पित और भरोसेमंद होती हैं. नीरजा मानती हैं कि यह एक दशक का बहुत बड़ा क्रान्तिकारी बदलाव है.

नीरजा ने अपने लम्बे पत्रकारिता के करिअर में खुद को एक पॉलिटिकल पत्रकार की तरह स्थापित करने के लिए कभी देर रात पार्टी, क्लब, इधर-उधर बेवजह दौड़ने का सहारा नहीं लिया. अपने परिवार और काम के बीच में संतुलन स्थापित करने के लिए नीरजा बतलाती है कि जब वो इंडियन एक्सप्रेस में थीं तब सुबह की मीटिंग अटेंड करने के बाद वे सीधे घर की और दौड़ती थीं. तभी उन्होंने गाड़ी भी खरीदी थी अपने काम में सामंजस्य स्थापित करने के लिए. जब उनके सहकर्मी ऑफिस के बाहर चाय-पानी पीते थे तब वे अपने बेटे के साथ क्वालिटी टाइम गुजार रही होतीं. इसके बाद वे फिर ऑफिस की और दौड़तीं, या अपने सोर्स की तरफ. नीरजा कभी अपनी स्टोरी के लिए एक सोर्स पर निर्भर नहीं रही हैं. वे सबसे बात-चीत करना पसंद करती हैं. हंसमुख और मिलनसार स्वभाव की नीरजा युवा पत्रकारों के साथ भी उतनी ही गर्मजोशी के साथ मिलती हैं जितना कि वे अपने वरिष्ट पत्रकार मित्रों और राजनेताओं से. ये नीरजा की ही पारखी नजर का कमाल है कि 1995 में वो सोनिया गाँधी पर लिखती हैं- “AT THE MOMENT SHE IS MORE LIKELY TO POSITION HERSELF IN SUCH A WAY SO THAT SHE CAN BE THE POWER BEHIND THE THRONE”. ये उन्होंने एक दशक पूर्व तब लिखा था जब 2004 में सोनिया गाँधी ने अपने को प्रधानमंत्री न बनाने की प्रसिद्ध घोषणा की थी.

नीरजा का नाम अगर पॉलिटिकल पत्रकारिता में आदर के साथ लिया जाता है तो शांता सरबजीत सिंह का नाम कला और संस्कृति पत्रकारिता में परिचय का मोहताज नहीं है. उन्होंने THE FIFTIETH MILESTONE; A FEMININE CRITIC नामक पुस्तक लिखी जिसमे 50 महत्वपूर्ण महिलाओं के बारे में जानकारी दी गयी है. ये महिलाएं भारत के 50वें स्वाधीनता वर्षगांठ के अवसर पर आईं. . इसके अलावा NANAK, THE GURU भी उन्होंने लिखी है. वे UNESCO और The World Culture Forum Alliance (WCFA) जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्था की सलाहकार भी हैं. 1972 से वे Hindustan Times में नृत्य पर निरंतर लिख रही हैं और गुलाबी अखबार “The Economic Times” की स्थायी स्तंभकार हैं. देश-विदेश के अन्य पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर उनके लेख छपते रहते हैं. उन्होंने देवदासी परंपरा और लद्दाख की संस्कृति पर एक वृत्तचित्र भी बनाया है. वे कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की कमेटी में रही हैं और राष्ट्रीय फिल्म समारोह में जूरी के पद को भी सुशोभित किया है. इसके अलावा कांस और बर्लिन अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में उन्हें लगातार बुलाया जाता है. शांता-नीरजा की पीढ़ी में पत्रकारिता के क्षेत्र में कोमी कपूर, उषा राय, कल्याणी शंकर का नाम उनके कामों के कारण लिया जाता है. ऐसा कहा जाता है कि दिल्ली के पावर सर्कल का ऐसा कोई भी गॉसिप नहीं है जो कोमी कपूर और उनके पत्रकार पति को मालूम न हो. उषा राय जब टाइम्स ऑफ़ इंडिया में थीं और जब वे पहली बार गर्भवती हुईं तो उन्होंने छुट्टी मांगी तब उन्हें कहा गया- The rule books had to be consulted for TOI had no tradition of maternity leave. ऐसा कहा जाता है कि जब वरिष्ठ पत्रकार बच्ची काकरिया ‘दी स्टेट्समैन’ में नौकरी के लिए गयीं तो उन्हें यह कह कर मना कर दिया गया था कि संस्थान में महिला टॉयलेट नहीं है. आज की महिला पत्रकारों को यह जान कर आश्चर्य होगा कि नौकरी न मिलने की यह भी वजह हो सकती है.

महिला पत्रकारों के लम्बे संघर्ष का नतीजा है कि आज पत्रकारिता का परिदृश्य बदला है. पर उपस्थिति बदली है, स्थिति नहीं. दिल्ली में भास्कर की तेजतर्रार पॉलिटिकल पत्रकार स्मिता मिश्र जो अपने बीजेपी कवरेज के लिए जानी जाती हैं, ने जब दस साल पहले पत्रकारिता शुरू की थी जम्मू-कश्मीर जैसे संवेदनशील इलाके से तो महिला पत्रकारों को हार्ड बीट नहीं दिया जाता था. केवल संस्कृति -सेमिनार तक उन्हें सीमित रखा जाता था. जब स्मिता ने आर्मी, पुलिस और राजनीती जैसे मुद्दों पर लिखना शुरू किया तो उन्हें कई तरह के दंश झेलने पड़े. पर अपने काम से उन्होंने सबका मुंह बंद कर दिया.

ज्योति मल्होत्रा का नाम विदेश मामलों की जानकर के रूप में सम्मान के साथ लिया जाता है. 25 वर्ष के लम्बे सफ़र में ज्योति ने अपनी शुरुआत कोलकाता के दी टेलीग्राफ अखबार से की थी. उसके बाद वे इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ़ इंडिया, मिंट आदि कई अखबारों से गुजरते हुए आज दिल्ली में स्वतंत्र पत्रकार हैं. ज्योति की यादगार रिपोर्टिंग में 2001 में मुशरर्फ का आगरा सम्मेलन रहा. तब वे 9 माह की गर्भावस्था में थीं. उस समय उन्हें बड़ा रोमांच आया था रिपोर्टिंग करने में. ज्योति बताती हैं कि उनके सभी सहकर्मियों ने उनके साथ भरपूर सहयोग किया था. वे ज्योति के सामने सिगरेट नहीं पीते थे, ज्योति ने खुद सिगरेट उस समय छोड़ रखी थी.

वर्तिका नंदा जो एनडीटीवी के दिनों से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में अपराध की संवेदनशील रिपोर्टिंग के लिए जानी जाती हैं, का मानना है कि महिला पत्रकार को अपने महिला होने की पहचान को बचाए रखते हुए पत्रकारिता करनी चाहिए. उनकी यादगार रिपोर्टिंग में उत्तरी दिल्ली में एक दहेज़ हत्या का मामला है जिसमें मृतका के आंखो में उसके ससुराल वालों ने सुई चुभो कर मारा था. वर्तिका बताती हैं कि उसने रिपोर्टिंग खत्म करके उस मृतिका की सास से कहा- आंटी, जब आपकी बेटी के साथ भी ऐसा हो तो मुझे जरूर बुलाना.

काफी लम्बी यात्रा कर चुकी महिला पत्रकारों की लम्बी लिस्ट है. इसमे शुभा सिंह, अन्नू आनंद, पारुल जो दिल्ली जनसत्ता में एडिशन भी संभालती हैं, सेवंती नैनन जो अपना द हूट नामक मीडिया वेबसाइट चलती हैं, मनिका चोपड़ा, मृणाल पाण्डेय. दिल्ली के प्रायः सभी राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय अखबारों, पत्रिकाओं में महिला पत्रकारों ने अपनी महत्वपूर्ण जगह बना ली है. ये सब उनके लगातार कठिन परिश्रम का नतीजा है.

अभी हाल में 2 नवम्बर को चंडीगढ़ प्रेस क्लब की ओर से आयोजित महिला पत्रकारों पर केंद्रित सेमिनार में वरिष्ठ पत्रकार ननकी हंस ने कहा कि कम से कम चालीस फीसदी महिलायें जो मीडिया में हैं काफी लम्बे समय से अपने पदोन्नति का इन्तजार कर रही हैं. ननकी कहती हैं कि महिलायें शोषण को चुपचाप सहने की आदी हो गयी हैं. उन्होंने इस बात की ओर सभी का ध्यान दिलवाया कि उत्तर-पूर्व राज्यों में केवल 25 महिला पत्रकार हैं. इस सम्मलेन में यह बात भी निकल कर आयी कि टॉप एडिटोरियल पोजीशन में केवल छह फीसदी महिलाये हैं.

दिल्ली में भारतीय महिला पत्रकार कोर्प्स की स्थापना की कहानी भी महिला पत्रकारों की कहानी से कम दिलचस्प नहीं है. एक बार 18 महिला पत्रकारों ने प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया के प्रांगण में बैठ कर निर्णय लिया कि उनके लिए भी अपनी एक ऐसी जगह होनी चाहिए जहां सभी महिला पत्रकार एक दूसरे से मिल सकें. आपस में चर्चा कर सकें. वरिष्ठ पत्रकार सरोज नागी जो इस गोष्ठी में शामिल थीं, का कहना है कि यह क्लब पीसीआई की प्रतिछाया नहीं है बल्कि महिलाओं के लिए अपने एक स्थान की कल्पना थी. नीरजा कहती हैं कि उन 18 महिलाओ ने एक हजार रुपये अपने पास से निकाले और एक फंड तैयार हो गया. फिर जगह के लिए जद्दोजहद की गयी. उस समय के तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के हस्तक्षेप से लुटियन दिल्ली में संसद का एक खाली बंगला महिलाओं को अपने प्रेस क्लब के लिए मिला.

पहली बैठक में सभी अपने घर से लाये हुए दरी-कुशन पर बैठीं. उन 18 दूरदर्शी महिला पत्रकारों के नाम हैं मृणाल पांडे, उषा राय, कल्याणी शंकर, रश्मि सक्सेना, कोमी कपूर, हरमिंदर कौर, अनीता कात्याल, कुमकुम चढ्ढा, मनिका चोपडा, राधा विश्वनाथ, नीरजा चौधरी, पामेला फिलिपोंसे, ऋतंभरा शास्त्री, रश्मि सहगल, सुषमा रामचंद्रन, सरोज नागी, शीला भट्ट और अमृता.18 महिला पत्रकारों की संख्या बढ़ कर अब 500 से ऊपर हो गयी है. इस क्लब में मीरा कुमार, कृष्णा तीरथ, प्रणब मुखर्जी, पाकिस्तान के विदेश मंत्री कुरैशी तक आ चुके हैं. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपने प्रेस कांफ्रेंस की शुरुआत महिला पत्रकारों के दल को संबोधित कर शुरू करते हैं. इससे महिला पत्रकारों की महत्ता का पता चलता है.


लेखिका माधवीश्री दिल्ली में रहकर स्वतंत्र पत्रकारिता के साथ-साथ मीडिया एजुकेशन से भी जुडी हुई हैं.
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