उस झूठे और करप्ट आईजी की फर्जी प्रेस रिलीज को किसी पत्रकार ने नहीं छापा

Himanshu Kumar : जब हम दंतेवाड़ा में काम करते थे तब एक बार वहाँ एक आई जी साहब की नियुक्ति हुई. एक बार उन्होंने पत्रकारों को अपने आफिस में बुलाया. अपने एक पत्रकार मित्र के साथ मैं भी वहाँ चला गया. आईजी साहब के कार्यालय में एक आदिवासी लड़का जिसकी उम्र करीब सोलह साल की होगी और साथ में एक आदिवासी लड़की जिसकी उम्र करीब पन्द्रह की रही होगी, सहमे हुए बैठे थे. दोनों ने नक्सलियों वाली एकदम नई हरी वर्दी पहनी हुई थी. मुझे शक हुआ कि जंगल से आने वाले नक्सली के पास एकदम नए साफ़ कपडे कहाँ से आये?

आईजी साहब ने सभी पत्रकारों से इन दोनों का परिचय करवाया और बताया कि ये लड़का लड़की दोनों खूंखार नक्सली कमांडर हैं और इन्होंने आज ही पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया है. आत्म समर्पण के बाद इन्होंने दंतेश्वरी माता के मंदिर में शपथ ली है कि ये लोग अब से कभी देशद्रोहियों का साथ नहीं देंगे.

इसके बाद आईजी साहब ने एक लिखा हुआ प्रेस स्टेटमेंट सभी को बाँट दिया. आईजी साहब ने कहा कि इन दोनों पूर्व नक्सलियों की सुरक्षा के लिहाज़ से पत्रकारों को इनसे कुछ पूछने की इजाज़त नहीं दी जा सकती. और अब आप लोग जा सकते हैं. उन्होंने सभी पत्रकारों से कहा कि इस खबर को प्रमुखता से छापा जाए. सभी पत्रकार उठ कर बाहर आने लगे. मैंने कहा कि एक मिनट रुकिए. सब खड़े रहे. मैंने कहा साहब मुझे बस एक बात पूछनी है. आईजी साहब ने कुछ क्षण सोचा और फिर उन्होंने मुझे बस एक बात पूछने की इजाजत दे दी. मैंने बस्तर की आदिवासी बोली में पूछा 'इव घिसिड मीकिन बेनूर इत्तौर' अर्थात यह कपडे तुम्हें किसने दिये? लड़का तो घबरा गया पर लड़की ने भोलेपन से आईजी साहब की तरफ आँखें घुमा कर कहाँ 'वेर साहब इत्तौर' अर्थात इस साहब ने दी. मैंने कहा बस साहब मुझे अब और कुछ नहीं पूछना है. इसके बाद हम सभी लोग आईजी साहब के आफिस से बाहर आ गये .

दंतेवाड़ा के किसी पत्रकार को तो गोंडी आती नहीं थी. मैंने बाहर आकर सभी पत्रकारों से कहा कि भाइयों इन तथाकथित आत्मसमर्पित नक्सलियों का तो कहना है कि यह वर्दी तो उन्हें पुलिस ने बनवा कर पहनाई है. इसलिए पुलिस के दावे पर कैसे विश्वास किया जाय? इसके बाद किसी भी पत्रकार ने आत्मसमर्पण वाली वह खबर नहीं छापी.

बाद में वो आईजी साहब भ्रष्टाचार के मामले में काफी चर्चित हुए. निलम्बित भी हुए. उनके बारे में कहा जाता था कि वह अक्सर नकली आत्मसमर्पण करवाते थे, और सरकार आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों के लिये जो पैसा भेजती थी वह आई जी साहब हड़प लेते थे. शुभ्रांशु चौधरी ने अभी अपनी नई किताब 'उसका नाम वासु था' में इन्ही आई जी साहब की ईमानदारी के कसीदे काढे हैं और अपने एक काल्पनिक नक्सली पात्र के मूंह से आईजी साहब की ईमानदारी की प्रशंसा करवाई है.

मुझे ठीक से तो नहीं पता की शुभ्रांशु ने आईजी साहब को अपने काल्पनिक नक्सली पात्र से क्यों क्लीन चिट दिलवाई है. लेकिन परिस्थिगत साक्ष्य यह कहते हैं की चूंकि शुभ्रांशु ने यह किताब भोपाल में बैठ कर लिखी थी. और यह वाले आई जी साहब भी भोपाल में ही रहते हैं. किताब लिखते समय अपने तथ्यों को क्रोस चेक करने के लिए शुभ्रांशु को उनके पास जाना पड़ता होगा. इस दोस्ती क्या फायदा आई जी साहब ने उठा लिया. शुभ्रांशु को भी इसमें क्या नुकसान होना था. दो वाक्य लिखने में कौन से हाथ दुखे जाते हैं.

इस किताब में एक जगह लेखक ने लिखा है की सिंगारम गाँव में जो उन्नीस आदिवासी मरे गए थे वे निर्दोष आदिवासी नहीं थे क्योंकि उनमे से सीते नामकी लडकी तो हत्याकांड के मुख्य आरोपी एसपीओ मडकम मुद्राज की पूर्व सहायक थी और यह मद्कम मुद्राज पहले नक्सली था और उस हत्या के समय सीते दरअसल आदिवासियों की मीटिंग कर रही थी .

इस हत्याकांड का मुकदमा हम लोग अभी भी छत्तीसगढ़ के हाई कोर्ट में लड़ रहे हैं . असल में एसपीओ मडकं मुद्राज और उसके साथियों ने गाँव पर हमला बोल कर उन्नीस आदिवासियों को मार डाला था। मरे गए आदिवासियों में चार लडकियां भी थीं .चारों लड़कियों के साथ बलात्कार भी किया गया था. यहाँ शुभ्रांशु कहना चाहते हैं की देखो मार डाली गयी वह लडकी निर्दोष नहीं थी क्योंकि वह तो नक्सलियों की मीटिंग कर रही थी .इस प्रकार का लेखन तो दंतेवाडा के सस्ते पत्रकार भी एसपी से पैसे खाकर नहीं करते परन्तु शुभ्रांशु ने इस किताब के द्वारा सरकार की सारी क्रूर हरकतों को सही ठहराने की भी शरारत पूर्ण कोशिश की है.

इसी प्रकार से एक अन्य जगह पर लेखक ने लिखा है कि गांधीवादी लोगों ने (वह गांधीवादी मैं ही हूँ ) सलवा जुडूम द्वारा जला दिये गये नेन्द्रा नामक गाँव को दोबारा बसाया था . वहां का पूर्व सरपच तमैय्या असल में पहले नक्सलियों के साथ मिल कर एर्राबोर बाज़ार लूटने की वारदात में शामिल था , और इसलिए वह डेढ़ साल जेल में भी रहा . लेखक के अनुसार यह बात तमैय्या ने लेखक को कभी नहीं बताई हांलाकि वह उसके गाँव में उसके साथ कई दिन तक रहा .

हम नेन्द्रा गाँव के आदिवासियों को आंध्र प्रदेश और बस्तर के जंगलों से वापिस लाये थे और दोबारा उनके गाँव में बसाया था. और हमने सरकार को चुनौती दी थी कि अगर सरकार इन आदिवासियों को मारना चाहती है तो सरकार को पहले हमारी हत्या करनी पड़ेगी . सब जानते हैं की नेन्द्रा गाँव में आदिवासियों को सलवा जुडूम और सरकार के ज़ुल्मों से बचाने के लिए किये गए हमारे मानव कवच के प्रयोग से सरकार की कितनी थू थू हुई थी. इसलिए शुभ्रांशु इस किताब के माध्यम से यह कहने की कोशिश करना चाह रहे हैं की देखो गांधीवादी लोग भी असल में नक्सलियों की रक्षा कर रहे थे. इस तरह की मनगढ़ंत बातों से किसको फायदा होगा सभी जानते है.

इस किताब के द्वारा दरअसल शुभ्रांशु ने सरकार के मूंह पर लगे सारे कीचड़ को धोने की कोशिश करी है . और उन सारे लोगों की विश्वसनीयता पर कीचड उछाला है जिनसे सरकार को परेशानी हो रही है . उदहारण के लिये इस किताब में बिनायक सेन के बारे में जो भी लिखा गया है वह तो हूँ- बहु पुलिस की कहानी है. और यह कहानी तो रोज़ छत्तीसगढ़ के अखबारों में छपती थी . इसको जानने के लिये किसी नक्सली से मिलने की ज़रूरत थोड़े ही है . यह कहानी तो रायपुर को कोई भी पुलिस वाला एक डोसा खाकर आपको आराम से सुना देता. जहां तक नक्सलियों का सवाल है हमने भी नक्सली देखे हैं . लेकिन कोई भी नक्सली कभी अपने साथ करने वाले लोगों की सूची किसी पत्रकार को नहीं देता .लेकिन शुभ्रांशु की किताब तो कमाल है, उसमे नक्सली खुद हवाई जहाज में बैठ कर दिल्ली आकर रेस्टोरेन्ट में बैठ कर डोसा खाते हुए अपने साथियों की लिस्ट दिल्ली में रहने वाले शुभ्रांशु नामक एक पत्रकार को बताते हैं .

दूसरी एक समझने वाली बात. शुभ्रांशु सीजी नेट नामक एक इंटरनेट ग्रूप चलाते हैं . उस ग्रूप पर शुभ्रांशु की मदद से बिनायक सेन की रिहाई के लिये ज़ोरदार अभियान चलाया गया. अगर शुभ्रांशु को बिनायक के जेल जाते ही पता चल गया था कि बिनायक नक्सलियों के पत्रवाहक (कूरियर) हैं तो उसी समय शुभ्रांशु को उस अभियान से अपने सी जी नेट को अलग कर लेना चाहिये था .लेकिन अब जाकर शुभ्रांशु चौधरी का ह्रदय परिवर्तन कैसे हो गया? छत्तीसगढ़ में सब जानते हैं कि आजकल शुभ्रांशु चौधरी जी रमन सिंह के साथ मंच साझा करने लगे हैं और अब अचानक शुभ्रांशु को ख्याल आया है कि अरे मुझे तो एक नक्सली ने यह कहा था कि बिनायक सेन तो हमारे कूरियर हैं. और छात्तिसगढ़ में काम कर रहे गांधीवादी भी दरअसल नक्सलियों की रक्षा करने में लगे थे.

इस सब को लिखने से ना तो बस्तर की जनता का फायदा होगा. ना देश में नक्सलवाद को समझना चाह रहे लोगों को इस से कोई नई जानकारी मिलेगी. हाँ पुलिस और छत्तीसगढ़ सरकार के कई मूर्खतापूर्ण दावे जो वह मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के बारे में करती थी कि यह लोग तो नक्सलियों के लिये काम करते हैं उन्हें सच साबित करने की नाकाम कोशिश इस किताब में की गयी है.

हिमांशु कुमार के फेसबुक वॉल से.

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