भ्रष्ट अफसरों को संरक्षण देने वाले मुलायम का अखिलेश से बेहतरी की उम्मीद करना बेमानी है

सैफई में पिता ने पुत्र से कहा- तुम्हारा राज ख़राब चल रहा है, कुछ भी ठीक नहीं हो रहा है… यह सुनकर सबको लगा एक पिता का शायद पुत्र पर स्नेह है इस कारण सुधारने की कोशिश में लगा है. पर जब अगले 15 दिन में ही यह बात पिता ने बार-बार दोहरानी शुरू कर दी, तो लोगों को लगा कि शायद मामला कुछ गड़बड़ है. लोगों ने कयास लगाने शुरू कर दिए कि पिता ने पुत्र को गद्दी तो सौंप दी, पर अब शायद उन्हें कुछ अधूरा-अधूरा सा लग रहा है.

पिता ने 1989 में जब पहली बार गद्दी संभाली थी, तब पिताजी आम आदमी से जुड़े 'नेताजी' थे. पिताजी कई बार गद्दी पर बैठे. लोगो के बहुत लाडले थे. लेकिन बाद में वो सिर्फ नाम के ही नेताजी रह गए. जनता से कुछ कटते से चले गए. जनता को लगा हमारे नेताजी को ठाकुर साहब ने ख़राब कर दिया. पर अब तो ठाकुर साहब भी चले गए. बेटे ने ज़बरदस्त मेहनत करके फिर सत्ता भी पा ली है. न किसी का दबाव है, न कोई गठबंधन का डर. फिर भी अगर कुछ गलत चल रहा है तो दोषी कौन है?

पुरानी कहावत है कि बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से आये. आज नेता जी को लग रहा है कि सब गड़बड़ चल रहा है तो जिम्मेदार कौन है? अगर आज यह कहा जा रहा है कि प्रदेश में अफसरों की इमेज ख़राब हो गयी है तो उसका भी कारण कौन है? बात 1995-96 की है,तब कुछ ईमानदार माने जाने वाले अफसरों ने खुद घर में सफाई की शुरुआत की. प्रभात चतुर्वेदी, विजय शंकर पाण्डेय, अनंत कुमार सिंह जैसे अफसरों ने एक मुहिम चलायी कि कैडर में जो सबसे ज्यादा बेईमान अफसर हो, उन्हें वोट के जरिये छांटा जाए. उस समय तय हुआ था कि कम से कम 100 अफसर जिन्हें बेईमान कहें, उनके नाम सार्वजानिक कर दिए जाए. उस समय किसी को 100 वोट तो नहीं मिले थे फिर भी सबसे ज्यादा वोट वालों अखंड प्रताप सिंह, नीरा यादव और ब्रिजेन्द्र यादव के नाम सार्वजानिक कर दिए गए थे.

उस समय इस मतदान को लेकर काफी चर्चा भी हुई थी, पर लुकी छिपी बात जनता के बीच आ गयी थी. कुछ दिन बाद नेताजी प्रदेश के मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने अखंड प्रताप सिंह और नीरा यादव को मुख्य सचिव बना दिया. काफी बवाल भी मचा पर नेताजी ठहरे नेताजी. अपनों को मौका दिया. जनता में सन्देश चला गया कि यहाँ नियुक्ति का पैमाना क्या है और अफसरों में भी. फिर तो प्रदेश में चाहे सपा की सरकार रही हो या बसपा की, दोनों ने अफसरों की क़ाबलियत नहीं, उनकी समर्पण सेवा को ही वरीयता दी. जिसका असर ऐसा हुआ कि लुटेरों ने लूट की और अच्छे अफसरों ने किनारे रहने या प्रदेश से बाहर रहने में ही भलाई समझी.

इस बार पिता ने सोचा कि ढलती उम्र है, पुत्र को अपने सामने ही स्थापित कर दे. पुत्र ने मेहनत भी जबरदस्त की थी, तो संगी साथियों के विरोध के बावजूद भी पुत्र का राजतिलक करा दिया गया.  हमने तब लिखा था कि 'चक्रव्यूह में फंस गया है अभिमन्यु'. समय गुजरा तो लगा कि ऐसा ही हो रहा है. कभी छोटे चाचा नाराज हो जाते हैं तो कभी खान चाचा. पिता और खान चाचा ने तो कभी सूबे का राजा माना ही नहीं, उनकी नजर में अब भी घर का टीपू ही है. उम्र का एक दौर होता है जब बचपन के नाम भी चिढाने लगते हैं. वो कुछ करना चाहता है, पर कुछ बड़े उसे बचपन के नाम के साथ ही लपेटे रखना चाहते हैं, बड़ा होने ही नहीं देना चाहते.

यहाँ तो स्थिति और भी नाजुक बनी कि बेटे की टीम में कौन सेनापति होंगे, इसका फैसला करने का अधिकार भी बड़ों ने अपने पास ही रख लिया और जब रिजल्ट की बात आई तो पूछ रहे हैं कि बताओ क्या हुआ? बेटे का राजतिलक हुआ तो सूबे के सबसे बड़े अफसर के तौर पर जावेद उस्मानी का बेहतरीन नाम सामने आया. लोगों को लगा, नए खून के साथ निजाम भी अच्छा होगा. जावेद उस्मानी के नाम ने लोगों को यकीं भी दिलाया कि इस बार सचमुच अच्छा होगा. दूसरे महत्वपूर्ण पद पुलिस के मुखिया के पद पर चुनाव आयोग ने अतुल को नियुक्त किया था. कई दिन चर्चा चली कि अतुल को ही बनाये रखा जायेगा. अतुल भी ईमानदार अफसरों में शामिल हैं. लोगो का विश्वास मजबूत हुआ.

राजनीति में कहा जाता है कि वक्त पर गधे को भी बाप बनाना पड़ता है. पर बेटे ने ऐसे में जब चुनाव होता है, हर आदमी का महत्व होता है, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हर तरह से मजबूत माने जाने वाले डीपी यादव को साथ लेने से साफ़ इंकार करके अपनी एक शानदार इमेज भी बना ली थी. ऐसे में लग रहा था कि इस बार बदला-बदला सा निजाम होगा. नौजवान खून है. अच्छी टीम लाकर कुछ अच्छा ही करेगा. अचानक पुलिस मुखिया के पद पर अम्बरीश चंद्र शर्मा की नियुक्ति हो जाती है. उनकी एकमात्र खास क़ाबलियत यह है कि वो नेताजी के बहुत नजदीक हैं.

मुख्यमंत्री के अपने सचिवालय और आसपास में अनीता सिंह, पंधारी यादव, जुहैर बिन सगीर, अनिल कुमार गुप्ता जैसे वो ही लोग नियुक्त हुए जिनकी नेताजी के प्रति निष्ठा मानी जाती है. नोयडा जैसे महत्वपूर्ण जिले में भी राकेश बहादुर और संजीव सरन जैसे उन अफसरों की तैनाती की गयी, जो सीबीआई की जांच में फँसे हुए हैं. अनिल कुमार गुप्ता को तो एक साथ ही सारे प्रदेश की जिम्मेदारी दे दी गयी, मानो प्रदेश में उनके अलावा कोई अफसर ही नहीं रह गया हो. हालत यहाँ तक ख़राब हुई कि नियुक्ति सचिव राजीव कुमार को नीरा यादव के साथ अदालत से सजा तक हो गयी और नोयडा के अफसरों को हटाने के लिए अदालत तक को आदेश देना पड़ा.

आज नौजवान सरकार चुनावी वायदे तो तेजी से पूरे कर रही है, फिर भी आम जनता में विश्वास नहीं बना पा रही है. कानून व्यवस्था की स्थिति बदतर नजर आ रही है. अपराध बढ़ रहे हैं. बिजली की स्थिति ऐसी कि शहर भी गाँव से लगने लगे हैं. अफसरशाही निरंकुश हो रही है. पार्टी के नेता बड़ी-बड़ी गाड़ियों में घूम-घूमकर लूट मचाये हुए हैं. पिता-पुत्र के रोज़ कहने पर भी समझ नहीं रहे हैं. ऐसा हो रहा है तो क्या केवल वो ही दोषी है जो जुम्मे-जुम्मे 8 दिन से कुर्सी पर बैठा है, और वो भी बंदिशों के साथ. घर का मालिक तू, पर कोठी-कुठले के हाथ मत लगाना, टीम बनाकर दो आप और कहो -मैच जीतो, तो ऐसा तो धोनी भी नहीं कर सकता. जब नाम के अलावा सब कुछ आपका, फिर अभिमन्यु का चक्रव्यूह में क्या हश्र होगा,  यह पूछने की जरूरत है?

हिंदी दैनिक 'रायल बुलेटिन' के संपादक अनिल रायल का विश्लेषण.

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