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अब कौन मौत को ठेंगा दिखाते हुए कारपोरेट मीडिया को चेतावनी देगा?

कबसे भड़ास को रिफ्रेश पर रिफ्रेश किये जा रहा हूं. लगभग हर बार आलोक जी के बारे में एक नयी श्रद्धांजलि पढ़ने को मिल रहा है. मन है कि भर ही नहीं रहा. लगता है ऐसे ही उनका संस्मरण पढ़ता रहूं, हर बार उनके व्यक्तित्व के एक नए पक्ष से रु-ब-रू होता रहूं. भरोसे के संकट के इस दौर में आलोक जी का जाना एक भयंकर निर्वात छोड़कर गया है.

कबसे भड़ास को रिफ्रेश पर रिफ्रेश किये जा रहा हूं. लगभग हर बार आलोक जी के बारे में एक नयी श्रद्धांजलि पढ़ने को मिल रहा है. मन है कि भर ही नहीं रहा. लगता है ऐसे ही उनका संस्मरण पढ़ता रहूं, हर बार उनके व्यक्तित्व के एक नए पक्ष से रु-ब-रू होता रहूं. भरोसे के संकट के इस दौर में आलोक जी का जाना एक भयंकर निर्वात छोड़कर गया है.

ऐसा लग रहा है कि अब कोई बचा ही नहीं जिस पर ये भरोसा किया जा सके कि बिना किसी मेनुपुलेशन के, किसी के व्यक्तिगत हित-अहित, मान-अपमान, लाभ-हानि की चिंता के बजाय केवल लोकहित को सामने रख कर समूची ताकत से अपनी बात कहेगा. अब कौन होगा ऐसा जो तिहाड़ जाने की कीमत पर, अपना करियर खत्म हो जाने का खतरा लेकर भी अभिव्यक्ति की सच्ची आजादी को एक नया मुकाम देगा. कौन होगा जो अपनी असाध्य बीमारी को भी एक ऐसे अवसर में तब्दील कर देगा, जिससे लोग ‘मेडिकल आतंकवाद’ से, कैंसर से भी भयानक उसके उपचार के बाजारवाद की असलियत के प्रति सचेत होंगे.

कौन बचा है अब जिससे ये उम्मीद की जाय कि वह नियति के तीन महीने के अल्टीमेटम को ठेंगा दिखाते हुए कोरपोरेट मीडिया को चेतावनी देता रहेगा. उसके नोटिस को वैसे ही हवा में धुएं की तरह उड़ाता रहेगा जैसे आसन्न मौत की फ़िक्र को. कौन होगा जो हर तरह के ‘वाद’ के विवाद से परे हटकर सबकी ‘खबर’ लेता रहेगा.

कुछ समय पहले आलोक जी का लिखा यह याद आ रहा है, जिसमें उन्होंने स्वदेश के अपने शुरुआती दिनों की चर्चा की थी. उसमें उन्होंने यह जिक्र किया था कि काम करत-करते मशीन रूम में ही सो जाने वाले उन समेत चार लोगों में से तीन आज सांसद हैं. लेकिन उसी संघर्ष, मेहनत और शिद्दत से जीते हुए तोमर जी ने कभी भी इस तरह के किसी पद की लालसा में अपने कलम को रुकने या बिकने नहीं दिया. किसी राजनीतिक पद पर न रहते हुए भी अपना कद किसी अपने समय के उन सहचरों से बड़ा ही रखा. यूं तो उनके भीतर के सर्जक के विभिन्न रूपों की चर्चा उनके साथ-साथ चले वाले सैकड़ों लोग करेंगे ही. लेकिन दूर बैठकर केवल उनकी कलम से सीखने वाले अपने जैसे लोग उन्हें हमेशा याद रखेंगे, यथा संभव प्रेरणा लेते रहेंगे.

डेनमार्क के कार्टूनिस्ट का कार्टून अपनी पत्रिका में प्रकाशित कर उन्होंने वास्तव में अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर दूकान चलाने वाले कलम के व्यापारियों को बेनकाब किया था. जहां अभिव्यक्ति की आज़ादी, मानवाधिकार, लोकतंत्र की ओट लेकर लिखने वाले कलमकार आपको ‘लिखते’ नहीं बल्कि साज़िश करते नज़र आयेंगे, वहां आलोक जी का लेखन हर साज़िश का पर्दाफ़ाश सा करता नज़र आता था. इस बारे में लिखते शेष लोग जहां आपको सचेत करते नहीं बल्कि चिढ़ाते से नज़र आएंगे, वहां सीना तान कर खरी-खरी कहने वाले आलोक तोमर जी की आलोचना भी कबीर के फटकार की मानिंद होता था. एक ऐसी फटकार, जिसपर मुट्ठी भर अवसरवादियों के अलावा किसी को कोई आपत्ति नहीं होती थी.

उनके साहस भरे उस कदम ने ही कलम के हिप्पोक्रेटों का पर्दाफाश कर दिया था. उन सेक्युलरों का जिनके लिए भारत मां तक को नंगा दिखाना, उसे डायन तक कहना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, लेकिन किसी दूसरी जगह प्रकाशित कार्टून का देश में पुनर्प्रकाशन के कारण अगर कोई प्रताडि़त हो रहा हो तो उसे उनके हाल पर छोड़ देना. जिनकी राजनीति केवल इसलिए कि वह ‘आजादी’ कथित सेक्युलर लोगों के पॉलिटिक्‍स में फिट नहीं बैठता रहा हो. तो इकतरफा आज़ादी की तिजारत करने वाले लोगों के लिए आलोक जी का वह कदम मानो सीना तान कर यह कहता नज़र आया था कि ‘हां पार्टनर, मेरी कोई पॉलिटिक्स नहीं है.’

ऐसा कतई नहीं था कि आप आलोक जी से हर वक्त सहमत ही हों. हम जैसे लोगों की असहमति उनके हाल के विनायक सेन या आरुषि कांड पर लिखे गए लेखों से थी ही. लेकिन कुछ भी लिखते हुए वे कहीं से भी पक्षपाती नहीं दिखते थे. उनका हर लेखन ऐसा लगता था मानो हर ‘बौनों’ से उलट वे केवल अपनी आत्मा की आवाज़ को ही उकेर रहे हों. चंबल के बीहड़ से अपनी यात्रा शुरू करने वाले आलोक जी की ही जीवटता थी कि वो शर-शय्या पर रहकर भी मृत्यु का इंतज़ार करने के बजाय, न केवल उससे दो-दो हाथ करते नज़र आये बल्कि कैंसर के कारणों और उसके नाम पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों की तिजारत के विरुद्ध भी पाठकों को जागरूक करते रहे.

देश के बड़े पत्रकारों जितना कद रख कर भी बिलकुल लो-प्रोफ़ाइल में रह कर आलोक जी ने जिस कलम को सम्मानित किया. जिनका समूचा करियर, सारा संघर्ष केवल कलम की महत्ता को स्थापित करने में ही लगा रहा, सही अर्थों में उस कलम को आज उनकी जय बोलने की ज़रूरत है. साथ ही अगर नए कलमकार उनके जीवन से प्रेरित हो उन्हीं की राह पर कुछ कदम भी चलने की कोशिश करें तो आलोक जी के प्रति यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी. निश्चित ही उनकी जीवटता से प्रेरणा लेकर उनके परिवार के लोगों को इस संताप को सहन करने की ताकत मिलेगी. इस प्रकाश पुंज को जन्म देने वाला माता-पिता को यह पीड़ा सहने की शक्ति देने के लिए इश्वर से प्रार्थना करने की ज़रूरत नहीं है. अपने पुत्र का उज्ज्‍वल कृतित्व ही उन्हें इस वज्रपात को झेल लेने की ताकत प्रदान करेगा. इस समय के सशक्त अग्रदूत आलोक जी को बारंबार प्रणाम.

लेखक पंकज झा रायपुर में भाजपा के मुखपत्र दीपकमल के संपादक हैं.

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