अरविंद त्रिपाठी ने पुलिस के कंधे पर बंदूक रखकर पत्रकारों को निशाना बनाया है

कानपुर के वरिष्‍ठ पत्रकार अरविंद त्रिपाठी ने कुछ दिनों पूर्व दक्षिणी कानपुर के प‍त्रकारिता के बारे में एक खबर लिखी थी. खबर में बताया गया था कि किस तरह से कुछ पत्रकार खबर बनाने के लिए खेल करते रहते हैं. उनकी यह खबर अम्‍बरीश त्रिपाठी को ठीक नहीं लगी. उन्‍होंने इस खबर को आधी अधूरी बताते हुए इसे व्‍यक्तिगत खुन्‍नस निकालने के लिए लिखा गया लेख बताया. उन्‍होंने तफ्सील से पूरे घटनाक्रम को लिखा है, जिसे हूबहू प्रकाशित किया जा रहा है.- एडिटर

आदरणीय यशवंत जी नमस्ते, सर आपके पोर्टल भड़ास पर लिखी गयी खबर ‘लड़ाई-झगड़ा+धक्का-मुक्की+छीना-झपटी+उगाही = साउथ कनपुरिया पत्रकारिता‘  की हकीकत से पर्दा उठाते हुए आपकी जानकारी में डालना चाहता हूं कि कानपुर की पत्रकारिता में किस तरीके से हमारे बीच के पत्रकार भाई एक दूसरे की पीठ में छुरे से वार कर अपना स्वार्थ सीधा करते हैं. कुछ ऐसा ही इस बार भी किया है कानपुर के कुछ स्वार्थी पत्रकार भाइयों ने लेकिन इस बार उन्‍होंने दूसरे के कंधे पर बन्दूक रख कर चलायी है, जो खबर लिखी गई है उस भाषा से साफ़ जाहिर हो रहा है कि खबर लिखने का मुख्य मकसद क्या है, और जो खबर लिखी गई है उसकी हकीकत भी कहीं से कुछ-कुछ गलत है.

सही खबर ये है कि बर्रा थाना क्षेत्र के एक ढाबे में ऑटो से दो सिपाही उतरे, जो बेहद नशे में थे, वहां कुछ लोग पहले से ही बैठकर खाना खा रहे थे. कुछ देर बाद वहां थाने के ही दो और सिपाही खाना खाने आये, उन्‍होंने भी अपने थाने के दो सिपाहियों को नशे की हालत को देखा था. उसके बाद उन दोनों पुलिस वालों ने चुपचाप खाना खाया और वहां से चले गए. नशे में धुत दोनों सिपाही अपशब्‍द बोल रहे थे, इसी बीच ढाबे में बैठे एक व्यक्ति ने एक चैनल के रिपोर्टर को फोन किया कि यहाँ दो सिपाही बहुत नशे में हैं तथा उल्‍टी-सीधी हरकत कर रहे हैं, गाली गलौज कर रहे हैं. इसके बाद एक लोकल चैनल के रिपोर्टर अपने कैमरामैन के साथ वहा पहुंच गए. उसके बाद जानकारी मिलते ही वहां तीन से चार अलग-अलग चैनलों के रिपोर्टर व कैमरामैन भी पहुंच गए.

जब सभी लोग उस जगह पहुंचे तो दोनों सिपाही ढाबे से कुछ दूरी पर पड़े एक तखत पर लेटे हुए थे. बस क्या था सभी कैमरामैनों ने अपना कैमरा आन कर उन दोनों सिपाहियों को शूट करना शुरू कर दिया. जैसे ही दोनों सिपाहियों ने कैमरा चलता देखा तो उठ कर चलने लगे. तकरीबन दो सौ मीटर चलने के बाद एक सिपाही जो ज्यादा नशे में था उसने गाली देते हुए एक स्टील कैमरे पर ऐसा हाथ मारा कि वह हवा में उछल कर नीचे गिरा और टूट गया. उसके बाद उसी सिपाही के साथ दूसरे सिपाही ने जब उसे रोका तो वह अपनी बन्दूक को लोड करने लगा और लोड करने के बाद उसने अपना राइफल वहां खड़े पत्रकारों व पब्लिक पर तान दिया, जिसके बाद वहां खड़े सभी लोग भाग खड़े हुए, क्योंकि सिपाही इतना नशे में था कि वह ट्रिगर भी दबा सकता था. फिर कुछ देर बाद एक व्यक्ति ने पीछे से उस सिपाही को पकड़ा और आगे से साथी सिपाही ने पकड़ा तब जाकर नशे में धुत्त सिपाही की बन्दूक पर काबू पाया जा सका.

इसके बाद बौखलाए सिपाही ने वहां खड़े पत्रकारों से हाथापाई करना शुरू कर दिया. इस नज़ारे की गवाह वहां की सैकड़ों लोगों की भीड़ थी. सभी लोग अधिकारियों को सूचना देने की बात कर रहे थे. इस बीच वह सिपाही वहां से जा रहा था तभी बर्रा थाने की फ़ोर्स व इंचार्ज आ गए, जिन्हें सिपाही देखते ही भाग गया. उसे पकड़ने के लिए फ़ोर्स भी पीछे दौड़ी और जनता भी, पर आगे जाकर वह सिपाही गायब हो गया यानी कि कहीं छुप गया. पर जिसके घर के नीचे खड़ी ऑटो में वह सिपाही छुपा था उसकी खबर मकान मालिक ने पुलिस को दी, जहां पुलिस अधिकारी ने उसे पकड़ा और जीप में बैठाकर ले गए. दोनों सिपाहियों का डाक्टरी परीक्षण कराया गया. फिर आला अधिकारियों ने उन दोनों सिपाहियों को निलंबित कर दिया. उसी रात एक अन्य सिपाही को निलंबित किया गया, जो ड्यूटी के दौरान नशे में पाया गया था. इसके बाद ये खबर हर चैनल में चली.

अब बताइए सर इस खबर में कहां से किसकी गलती है? क्या इस तरह की खबरों को उजागर करना गलत है? क्या पत्रकार इसी तरह खबर के बाद अपने ही स्वार्थी पत्रकारों की वजह से चर्चा का विषय बनते रहेंगे? सर.. आपसे निवेदन है कि यदि अपने यहां कोई खबर छापें तो उस खबर को एक बार जॉच लिया जाया करें. मानते हैं कि आज के समय मे ईमानदार पत्रकार कम हैं, मगर उन पत्रकारों को काम नहीं करने मिल पा रहा है, जो ईमानदारी से काम करना चाहते हैं। भड़ास पर नशेबाजी कर रहे 2 सिपाहियों की हमर्ददी में छपी है, मगर पत्रकारों की पोल खोलने वाले जिन पत्रकार महोदय ने यह खबर लिखी तो क्या वह मौके पर मौजूद थे, जो बात को इस तरह से लिखकर किसी को बदनाम कर रहे है. रही बात सिपाहियों के शराब पीने की तो सवाल यह उठता है कि जो आम जनता की सुरक्षा में ड्यूटी पर तैनात किये गये हैं वो क्या शराब पीकर ड्यूटी निभायेंगे.

दूसरा सवाल यह है कि बर्रा थाने की पुलिस जब बाद में घटना स्थल पर पहुंची तो उसको अपने ही थाने के सिपाही नशे की हालत में मिले, जिन्हें वहॉ पर मौजूद पब्लिक पकड़े हुए थी. इस कवरेज के दौरान तो एक अखबार के फोटोग्राफर का कैमरा भी सिपाही ने तोड़ दिया था. क्या उसने या फिर किसी पत्रकार ने अपने साथ हुए दुर्व्‍यवहार की शिकायत थाने में दर्ज करायी, नहीं ऐसा किसी ने कुछ भी नहीं किया और न ही पुलिस ने किसी विवाद में किसी पत्रकार के खिलाफ शिकायत की. मामला सिपाही और जनता के बीच का था. जिस वजह से किसी पत्रकार ने अपने साथ हुए दुर्व्‍यवहार की शिकायत नहीं की. क्योंकि किसी को भी सिपाहियों से कोई भी खुन्नस नहीं थी, जो हुआ खबर बनाने को लेकर हुआ. मगर खबर पुलिस की हमदर्दी में लिख दी गई. और जिन पत्रकारों के नाम का व्‍याख्‍यान किया गया है शायद वह उन पत्रकारों से मन में खुन्नस रखते हैं या फिर कानपुर शहर में अपने आपको दूध का धुला पत्रकार साबित करना चाहते हैं. सबका मालिक एक है. उपर वाला सब देख रहा है. समय आने पर सब सुधर जायेगा. भगवान सबको सदबुद्वि दें.

अम्‍बरीश त्रिपाठी

reporter.ambrish@gmail.com

Comments on “अरविंद त्रिपाठी ने पुलिस के कंधे पर बंदूक रखकर पत्रकारों को निशाना बनाया है

  • राहुल says:

    आपके शब्दों में सच्चाई जान पड़ती है, अम्बरीश भाई और आप सही कह रहे है यहाँ कोई दूध का धुला नहीं है हमाम में तो सभी नंगे है ………

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  • anurag srivasatav says:

    is tarah ki khabaro ko dekh kar lagata hai ki kanpur me patrakarita kam varchasva jyada ho gaya hai , jisko dekh kar lagta hai kanpur ke patrakar ek dusre ko nanga karne me utar aaye hai aakhir sabhi ek hi pariwar ke hai aur is tarah se arvind ji ne kandhe par bandook rakh kar chalayi hai vah galat hai kyoki agar dekha jaye to sabhi me kuchh na kuchh kami hoti hai is liye khabar ki hakikat me jaye ek dusre par nishane par nahi– aur mai bhadas4media ko dhanyavaad dena chahu ga ki unhone khabar ki hakikat ko samjha …………… anurag srivastava ( anna )

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  • इमानदार पत्रकार हमाम में नहीं घुसते है राहुल जी …….. हम इमानदार कपडे के नीचे नगे होते है ….हम सभी किसी के हमाम में कभी घुसने की लाल सा नहीं होती है …आप को मुबारक …!सब्द आदमी के सोच की पहचान कराती है ……! Rahul

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  • arvind tripathi says:

    अम्बरीश त्रिपाठी ‘टीटू’,शिव शर्मा,अनुराग श्रीवास्तव’अन्ना’,राहुल, अमित कुमार,सहित तमामों साथियों, सहयोगियों,विरोधियों, आक्रान्ताओं, और साजिश कर्ताओं,
    मैं कभी कोई सफाई नहीं दिया करता . कारण ये हैं कि मेरे पास किसी खबर के पर्याप्त प्रमाण होते हैं. वो सरेआम नहीं किये जाते. मैं नहीं जानता कि अनजाने या जानबूझकर तुममें से कौन किसकी गुलेल का पत्थर बन रहा है. मैं आज इस तह में भी नहीं जाना चाहता. मैं तुममें से लगभग सभी की ताकत और कमजोरी जानता हूँ, जिसे ढके रखने में ही सभी की समझदारी और भलाई है.
    रही बात अम्बरीश तुम्हारी तुम्हें तो सब बातें बता ही चुका था फिर ऎसी क्या आफत आन पड़ी कि तुम्हें सफाई देनी पड़ी.ऐसे क्यों रिऐक्ट कर रहे हो जैसे तुम्हारी दाढ़ी में तिनका नहीं झाडू है.फिर अपनी आई.डी. से किसी दुसरे को लिखने की इजाजत क्यों देते हो???? मुझे ये भी पता है कि तुमने ये सब नहीं लिखा है. अन्ना तो बच्चा है, उसे कुछ पता नहीं उसे क्यों मोहरा बनाते हो. डरो, ऊपर वाले के करम से जरूर डरो. आज एक बार फिर तुम सभी दूसरों की तरह से डरे हुए आदमी लगे. दिन-रात दूसरों कि खबर चलाने वाले वीरों, अगर कोई तुम्हारी सच्चाई का एक अंश भी बता दे , तो इतना भय नहीं पैदा करो कि ‘वो’ डरकर अपने सच पर ही शक कर बैठे. दिन-रात पुलिस-कर्मियों के साथ काम करते-करते तुम लोगों की मानसिकता भी निगेटिव होती जा रही है. कुछ अपने लिए समय निकालो. योगासन आदि करो. मानसिक शान्ति के लिए समय निकालो.
    “मेरे लिखे को मिटाने वालो,
    जरा ये देखो लिखा कहाँ है.
    न कोई कागज़ न कोई पत्थर,
    ये दिल जहां है-कलम वहाँ है.
    ….
    जो हक की राहों पे चल रहे हैं,
    उन्हीं की राहों पे हक चलेगा.
    इसी भरो से पे चल रहा हूँ,
    न कोई मंजिल-न कारवां है.”

    साभार – प्रमोद तिवारी.

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