आईआईएमसी में कैंपस प्लेसमेंट का दौर चल रहा है। फसल पक चुकी है और बाजार यहां लगातार खरीददारी के लिए आ रहा है। हर सत्र की तरह 2010-11 में भी मई 2010 में रोपे गए पत्रकारिता के बीज अब पक चुके हैं। लेकिन हर बार की तरह पत्रकारिता बाजार इन पत्रकारों को सही कीमत नहीं दे रहा है। वर्तमान सत्र में हिन्दी पत्रकारिता विभाग के जिन छात्रों का प्लेसमेंट राजस्थान पत्रिका में हुआ है वो गरम हैं। जिन छात्रों का प्लेसमेंट पत्रिका में हुआ है उनमें से कुछ बहुत ही खिन्न हैं।
मंगलवार को ऐसे ही कुछ छात्रों ने क्लास में डॉ. आनन्द प्रधान से कई ऐसी मांगे कर डाली कि माहौल गंभीर सा हो गया। मांगों का सार यह था कि कैंपस प्लेसमेंट के लिए आने वाले मीडिया घरानों के सामने एक न्यूनतम समर्थन मूल्य तय कर दिया जाए। एक छात्र ने 7000 का सुझाव भी दिया। दरअसल हुआ यह कि राजस्थान पत्रिका ने भारतीय जनसंचार संस्थान से चयनित छात्रों का अलग-अलग वेतन देने की बात कही। पत्रिका का कहना था कि मानदेय का निर्णय छात्रों की प्रतिभा और क्षमता के अनुसार दिया गया है। इसी बात से कुछ छात्र उखड़ गए हैं और ये मांग कर रहे हैं कि सभी छात्रों को एक जैसा वेतन दिया जाए।
माहौल को अनुकूल बनाने में माहिर डॉ. प्रधान ने बीच का रास्ता निकालते हुए 7000 से कम वेतन पर चयनित छात्रों में से इच्छुक छात्रों को ये विकल्प दिया कि वह अन्य कैंपस में भी बैठ सकते हैं। पहले ऐसा निर्देश था कि जिन छात्रों का किसी अखवार या चैनल में कैंपस हो जाए वह अगले कैंपस में नहीं बैठेगा क्योंकि इससे प्रतिस्पर्धा का लाभ सभी छात्र नहीं उठा पाएंगे।


योगेश कुमार शीतल की रिपोर्ट.












NEERAJ BHAI PATEL
March 24, 2011 at 10:39 am
बहुत बढ़िया योगेश तुम बेबाक हो और काफी हद तक खोजी पत्रकार भी…..
Joydeep
March 24, 2011 at 11:39 am
Carry respect and dignity for urself…now the journos are only after money…hello IIMC guys gals…need not to worry u r brand itself…dont go through Campus Placements…they cannot do good to you…you own can create ur way…try out independently u’ll get good bargain…
Nadim Akhter
March 24, 2011 at 7:16 pm
दुख तो ये है कि देश का सबसे प्रतिष्ठित संस्थान होने के बावजूद आईआईटी और आईआईएम जैसे संस्थानों के मुकाबले प्लेसमेंट के मामले में आईआईएमसी की साख नहीं बन पाई है हालात जस के तस हैं…भला आज के जमाने में 7 हजार रुपये भी कोई शुरूआती सैलरी है..प्लेसमेंट के मामले में बहुत भारी कमी रह गई है जो आज तक कायम है…अखिल भारतीय परीक्षा से चुनकर आए IIMC के बच्चे ही आज मुख्य रूप से सभी मीडिया संस्थानों को चला रहे हैं…आनंद प्रधान जी को कठोर निर्णय तो लेना ही पड़ेगा…या तो निर्धारित न्यूनतम सैलरी दो या हम बच्चे नहीं देंगे…फ्रेशर अगर मार्केट में जाकर individualy कम सैलरी पर जाइन करता है तो ये उसकी व्यक्तिगत पसंद है…लेकिन अगर संस्थान से बच्चे लेने हैं तो संस्थान की साख को ध्यान में रखते हुए एक सम्मानजनक वेतन तो मीडिया घरानों को देना ही पड़ेगा।
नदीम अख्तर 2000-2001 बैच
(जिस दिन ऊपर वाला मेरे हाथ में कैंपस से recruitment करने का सुअवसर देगा, उस दिन मैं अपने जूनियर साथियों के लिए जरूर कुछ करूंगा )
Amit Pathe
March 25, 2011 at 4:26 am
योगेश हल्के में लो। इंडियन न्यूज़ चैनल की तरह तुम्हे भी जबरन की टीआरपी पाने की महामारी लग गई है। अमा, ये सब तो हमारे घर की बातें जैसी है, वहीं रहने देते। थोरा और परिपक्व हो जाओ। जोश तो है पर होश उससे ज्यादा कम है।
ashok kumar
March 25, 2011 at 6:50 am
Very good Mr Yogesh, your focus on this issue is really remarkable as most of the journos hardly ever think on this point which is important for every body life as a journalist also need a handsome salary to survive in this materialistic world.
anuj
March 25, 2011 at 9:26 am
योगेश तुम मूर्ख और नादान हो .। अपने ऊपर तुम्हें खुद तो भरोसा है नहीं । अपनी औकात को देखो , सैलरी हमेशा योग्यता पर आधारित होती है। तुम सबको अपनी तरह क्यों समझ रहे हो, आईआईएमसी से कल ही दो लड़को 6.5 लाख की सालाना सैलरी पर सलेक्शन हुआ है .. बेहतर है फर्जी हवाबाजी की जगह अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो। और हां जिस थाली में खाओ उसी में छेद मत करो..
anuj
March 25, 2011 at 9:29 am
योगेश तुम मूर्ख और नादान हो .। अपने ऊपर तुम्हे खुद तो भरोसा है नहीं । अपनी औकात को देखो , सैलरी हमेशा योग्यता पर आधारित होती है। तुम सबको अपनी तरह क्यों समझ रहे हो, आईआईएमसी से कल ही दो लड़को 6.5 लाख की सालाना सैलरी पर सलेक्शन हुआ है .. बेहतर है फर्जी हवाबाजी की जगह अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो। और हां जिस थाली में खाओ उसी में छेद मत करो..
Poorva Singh Tripathi
March 25, 2011 at 4:32 pm
योगेश, आपकी हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी। मैंने आपकी बेबाकी के बारे में अपनी एक दोस्त से सुना था। आप क्लास के उन छात्रों की टिप्पणीयों पर बिल्कुल ध्यान न दें जो स्वयं अ-पीड़ित और पूर्वाग्रह से ग्रस्त है। ये तत्व टिप्पणीकर्ताओं को कठपुतली नृत्य करवाने पर मजबूर कर रहे है। एग्जेक्टली ऐसा ही है।
यशपाल शर्मा
March 26, 2011 at 3:33 am
जब तक आईआईएमसी आनंद प्रधान जैसे दलालों के भरोसे चलता रहेगा, ऐसा ही होगा। अंबिका सोनी को इस मामले में सीधा हस्तक्षेप करना चाहिए। आखिर दिल्ली में दो लाख रूपए फूंकने वाले छात्र 4000 रूपए में क्या करेंगे। आनंद प्रधान प्रगतिशीलता के चोले में ब्राह्मणवादी है और मीडिया में चमचों के चरिए लॉबिंग में लगा है।
योगेश ने सही लिखा है और भड़ास ने छापकर उन आरोपों का जवाब दे दिया है कि इन दिनों भड़ास मीडिया मालिकों का समर्थक बन गया है।
राजस्थान पत्रिका के तो उल्टे दिन शुरू हो गए हैं और चौथी तिमाही के नतीजे इसकी पुष्टि करते हैं।
Priti Sharma
March 28, 2011 at 11:29 am
Excellent effort to raise this burning question from this stage. I oblised you…keep it up.