आईएनएस अध्यक्ष दिखे तो मुंह पर कालिख मलो

: हरामखोर और नमकहराम मीडिया मालिकों को थोड़ी-बहुत तो छोड़िए, बिलकुल ही शर्म नहीं आती : अखबार मालिकों का संगठन है आईएनएस उर्फ इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी. जो पत्रकार व गैर-पत्रकार लोग इन मालिकों के अखबारों में काम करते हैं, उनकी तनख्वाह को नए माहौल के हिसाब से रिवाइज करने के लिए सरकार की तरफ से सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जीआर मजीठिया के नेतृत्व में वेज बोर्ड का गठन किया गया था.

इस वेज बोर्ड ने अपनी सिफारिशें एक जनवरी 2011 को दिल्ली में भारत के लेबर सेक्रेट्री पीके चतुर्वेदी को सौंप दी. इस वेज बोर्ड ने पत्रकारों के रिटायरमेंट की उम्र 65 साल करने और तनख्वाह में 35 फीसदी का इजाफा करने की सिफारिश की. कम वेतन पाने और मीडिया मालिकों की मनमर्जी व शोषण के शिकार रहने के कारण कुख्यात हो चुके पत्रकारों के लिए ये सिफारिशें नई बयार की तरह आईं लेकिन मालिकों को यह कहां मंजूर कि उनके यहां काम करने वाले लोग अच्छे से जी सकें, राहत भरी जिंदगी पा सकें. सो, मालिकों ने आपस में विचार-विमर्श कर पत्रकारों के भले के लिए जारी की गई सिफारिशों को नामंजूर कर दिया. आईएनएस की तरफ से कल इस बारे में एक आधिकारिक रूप से प्रेस विज्ञप्ति जारी की गई. इस विज्ञप्ति में एक जगह कहा गया है कि ”आईएनएस ने सरकार से इसे तत्‍काल रद्द करने की मांग की है” और यह भी कहा गया है कि ”अगर सरकार वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करती है तो कई समाचार पत्र प्रतिष्ठान कारोबार से बाहर हो जाएंगे”.

कोई इन हरामखोर मीडिया मालिकों से पूछे कि डाक्टर ने कह रखा है कि तुम अपने अखबार-मैग्जीन की दुकान को चलाते ही रहो. अगर गूदा नहीं है तो दुकान बंद करो और कर लो कोई और धंधा. लेकिन ये नहीं करेंगे क्योंकि इनके मुंह मुफ्त में खाने की आदत जो पड़ चुकी है. सारा माल खुद डकार जाएंगे और उनके यहां काम करने वाले पत्रकारों का भला करने की बात आएगी तो ये लगेंगे रोने कि साहब, ये हो जाएगा, वो हो जाएगा और सब बंद हो जाएगा. इन मीडिया मालिकों के धन और माल की सीबीआई व इनकम टैक्स से जांच करानी चाहिए कि इन लोगों ने कितना माल बनाकर रखा है और कितने की टैक्स चोरी की है. पर सरकारें भी इन मीडिया मालिकों से मिली हुई होती हैं क्योंकि उन्हें भी अपने हित में चीजें छपवानी लिखवानी होती हैं सो इन मीडिया मालिकों का कभी कोई बड़ा नुकसान नहीं हो पाता, इस कारण इनकी चमड़ी दिनोंदिन मोटी होती जाती है. मीडिया के इन नमकहरामों को बेसिक तमीज नहीं है कि अगर उनके यहां काम करने वाले सुखी नहीं रहेंगे तो देर सबेर वे भी सुखी नहीं रह पाएंगे, ये पक्का है.

ये अकाल मौत को प्राप्त होंगे या भांति-भांति के रोगों से ग्रस्त होकर तड़प तड़प कर मरेंगे. या किसी दिन ट्रेन या जहाज दुर्घटना में निपट जाएंगे. हरामखोर व नमकहराम मीडिया मालिकों को ये बददुवाएं हम पत्रकारों की तरफ से है. उनमें अगर थोड़ी भी संवेदना और समझ बाकी हो तो उन्हें बिना जिरह-बहस किए वेतन बोर्ड की मांगों को मंजूर कर लेना चाहिए. पर, वे ऐसा करेंगे, मुश्किल है. मालिक मालिक होता है और मजदूर मजदूर. पत्रकारों को भ्रम हो जाता है कि वे बड़े वीआईपी लोग हैं लेकिन जब उनका मालिक उन्हें आइना दिखाता है तो उन्हें समझ में आ जाता है कि पढ़े लिखे होने के बावजूद वे एक रीढ़ विहीन जोकर से ज्यादा नहीं है जो मालिक के सामने दुम हिलाकर उनका तरह तरह से न सिर्फ मनोरंजन करता है बल्कि पैसा भी कमाकर देता है, धंधा भी बढ़वाता है.

कहां गए पत्रकारों के संगठन जो पत्रकारों के हित के दावे करते रहते हैं. इन संगठनों के लोगों को आगे आकर आईएनएस के खिलाफ मोर्चा खोल देना चाहिए और दिल्ली व मुंबई में आईएनएस के दफ्तरों पर तालाबंदी कर अपनी सिफारिशों के माने जाने तक कलमबंद हड़ताल का ऐलान करना चाहिए. लेकिन दुर्भाग्य से हमारे पत्रकार संगठन मीडिया मालिकों के गुलाम हो गए हैं, उनके पैरोल पर चल रहे हैं. इसी कारण इनकी तरफ से कोई चिल्ल-पों नहीं सुना जा रहा है. हम सभी पत्रकार मीडिया मालिकों के संगठन आईएनएस के बयान की न सिर्फ निंदा करते हैं बल्कि अगर आईएनएस के अध्यक्ष कहीं मिल गए तो उनके बयान के कारण उनके मुंह पर कालिख पोतने का ऐलान करते हैं. नीचे आईएनएस की तरफ से जारी मूल बयान को प्रकाशित किया जा रहा है.

-यशवंत

एडिटर, भड़ास4मीडिया

 


 

“Members of the Indian Newspaper Society (INS) have at an emergency meeting held in Mumbai on 20 January 2011 expressed shock and dismay at the report submitted by the chairman of the wage boards for working journalists and other newspaper employees, and said that this, if accepted by the government, would drive several newspaper establishments out of business. They urged the government to reject the report.

“The president of the INS, Kundan R. Vyas, said that the report was severely flawed and utterly one-sided. The wage boards had been improperly constituted, and the report had been prepared in breach of several rules and time-tested procedures. Further, the wage boards had exceeded their remit under the statute by suggesting measures that were manifestly beyond their scope and terms of reference.

“Echoing the sentiments of the large body of newspapers represented at the emergency meeting, Vyas said that the existence of these wage boards was itself out of tune with the times as even the national commission on labour had in 2002 recommended that there was no need for any wage board, statutory or otherwise, for fixing the wages for workers in any industry. The newspaper industry is the only one which has statutory wage boards, and their presence is aimed at financially compromising the ability of establishments to function in a free and fearless manner, Vyas said.

“The present wage boards had submitted their report without prior consultations among members. The boards had ignored settled principles to assess the capacity to pay, and had made no effort to assess the burden on the newspaper industry, Vyas said. Not just this, the wage boards had not even bothered to publish tentative proposals as was done by earlier wage determining authorities, to respect the principles of fair play and natural justice.”

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Comments on “आईएनएस अध्यक्ष दिखे तो मुंह पर कालिख मलो

  • aap is khabar se bahut aashcharya me mat pariye. yaha banaras AMAR UJALA ka hal batau, 3 pm par offic me pahuchana hai EDITORIAL me n jaane ka koi samay nahi. 12 to bajana hi hai. naya aadesh yah hai ki 3.10 pm ke baad aane per spashtikaran dijiye. matalab ye ki nine hrs to duty karani hi hai. LEAVE ki baat karana yani bagavat ki baat karna. kai log to ese hai jinki 6-7 CL lapse ho gai aur unaki EL kati gai. AB kaise mahaul me patrakar kaam kar rahe hai ye kya MAALIKAN ko khabar nahi. dailogue yeh diya ja raha hai ki 4 page lagane ko kaam khatma hona mt samajhiye. KHOON chusne ka ENAM to in-charge pa hi chuke hai. MARCH me fir tagada ENAM milega hi. VIRODH na ho iske liye LOCAL logo ko transfer ki saja di ja rahi hai.

    Reply
  • aap is khabar se bahut aashcharya me mat pariye. yaha banaras AMAR UJALA ka hal batau, 3 pm par offic me pahuchana hai EDITORIAL me n jaane ka koi samay nahi. 12 to bajana hi hai. naya aadesh yah hai ki 3.10 pm ke baad aane per spashtikaran dijiye. matalab ye ki nine hrs to duty karani hi hai. LEAVE ki baat karana yani bagavat ki baat karna. kai log to ese hai jinki 6-7 CL lapse ho gai aur unaki EL kati gai. AB kaise mahaul me patrakar kaam kar rahe hai ye kya MAALIKAN ko khabar nahi. dailogue yeh diya ja raha hai ki 4 page lagane ko kaam khatma hona mt samajhiye. KHOON chusne ka ENAM to in-charge pa hi chuke hai. MARCH me fir tagada ENAM milega hi. VIRODH na ho iske liye LOCAL logo ko transfer ki saja di ja rahi hai.

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  • Bilkul sahi kaha Yashwant ! Par dikkat ye hai ki ye saare media maaliq , behad ameer gharaanon se aate hain . lihaaza inse kisi bhi tarah ki DAYA ya INSAANIYAT ki ummid be-imaani ho jaati hai . Isiliye jo Delhi ya Bade Shahron mein ya bade gharon mein paida hua, wahi inke yahan bada ya Rashtriya star ka patrakaar banta hai, Bhale aise logon ne (70% Gaaon ke Desh ) Hindustaan ka 1/4 hissa bhi kabhi (Patrakaarita ke maddenazar) na dekha ho . Aap Hindustaan bhar mein ghum kar dekh lijiye – Har zyaadatar paise waalon ka yahi haal hai . Ab Dr. Prannav Roy ji ka hi udhaaharan lijiye – Unhe kabhi sharm aati hai? NAHI ! Gar unhe sharm aati to kya itni fajeehat ke baad bhi wo Barkhaa Dutt jaise BADNAAM chehre ko apne channel par aane dete ? Today Group ke aroon purie ne Prabhu Chaawla ko turant hata diya , par Prannav Roy ji, Brakha ko waise hi jamaaye hue hain. Aur aise bhi maana jata hai ki [b]BADE LOGON KO SHARM AATI NAHI , AUR AATI BHI HAI TO BADI DER SE [/b]! [b]100 mein se 90 b—–aan , Phir bhi mera Bharat Mahaan[/b] .

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  • Shakti Kumar says:

    sir qya patrakar ke hi hit me likhte rahoge kabhi patrakar se niche ke logo ki taraf bhi dhayan do aapne to dekha hi hai hindustan times me casual manak prani ke sath qya saluk kiya ja raha hai vo log 10 sal se vaha par kam kar rahe hai or salary ke nam par unhe diye jate hai sirf 4300 rupye (1800 se 4300 ka safar un logo ne 10 sal me tey kiya hai) or kam liya jata hai 3-3 admiyo ka
    or leadership summit me udaye jate hai carodo. sirf 4300 rupye 10 sal ke bad bhi qya ye sahi sir or kabhi bhi hataye jane ki dhamki to roj hi di jati hai. bharat me badti berojgari ka or sath me hamara kis tarah majak udaya ja raha hai
    (aaj bharat me aapko sabhi prakar ke log padh rahe hai chote se bada sabhi jiska 1 udharan me bhi hu sir) hardik shubhkamnaye

    unhi sataye hue me se ek casual
    Shakti

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  • Gaurav Yadav says:

    मीडिया हाउसेस का एडिटोरियल स्टाफ बंधुआ मज़दूर से ज़्यादा कुछ नहीं। फिर चाहे उनसे फ्री में काम लिया जाए या कम कीमत पर, मालिकों की मर्ज़ी। ये कोई नई बात नहीं है।
    मुझे एक किस्सा याद आता है जब सन् 2008 में आर्थिक मंदी का कथित आर्थिक दौर आया था। हालांकि मीडिया ग्रुप्स का मात्र मुनाफा घटा था लेकिन उन्होंने इसे नुकसान बताना शुरू कर दिया था। उसी वक़्त जेट एयरवेज, जिसे वास्तविकता में बड़ा घाटा हुआ था, ने छंटनी की घोषणा कर दी। मीडिया ने जेट एयरवेज में छंटनी की ख़बर को जोर-शोर से उठाया। अन्तत: मनसे प्रमुख के हस्तक्षेप से जेट को कुछ शर्तों के साथ अपनी छंटनी रद्द करनी पड़ी थी। दूसरी ओर कम मुनाफा कमाने वाले मीडिया समूहों में भी छंटनी का दौर जारी था। मज़ेदार बात यह रही कि दूसरों की ख़बर छापने वाले मीडिया कर्मियों की छंटनी की ख़बर को उठाने वाला कोई नहीं था। जैसे कि सभी मीडिया समूहों में गुप्त समझौता हो चुका था कि ‘तेरी भी चुप, मेरी भी चुप।’
    न जाने कितने पत्रकार इस छंटनी की भेंट चढ़े और मन मसोस कर रह गए, चीखे-चिल्लाए लेकिन उनकी आवाज़ दबकर रह गई। मीडिया के सेल्स और मार्केटिंग जैसे दूसरे विभागों के कर्मी तो दूसरे सेक्टरों में एडजस्ट हो गए और रह गए तो सिर्फ़ निरीह पत्रकार। ऐसे मौके को मीडिया घरानों ने खूब भुनाया और उन पत्रकारों को अपने यहाँ से साफ कर दिया जिनसे उन्हें ख़तरा था।
    तो भाई लोगो यह कोई नई बात नहीं है। आवाज़ उठाने के लिए ज़रूरी है आवाज़ का स्वतंत्र होना, और यहाँ जब हर शब्द को सैलरी के पैमाने में तोला जाता है तो आवाज़ उठाएगा कौन?

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  • om prakash gaur says:

    आज राजनीति से अपराधी बहार करने की बात हो रही है कल से निश्चित ही पत्रकारिता और अखबार के धंधे से निकलने की बात होगी तब कुछ शरीफ मालिक जरुर कहेंगे गन्दा है पर धंधा है …

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  • Beauty Singh says:

    yaswant jee ke akhabar nikal kar dekho aap ko aapki aukat samjh me aa jayegee. mai bhee ek chhote akhbar me computer opretor hu , mera malik income se jyada hum logo ko paisa bhee deta hai aur samman bhee hum log 17 logo ka stof hai koee bhi ek aadmi malik ki sikayat nahi sunnna chahata hai

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