आधी आबादी की आवाज पहचानने में चूके लालू

गिरीश मिश्र: डॉ. लोहिया कहते थे, ‘जो बोलेगा और डोलेगा, वो आगे जाएगा’, नीतीश ने इस सूत्र-वाक्य पर अमल किया : बिहार के चुनावी नतीजों के प्रमुख कारकों में प्रदेश की आधी आबादी यानी महिला तबके की जागृति, उनका अपूर्व उत्साह और चुनाव में बढ़-चढकर उनकी हिस्सेदारी रही. लेकिन बहुतों ने इस नए माहौल की या तो अनदेखी की या जान-बूझकर इसे झुठलाने की कोशिश. तभी तो दीवारों पर लिखी इस इबारत को समझने में वे चूक गए. उदाहरण के तौर पर बूथों के बाहर महिला वोटरों की लंबी-लंबी कतारों के बारे में मतगणना से एक दिन पूर्व जब लालू यादव से पूछा गया तो उन्होंने ऐसी किसी महिला जागृति की बात या फिर उनकी किसी उत्साही शिरकत को सिरे से ही खारिज कर दिया. तभी लालू ने ये भी कहा, ‘अरे राबड़ी देवी वहीं न वोट देंगी, जहां हम कहेंगे. इसमें नया क्या है?… यही पूरे बिहार में होता है, रिजल्ट आएगा तो सब मीडिया वालों को पता चल जाएगा…’.

लालू के ऐसा कहने के 24 घंटे बाद जब काउंटिंग शुरू हुई तो लालू राज में बिहार की ‘फर्स्ट लेडी’ और पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी चुनाव हार रही थीं. वो भी एक जगह से नहीं, राघोपुर और सोनपुर, दोनों जगहों से. राबड़ी की ये हार दरअसल लालू की हार थी. ऐसा नहीं था कि लालू-राबड़ी ने इन सीटों को जीतने में कोई कोर-कसर छोड़ी थी. उनके मन में डर और आस दोनों थी कि यदि किसी एक से हारे भी तो क्या, दूसरी सीट तो जीत ही लेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया. गौर करने की बात ये है कि आरोपों से घिरे इन्हीं लालू ने अपना राज बनाए और बचाए रखने के लिए जब राबड़ी को मुख्यमंत्री बनाया था तो उसे अपनी ‘प्रगतिशील सोच’ और ‘महिला सशक्तीकरण’ का ध्वजवाहक बताते नहीं थकते थे. दरअसल, लालू का द्वंद्व ही यही था, जिसे वो वक्त रहते कभी समझ ही नहीं पाए और यही उनकी चुनावी ताबूत की कील भी साबित हुआ.

लालू इसे तब भी नहीं समझ पाए थे, जब वो मुख्यमंत्री थे और अपने चुनावी प्रचार के सिलसिले में लाव-लश्कर के साथ दौरे पर थे, तभी गांवों की कमजोर-पिछड़ी महिलाओं ने उनका घेराव किया. महिलाओं ने पूछा कि पिछले चुनाव में भी आपने इस इलाके में विकास का वादा किया था, लेकिन कुछ नहीं हुआ. फिर आप वही आश्वासन दे रहे हो, इसका क्या मतलब है? लालू ने तब जवाब दिया – ‘आप ठीक कहती हैं, यहां विकास नहीं हो पाया. लेकिन हमने आपको जो दिया है, वो पहले किसी और ने दिया है क्या? क्या इसके पहले भी आपने किसी सीएम का काफिला रोका है?…’ महिलाएं चुप थीं. लालू ने उनसे कहा, ‘हमने आपको यही दिया है. हमने आपको आवाज दी है. आज सीएम का काफिला आपकी आवाज पर रुकता ही नहीं, सीएम कार से उतरकर आपसे बात भी करता है…. क्या ये कम बड़ी बात है!…’

दिलचस्प है कि लालू ने उन्हें आवाज तो दी, लेकिन उनकी आवाज को सुना नहीं. नीतीश ने सुन लिया. इसी सुनने का ही नतीजा रहा कि ‘महिला सशक्तीकरण’ की कथित प्रतीक राबड़ी सोनपुर और राघोपुर – दोनों जगहों से चुनाव हार गईं तो दूसरी ओर पहली बार बिहार विधानसभा में 34 महिलाएं चुनाव जीत कर पहुंचीं. दरअसल, लालू मंडल के प्रतीक थे. वी.पी. सिंह और देवीलाल की पसंद भी – मानने वाले उन्हें कर्पूरी ठाकुर का नया अवतार भी मानते थे. लेकिन सच यही है कि लालू के पास कर्पूरी जैसी न तो दृष्टि थी और न ही कर्मशीलता. उन्होंने जातीय व्यवस्था को बजाय तोड़ने के उसे मजबूत ही किया. सामंती व्यवस्था में सिर्फ अगड़ों की जगह पिछड़ों को स्थापित कर दिया गया. इस तरह शोषण की नई व्यवस्था पैदा की  – जिसमें अपराध, कुव्यवस्था और हर किस्म का भ्रष्टाचार भी शामिल हो गया. नतीजा हुआ कि हालत बद से बदतर ही हुई.

लालू की यही कमजोरी नीतीश का हथियार बनी. पांच साल पहले उन्होंने जो आस जगाई – उसे लोगों ने देखा और लालू के 15 बरस से उसकी तुलना भी हुई. वैसे अस्पताल, स्कूल, पंचायत – सभी जगह बदलाव झलका, लेकिन सबसे ज्यादा परिवर्तन सड़कों पर दिखा. फिर अपराधीकरण पर विराम और 55 हजार अपराधियों को सींकचों के पीछे ठूंस कर बिहार में सुरक्षा की बयार दशकों के बाद चलना कोई मामूली बात नहीं थी. जिस बिहार में सरेशाम घरों के दरवाजों पर ताले लग जाते हों, और हत्या, लूटपाट, अपहरण, डकैती मामूली बातें हों – वहां देर रात महिलाएं सड़कों पर अकेली चलती मिलें, तो इसे कहने वाले ‘जंगलराज’ से निजात ही कहेंगे.

डॉ. लोहिया कहते थे, ‘जो बोलेगा और डोलेगा, वो आगे जाएगा’. नीतीश ने इस सूत्र-वाक्य पर अमल किया. आठवीं कक्षा पास करने वाली हर लड़की के लिए नीतीश ने मुफ्त साइकिल और यूनिफार्म की व्यवस्था की. साथ ही हर जिले के पुलिस प्रशासन को हिदायत की कि हर लड़की और हर साइकिल की सुरक्षा तय हो. प्रदेश में 27 लाख साइकिलें वितरित की गईं – मुख्यमंत्री साइकिल योजना के तहत. यानी पहली बार लाखों लड़कियां साइकिलों पर उन नई बनी सड़कों पर खुलेआम दिखने लगीं, जहां से वे पहले अकेले गुजरने को सोच भी नहीं सकती थीं. और, इसका सीधा श्रेय मिला नीतीश को.

ऐसा भी नहीं है कि बात सिर्फ मुफ्त साइकिल बांटने की हो – बिहार जैसे पारंपरिक, लेकिन विकास के लिए छटपटाते समाज में आशा की नई लौ जगी. स्कूलों में शिक्षक नियमित आएं, इसके लिए जहां सख्त सरकारी निर्देश थे, वहीं लड़कियों के घर वालों, खासकर बच्चियों की माताओं ने नजर रखना शुरू किया. जो महिलाएं पहले घरों से बाहर निकलने में असुरक्षित और स्वभावतः असहज महसूस करती थीं, वे अब ये भी तय करने लगीं कि बाढ का पैसा पीड़ितों में ईमानदारी से बंटे और अस्पताल तथा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर डॉक्टर समय से आएं और इलाज करें. महिलाएं अब घरों से निकल कर बाहर खुले में समाज-राजनीति पर चर्चा करती भी दिखने लगीं. इस तरह लोकतंत्र को एक नया अर्थ भी मिला. पर्दे में रहने वाली अनेक बुर्काधारी औरतों ने भी नई आशा के साथ अपनी बच्चियों को लड़कों के साथ स्कूल भेजना शुरू किया. जरूरत होने पर इन्होंने मंत्री-मुख्यमंत्री, अधिकारियों तक अपनी शिकायतें भी भेजीं. यहां दिलचस्प ये है कि ये सब उस बिहार के कस्बे-शहरों में होना शुरू हुआ, जहां आज भी टॉयलेट की सुविधा आम लोगों को मयस्सर नहीं है, उन्हें मैदानों-सड़कों के किनारों का सहारा लेना पड़ता है. लेकिन उनका ‘बोलना और डोलना’ रंग लाया. इस तरह जिस आवाज को वर्षों तक लालू सुनाने पर भी सुनने को तैयार नहीं थे, वही आवाज नीतीश की ताकत बन गई.

इसलिए जब बात जातियों की पारंपरिक गोलबंदी से अलग हटकर अति-पिछड़ों, महादलितों और पसमांदा मुसलमानों को आरक्षण और सुविधाओं की होती है तो हमें नहीं भूलना चाहिए कि बिहार की आधी आबादी ने भी जातियों के इस चक्रव्यूह को तोड़ने में खासी अहम भूमिका अदा की है. यह लीक से अलग हटकर एक नए बिहार की आस जगाती हुई आवाज है. ऐसा भी नहीं है कि ये आवाज सिर्फ बिहार तक सीमित रहने वाली है. इसका असर दूरगामी होने वाला है. जिस दिन बिहार के ये अप्रत्यशित चुनावी नतीजे आ रहे थे, लगभग उसी समय राष्ट्रीय पार्टियों में से एक भाजपा विजयी उल्लास में कर्नाटक में अपने मुख्यमंत्री येदियुरप्पा के भारी भ्रष्टाचार और घपले के बाद भी उन्हें आगे मुख्यमंत्री बनाए रखने की घोषणा कर रही थी और उधर संसद में भ्रष्टाचार के खिलाफ हंगामे को अंजाम दे रही थी, तो दूसरी ओर कांग्रेस आंध्र प्रदेश में तेलंगाना की जनआकांक्षा से निपटने के लिए क्षेत्रीय संतुलन तलाशते हुए ताश के पत्ते की तरह मुख्यमंत्री बदलने की कवायद कर रही थी. कहने का आशय यह है कि ऐसा नहीं है कि लोकतंत्र की इस हवा को किसी सीमा में बांधा जा सके – पहले भी ऐसे असर दिखते रहे हैं और आगे भी दिखेंगे ही. इसका तात्पर्य ये भी नहीं है कि बिहार में सब कुछ अच्छा ही हो गया है. नीतीश ने ठीक ही कहा है कि काम तो अब शुरू होगा. लोगों में उत्साह है तो अपेक्षाएं भी. उन पर खरा उतरना होगा. लेकिन 243 सदस्यीय विधानसभा में 141 सदस्यों पर विभिन्न किस्म के आपराधिक मुकदमों की फेहरिस्त ये बताती है कि सब कुछ उतना आसान भी नहीं है.

जरूरत है संकल्प की. बिहार की आधी आबादी यानी महिलाएं अगर एकजुट हैं नई सुबह के लिए तो समग्र संदर्भ में जड़ता टूटने की अनेक निशानियां भी मौजूद हैं. चाहे वो जातीय गोलबंदी की टूटन की बात हो या फिर विकास की नई चाहत और कुछ नया करने की प्रतिबद्धता. जो बिहार बुद्ध की मध्यमार्गी धारा का हमेशा ही कायल रहा, चाणक्य की दूरदृष्टि जिसकी पूंजी रही, अशोक और चंद्रगुप्त जिसके शासकीय मानक रहे, ह्नेनसांग-फाहियान जिसके नालंदा और पाटलिपुत्र के प्रशंसक रहे, जिसका चंपारण गांधी की भारत में पहली कर्मभूमि रही और जहां से आजाद भारत में लोकतंत्र को नई ऊर्जा देने वाला जेपी आंदोलन चला – वहां का नवसंकल्प नई मंजिलें तय करे – यही कामना है, विकास और जम्हूरियत में यकीन रखने वाले हर तबके की, हर व्यक्ति की.

लेखक गिरीश मिश्र वरिष्ठ पत्रकार हैं. इन दिनों वे लोकमत समाचार, नागपुर के संपादक हैं. उनका ये लिखा आज लोकमत में प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लेकर इसे यहां प्रकाशित किया गया है. गिरीश से संपर्क girishmisra@lokmat.com के जरिए किया जा सकता है.

Comments on “आधी आबादी की आवाज पहचानने में चूके लालू

  • Bhanupratapnarain Mishra says:

    Theek kaha Girish ji aapne per Lalu ji ne jahan gandhi parivaar ki tarah vanshwaad ka aatankwaad chalya vahi bihar ke logon ne dekha ki Nitish kumar Ji esse kishi bhi prakar matlab nahi raktae….eska bihar or pure Bharat main bada asar pada…gandhi dyanst ke saath satth lalu or paswan dyansty bhi dhvast ho gai…bihar ke in vidansabha chunoovo main…Anti dyansty Front

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  • madan kumar tiwary says:

    गिरीश जी कहां देख लिया आधी आबादी को वोट देते हुये। किसी बात को ईतना मत बढाकर लिख दें की कल कुछ विपरित निकले तो जबाब न हो । भ्रष्टाचार कितना है मालूम है। और चुनाव नतीजे खुद जितने वालों को हजम नहीं हो रहें हैं। लेकिन एक बाद हमेशा याद रखनी चाहिये । सत्य ्देर से हीं सही सामने जरुर आता है। मेरी बात याद रखेंगें ई वी एम से जिन्न निकलता है यह तो हरि के प्रसाद ने कर दिखाया है। अब वह जिन्न किस – किस राज्य में निकला है यह जांच से हीं पता चलेगा । जांच भी सिर्फ़ एक हीं बात की करनी है कि कौन से राज्य के क्षेत्रीय दल के नेता ने अक्टूबर २००९ में हरि के प्रसाद से संपर्क साधा था ई वी एम में वोट चोरी करने के प्रस्ताव के साथ। फ़िर तो एक ऐसा सत्य उभर कर सामने आयेगा की हम आप सब शर्मसार हो जायेंगे।

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  • Rajiv Kishor says:

    Bihar main mahilaon ne jamkar voting ki. ye shayad madan kumar ko hi nahi dikha. iski do wajah ho sakti hain. yaa to unko dikha nahi, ya phir wo dekhna nahi chahte. waise girish sir ke is lekh par aise sawalon ka koi matlab nahi hai. kaun nahi janta ki satta ke mad me laloo ne kin-kin baton ki andekhi ki thi. ab uska khamiyaza to bhugatna hi padega. waise madan ji agar aap mere comment par bhi comment karna chahte hain to manch khula hai, swagat hai.Shandaar lekh ke liye girish sir apko badhaiyan.

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  • आदरणीय गिरीश जी,
    आपने बिहार और झारखण्ड में स्टेट एडिटर रहते हुए उसको देखा और परखा है. निश्चित रूप से लालू ने आधी दुनिया को नाराज किया है, भले ही अपनी पत्नी को मुख्यमंत्री बनाया हो उन्होंने. विकाश और अपराधीकरण ने भी उन्हें लोगो से डोर क्या. मौकापरस्ती भी एक वजह रही है सर. हम आपसे सीखते रहे है, जो इस चुनाव में देखा उसमे आधी दुनिया का बड़ा महत्त्व रहा है.

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  • Yogendra Rawat says:

    sara desh Nitish ki jeet ka loha man raha hai. Sabse achchi baat yah hai ki vihar me sabhi ko vikas dikh raha hai. Is chunav ne yah bhi sabit kar diya hai ki election jeetna bahubliyo, rupyon or criminals ke hi boote ka hanin. Nistha se kam krke bhi ise jeeta ja sakta hai. Ismen koai atiyukti hahin hai. Girish sir ka article santulit or tathyaparak hai.

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  • Amit Kumar Singh says:

    सच कहा, सच्चाई किसी को हज़म नहीं होती… आज जब दाँव उल्टा पड़ गया तो जिन्न निकलने की बात कर रहे हैं. कल जब लालू खुद बैलट बॉक्स से जिन्न निकालते थे तब तो तमाम सबूत होने के बाद भी कोई कुछ नहीं कर पाता था. जनता ने विकास और सुरक्षित भविष्य की उम्मीद को वोट दिया है.

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  • nice article.
    But still women are being instructed by men whom to vote in general elections and that too is a fact.When most of Bihar Men are working in other state, obviously it will be women who will be left behind in their home state.So there will be more women seen at polling booths.Also i think cycles should have been provided to boys too by Nitish Government as even for them Village school are 10Km-20Km away even more.I have been a frequent visitor to Bihar during nitish time as well as Lalu’s time.The Change is clearly visible, specially in law and order.Bihar has a glorious history and it’s time that History be now transformed into Present.

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