आरटीआई- मदद की दरकार : आईआईएम- बुलंद इरादे

अमिताभ ठाकुर की तरफ से प्रकाशन के लिए आज दो मेल आई हैं. एक में शीर्षक है- ”पत्रकार साथियों से मदद की दरकार”. दूसरे में हेडिंग है- ”बुलंद इरादे”.

पहली मेल में जहां आरटीआई शहीदों के बारे में जानकारी मांगी गई है तो दूसरे में आईआईएम की पढ़ाई कर नोट कमाने हेतु दूसरों की नौकरी करने की जगह अपना धंधा चमकाने वालों या फिर अपने सामाजिक सरोकार को आगे बढ़ाते हुए नई पहल करने वालों के बारे में विस्तार से वर्णन किया गया है. लीजिए, इन दोनों को बांचिए…

पत्रकार साथियों से मदद की दरकार

भाइयों, मैं और मेरी पत्नी नूतन आरटीआई शहीदों के ऊपर एक पुस्तक लिख रहे हैं, इसके लिए कुछ सामग्री इकट्ठा हुई है पर अभी और काफी कुछ बातें जानने की जरूरत है. मैं समझता हूं कि इसमें पत्रकार साथियों की बहुत बड़ी भूमिका हो सकती है क्योंकि आप लोगों की निगाहों में तमाम बातें आती रहती हैं. मैं सभी आरटीआई शहीदों के नाम यहां लिख कर आपसे कुछ निवेदन करना चाहूँगा-

1. ललित कुमार मेहता, पलामू, झारखण्ड
2. कामेश्वर यादव, गिरिडीह, झारखण्ड
3. वेंकटेश, बंगलुरु, कर्नाटक
4. सतीश शेट्टी, पुणे
5. विश्राम लक्ष्मण डोडिया, सूरत, गुजरात
6.  शशिधर मिश्रा बेगुसराय, बिहार
7. अरुण सावंत, बदलापुर, थाने, महाराष्ट्र
8. शोला रंग राव, कृष्ण, आंध्र प्रदेश
9. विट्ठल गीते, औरंगाबाद, महाराष्ट्र
10. दत्तात्रे पाटिल, कोल्हापुर, महाराष्ट्र
11. अमित जेठवा, जूनागढ़, गुजरात
12. रामदास पाटिल घड़ेगओंकर, नांदेड, महाराष्ट्र

मेरे निवेदन हैं- 1. यदि कोई अन्य नाम आप समझते हो कि आरटीआई शहीदों की सूची में छूटे हुए हों तो कृपया बताने का कष्ट करें 2. इनमे से जिनके भी विषय में आपको जानकारी हो तो कृपया amitabhthakurlko@gmail.com या nutanthakurlko@gmail.com  या 94155-34526 पर बताने की कृपा करें.

अमिताभ ठाकुर, आईपीएस, लखनऊ


बुलंद इरादे

अभी हाल ही में मेरी आईआईएम लखनऊ के एक छात्र अमित हरलालका के साथ लिखी पुस्तक “द फ्रेश ब्रू: क्रोनिकल्स ऑफ सिजिनेस एंड फ्रीडम” प्रकाशित हुई है. इसमें आईआईएम लखनऊ के पच्चीस ऐसे पूर्व विद्यार्थियों के संघर्ष प्रस्तुत किये गए हैं जिन्होंने आईआईएम से पढ़ने के बाद अन्य किसी बड़े फर्म या मल्टी-नेशनल में नौकरी नहीं किया बल्कि जीवन का वह रास्ता चुना जो उन्हें मन से पसंद था.

अब देखिये ज़रा इन लोगों को कि ये वे लोग हैं जिनके पीछे दुनिया भर की कंपनियां भाग रही थी और जो काफी सुरक्षित और सफल भी थे किन्तु जिनके अंदर कुछ अलग करने की आस थी और इसी आग के चलते उन्होंने अपनी बड़ी-बड़ी नौकरियाँ छोड़ दी और ट्रेडिशनल रास्ता दरकिनार करते हुए अपनी मर्जी के अनुसार अपना एक स्वतंत्र मार्ग चुन लिया. इस सूची में मुझे एक पर एक लोग नज़र आते हैं. मैं देखता हूँ कि यदि बिमल पटवारी नाम के सज्जन आईआईएम लखनऊ से गोल्ड मेडलिस्ट हो कर विश्व के सबसे सम्मानित फार्मों में एक ए एफ फर्गुसन में अच्छी नौकरी छोड़ कर कंप्यूटर के माध्यम से कैड, कैम का काम शुरू करते हैं और देश के चोटी के कंप्यूटर कंपनियों में अपना स्थान बना लेते हैं, तो दूसरी ओर सत्यजित सदानंदन है जो आईआईएम से पड़ने के बाद भी लोगों को फीफा के माध्यम से फुटबाल खिला रहे हैं तथा दूसरे विश्व-स्तरीय फुटबाल क्लबों के लिए काम करते हैं.

तरुण त्रिपाठी हैं, जिन्होने यशराज फिल्म्स में काम किया, हम तुम के निर्माण के सक्रीय भूमिका निभाई और अब एक टी वी सीरियल लिख रहे हैं तो गायत्री अय्यर नामक यह सुन्दर बाला भी हैं अंतर्राष्ट्रीय थियेटर में काम करती हैं और ब्लैक, सलाम नमस्ते समेट बीस फिल्मों में गा चुकी हैं. मैककिन्सकी के पूर्व कंसल्टेंट मयंक शिवम हैं जो अब ग्रामीण रेडियो तथा कम्युनिटी रेडियो का काम कर रहे हैं तो सामजिक सरोकारों वाली फिल्मों के निर्माता नितिन दास को कैसे भूल सकते हैं जिन्होंने न्यूयोर्क फिल्म एकेडेमी से अध्ययन किया. एनवायरनमेंट पर काम करने वाले सुधांशु सिरोनवाला वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर के लिए जेनेवा में काम कर रहे तो रत्नेश माथुर सब कुछ छोड़ कर बंगलुरु में बच्चों के लिए स्कूल चला रहे हैं. अंजलि मुलाटी हैं जिन्होंने मंजुनाथ शंमुगम ट्रस्ट तब बनायी जब मंजुनाथ की हत्या हो गयी थी और ऐसा लगने लगा था कि सारा मामला हमेशा के लिए दब जाएगा पर उनके मुहिम ने रंग लाया और आज वह इसके माध्यम से भ्रष्टाचार से लड़ रही हैं.

जिन लोगों की कहानी मैंने लिखी इनमें से हर व्यक्ति ने अपने लिए यह नियत किया कि वे वही करेंगे जो उनका मन कहता है. वे यदि किसी की गुलामी करेंगे तो अपने मन की. इसी प्रण पर चलते हुए इन विद्यार्थियों ने अपने लिए नए मुकाम बनाए और समाज को एक नयी दिशा देने का प्रयास किया है. मैं इस पुस्तक को सन्दर्भ के रूप में प्रस्तुत करते हुए यह कहना चाहूंगा कि आज समाज में इस सोच की भारी जरूरत आ गयी है वह कर रहा है जो उसका मन कर रहा है. इस कड़ी के खुद को पूरी तरह नहीं पा कर मुझे कुछ झुंझलाहट, कुछ कष्ट होता है पर मैं यह जानता हूँ कि यदि नज़र लगा बैठे तो आज नहीं तो कल बात बनती ही है. बाकी मैं इनमे से हर किसी को एक सच्चे सिपाही और बुलंद इरादों वाले इंसान के रूप में देखता हूँ जिन्होंने बड़े दमखम और बड़े विश्वास के लिए अपने लिए रास्ते चुने और बाधाओं के विपरीत भी उन पर चलने का साहस कर रहे हैं.

अमिताभ ठाकुर, आईपीएस, लखनऊ

Comments on “आरटीआई- मदद की दरकार : आईआईएम- बुलंद इरादे

  • jai kumar jha says:

    अच्छे विचार हैं आज इस बात की जरूरत भी है की सच्चाई,अच्छाई,ईमानदारी की राह पर चलने वालों के सराहनीय प्रयासों को प्रचारित और प्रसारित किया जाय तथा हर योग्य व्यक्ति को अपनी कमाई का कुछ हिस्से को देश व समाज को भ्रष्टाचार के खिलाप लड़ना,इंसानी कर्तव्यों को निभाना तथा सामाजिक उत्थान के लिए काम कैसे किया जाय सिखाने के लिए खर्च करना चाहिए…..हमारा समाज मनमोहन सिंह जैसे पद के लोभी अंधे तथा मुकेश अम्बानी जैसे 6000 करोड़ के घर को पाने की लालसा रखने वाले शर्मनाक स्तर के लूटेरे उद्योगपतियों की वजह से कराह रहा है…..इंसानियत मरने के कगार पर है जिसे जिन्दा करने का प्रयास हमसब को मिलकर करना ही होगा……

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  • Siddharth Kalhans says:

    अमिताभ भाई, शिशिर गुप्ता को आप भूल गए। उन्होंने भी आईआईएम लखनऊ मे पढ़ा और फिर पत्रकार बने। आजकल इंडियन एक्सप्रेस में रिपोर्टिंग टीम को हेड कर रहे हैं।

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