आलोक तोमर और अच्छे-बुरे आदमी

अमिताभ ठाकुरमैं आप सबके सामने यह कहने में लेशमात्र भी संकोच नहीं करता कि मैं अलोक तोमर नामक इस जीव का एक बहुत बड़ा फैन हूँ. मैं उन्हें पहले ज्यादा नहीं जानता था, जैसे वे मुझे बिलकुल नहीं जानते रहे होंगे (क्योंकि मैंने कोई भी ऐसा सुकृत्य या दुष्कृत्य नहीं किया था जो देशस्तरीय हो और जिसके कारण अलोक तोमर जैसा दिल्ली में बैठा एक बड़ा पत्रकार मेरा नाम जानने को बाध्य हुआ हो). हां, उनका नाम जरूर सुन रखा था, दिल्ली के एक नामचीन पत्रकार के तौर पर.

पर फिर पहले फेसबुक के जरिये और उसके बाद डेटलाइन इंडिया और भड़ास के जरिये मैं वास्तव में अलोक तोमर के सानिध्य में आ गया. जी हां, मेरा मानना है कि एक व्यक्ति (और खास कर एक लेखक) से सबसे निकटस्थ संपर्क उसकी लेखनी और उसके विचारों के जरिये ही हो सकता है और इस रूप में मैं भी अलोक तोमर का बहुत नजदीकी और जानने-पहचानने वाला हूं. मैं समझता हूं, मैं अलोक जी द्वारा लिखा कोई भी ऐसा लेख नहीं छोड़ता जिस पर मेरी निगाह न चली जाए. क्योंकि पता नहीं क्या बात है इस आदमी की लेखनी में कि जब यह लिखता है तो बस लिखता ही जाता है, मानो उसके शब्दों में, उसके वांग्मय में, उसकी लेखनी में, उसके स्वर में, उसकी भाषा में और उसके विचारों में किसी प्रकार का बिजली का करेंट लग गया हो, जो उन्हें निरंतर साहस, हिम्मत, निष्ठा, विचारोंमत्तता, गहराई प्रदान कर रहा हो.

लिखता मैं भी हूं, लिखास रोग से मैं भी पीड़ित हूं. कई दूसरे लोग भी कागज़ काले करते ही रहते हैं और जब से इन्टरनेट आ गया है तब से लिखईओं की तो एक बिन मौसम बरसात सी आ गयी है जो ई-मेल के जरिये, सोशल साईट के जरिये, ब्लोगों के माध्यम से और अन्य तमाम प्रकारों से अपने लिखने और छपने की अन्तर्निहित आकांक्षा को पूरा कर पा रहे हैं, पर इन सब के बीच अलोक तोमर नामक इस लेखक का प्रभाव मुझ पर कुछ ज्यादा ही पड़ता है. कारण भी है. आज के समय में संभवतः व्यावसायिक कारणों से अथवा निजी लाभ से प्रेरित हो कर एक ऐसी स्थिति बन गयी है जब एक तो सच बोलने से ही परहेज किया जा रहा है और यदि सत्य का प्रस्फुटन किया भी गया तो वह ‘सत्यम ब्रूयात, प्रियं ब्रूयात, ना ब्रूयात सत्यम अप्रियम’ की परंपरा का ही अनुसरण होता जान पड़ता है. यानि कि चुभने वाली, कड़वी और खरी-खरी बात कहने की परंपरा कुछ सपाप्तप्रायः सी होती जान पड़ती है.

बहुधा टीवी चैनलों पर किसी पत्रकार को नेता-प्रशासक को हड़काते हुए दिखा दिया जाता है, पर उनमें भी कई बार ऐसा दिख जाता है कि जिस पर जोर आजमाइश की जा रही है, वह कुछ कमजोर किस्म का प्राणी है, जिसमें पलट कर औकात दिखाने की बहुत ताकत नहीं है. वरना जिसमें वास्तव में ताकत है और जो सरे-आम गलत कर रहा है उसके खिलाफ उठ कर, सामने आ कर, सीने को सामने खोल कर और अपने व्यावसायिक हितों को एक तरफ भुला कर मोर्चा लेने की जो ताकत मीडिया के समुदाय में हो सकती है, (वैसे ही जैसे खुद मेरे जैसे नौकरीपेशा समुदाय में, जहां हम कई बार उस समय भगवान बुद्ध की शांत मूर्ति स्वरुप बन जाते हैं जब हमसे हमारा कर्तव्य कुछ ठोस और खालिस कृत्य करने की मांग करता है) उसका कई बार अभाव सा दिखने लगता है. इतनी हिम्मत मुझमे नहीं और ना ही मेरी इतनी प्रतिष्ठा है कि मैं इन सभी लोगों के बारे में कह सकूं जिनके बारे के सब जानते हैं कि वे सच्ची बातें कह सकते हैं पर कई क्षुद्र कारणों से सच से विमुख हो जा रहे हैं. पर हां, इस युग में भी, इस परिवेश में भी मुझे अलोक तोमर जैसा व्यक्ति दिखा तो जो वही लिख रहा है जो उसे सही जान पड़ रहा है, जो कड़वा है, जो बहुत सारे ताकतवर लोगों को सीधे उनके मुंह पर सच कहने की हिम्मत रख रहा है और जो अपनी कलम की ताकत उस काम में लगा रहा है जिसमे हर पत्रकार को लगाना चाहिए.

हो सकता है मैं वास्तविक अलोक तोमर को नहीं जानता होऊं. यह भी हो सकता है कि अलोक तोमर असल में वैसे कदापि नहीं हों, जैसे वे आज नज़र आ रहे हैं. यह भी संभव है कि उनका इतिहास उतना चमकदार नहीं हो जैसा मेरे जैसे दूर से और देर से देखने वाले लोगों को दिख रहा हो. यह हो ही सकता है कि उनके खुद के ऐसे राज़ हों जिन्हें शायद वह खुद भी भूलना चाहते हों. उदाहरण के लिए मैंने उनसे सम्बंधित ये शब्द एक जगह लिखा देखा-

“जी हां, मैं बात कर रहा हूँ उसी आलोक तोमर की जो कभी जनसत्ता में प्रभाष जोशी का करीबी हुआ करता था, वही अलोक तोमर जिसे बाकायदा प्रभाष जोशी ने लात मार कर बाहर निकला, वही अलोक तोमर जिसने पत्रकारिता को हथियार बना अपने स्वार्थ सिद्धि में पत्रकारिता का बेजा इस्तेमाल करता था परिणाम तिहार की हवा। आजकल वापस अपने कलम से मानो देश का कलम सिपाही या फ़िर बाजारवाद में अपने धंदे के लिए दलाली और दलाली न दे तो कलम से उसकी बजा दी। मीडिया की ये ही पहचान ने आम लोगों में मीडिया की विश्वसनीयता कम की और इसके लिए प्रभाष जोशी गुर्गों की जमात ने इसमें सबसे अग्रणी भूमिका निभाई। जी हाँ आज कल अलोक तोमर ने सच बोलने का ठेका ले रखा है, और अपने वेब साईट पर इस सच को जो की सच से ज्यादा उस लेखक की खीझ लगती है जिसका कलम कुंद हो चुका है और जो अपने कलम को बेचने के लिए मारा मारा फ़िर रहा हो मगर खरीदार नही मिलता है। पत्रकारिता के वो लोग जो अलोक तोमर से मीलों आगे निकल गए जबकि वो छोटे छोटे दलाल थे जब तोमर जी इनमे ख़ास स्थान रखते थे तो खीझ प्रभु चावला पर भी उतरेगी ही लेकिन इन सबसे जो सिर्फ़ एक बात सामने आती है वो ये की प्रभाष जोशी के जितने भी गुर्गे रहे सभी के सभी प्रभाष जी की तरह महत्वाकांक्षी और महत्वाकांक्षा पुरा ना हुआ तो वापस अपने पुराने धंधे पर.”

एक दूसरे व्यक्ति का कथन देखिये- “इस घटिया आदमी के बारे में चर्चा करके आप बेवजह ब्लॉगर्स का समय जाया कर रहे हैं। जो आदमी जीते-जी प्रभाष जोशी को दोस्तों की महफिल में जली-भुनी सुनाकर अपनी एहसानफरामोशी का उदाहरण दिया करता था, वही आदमी उनके मरने के बाद ऐसे जता रहा है कि वही प्रभाष जी की पत्रकारिता का वारिश है। खैर, शराब और शबाब के शौकीन इस ढोंगी पत्रकार के किस्से दिल्ली, भोपाल, ग्वालियर और भिंड के पत्रकार भलीभांति जानते हैं। यह आदमी इतनी तेजी से रंग बदलता है कि गिरगिट भी शरमा जाए। यह वो सपोला है जो बड़ा होकर पालने वाले को ही काटता है। इससे सावधान रहें।“

अब ऊपर लिखी गयी दो बातें सही हैं या जो मैं अपनी तरफ से पढ़ और देख रहा हूँ इस सम्बन्ध में स्पष्ट टिप्पणी दे सकना मेरे वश में नहीं है, और मेरे लिए उचित भी नहीं है. पर हाँ, अपने स्वयं के जीवन और समय के साथ अपनी स्वयं की बदलती सोच के आधार पर मैं यह जरूर कह सकता हूँ कि व्यक्ति हमेशा एक समान नहीं रहता. एक ऐसा समय था जब मुझे यदि किसी जनपदीय पोस्टिंग पर जगह नहीं मिली हो तो मैं अपने-आप को बहुत खराब स्थिति में मानता था और मेरी इच्छा रहती थी कि मेरा भी किसी जिले के एसपी के रूप में स्थान मिल जाए. अब देखते ही देखते वह समय भी आया जब मुझे आईआईएम में पूर्ण सुविधाहीन अवस्था में ज्यादा अच्छा लगता है और अब मैं आईएएस और आईपीएस अफसरों की ट्रांसफर-पोस्टिंग के न्यूज़ तक नहीं पढता. इस तरह के मानसिक परिवर्तन अगर मेरे जैसे व्यक्ति में हो सकते हैं तो यह दूसरे तमाम लोगों में निश्चित रूप से होते होंगे.

इसके मद्देनज़र मैं अलोक तोमर के विगत जीवन के बारे में जानकारी के अभाव के कारण कोई भी टिप्पणी नहीं करूंगा पर हां जब से मैंने उन्हें पढ़ना शुरू किया है, तब से मैं जो भी पढ़ रहा हूँ, जो उनकी हिम्मत देख रहा हूँ, जो उनकी अतुल्य मानसिक शक्ति देख रहा हूँ, जो उनका अपने पेशे और अपने कर्तव्य में प्रति समर्पण देख और सुन रहा हूँ, जिस प्रकार की धार उनके कलम में पा रहा हूँ, वह मुझे अद्भुत ढंग से वशीभूत किये हुए है. इनका असर मुझ पर यह है कि मेरी आंतरिक इच्छा यह रहती है कि काश अलोक तोमर की आवाज़ दूसरे अन्य कोनों से भी उसी तेजी और हुंकार के साथ आती.

एक लंबे समय से पता था कि अलोक जी कैंसर से पीड़ित हैं. अभी हाल में यशवंत भाई ने हम लोगों को बताया कि इधर उनकी तबियत कुछ ज्यादा खराब हो गयी थी. पर विश्वास मानिए, मेरे मन में उनके प्रति कोई सहानुभूति के भाव नहीं जागते. कारण यह कि सहानुभूति जगाते हैं लाचार, असहाय, कमजोर किस्म के लोग. अलोक तोमर जैसा शेर क्या सहानुभूति जगायेगा. वह पट्ठा जो इधर तो रोज सुबह-शाम कीमोथेरेपी करा रहा है और उधर सुबह और शाम अपनी लेखनी से लोगों की साँसे रोके हुए है, वह भला क्या सहानुभूति का पात्र है. कभी नहीं. अलोक तोमर यदि कोई भाव जगा सकते हैं तो वह है अपने प्रति सम्मान का, अपने प्रति आदर का, अपने प्रति भय का (कि यह आवारा नदी अपना तट-बांध छोड़ के आपकी ओर ना प्रवाहित होने लगे) और अपने प्रति विश्वास का.

अंत में मैं लगे रहो मुन्ना भाई की तर्ज़ पर इतना ही कहना चाहूँगा- “लगे रहो आलोक भाई.” (बड़े भाई से इतना हक तो लिया ही जा सकता है).

लेखक अमिताभ ठाकुर आईपीएस अधिकारी हैं. लखनऊ में पदस्थ हैं. इन दिनों आईआईएम, लखनऊ में अध्ययनरत हैं.

Comments on “आलोक तोमर और अच्छे-बुरे आदमी

  • Quite touching account Mr thakur. I havent known Mr Tomar personally either. Just heard about him from some colleagues. But I have started loving his columns too. He is icredibly sharp, piercing and pungent and doen’t mince words….
    As for those trying to belittle him, they should also know that everyone has a past( including those nuktachins)… greater souls are those who get over them and grow… and yet dont repeat the same mistakes in life.
    I have seen many hallowed warriers tumble and many decorated chieftains falling like ninepins.
    We are nonone to judge anyone’s character and past but we do and must react to what comes in black and white and in full public glare and in that case.. Mr Tomar indeed is a lancer…..

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  • By chance I came across bhadas4media blog and I was exposed to Alok Tomar’s writings.

    I remember back in 1970s – when I was an English-language daily newspaper reporter in India and used to write real crime stories in Hindi – most of the Hindi magazines or newspapers used to carry translated material and the editors were either teachers or writers.

    Professionally-trained Hindi journalists were unheard of those days. Before I left India for good in late mid-70s I can say Ravivar was in limelight those days. Encouraged by M J Akbar, Udayan Sharma and Surendra Pratap Singh (both of whom I had met once) had brought a whiff of fresh air to Hindi journalism scene. Arvind Kumar of Madhuri was another journalist who had given a new face to Hindi film journalism.

    After a lapse of 30+ years I have just started reading Hindi newspapers and magazines – thanks to the web media.

    Having read the interviews of media heroes like Alok Tomar and several other media persons I can sense that Hindi journalism has evolved in its own way and for good. Unlike English journalists, who work like stenographers and power-brokers, good Hindi journalists espouse causes.

    Alok Tomar, as he admits himself, is a bundle of contradictions.

    Like you, I am also mesmerised by his intense writings and honest appraisal of him as a person. As you said rightly, he doesn’t need any sympathy.

    Yes, we do need Alok Tomars in our lives just to reassure ourselves that it is possible to celebrate sadness.

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  • Thanks Amitabh to puting me back on the scanner. Having said that let me clear a confusion. I do have a past but nothing of which I am ashamed of. I regret many things I did in my life like many I should have done but ignored. Sheer callous and lethargic of me.

    But, I never did anything that may become a burden on my soul. And who is this minion who claims to have ”seen” me ”abusing” Prabhash Joshi. He/ she must have lied in the ration card about the parentage. Thank god no one is showering sympathies on me for my ailment. You too amitabh, scroll down and read both parts of my interview and being a cop, you will find faultlines, if any.[b][/b]

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  • भारतीय़ नागरिक says:

    आपको बधाई इसलिये कि आपने यह मानने का साहस किया कि आईपीएस होने के कारण जिले के एसपी की पोस्टिंग न मिलने पर खीज होती थी. सच को स्वीकारना भी बड़ी बात है. दूसरा यह कि निश्चित रूप से जिले की पोस्टिंग पर आदमी का वजन तो बढ़ता ही है साथ में कुछ अन्य सुविधायें भी मिलती हैं जो अन्यथा नहीं मिल पाती होंगी. आपने लिखा है कि आपकी मानसिक अवस्था में बदलाव आया. अच्छी बात है. यदि चौथाई आईए-एस पीएस संवेदनशील हो जायें तो पूरा देश सुधर जाये.
    आलोक जी जो लिख रहे हैं, सच लिख रहे हैं और सच कडुवा तो होता ही है. उनके जज्बे को सलाम. ईश्वर उन्हें जल्दी स्वस्थ करे. और आपको फिर आपके साहस के लिये बधाई देना चाहूंगा.

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  • vishalshukla says:

    दीपक जी आलोक तोमर को किसी की सहानभुति की जरुरत नही है। आपकी इस बात से मैं 100 फिसदी सहमत हुँ। आलोक तोमर जी को व्यक्तिगत रुप से तो मैं भी नही जानता। लेकिन उनकी सशक्त लेखनी का मैं भी मुरीद हुँ। रही बात आलोक जी के बीते हुए कल की। तो इस बात पर मुझे (राजेश खन्ना) की फिल्म का गीत याद आ रहा है…….यार हमारी बात सूनो, ऐसा एक इन्सान चुनो, कि जिसने पाप ना किया हो, जो पापी ना हो।

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