इस शोर के बीच पसरा सन्‍नाटा

मैं डेटलाइन इंडिया में था। आलोक जी एस1 चैनल में ज्वाइन करने का मन बना चुके थे। बताया कि मैं कल से चैनल में काम करूंगा और आप यहां का काम संभालेंगे। मैंने कहा-आप चिंता मत कीजिए। ‘‘मैं हूं ना’’। उन्होंने कहा मुझे पता है कि आप हैं। फिर हल्की फुल्की बातचीत हुई और आखिर में उन्होंने बताया कि आगे से बात करते वक्त इस बात का खयाल रखिएगा कि आप एक चैनल हेड से बात कर रहे हैं। मैंने कहा कि आप भी मत भूलिएगा कि मैं भी एक संस्था का सर्वेसर्वा हूं और इसीलिए बातचीत हमेशा बराबरी के स्तर पर ही होगी। मुझे लगता है कि आपको ऐतराज नहीं होना चाहिए। वे मान गए।

साप्ताहिक लेख लिखने में वे किसी भी व्यस्तता को दरकिनार कर देते थे। उन्हें लेख लिखना था लेकिन उन्हें कंप्यूटर में लिखना आता नहीं था। उन्होंने मुझे बताया कि आप मेरे पास आ जाइए। लेख लिखवानी है। मैंने कहा कि एक टाइपिस्ट की हैसियत से नहीं आऊंगा और जिस हैसियत में मैं हूं उसके मुताबिक मेरे पास आप गाड़ी भिजवाइए फिर विचार करूंगा। उन्होंने कहा कि फिलहाल मेरे पास ऐसी सुविधाएं नहीं है लेकिन यकीन मानिए आपके सम्मानीय होने का अहसास मुझे है।

मैं उनके पहुंचने के बाद उन्हें फोन मिलाया और अपने आने की सूचना दी। बोले आप वहीं खड़े रहिए मैं आ रहा हूं। मैंने कहा सर, अब आप मुझे कुछ ज्यादा ही इज्जत दे रहे हैं। बोले नहीं, जिसका जो हक होता है उसे वह मिलना ही चाहिए। फिर आदर के साथ ऑफिस ले गए और उसे दिखाते हुए सगर्व बोले देखिए कुछ तो मुझमें खास है न। मैंने कहा- यह कुछ भी नहीं है। आप बहुत ही खास हैं। मैं तो यूं ही मजाक किया था तो उन्होंने कहा कि मैं ही कौन सा गंभीर हूं। लेख लिखवाने लगे और चूंकि चाय वे पीते नहीं थे इसलिए सिर्फ मेरे लिए चाय मंगवाई और कहा कि खर्च का हिसाब बाद में कर लेंगे। वह बकाया कभी उन्होंने चुकता नहीं किया।

एक बात जिसकी वज़ह से वे मेरे लिए खास रहे हैं वह यह कि जब भी कोई हेडलाइन उन्हें अच्छी लगती थी, वे तारीफ करना नहीं भूलते थे। यह बात अलग है कि मैं हमेशा ही हेडलाइन उनसे ही लगाने की जिद्द किया करता था। लेकिन आम तौर पर वे इसके लिए राजी नहीं होते थे। दिल्ली से बाहर होने पर वे सिर्फ मुझे हेडलाइन बताते थे और ख़बर को पूरा करने के लिए मुझे कहते थे। एक बार उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर खबर लिखवाई। खबर कुछ इस तरह की थी कि प्रधानमंत्री ने अधिकारियों को बुला कर फटकार लगाई है। खबर लिखवाने के बाद उन्होंने कहा कि इसका हेडलाइन आप दीजिए क्योंकि खबर मैंने लिखी है। मैंने कहा कि बेहतर होगा कि आप ही इसका हेडलाइन दें। बोले, मैंने कहा न कि खबर मैं लिख चुका हूं इसलिए हेडलाइन आपको ही देना है। मैंने कहा कि इसका हेडलाइन प्रधानमंत्री ने अधिकारियों को घर का पता बताया, कैसा रहेगा। वे सीधे कुर्सी से उछल गए और बोले इससे अच्छा कुछ हो ही नहीं सकता। बोले-आप बढ़िया सोच लेते हैं। मैंने कहा कि सोचने के लिए दिमाग की जरूरत होती है। तो वे बोले इसका मतलब क्या है बेटा! मैंने कहा कि मतलब आप से बेहतर और कौन समझ सकता है। बोले चलिए, किसी दिन मैं हेडलाइन बनाऊंगा तब देखिएगा कि मेरे पास भी बढ़िया दिमाग है। मैंने कहा कि इसके बारे में मैंने तो कभी मना किया ही नहीं है। मैं तो सिर्फ अपने बारे में बता रहा था।

तीन दिन से लोगों की उनके साथ जुड़ी यादों की ख़बरों को पढ़ रहा हूं। अलग अलग लोग और अलग अलग यादें। सभी उनके देहावसान पर शोक में हैं। लेकिन कौन कहता है कि उनका देहावसान हो गया है। आज भी उनके शब्द मेरे कानों में गूंज रहे हैं। उनके गढ़े गए शब्दों को लगातार पढ़ रहा हूं और ऐसा मैं अकेला नहीं हूं। मैं जानता हूं कि मेरे गढ़े जाने वाले शब्द तो उन्हीं के हैं। उन्होंने ही तो बताया है कि शब्दों को गढ़ते वक्त किन किन बातों का खयाल रखना जरूरी होता है। इसीलिए मेरा मानना तो यह है कि उनका देहावसान हो ही नहीं सकता है। एक शरीर के चिता में जल जाने से उससे जुड़ा हुआ संस्कार और सरोकार कभी खत्म होता है क्या! उन्होंने ही तो लिखा था कि चिंता मत करो तात नहीं तो चिता बन जाओगे और यह भी कि मैं नहीं कहीं जाने वाला। लेकिन पता नहीं क्यों, हर जगह शोर है लेकिन मुझे सन्नाटे का अहसास हो रहा है।

लेखक गिरिजा नंद झा पत्रकार हैं तथा आलोकजी से जुड़े रहे हैं.

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Comments on “इस शोर के बीच पसरा सन्‍नाटा

  • sach me mai aapke bare me hi soch raha tha. mujhe tazzub ho raha tha, aap aalok jee ke itne karib rahe, aap unke bare me kitni sari baaten bataya karte the, lekin ab tak wo baten sabko kyon nahi batai. aapki lekhni me bhi aalok jee ki khushbu hai, maine to aapke madhyam se hi une jana hai, lekin jitna bhi jana hai, kam lagha hai.

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  • संदीप द्विवेदी says:

    गिरि जी आपने ही मुझे अलोक सर के यहाँ काम करने का मौका दिलवाया था. वो सभी की काफी इज्जत करते थे..मुझे पंडित जी कहा करते थे. उनकी लेखनी की धार हमेशा जिंदा रहेगी..

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