एक आईपीएस की नजर में पुलिसिया दबंगई

अमिताभ ठाकुर
अमिताभ ठाकुर
वर्दी; ऐसा शब्द, जो आजकल सुरक्षा भाव कम, खौफ ज्यादा पैदा करता है. रक्षा-सुरक्षा के लिए सृजित वर्दी की अब ज्यादातर चर्चा इसके भक्षक पक्ष पर केंद्रित होने लगी है. वर्दी; जिसे विपक्ष में रहlते हुए हर नेता गरियाता है, लेकिन सत्ता में आते ही इस वर्दी को साथ लिए चलने, उपयोग-दुरुपयोग के लिए बेताब होता है. इसी वर्दी के बारे में भड़ास4मीडिया पर भिलाई के प्रतिभाशाली जर्नलिस्ट आरके गाँधी की रिपोर्ट पढ़ी- “वर्दी वाले इन गुंडों को औकात में कौन लाएगा“. इसमें इन्होंने दो मामलों का जिक्र किया है.

एक विलासपुर में एसपी की मौजूदगी में पुलिस वालों द्वारा बेहद तुच्छ कारण से एक व्यक्ति की सिनेमा हॉल में पीट-पीट कर हत्या. दूसरी घटना है ईटीवी के संवाददाता वैभव पांडे और जी24 घंटे के पत्रकार सुरेन्द्र की भिलाई पुलिस कैंप में गुस्साए जवानों की तबाही को कैमरे में कैद करने के प्रयास में जमकर धुनाई. गाँधी के ही शब्दों में – “खासकर ईटीवी के संवाददाता वैभव पांडे को सड़क पर लोटा-लोटा कर पीटा. पुलिस की हैवानियत से वहां खड़ लोग भी स्तब्ध हो गए.” अंत में वे एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाते हैं- “पुलिस की कार्यप्रणाली में सुधार के लिए कई आयोग बने और सिफारिशें अमल में लाई गई. लेकिन सारी कवायद ढाक के तीन पात ही रहे हैं. ऐसे में छत्तीसगढ़ पुलिस की बढ़ती दबंगई पर कब लगाम लग पाएगी, यह किसी को नहीं पता.”

मैं पुलिस विभाग का हूँ और पत्रकारिता से भी मेरा लगाव और रिश्ता रहा है, इसीलिए मैं अपना हक़ मानते हुए इस मामले में अपनी ओर से भी कुछ बातें कहना चाहूँगा. गांधी का मत है कि पुलिस बेलगाम हो गयी है और उसमे अपेक्षित सुधार की नितांत और तत्काल जरूरत है. वे इस बात से भी चिंतित हैं कि कहने को तो इस दिशा में काफी प्रयास हो रहे हैं पर कामयाबी कोई ख़ास नहीं मिल रही है. मैं उनकी दोनों बातों से शत-प्रतिशत सहमत हूँ. पुलिस एक ऐसा विभाग है जिसका जन-सामान्य से सीधा वास्ता है और बहुत गहरे से सम्बन्ध है. जीवन के कदम कदम पर हमें इसकी जरूरत पड़ती ही रहती है. ऐसे में पुलिस की जिम्मेदारी और जवाबदेही बहुत अधिक बढ़ जाती है और ऐसा नहीं होने पर लोगों को अपार कष्ट भी होता है और असुविधा भी.

पर मैं यहाँ इस बात को थोड़ा आगे खींचते हुए इस श्रेणी में अन्य तमाम समूहों को भी डालना चाहूँगा जिनके स्तर पर भी उसी प्रकार की संचेतना, संवेदना और जवाबदेही की जरूरत है जितनी पुलिस में है. बल्कि मैं तो यहाँ तक कहूंगा कि अपने देश में हर उस समूह में ऐसी भावना के विकास की जरूरत है जिनका अपना एक स्वतंत्र और प्रभावशाली अस्तित्व है और जो एक समूह, संघ या तंत्र के रूप में समाज को प्रभावित करने की हैसियत रखते हैं. सबसे पहले हम पत्रकारिता को ही लें, जिसके गाँधी एक अंग हैं. पत्रकारिता एक अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य है और इसका समाज पर व्यापक असर है. पत्रकार इस क्षेत्र के आधारभूत प्रतिनिधि हैं. अपमे आप को तमाम वाह्य शक्तियों और अवांछनीय ताकतों से बचा रखने के लिए उन लोगों ने कई प्रकार के समूहों, संघों और यूनियन का निर्माण कर रखा है. इनकी आवश्यकता भी है. पर समस्या तब आ जा रही है जब इन संघों और समुदायों में स्वयं अवांछनीय तत्त्व शामिल हो जाते हैं और एक मछली पूरे तालाब को गन्दा कर देती है, के तर्ज़ पर इन समूहों की शक्ति का बेजा और गलत इस्तेमाल करते हुए पूरे पत्रकार बिरादरी के बारे में बुरी राय बनवाना शुरू कर देते हैं.

एक अन्य बहुत महत्वपूर्ण और बौद्धिक रूप से सक्षम समूह को लें. वकील यानि अधिवक्ता. क़ानून की किताबों के जानकार और कानूनी कार्यों के अनिवार्य अंग. वकीलों के भी ताकतवर समूह हुआ करते हैं जो बार काउन्सिल जैसे नामों से जाने जाते हैं. पर हममे से ऐसा कौन है जिसने कभी-कभार इन अधिवक्ता संघों को अपनी प्रतिष्ठा और समाज में अपने स्थान को भूल कर स्वयं क़ानून को हाथ में लेते नहीं देखा होगा. इलाहाबाद हाईकोर्ट से लेकर चेन्नई हाई कोर्ट तक में ऐसी घटनाएं हुई हैं जिन पर उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय तक ने कड़ी टिप्पणियां की हैं और उन्हें अशोभनीय तक करार दिया है. इन दिनों लखनऊ हाईकोर्ट में फर्जी और आपराधिक किस्म के उन तथाकथित वकीलों को चिन्हित करने का काम बहुत जोर-शोर से चल रहा है जिनके कारण पूरा वकील समुदाय अपने आप को शर्मिन्दा महसूस करता है.

लगभग यही हाल डॉक्टर एसोशिएशन, शिक्षक संघ, छात्र यूनियन, तमाम ट्रेड यूनियन का भी है जिनके निर्माण और गठन तो बहुत पवित्र उद्देश्यों से किये जाते हैं पर कई बार उनमे गलत किस्म के लोग घुस कर अपना उल्लू सीधा करने के चक्कर में अपनी पूरी प्रजाति को ही बदनाम कर देते हैं. मेरा बहुत साफ़ मानना है कि हमें ऐसे सभी मामलों में पूरे पेशे या पूरे समूह को दोषी नहीं करार देते हुए उनके बीच में अच्छे और बुरे का बहुत साफ़ अंतर करना पड़ेगा. जो पुलिस वाला सिनेमा हॉल में जा कर बिलावजह गुंडागर्दी करेगा उसे भला आदमी कैसे कहा जाएगा, भले ही वह मेरा या आपका सगा भाई ही क्यों ना हो. फिर यदि जगह नहीं देने, रास्ता नहीं देने या सामने खड़े हो जाने के “अपराध” के चलते किसी की मार-मार कर हत्या कर दी जाए तो वह जो जघन्यतम और निकृष्टतम कृत्य माना ही जाएगा. फिर भले ही यह करने वाला और इसमें साथ देने वाला या मूक-दर्शक बना रहने वाला एसपी, डीआईजी हो या सिपाही. मात्र फोटो खींचने के कारण दो पत्रकारों की पिटाई करने वाले लोग दण्डित होने ही चाहिए.

और इसी प्रकार से इन सभी पेशों और प्रोफेशन में हमें यह बात लानी ही होगी कि “संघे शक्ति कलियुगे” का यह अर्थ कदापि नहीं है कि हम एक संघ या तंत्र का हिस्सा हो जाएँ और उसके जरिये अपने सारे गलत-सही काम करने में लग जाएँ. संघ या तंत्र का उद्देश्य मुश्किलों को आसान बनाना है न कि ऐसी मुश्किलें पैदा कर देना जो खुद ही एक भयावह समस्या बन जाएँ, ऐसा ही कुछ-कुछ कई जगहों पर हो रहा है और इन सभी मामलों पर हर प्रकार से अंकुश लगना अनिवार्य है.

….जारी….

लेखक अमिताभ ठाकुर आईपीएस अधिकारी हैं. लखनऊ में पदस्थ हैं. इन दिनों प्रबंधन क्षेत्र में शोध कार्य में रत हैं. पत्रकारिता और साहित्य से गहरा अनुराग.

Comments on “एक आईपीएस की नजर में पुलिसिया दबंगई

  • ashok gupta says:

    एक मछली सारे तालाब को गन्दा कर देती है. एक पोलिसे वाले के दुरव्यव्हार के कारण सारे पोलिसे वाले बदनाम हो जाते हैं. यह ठीक है. सोचने की बात यह है की उस पोलिसे वाले जिसकी वजह से सारा तालाब गन्दा हो रहा है प्राशसन क्या कर रहा है? अगर कुछ नहीं कर रहा और कुछ नहीं करने का फैसल कर लिया है तो फिर तालाब गन्दा ही रहेगा, जनता का विश्वास ऐसे पोलिसे वालों, ऐसे पत्रकारों , ऐसे डोक्टोरो और ऐसी वकीलों से उठ जायगा और अंत में जनता येही कहेगी की हमारी डेमोक्रेसी एक ढकोसला है. यहाँ तो सिर्फ वर्दी, दादा गिरी, कर्रप्शन और पैसों वालों की ही चलती है. आम आदमी तो सिर्फ धक्के खाने के लिए ही है. अगर हम शांति और दिसीप्लैन चाहते हैं तो हमें लोगो को न्याय देना होगा. और जो गलत काम करते हैं उन्हें सख्त सजा देनी होगी चाहे वोह पोलिसे वाला हो या वकील. और कोई रास्ता नहीं है. नहीं तो सारा देश एक दिन नाक्साल्वादी हो जायगा. आखिर आम आदमी कब तक अन्याय सहेगा?

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  • Atul Shrivastava says:

    अमिताभ जी की बातों से मैं सहमत हूं। कहावत जरूर है कि एक मछली पूरे तालाब को गंदा कर देती है, लेकिन वास्‍तव में ऐसा नहीं होता और ऐसा समझना भी नहीं चाहिए। पुलिस में कुछ लोग होते हैं जो वर्दी का रौब दिखाकर गलत करते हैं लेकिन हमें नहीं भूलना चाहिए कि पुलिस में ऐसे भी लोग हुए हैं जिन्‍होंने अपनी जान दे दी देश के लिए राज्‍य के लिए। कई नाम हैं यदि लिखना शुरू करें तो इस कालम में जगह नहीं बचेगी और शायद मैं सबका नाम नहीं लिख पाउंगा। एक का उल्‍लेख करना चाहुंगा जो मेरे जिले में पदस्‍थ थे और आर के गांधी के जिले के रहने वाले थे। स्‍व विनोद कुमार चौबे। राजनांदगांव के एसपी हुआ करते थे, रायपुर के निवासी थे। नक्‍सलियों से लोहा लेते हुए अपनी जान दे दी। शहीद हो गए। एक उदाहरण और दूंगा कुछ दिन पहले राजनांदगांव के नक्‍सल इलाके में एक वारदात हुई थी। खबर कवर करने जब हम गए तो वहां तैनात आईटीबीपी के कुछ जवानों ने हमें धमकाया। गोली तक मार देने की धमकी दी। लेकिन वह पूरी आईटीबीपी की राय नहीं थी, कुछ उदंड जवानों की थी, वरना आईटीबीपी के बडे अफसर तो अब भी अच्‍छा व्‍यवहार रखते हैं। पत्रकारों के साथ भिलाई में जवानों ने जो किया उसकी जितनी निंदा की जाए कम है उन जवानों को सजा भी मिलनी चाहिए, लेकिन इसके लिए पूरी पुलिस बिरादरी को कटघरे में खडा करना मेरे लिहाज से ठीक नहीं।
    अतुल श्रीवास्‍तव, सहारा समय, राजनांदगांव

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  • bahut achchha amitabhji. police, wakil, journalist ke saath mein politician ko bhi jodiye. mere hisab se ye chaaro loktantra ki jaan hai shaayad isiliye sabse jyaada dabangai karte hai.

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  • Manpreet Singh says:

    dear sir chhe kuch ho police ko bartav din pr din badalta ja raha ha pr mera ye manana ha ki police me gandgi jaidatr s.h.o se nichele str wale falate h
    officer hamesha mostly samajdar hote h

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  • rakesh kumar pandey says:

    I learnt a saying ” A country gets a leader that it deserves”. Same is true for governance too.Police behaviour have shown significant improvement in last decade.There had been few political parties,when in power,in any state police attrocities increased.There is difference in police behaviour State to State why, is a serious question to analyse.
    There are some frustrated personnels,in every department,when give power,show indifferent behaviour.Since police power is acknowledged at each level of sociey and police has power to demonstrate it physicaly society becomes big sufferer and a panic with mistrust in police is also developed.
    As we move lower in the police hierarchy interaction of police with common people having complex socio politacal issues,increases.This is the reason that behaviour at SHO and below level is different.

    In my opinion this issue is related to manpower development within POLICE.Someone has to see from Human Development perspective.
    Police management has to identify whether it is a departmental issue or a HR issue within police department.I don’t think HR is effective in police as in other Corporate or Industrial Sector.
    There is need to establish Professional HR Department in Police.

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  • bahut achha amitabh ji, this country needs u kinda people.
    kabhi kabhi lagta hai we all common people are culprit for this condition.
    the common man like me can encourage you type people but can not take a stand against loopholes of society.
    welldone
    manoj seth

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  • chandan srivastava says:

    amitabh ji ye hamesha ke sune sunaye bahane hai…aapke article ka arth ye nikalta hai ki amuk vyakti ne hatya ki hai to humne kar di to kya galat…bilkul bekar ki baat wo b IPS ki kalam se. aap IPS behatreen posting ka lalach chhor do to kafi had tak ye mahakma durust ho jayega…ab uske liye jo bahana aapne banaya hai wo thik usi tarah se jaise police chaukiyo me hota hai aam taur se…kisi ko kisi ne kayde se peet diya, maar khane wala police ke paas pahuncha aur police ne usko hi gariyana shuru kar diya ki sale bahut shikayat tumhari b aa chuki hai, tumhe aksar chaurahe par khada dekhta hu. koi thik thak aadmi pit pita ke aaya to 323 ke sath 307 muft..aur aam aadmi pit kar aaya to NCR bhi darj kar liya to bada ahsaan..sochiye agar sirf aap jaise bade adhikari posting ke chakkar me mantri ji ki gulami na kare to kafi had tak police tantra sudhar nahi jayega?

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  • The fact must not be decried.Police image is in the doldrums, not now, but since long.And as time is passing, instead of improving, it is going further down.
    Yes the Police are not alone to blame for it.For in addition to the Executive there are the Legislature an Judiciary too. More importantly the People. The corruption amongst the people is increasing by the second.With every child born there is a simultaneous action taking place at the higher age group level, a corrupt countryman is also born. Now it may be taking place the world over, but who the hell is bothered about that.I am an Indian and my concern is for India.
    The Netaji or Netainji, the Judges, the Executives,the Industrialists,the Clergy,the Bania,tradesman,workers,journalists etc.etc. all form part of this corrupt society.And there is a definite need for the country psyche to improve.For who ever be in whatever profession,at whatever level is being churned out of this society only.
    The Police must however must take drastic steps to improve it’s image with sincereity.Some suggestions whether to be taken in a good spirit for implementation or discarded are:
    -Corruption for acquiring greater wealth or higher status must cease amongst all police personnel.Duties must be carried out in good faith.
    – The major area of concern is at the grassroot level, SHO/Circle Officer/Inspector/Kotwal and below.Possibly since they stay independently in their PS, and in that too deployed in penny pockets without much supervision,they tend to forget ther uniform and greed/dadagiri overtakes them.This despite the fact that they alsohave to bear up with hardships, but they must have no cribs about service conditions,for they very well knew all this, before opting to join the police service.And there must be some inhouse forum
    addressing their issues as best as they can.
    – Regular update trainings must be conducted regularly including physical.Pot bellies ust be made to disappear and if not then the individual’s services must be terminated.The training must not be 10 days to 30 days capsules.These could be conducted regularly so that an individual must go through the training at least once in two years.This includes all personnel.Then minimum every four to five years an individual must undergo atfull fledged 3-4 months training- mandatory for all,IG and above could be excused this,if required.
    -While it is not being implied that insubordination be resorted to with respect to Ministers in power,but definitely wrong orders must not be implemented even at the risk of ones promotion.Otherwise the same thing will occour as we see on the Bollywood Masala movies, where all of it is really not masala, some of it is truth too.
    – Strict disciplinary action must be taken against erring personnel.They must not be spared in the name of it having effect on the morale of the police/police solidarity.
    -All dabanggs must be caught hold of by their throats and shown the Jail Cell, no matter what level of support he or she has.Let the Judiciary do it’s justifiable duty thereafter.
    – Personnel seeking commissioning/recruitment into Police services must be thoroughly screened for their suitability including academics,physical and psychological.No level of pulls or pressures must play iny role in their selection at all.There are lakhs and lakhs of people wanting to join the police and there should be no dearth of people to select the best, from.
    All the best.Let us act, instead of unecessary justifying ourselves.Much must already have been already brought out in various commisions set up for the purpose as also at the IPS and IAS academies.I think these suggestions gather dust after collecting them. Incase the Police Services are already very good and there is nothing wrong with.This Forum/Site must be closed down forthwith.
    Hardships will be there, that is what has to be overtaken.
    Regards.

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  • umesh chandra gaur says:

    police ke khop ko khatm karne hetu police mai bharti hetu bhrtachar ko katm karna hoga aj ak sipahi bhi bina siparis nahi lagta usko nokri pane mai ghus deni hoti hai is liya nokri ke bad suru hota hai bhrta char ka adhyay pehle to bhrsta char se karj utarta hai fir adat ban jati hai (mujhe student and youth leader hone ke nate 19 sall ki umar se surkcha uttar prdesh govrment ne di merei surkcha mai lage police adhi kari jhute ta bill banate the bina mere hastakchar ke asa sabhi surkchakarmi karte hai jabki yatra aur kana unka hamare sath hota hai maine unko asa karne se roka aur kamyabi mili hame viksit bhart ka kham karna hai

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  • Himanshu B. Narayan says:

    Police wala kare to Line Hajir ya enquiry chal rahi hai – bus. Ye hi halat samaj ke sabhi powerful logon ke liye bhi hai. S.P. sahab paise dekar posting karate hai aur bad mein thana bechte hain.

    Ek clerk das rupaya lete hue pakda jaye to barso mukadma jhelta rahega usi court mein usi judje sahab ke samne jahan peskar sahab har ek case mein date dene ya kisi bhi aur naam par paise lete hai lekin kuch nahi hota. Aam dharna hai ki hakim ke ghar ka saman inhi paison se aata hai.

    Kam ya jayada samaj ke har tabke mein bhrastachar buri tarah se aapni jagah bana chuka hai. Chahe wo doctor ho ya wakil ya koi businessman hi kayon nahi.

    Mansik taur par lagbhag ham sabhi ‘Bhrast ya Hinsak’ ho gaye hai.

    Jarurat hai – sarkar ya n.g.os. Jagrukta sambandhi Seminar ke dwara hamein sikchit kerein.

    Amitabh Ji ko badhai – is tarah ki baton ko samne lane ke liye.

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  • Amitabh ji,
    As per as your article- I personally realise we all are part of society. Its human nature, to blame others. Simply a person who is police department, when they reached in their office and start to face abusing. Even though abuse is rutine in Police constable traing. All the things are good or bad its not question, we all are responsible for it.

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  • tejaswi FOUNDER GEN.SEC VSC says:

    Read the individual opinion of dear Amitabh thakur through his article.Mr. thakur could pen down his opinion so he deserves a simple praise.In my personal opinion Mr.Amitabh has brought a factual position about police,press,prosecutors,politicians and pupil.But what are remedial steps?Why the press associations,police mentalities,Bar councils,Legislatives and students unions are witnessing devaluation in their own values ….why?Who is responsible?Why a judge is not effective in checking the corruption happening under his nose?Why an IPS officer is not able to initiate and take an examplary action against the corrupt officials , involved in corruption that too under his nose?Why bad elements are getting elected as office bearers and then steering the associations,unions and bar councils for their vested interests and bringing disrepute to it?G R E E D is the only perhaps in its roots.Strict discipline and attachment of property earned out of corrupt practices can be one of the effective measures.
    I wish more IPS officers like dear Amitabh in the SYSTEM!

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  • Shravan Kumar says:

    Amitabh ji
    You are 100% right, I agreed this .I am working in council for Advancement of People’s Action and Rural Technology ( CAPART) head quater for long time as Research Officer. I know so many vuluntary organisations and unions.

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  • SANTOSH KUMAR says:

    I personally feel that basic reason for all such things are wrong parenting & lack of moral education.
    Our education system prepares good doctors, good engineers, good IAS/IPS officers & others but not good human beings.

    Until & unless we prepare good human beings with little bit of compassion, such problems will always exist in the socity.

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  • Indian Police Commission appointed in July 1902 under the chairmanship of A. H. L. Fraser concluded:

    “The police force is far from efficient; it is defective in training and organisation; it is inadequately supervised; it is generally regarded as corrupt and oppressive; and it has utterly failed to secure the confidence and cordial cooperation of the people.”

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  • Indian Police Commission appointed in July 1902 under the chairmanship of Sir A. H. L. Fraser concluded:

    “The police force is far from efficient; it is defective in training and organisation; it is inadequately supervised; it is generally regarded as corrupt and oppressive; and it has utterly failed to secure the confidence and cordial cooperation of the people.”

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  • comrad k.k.tripathi says:

    amitabh thakur sahab aakhir sabdo ki chashni me sayad yah kahna chahte hai ki samaj ke sabhi hisse me yah ho raha hai . yah kahte hue ve bhool jate hai ki isse police dwara kiye gae kritya ka samanyi karan nahi ho sakta. police samvadhanik adhikar prapt karya palika ka ang hai, unko anya ke barabar nahi rakha ja sakta. jitni badi samvadhnik jimmedari, galtiyo par utna hi kathor dand ki vyavastha lagoo karna hoga. isse amitabh thakur sahab bhi sahmat honge.
    9451260786

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