औरंगाबाद में पहले ही दिन नंबर वन हुआ ‘दिव्य मराठी’!

औरंगाबाद। दैनिक भास्कर समूह के मराठी अखबार ‘दिव्य मराठी’ का शनिवार को औरंगाबाद में शुभारंभ हो गया। केवल औरंगाबाद शहर में ८७ हजार प्रतियों के साथ शुरू हुआ ‘दिव्य मराठी’ पहले ही दिन यहां नंबर वन हो गया। समूह का यह साठवां संस्करण है, जो चौथी भाषा में प्रकाशित हो रहा है। हिंदी में ‘दैनिक भास्कर’, अंग्रेजी में ‘डीएनए’ और गुजराती में ‘दिव्य भास्कर’ पहले से ही प्रकाशित हो रहे हैं।

औरंगाबाद में एक भव्य समारोह में ‘दिव्य मराठी’ का विमोचन केन्द्रीय गृहमंत्री पी. चिदम्बरम ने किया । चिदम्बरम ने इस अवसर पर ‘दिव्य मराठी’ को शुभकामनाएं दीं और कहा कि ‘दैनिक भास्कर’ जिस तेजी से आगे बढ़ रहा है, उसे देखते हुए अंग्रेजी और अन्य भाषाओं के बड़े अखबार हैरत में पड़ गए हैं। उन्होंने कहा- भास्कर का महाराष्ट्र में प्रवेश एक महत्वपूर्ण घटना है । मुझे विश्वास है कि ‘दिव्य मराठी’ अपने पाठकों की अपेक्षाओं पर खरा उतरेगा । प्रमुख अतिथियों के भाषण से पहले समूह के चेयरमैन रमेशचंद्र अग्रवाल ने समूह का परिचय दिया और औरंगाबाद व महाराष्ट्र के लोगों के स्नेह के प्रति आभार व्यक्त किया। इस मौके पर पी. चिंदबरम, पृथ्वीराज चव्हाण और शिवराज सिंह चौहान ने जो कुछ कहा, वह इस प्रकार है…

मराठी बोल नहीं सकता, लेकिन मित्रों ने जो कहा उससे मराठी जानने लगा हूं – पी. चिदंबरम, केंद्रीय गृहमंत्री

मैं मराठी बोल नहीं सकता, लेकिन मेरे राजनीतिक मित्रों ने अभी जो कहा उससे मराठी जानने लगा हूं। आज उत्तर प्रदेश के बाद महाराष्ट्र की जनसंख्या सबसे अधिक है। देश की राजनीति में भी महाराष्ट्र का स्थान महत्त्वपूर्ण है. आर्थिक और सामाजिक रूप से भी महाराष्ट्र अग्रसर है. ऐसी स्थिति में भास्कर समूह के दिव्य मराठी की शुरुआत भी अति-महत्वपूर्ण है। यह शिवाजी महाराज, महात्मा ज्योतिबा फुले, डॉ. बाबासाहब अंबेडकर जैसे महापुरुषों की भूमि है। उनके सिद्धांतों को छोड़ कर समाचारपत्र आगे बढ़ नहीं पाएंगे। मुझे विश्वास है कि दिव्य मराठी सारी अपेक्षाओं पर खरा उतरेगा।

भास्कर जहां जाता है, पहले ही दिन नंबर वन हो जाता है – पृथ्वीराज चव्हाण, मुख्यमंत्री महाराष्ट्र

भास्कर की खासियत यह है कि यह जहां भी जाता है, पहले दिन नंबर वन हो जाता है। देश के इस सबसे बड़े समाचारपत्र ने महाराष्ट्र में, मराठी में कदम रखा है। आज किसी अखबार की 60 प्रतियां भी बेचना मुश्किल बन गया है, वहीं भास्कर ने 60 संस्करण खड़े कर दिए हैं। इन संस्करणों से भव्यता झलकती है। एक निष्पक्ष, निर्भीक, धर्मनिरपेक्ष दैनिक के रूप में भास्कर ने अपना स्थान बनाया है। औरंगाबाद एक तेजी से बढऩे वाला शहर है। यहां समाचारपत्रों में स्पर्धा भी है। समाचारपत्रों की संख्या बढ़ रही है और साथ साथ जनतंत्र भी मजबूत होता जा रहा है। मुझे आशा है कि महाराष्ट्र में भी अखबारों में अच्छी स्पर्धा होगी और दिव्य मराठी महाराष्ट्र की तरक्की का हिस्सा बने।

बार बार के चुनाव बंद हों, मीडिया मदद करे- शिवराज सिंह चौहान

भास्कर ग्रुप के अध्यक्ष रमेशचंद्र अग्रवाल को मैं बचपन से देख रहा हूं. व्यक्तिगत स्तर पर मैं उनका बहुत आदर करता हूं. ऐसा हो ही नहीं सकता कि वे मुझे बुलाएं और मैं न आऊं. मध्य प्रदेश का भास्कर न तो सत्ता पक्ष का है न प्रतिपक्ष का है। निष्पक्ष है।मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र का भी बड़ा गहरा रिश्ता है. मध्य प्रदेश की राजधानी नागपुर हुआ करती थी और हमारे पूर्वज नागपुर आया करते थे। औरंगाबाद में भी मध्य प्रदेश की कई बेटियां हैं और मध्य प्रदेश में भी महाराष्ट्र की कई बेटियां बहू बन कर आईं हैं। केवल इतना ही नही, मेरी आदर्श शासक अगर कोई है तो वह हैं अहिल्याबाई होलकर, जिन्होंने इंदौर में कभी सुशासन दिया था। महारानी लक्ष्मीबाई झांसी से आईं और उन्होंने ग्वालियर के किले पर कब्जा किया था। अंतत: वहीं पर लड़ती हुईं वे शहीद हुईं थीं. उन महारानी लक्ष्मीबाई को हम गहरी श्रद्धा की दृष्टि से देखते हैं. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चौहान का जन्मस्थान मध्य प्रदेश में है और मैं तो मध्य प्रदेश में पैदा हुआ, लेकिन जमाई महाराष्ट्र का बना. इसलिए पृथ्वीराजजी न हमको कोई ठौर है न आपको कोई और है. इस मौके पर इतना जरूर कहना चाहूंगा जातिगत जनगणना 1931 में अंग्रेजों ने करवाई थी. जो आज हम स्वतंत्र भारत में भी करवा रहे हैं. मैं मानता हूं कि पिछड़ी जातियों को सहायता की आवश्यकता है. लेकिन जाति के आधार पर उन्हें गिनने की जरूरत क्या है? हम तो बरसों से कहते आ रहे हैं कि सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे संतु निरामया:। अब कई बार नेता नहीं बोल पाते कि विरोध करें कि न करें, वोट बैंक बिगड़ जाये. लेकिन अखबार जरूर बोल सकते हैं। भ्रष्टाचार की बात कई बार आती है तो मैं यह कहता हूं, कि भ्रष्टाचार की बुनियाद में जो है वो लगातार होने वाले चुनाव है। चौबीसो घंटे, सातों दिन चुनाव की तैयारी चलती हैं। हिंदुस्तान में लोकसभा और विधान सभा के चुनाव पांच साल में एक बार और एक साथ हों। अगर बहुमत समाप्त होता है तो बैठ कर नेता चुनो। लगातार चुनाव होते हैं और चुनाव तो चंदे के बिना होता नहीं है. चंदा जरूरी नहीं कि व्हाइट मनी हो. जब आएगा तो एेसा आता है जिसका कोई हिसाब नहीं होता। अगर आप किसी से चंदा लेते हैं तो उसकी बात रखनी पड़ती है। इसके कारण भ्रष्टाचार पनपता है। मैं मानता हूं काम कठिन है लेकिन देश में एक साथ चुनाव हो, पांच साल बाद चुनाव हो और तीसरी चीज चुनाव के लिए स्टेट फंडिंग होनी चाहिए। चुनाव के लिए जितना पैसा चाहिए, चुनाव आयोग को सरकार दे। आयोग उम्मीदवारों को पहचानपत्र दें, एक ही स्थान पर पार्टियों की सभाओं का आयोजन करें. इसके अलावा कोई एक भी पैसा खर्च करे तो उसे चुनाव से बाहर कर दीजिए. करप्शन बार-बार के चुनावों से ही पनपता है। ऐसे अभियान राजनेता नहीं चला सकते। यह काम अखबार बखूबी कर सकते हैं।

साभार : भास्कर डॉट कॉम

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