कोठारी जी, क्‍यों झुठला रहे हैं पेड न्‍यूज का सच

आदरणीय श्रीयुत् गुलाब जी कोठारी, प्रधान संपादक, राजस्थान पत्रिका, जयपुर, सादर प्रणाम,  भड़ास के माध्यम से आपको यह पत्र लिख रहा हूं। उचित रहेगा यह कहूं कि अपनी भावनाएं आप तक पहुंचा रहा हूं। भड़ास के माध्यम से ही क्यों, इसकी वजह है जो मैं अगली पंक्तियों में स्पष्ट करने जा रहा हूं। इससे पहले सीधे मुद्दे पर आता हूं। रविवार 9 जनवरी 2011 को पत्रिका के अजमेर संस्करण के मुख पृष्ठ पर एक समाचार था, ‘बडे़ अखबारों में पेड न्यूज शर्मनाक- ठकुरता, पेड न्यूज में राजस्थान पत्रिका का नाम नहीं’। यह समाचार राजस्थान पत्रिका और भोपाल के माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित पंडित झाबरमल्ल शर्मा स्मृति व्याख्यान का कवरेज था।

समारोह में मैं प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित नहीं था, इसलिए जो कुछ पत्रिका में छपा उसी के आधार पर आपसे मुखातिब हूं। आपके हवाले से छपा है, ‘पेड न्यूज के मामले में राजस्थान पत्रिका को छोड़कर लगभग सारे अखबार आ गए और देखकर लगा कि इन्हें अखबार कहें भी या नहीं। हमें गर्व है कि पत्रिका के संवाददाता ने पैसे लेकर खबर नहीं छापी।’

मेरी विनम्र राय में आपका कहना सही नहीं है। राजस्थान पत्रिका में भी वह सब चल रहा है जो देश के बाकी अखबारों में है। अगर विश्लेषण करने बैठेंगे तो हर बात तार्किक तौर पर सोदाहरण कही जा सकेगी, परंतु यहां मैं पेड न्यूज तक सीमित रहना चाहूंगा क्योंकि आपने इस बारे में कोई दावा किया है और मैं इस बात का प्रत्यक्ष अनुभवी, साक्षी और भुक्‍तभोगी हूं कि पत्रिका भी पेड न्यूज से अछूता नहीं है। अगस्त 2010 को हुए अजमेर नगर निगम के मेयर पद के चुनावों में पेड न्यूज का जो कुत्सित और घिनौना खेल खेला गया उसकी हकीकत मेरी व्यथा के रूप में भड़ास में 11 सितंबर 2010 को कहिन-मीडिया मंथन स्तंभ में, ‘पैसा देंगे तो अखबार आपके बाप का, कुछ भी लिखिए!’ शीर्षक से प्रकाशित हो चुकी है। आप काफी व्यस्त शख्सियत हैं। हो सकता है आपने नहीं पढ़ा हो, भड़ास आप देखते ही नहीं हों या कोई आपके ध्यान में भी नहीं लाया हो परंतु सितंबर 2010 में ही यह समाचार ज्यों का त्यों मैं आपके ई-मेल पर भेज चुका हूं। आप ही के क्यों पत्रिका प्रबंधन संभाल रहे सिद्धार्थ कोठारी, नीहार कोठारी, भुवनेश चतुर्वेदी और सुकुमार वर्मा सभी को एक साथ यह लेख भड़ास की ही साइट से फॉरवर्ड किया था। मुझे इसकी कोई प्रतिक्रिया किसी से नहीं मिली। आपकी जानकारी के लिए इस लेख में राजस्थान पत्रिका से जुडे़ मेरे अनुभव के मुख्य अंश निम्न हैं-

‘.… मैंने प्रचार की खबरें बनानी शुरू की और ई-मेल से उन्हें भेजने लगा। 9,10,11 अगस्त तीनों दिन खबरें भेजता रहा, दैनिक भास्कर और राजस्थान पत्रिका में एक भी लाइन नहीं छपी। दोनों अखबारों की ओर से उनके मैनेजर, विज्ञापन मैनेजर, विज्ञापन एक्जीक्यूटिव, विज्ञापन एजेंसी संचालक यहां तक कि पत्रकार और फोटोग्राफर मुझसे संपर्क करने लगे। व्यक्तिगत मुलाकातें हुईं। टिकट मिलने की बधाइयों और हाल-चाल के बाद मैंने उन्हें खबरें नहीं छपने का उलाहना दिया। सभी के शब्द अलग-अलग थे, संदेश एक ही था, पैसा दे दो, विज्ञापन तो छपेंगे ही खबरें भी छपनी शुरू हो जाएंगी। दोनों की मांग शुरू हुई छह-छह लाख रूपए से। इतना पैसा कहां से लाएं और वह भी खबरें छापने के लिए।

एक दिन फिर इसी उधेड़बुन में निकल गया। इधर पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं का दबाव बढ़ता जा रहा था। सामने वाले प्रत्याशी के बड़े-बड़े विज्ञापन और खबरें छप रहीं थी और हम इस तरह मीडिया से गायब थे, जैसे चुनाव ही नहीं लड़ रहे हों। फिर तो सारा-सारा दिन सौदेबाजी में बीतने लगा। पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं का दबाव बढ़ता जा रहा था। मैं मीडिया प्रतिनिधियों को बताता था कि विज्ञापन की दर बताएं, मैं जितना हो सकता है विज्ञापन के पैसे के बारे में आपको बता देता हूं, परंतु खबरों के लिए पैसा कौन सा पत्रकारिता धर्म है। भास्कर का कहना था, ‘रोज तीन कॉलम खबरें, एक तीन कॉलम का फोटो और राइट हैंड पेज पर एक अच्छा विज्ञापन।’ खबर में आप चाहे जो लिखो, एक लाइन नहीं कटेगी।

पत्रिका के संपादक को विज्ञापन की दर बताने के लिए कहा तो उन्होंने कहा, यार हाड़ा जी आप तो पुराने मित्र हो अब आपसे क्या सौदेबाजी, मैं फलां को भेज रहा हूं, आप तय कर लेना। मुझे बड़ा अच्छा लगा कि कितना साफ-सुथरा मामला नजर आ रहा है। जो सज्जन आए उन्होंने आते ही अपनी कीमत बता दी। साथ ही मेरी आंखों में झांकते हुए कहा, ‘सामने वाले यानी भास्कर से कितने में सौदा पटा।’ मैंने बताया कि संपादक जी ने मुझे विज्ञापन की दर बताने की बात कही थी, तो वह ऐसे देखने लगा जैसे मेरे सिर पर सींग उग आए हों। उसका एक ही जवाब था, ‘सर आप इतने सालों से मुझे जानते हैं, मैं आपसे क्या कहूं, मुझे तो आदेश मिला है इतना पैसा ले आओ।’ मेरे इस जवाब पर कि इतनी तो हमारी हैसियत ही नहीं है। विज्ञापन के लिए इतना है, चाहो तो एकमुश्त ले जाओ। उसने कहा, ‘सामने वाला जो दे रहा है, उसके सामने तो यह कुछ भी नहीं है।’ फिर उसने संपादक से बात की। संपादक के कहने पर वह लौट गया।…

आदरणीय कोठारी जी, हकीकत इससे आगे और भी है। इस खबर में मैंने किसी का नाम नहीं लिखा है परंतु मैं आज भी आपको राजस्थान पत्रिका के हर उस शख्स का नाम, पद और किस तारीख, समय, स्थान पर कितना पैसा किस तरह के नोटों की शक्ल में किसकी मौजूदगी में दिया गया, किस के सेलफोन पर कब, क्या बात हुई, यह सब बता सकता हूं। ऐसा मैं आज भी नहीं मानता कि आपके संस्थान का कोई भी कर्मचारी प्रबंधन की नीति और मर्जी के खिलाफ कोई काम कर सकता है। ऐसे में यह कैसे मान लूं कि आपके यहां चल रहे पेड न्यूज सिस्टम की जानकारी आपको नहीं है। दैनिक भास्कर इसके लिए खासा बदनाम है, परंतु भड़ास में ही दैनिक भास्कर के प्रधान संपादक श्री श्रवण गर्ग का साक्षात्कार छपा है। भड़ास के संपादक श्री यशवंत ने उनसे पेड न्यूज के बारे में सवाल किया है। उन्होंने भी भास्कर में पेड न्यूज नीति को स्वीकार नहीं किया है और सारा दोष अपने अधीनस्थों पर मढ़ते हुए स्थानीय स्तर पर कुछ हो जाता होगा कहकर टाल दिया है।

कोठारी जी राजस्थान की राजनीति में दो ही दल हैं। एक कांग्रेस और दूसरी भाजपा। आम आदमी की जुबान पर यही चर्चा रहती है कांग्रेसी जो करते हैं, खुले करते हैं। पैसा लेते हैं और काम भी करते हैं परंतु भाजपाई पैसा लेते हैं, काम भी नहीं करते और यह स्वीकार भी नहीं करते कि उन्होंने पैसा लिया है। आपके भाषण से राजनीति का कुछ ऐसा ही रूप नजर आया। नैतिकता, शुचिता, मूल्य, संस्कृति आदि से जुड़े आपके आलेख आए दिन पत्रिका में प्रकाशित होते हैं, देश के वरिष्ठतम पत्रकार के नाते आप काफी सचेत और जागरूक हैं। ऐसे में आपके मुख्यालय से 135 किलोमीटर की दूरी पर स्थित आपके ही अजमेर संस्करण के दफ्तर में क्या हो रहा होगा, इसकी जानकारी आपको नहीं होगी, ऐसा संभव नहीं। पेड न्यूज को लेकर आपने कोई दावा नहीं किया होता तो मैं यह सब नहीं लिखता जो लिख रहा हूं।

पत्रिका आम आदमी का अखबार है। वह अपने बजाय समाज का चिंतन करता है। सामाजिक सरोकार निभाता है। वह मूल्यों का सजग प्रहरी है, जागरूक है, नैतिक कर्त्तव्यों और उत्तरदायित्व को समझता है और निभाता भी है। ऐसे दावे पत्रिका की ओर से और आपकी कलम से अक्सर किए जाते हैं। मेरी कामना है कि हमारा यह विश्वास बना रहे और इसी उद्देश्य से मैं दो तथ्य सार्वजनिक करने का अनुरोध आपसे कर रहा हूं, जो बहुत बडे़ नहीं हैं और आपके लिए तो कतई नहीं।

1- राजस्थान पत्रिका में कार्यरत जितने भी कर्मचारी हैं, विशेषकर प्रबंधन एवं संपादन से जुडे़ उन सबकी आय जो आप ही के द्वारा प्रदान की जाती है और अर्जित परिसंपत्तियों का आंकलन करने का कष्ट करें। सार्वजनिक कर सकें तो बहुत ही अच्छा होगा।

2- राजस्थान के तीनों प्रमुख अखबारों राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर और दैनिक नवज्योति को राजस्थान सरकार के किन-किन निकायों, संस्थानों और विभागों से किस-किस शहर में कितनी-कितनी जमीन या भवन, किस-किस स्थान पर और किस-किस ट्रस्ट, संस्थान आदि के नाम से कब-कब आवंटित हुए। उनका प्रयोजन क्या था और उनकी आज क्या कीमत है तथा आज ये किस प्रयोजन के लिए काम आ रही हैं? इनकी कितनी आय या वित्तीय लाभ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से गुलाब कोठारी परिवार, रमेश चंद्र अग्रवाल परिवार और दीनबंधु चौधरी परिवार को प्राप्त हो रही है।

मेरा मानना है कि आम आदमी को उक्त दोनों जानकारियां मिलनी चाहिए ताकि समाचार पत्रों की विश्वसनीयता, ईमानदारी, पारदर्शिता, नैतिकता आदि-आदि बनी रहे।

एक बात और उक्त समारोह के मुख्य वक्ता भारतीय प्रेस परिषद के पूर्व सदस्य परंजॉय गुहा ठकुरता के हवाले से खबर में यह दावा किया गया है कि पेड न्यूज को लेकर भारतीय प्रेस परिषद को उन्होंने 36 हजार शब्दों और 71 पृष्ठों की जो रिपोर्ट सौंपी उसमें टाइम्स ऑफ इंडिया, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, आज तक चैनल जैसे लगभग सभी बडे़ अखबारों व मीडिया हाउस का नाम था, उन्हें खुशी थी कि राजस्थान पत्रिका का नाम इस रिपोर्ट में नहीं था।

माफ कीजिएगा ठकुरता जी की रिपोर्ट अपने को आधी-अधूरी और अविश्वसनीय नजर आ रही है।

धन्यवाद

राजेंद्र हाड़ा

राजेंद्र हाड़ा करीब दो दशक तक पत्रकारिता करने के बाद अब पूर्णकालिक वकील के रूप में अजमेर में कार्यरत हैं. 1980 में बीए अध्ययन के दौरान ही पत्रकारिता से जुड़े. दैनिक

राजेंद्र हाड़ा
राजेंद्र हाड़ा
लोकमत, दैनिक नवज्योति, दैनिक भास्कर आदि अखबारों में विभिन्न पदों पर कार्य किया. साप्ताहिक हिंदुस्तान, आकाशवाणी,  जनसत्ता, नवभारत टाइम्स, राष्ट्रदूत आदि में भी रचनाएं, खबरें, लेख प्रकाशित-प्रसारित. 1986 से वकालत भी शुरू कर दी और 2008 तक वकालत – प़त्रकारिता दोनों काम करते रहे. अब सिर्फ वकालत और यदा-कदा लेखन. पिछले सोलह साल से एलएलबी और पत्रकारिता के विद्यार्थियों को पढ़ा भी रहे हैं.

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Comments on “कोठारी जी, क्‍यों झुठला रहे हैं पेड न्‍यूज का सच

  • हाडा जी,
    आप एक और दो संवाददाताओ लेकर संपूर्ण पत्रिका समूह को बदनाम नहीं कर सकते, यदि आप मध्य प्रदेश आकर किसी भी पाठक से पूछे तो आपको पत्रिका और अन्य अखबारों के बीच खबरों का फर्क पता चलेगा. यहाँ पत्रिका को सच आइना माना जाता है. यहाँ पत्रिका ने सच्ची खबरों को प्रकाशित कर अपनी एक अलग पहचान बनायीं है. आज यहाँ पत्रिका इन्ही विशेषताओ के चलते लोकप्रिय बना हुआ है…

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  • आदरणीय हाडा जी
    आपके लिखे विचारों से सो मैं bhee सो फीसदी सहमत hoon .

    hariom garg

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  • बिल्‍लू says:

    हमाम में सब नंगे हैं। बस कोई आधा नंगा है, कोई पूरा, कोई आगे से नंगा है और कोई पीछे से। हैं सारे नंगे। मैं राजा हरिश्‍चंद्र और दूसरे चोर। जय हो पेड न्‍यूज वालों की।

    Reply
  • sharad pandya says:

    नमश्कार
    राजेंद्र हाड़ा जी

    आप के इस लेख जूठे सच को आयना दिखाया हे इस के लिए पत्रकारिता जगत में बचे कुचे सच को संबल मिलेगा | रविवार 9 जनवरी 2011 को पत्रिका के बांसवाडा संस्करण के मुख पृष्ठ पर एक समाचार था, ‘बडे़ अखबारों में पेड न्यूज शर्मनाक- ठकुरता, पेड न्यूज में राजस्थान पत्रिका का नाम नहीं’। यह पढ़कर दंग रह गया था क्योकि बांसवाडा नगर पालिका के मेयर पद के चुनावों में पेड न्यूज का जो कुत्सित और घिनौना खेल खेला गया वह मेरे आखो देखा हे

    आप ने हमने इस दर्द को बया कर दिया परन्तु अब कई लोग चुप हे

    आप के जज्बे को सलाम

    में भी आप की तरह खुला लिखता हु मेरा एक साप्ताहिक समाचार पत्र हे

    बांसवाडा आये तो जरुर मिले

    आपका

    शरद पंड्या

    9414645764

    Reply
  • shrad pandya says:

    नमश्कार
    राजेंद्र हाड़ा जी

    आप के इस लेख जूठे सच को आयना दिखाया हे इस के लिए पत्रकारिता जगत में बचे कुचे सच को संबल मिलेगा | रविवार 9 जनवरी 2011 को पत्रिका के बांसवाडा संस्करण के मुख पृष्ठ पर एक समाचार था, ‘बडे़ अखबारों में पेड न्यूज शर्मनाक- ठकुरता, पेड न्यूज में राजस्थान पत्रिका का नाम नहीं’। यह पढ़कर दंग रह गया था क्योकि बांसवाडा नगर पालिका के मेयर पद के चुनावों में पेड न्यूज का जो कुत्सित और घिनौना खेल खेला गया वह मेरे आखो देखा हे

    आप ने हमने इस दर्द को बया कर दिया परन्तु अब कई लोग चुप हे

    आप के जज्बे को सलाम

    में भी आप की तरह खुला लिखता हु मेरा एक साप्ताहिक समाचार पत्र हे

    बांसवाडा आये तो जरुर मिले

    आपका

    शरद पंड्या

    9414645764

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  • sharad pandya says:

    नमश्कार
    राजेंद्र हाड़ा जी

    आप के इस लेख जूठे सच को आयना दिखाया हे इस के लिए पत्रकारिता जगत में बचे कुचे सच को संबल मिलेगा | रविवार 9 जनवरी 2011 को पत्रिका के बांसवाडा संस्करण के मुख पृष्ठ पर एक समाचार था, ‘बडे़ अखबारों में पेड न्यूज शर्मनाक- ठकुरता, पेड न्यूज में राजस्थान पत्रिका का नाम नहीं’। यह पढ़कर दंग रह गया था क्योकि बांसवाडा नगर पालिका के मेयर पद के चुनावों में पेड न्यूज का जो कुत्सित और घिनौना खेल खेला गया वह मेरे आखो देखा हे

    आप ने हमने इस दर्द को बया कर दिया परन्तु अब कई लोग चुप हे

    आप के जज्बे को सलाम

    में भी आप की तरह खुला लिखता हु मेरा एक साप्ताहिक समाचार पत्र हे

    बांसवाडा आये तो जरुर मिले

    आपका

    शरद पंड्या

    9414645764

    Reply
  • mahandra singh rathore says:

    Rajindra singh ji ne jo sawal uthayen hain wo bilkul thik hai. rajasthan patrika bhi paid news se alag nahi ho saka hai yah dikh raha raha. agar gulab kothari ji kehte hain ki unka akhbar paid news se alag hai to unhe bhadas mai likhna hoga nahi to wo bhi or akhbaron ki terah is dhndhe mai lege hain. khari khari report ke liye raninder ji ko badhai ho.

    Reply
  • hada jee ye log itne neech ho gaye hain ki ye kya kehte hain aur kya kerte hain inhein inko isse kuchh bhi vasta nahin hai.
    videshi daaru manga kar peene wala kothari lekh to aiese likhta hai jaise iske jaisa insan aajtak paida hi nahin hua hai.

    Reply
  • patrika ko 60 saal hone ko h aur aaj patrka ki sabki najro me ijjat h aur hada ji aap samajhdar admi h aap chate to apni baat ko sahi tareeke se kothari ji ke samne rakhte to shayad apki samasya ka sahi hal nikalta kisi bhi adhuri baat ko lekar aap kisi par aarop nhi laga sakte apko sochna chaiye ki kisi insan ka koi beta agar galat kam kar bhi de to uska aarop uske pita par nhi lagaya jata
    😮

    Reply
  • murli prithyani says:

    Namaste,
    9 january 2011 ko patrika ke jabalpur (M.P.) edition ke katni wale panne me katni mayor ke sankalp aur sapne ka bakhaan pure pej me kiya gaya tha, saaf tha ki woh samachar nahi paid news thi, yah matter press council ko bataya ja sakta hai ki , dekho paid news chaapne ke baad seena thoka ja raha hai ki ham paid news nahi chhapte hai.Aap chahe to press council me iski shikayat kar sakte hai kyoke Mr Thakurta khud ek sadasya hai council ke. 09893053061 katni (M.P.)

    Reply
  • sanyogitakumari says:

    JO THA KABHI GULAB…
    AAJ KAR RAHA PRALAP…
    VIGYAPAN,ZAMEENE SAB BATOR LI
    PHIR KYO KAR RAHA HAI VILAP…

    HUM PATRAKARON KI DUNAIYA ME
    MALIK BAN KAR AAYE TUM…
    SATTA KI THALI ME TUMNE KHAYA
    AB PATRAKAR KI ROTI PER HALLA MACHAYA

    TAB KYO NAHI APNA DHARM NIBHAYA
    JAB JALMAHAL,SUKHAM PER TUMNE JI LALCHAYA…

    BUS UPDESH DETE RAHE HO ZINDAGI BHAR
    KAHA HAI WO PATRAKARON KA ” MILAP”

    JO THA KABHI EK GULAB
    AAJ KAR RAHA PRALAP…!!

    Reply
  • Vishnudeep Sharma says:

    handa g, mai aapki baat se puri tarah se sahmat hu.maine khud RAJASTHAN PATRIKA me maketing me sri ganga nagar edtion me work kiya h.elecation ke dino me leader se passa le kar hi news print hoti thi.editorial dept.khud passa le kar news print karta hai.patri bhi dudh ka dhula nahi h.chamcha giri jo karta h wo hi kaam kar sakta h.VISHNUDEEP SHARMA,SRIGANGA NAGAR,9829039063

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