गोरखपुर में पत्रकार संगठनों में छिड़ी जंग, पत्रकार आमने-सामने

पूर्वांचल के प्रमुख महानगर और नेपाल-बिहार की सीमाओं से सटा गोरखपुर महानगर गुरु गोरक्षनाथ की तप-स्थली और महात्मा बुद्ध, संतकबीर की निर्वाण स्थली के रूप में समस्त विश्‍व में प्रसिद्ध है लेकिन हालिया दिनों में गोरखपुर के पत्रकारों के बीच छिड़ी वर्चस्व की जंग में धूमिल प़ड़ती जा रही है।

कभी बाबू मुन्ना लाल जी, धर्मेंन्द्र गौड़, आरडी त्रिपाठी, गोपाल जी, मधुकर उपाध्याय, महेश अश्‍क, गिरिजेश राय, श्‍यामानन्द श्रीवास्तव, हरिशंकर उपाध्याय और कृपाशंकर पांडेय से शुरू हुई गोरखपुर की पत्रकारिता का फहराता ध्वज वर्तमान में रामचन्द्र गुप्त, एसपी त्रिपाठी, हर्षवर्धन शाही, रत्नाकर सिंह, शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी, अशोक अज्ञात ने संभाला है।

गोरखपुर में 1985 में गोरखपुर पत्रकार परिषद के नाम से सबसे पहला पत्रकार संगठन बना, जिसका नेतृत्व दिनेश चन्द्र श्रीवास्तव ने किया। तब एकबारगी लगा कि गोरखपुर में पत्रकारों की अस्मिता की लड़ाई को एक नया आयाम मिलेगा, पर कलम के ये सिपाही वर्चस्व की जंग में कुछ ऐसे डूबे कि इस संगठन का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया। गोरखपुर पत्रकार परिषद से अलग होकर कुछ पत्रकारों ने महानगर पत्रकार परिषद का गठन किया। इन दोनों की लड़ाई में और कुछ हुआ हो या नही, पर पत्रकारों के लिये गोरखपुर की हृदय स्थली गोलघर में तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह द्वारा बनवाया गया सभागार विवादों में पड़ गया।

इस जंग में अंततः 1988  के काले दिसंबर की एक रात हुई काफी गहमागहमी के बाद सुबह दिनेश चन्द्र श्रीवास्तव की हृदयाघात से हुयी मौत ने पूरे पत्रकार समुदाय को हिलाकर रख दिया। महानगर पत्रकार परिषद ने इस घटना के बाद अपने को पूरी तरह समेट लिया। उधर गोरखपुर पत्रकार परिषद की बागडोर दैनिक जागरण के रत्नाकर सिंह ने संभाली, पर वे किसी भी पद पर नही रहे, और 1999 तक परिषद के अध्यक्ष पद को तत्कालीन नेशनल हेराल्ड के डा. एसपी त्रिपाठी, यूनीवार्ता के कृपाशंकर पांडेय, हिन्दी दैनिक के सत्येन्द्र पाल, शिक्षक पत्रकार मारकण्डेय सिंह ने सुशोभित किया।

इसी दौरान 1993 में गोरखपुर के कुछ वरिष्‍ठ पत्रकारों ने प्रेस क्लब का भी गठन किया, पर पहली मीटिंग में ही इसमें विवाद होने से इसके तत्कालीन अध्यक्ष दैनिक स्वतंत्र चेतना के प्रधान सम्पादक रामचंन्द्र गुप्त और सचिव कृपा शंकर पांडेय ने दुखी होकर पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद 1998-99 में गोरखपुर के कुछ महत्वाकांक्षी पत्रकारों ने पुनः प्रेस क्लब के गठन का प्रयास किया, पर इस नाम के पहले से ही पंजीकृत होने के कारण उन्हें बाध्यतः गोरखपुर जर्नलिस्ट प्रेस क्लब के नाम का चयन करना पड़ा, हालांकि वे अपने को प्रेस क्लब ही कहते और कहलवाते थे। इस संगठन के जरिये उन्होंने अपने चहेते कुछ पत्रकारों को ही सदस्यता दी, जब कि सैकड़ों की संख्या में पत्रकार इससे वंचित ही रहे।

1999 में गोरखपुर पत्रकार परिषद ने अपना नाम गोरखपुर जर्नलिस्ट एसोसिएशन करते हुए नया पंजीकरण कराया। जिसकी बागडोर रत्नाकर सिंह और डा. मुमताज खान ने संभाली, और विनोद शाही, सर्वेश दूबे, चंन्द्रप्रकाश मणि त्रिपाठी, शफी आजमी, बांकेलाल तिवारी, शेष नारायण पांडेय को साथ लेकर नये जोश के साथ मैदान में उतरे। इन लोगों ने अपने संगठन का द्वार सभी पत्रकारों के लिये खोल दिया। होना तो यह चाहिये था कि दोनों संगठन एक साथ मिल कर पत्रकारों के हितार्थ लड़ाई करते, पर ऐसा हो नहीं सका, और दोनो संगठन शीतयुद्ध के दौर में ही अपनी ऊर्जा क्षरित करते रहे।

यह शीतयुद्ध तब अचानक तेज हो गया, जब 2010 में वरिष्‍ठ पत्रकार सत्येन्द्र पाल और मो. अनीस खान ने 1993 से मृतप्राय प्रेस क्लब को स्वतंत्र चेतना के समूह संपादक रामचन्द्र गुप्त के मुख्य संरक्षकत्व में एक नये कलेवर के साथ खड़ा कर दिया,  इस कार्य में उन्हे गोरखपुर जर्नलिस्ट एसोसिएशन का पूरा सहयोग मिला। इस गठन के बाद गोरखपुर जर्नलिस्ट प्रेस क्लब, जो अभी तक खुद को प्रेस क्लब के रूप में प्रचारित था, को प्रेस क्लब के संयुक्त मंत्री हनुमान सिंह बघेल ने अपनी संस्था का नाम प्रयोग करने से रोका, तो सहसा उनके सामने पहचान का संकट आने लगा।

गोरखपुर जर्नलिस्ट प्रेस क्लब की वर्तमान कमेटी ने इस घटनाक्रम के लिये गोरखपुर जर्नलिस्ट एसोसिएशन को जिम्मेदार मानते हुए अपनी 24 अप्रैल 2011 को हुई आम सभा की बैठक में एक ऐसा प्रस्ताव पारित किया, जो शायद देश के पत्रकारिता इतिहास में अनूठा प्रस्ताव होगा। सदस्यों के तमाम विरोधों के बाद भी कमेटी ने एकल सदस्यता का प्रस्ताव पारित किया, जिसके तहत किसी अन्य स्थानीय पत्रकार संगठन से जुड़े किसी पत्रकार को सदस्य बनाने से ना केवल प्रतिबंधित किया, वरन जो पहले से अन्‍य संगठनों के सदस्य हैं, उन्हें छांट कर बाहर निकालने के लिये एक कमेटी भी बनाने की घोषणा कर दी है।

गोरखपुर जर्नलिस्ट प्रेस क्लब की इस कार्रवाई की जद में स्वतंत्र चेतना के समूह संम्पादक राम चन्द्र गुप्त, राष्‍ट्रीय सहारा के स्थानीय संपादक मनोज तिवारी, अमर उजाला के स्थानीय संपादक मृत्युन्जय कुमार, आकाशवाणी के एनई रमेश चद्र शुक्ल (सभी संरक्षक) समेत लगभग 150 पत्रकार आ रहें हैं, जिन्हें निकालने में शायद संगठन को दातों पसीना आ जाएगा।

इस घटनाक्रम से आहत गोरखपुर जर्नलिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष रत्नाकर सिंह, जो गोरखपुर जर्नलिस्ट प्रेस क्लब के आजीवन सदस्य भी हैं,  ने एक पत्र लिखकर चुनौती दिया है कि उनके पास तिहरी सदस्यता है। अतः इस प्रस्ताव के आधार पर गोरखपुर जर्नलिस्ट प्रेस क्लब उनकी सदस्यता समाप्त कर दे। श्री सिंह के पत्र की भाषा को लेकर काफी चर्चा है,  जिसमें उन्होंने अपने संगठन के दोहरी सदस्ता वाले पत्रकारों के हित रक्षण के लिए पूरी तरह ताल ठोंक दिया है। उधर यह भी चर्चा है कि यदि पत्रकारों की सदस्यता समाप्त हुई तो सैकड़ों पत्रकार न्यायालय की शरण में जा सकते हैं। इस घटनाक्रम ने गोरखपुर की पत्रकारिता को दो खेमों में बांट दिया है और पत्रकार दो-दो हाथ करने पर आमादा नजर आ रहे हैं।

चंद्र प्रकाश मणि त्रिपाठी

पत्रकार, गोरखपुर


 

रत्‍नाकर सिंह द्वारा भेजा गया पत्र

समक्ष ,

अध्यक्ष महोदय,

गोरखपुर जर्नलिस्ट प्रेस क्लब (गोजप्रेक), गोरखपुर।

विषय : दोहरी सदस्यता।

मान्यवर,

सबसे पहले तो मैं गोजप्रेक की गत 24 अप्रैल को आयोजित आम सभा की बैठक में ना आ-पाने के लिये खेद व्यक्त करते हुए आप को आम सभा बुलाने की हिम्मत दिखाने पर बधायी देता हूं। यह अलग बात है कि आप को यह हिम्मत दिखाने के लिये लगभग पूरा साल बिता देना पड़ा। खैर। आपके नेतृत्व में गोजप्रेक ने इस हंगामी बैठक में कई प्रस्ताओं के साथ एक ऐसा प्रस्ताव भी पारित किया, जो पत्रकारिता के इतिहास का एक नये अध्याय के रूप में देखा जायेगा। मेरा आशय पत्रकारिता के क्षेत्र में पहली बार सुने गये दोहरी सदस्यता की ओर है, (जिसे अभी तक ट्रेड यूनियनों की लड़ाई में ही सुना गया था) जिसमें आप और आप की कमेटी ने स्थानीय स्तर पर किसी अन्य एसोसिएशन से जुड़े पत्रकारों को गोजप्रेक की सदस्यता के लिये अयोग्य करार देते हुए ऐसे सदस्यों की सदस्यता समाप्त करने का प्रस्ताव पारित कराया है।

मैं यह नही कहूंगा कि यह सही हुआ या गलत, पर यह जरूर कहूंगा कि आपने इस प्रस्ताव के जरिये अपनी ही संस्था के अपने विरोधियों को साधने की जो चाल चली है, उसमें आप जरूर सफल होते दिख रहे हैं। क्यों कि आपका कार्यकाल तो अब समाप्त हो ही रहा है, आपके इस निर्णय की आंच तो आने वाले उन पदाधिकारियों को झेलनी होगी, जिनका प्रतिरोध आपकी इस आमसभा की बैठक में सुना भी नहीं गया। अगर आप में ईमानदारी थी, तो आपको यह निर्णय अपने कार्यकाल के प्रारंभ में ही लेना चाहिये था, या फिर आने वाली कमेटी के लिये छोड़ देना चाहिये था, या फिर इसे आपको खुले में मतदान के जरिये सामने लाना चाहिये था, पर आपने तो हो हल्ला के बीच एक ही चाल में अपने उन सहयोगी विरोधियों को वो झटका दे दिया, जिसकी अभी कोई कल्पना भी नही कर सकता है। वैसे अगर आप में नैतिक बल हो तो इसी प्रस्ताव को आधार बना कर आप पुनः चुनाव लड़ कर जीत कर दिखायें।

मैं आपके इस निर्णय में एक सदस्य के रूप में आपके साथ हूं, और हमें यह कहते गर्व भी है कि हम माननीय रामचंन्द्र गुप्त के मुख्य संरक्षकत्व में सफलता पूर्वक चल रहे उस जीवंत संगठन गोरखपुर जर्नलिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष हैं, जिसे साध कर आपने यह बाण चलाया है, या इसे यह भी कह सकते हैं कि जिसकी बढ़ती लोकप्रियता और बढ़ते पत्रकारीय जनाधार से घबरा कर आपकी वर्तमान बाडी ने यह निर्णय लिया, साथ ही हम गोरखपुर में 1993 में गठित प्रेस क्लब गोरखपुर के सदस्य और संरक्षक भी है, जिसे गोरखपुर की पत्रकारिता के भीष्‍म पितामह परम श्रद्धेय रामचंन्द्रगुप्त जी के नेतृत्व में जिस कमेटी ने गठित किया था, जिसमें आप भी शामिल थे। इस कारण आपको अपने इस प्रस्ताव के आधार पर तत्काल अपनी संस्था से हमारी आजीवन सदस्यता को समाप्त कर देना चाहिये।

आपको हम यह भी ध्यान दिलाना चाहेंगे कि जिस गोजए के बढ़ते कद से घबरा कर आपने यह निर्णय लिया है, आप खुद भी उस संस्था के कई वर्ष संरक्षक रहे है। आपके पूर्ववर्ती कई अध्यक्ष और पदाधिकारी भी उसी गोजए से निकले हैं, जिसे आप की कार्यकारिणी ने पिछले दिनों ब्लैक लिस्टेड करने का निन्दनीय प्रयास किया। मुझे आप के साथ पूरी हमहर्दी है। आपने जिस प्रकार अपनी भड़ास निकालने का प्रयास किया, अगर आपमें हिम्मत हो तो बतायें कि किन कारणों से आप अपने सदस्यों को गोजए या फिर प्रेसक्लब गोरखपुर की सदस्यता लेने से मना कर रहे हैं। आप तो वही कर रहे हैं, कि किसी रेखा को छोटा करने के लिये उसके बगल में बड़ी रेखा नही खींच पाये, तो उस रेखा को मिटाने का ही प्रयास करने लगे। गोजप्रेक भी जब बनी थी तो एक सार्थक उद्देश्‍य को लेकर ही बनी थी, मेरा आपको सुझाव है कि उसे पथ भ्रमित ना करें, वरना पत्रकारों की आने वाली पीढ़ी आपको माफ नहीं करेगी।

यह भी जानकारी मिली है कि आपने कुछ वरिष्‍ठ पत्रकारों की एक कमेटी बना कर उसे ऐसे मेंम्बरों की सूची बनाने को कहा है, जिनके पास दोहरी सदस्यता है, तो आप क्यों उन्हें परेशान करते हैं, या उन्हें दुविधा में डालना चाहते हैं, आप तो गोजए के पूर्व संरक्षक और प्रेस क्लब गोरखपुर के संस्थापक सदस्य रहे हैं, आप इन अधिकारों के तहत हमसे ही संम्पर्क कर सकतें हैं, हम आप का पूर्ण सम्मान करते हुए आप को बता देंगे कि कौन-कौन से पत्रकार जो आपके मेंबर हैं, हमारे यहां भी सम्मानित सदस्य है। मेरा दावा है कि लिस्ट देखकर आप किसी एक को भी छू नहीं पायेंगे। वैसे हम आपको बतादेना चाहते हैं, कि लगभग सौ पत्रकार ऐसे हैं जो दोनों जगह मेंबर हैं, जिनकी गुरुता, गंभीरता और वरिष्‍ठता के सामने आपका यह प्रस्ताव नितान्त बौना है, हिम्मत हो तो उन्हें निकाल कर दिखायें। गोजए अपने सम्मानित सदस्यों सहित समस्त पत्रकारों के हित संरक्षण को कटिबद्ध थी, है और रहेगी। असफलता की खीझ मिटाने के लिये आप अपना ही चेहरा लहुलुहान कर रहे हैं, यह देख कर दुख और अफसोस दोनों हो रहा है।

अन्त में हम आप को पुनः यह स्मरण दिलाते हुए कि हम सगर्व गोजए के सदस्य/अध्यक्ष हैं, और प्रेस क्लब गोरखपुर के सदस्य/संरक्षक हैं, साथ ही आपकी संस्था के आजीवन सदस्य भी हैं, आप हमारे संबंध में अपने प्रस्ताव के आधार पर अविलंम्ब कार्रवाई कर हमें सूचित करने की कृपा करें, जिससे हम एक पत्रकार के रूप अपने अधिकारों के लिये जो भी अग्रिम वैधानिक कार्रवाई हो उसे कर सकें।

धन्यवाद।

भवदीय

(रत्नाकर सिंह)

Comments on “गोरखपुर में पत्रकार संगठनों में छिड़ी जंग, पत्रकार आमने-सामने

  • Sageer khaksar says:

    Gkp mein patrakron ke varchaswa ki ladai patrkarita uchchmandandon ke khilaf hai.kuchh varisht aur adarshwadi patrkaron ko aage akar mamle ko suljhana chahiye.sageer khaksar/freelancer journalist.siddharth nagar.u.p.9838922122.

    Reply
  • MANISH KUMAR PANDEY says:

    गोरखपुर में जो ये जंग आज हमें देखने को मिल रही है वो आज की नहीं वरन काफी पुरानी है
    जो लगभग गोरखपुर के सभी पत्रकार जानते है हा पर आज ये हो रहा है उससे ये जाहिर हो रहा
    है की आज ये अपने चरम पर पहुच गयी है | पत्रकारों के बीच आम मतभेद तो जायज है और ये
    काफी समय से चला आ रहा है , पर शीर्ष के लोगो के आपसी मतभेद की वजह से पुरे एक समूह
    या संगठन पर ऊँगली उठाना ठीक नहीं है | रत्नाकर सिंह को मै अच्छी तरह से तो नहीं पर थोडा
    बहुत जनता हूँ .| ये बात अलग है की वो मुझे नहीं जानते क्योकि जब से मै उनको जनता हूँ मै
    पत्रकार नहीं था .. पर मुझे इस क्षेत्र में आने की प्रेरणा जरुर उनसे मिली | मेरी गिनती तब बच्चो
    में हुआ करती थी मै तब से देख रहा हूँ वो हमेसा पत्रकारों के लिए हमेसा लड़ते रहते थे | वैसे कई
    सालो से मैंने उन्हें देखा भी नहीं है, पर आज उनके द्वारा भेजे गए प्रेस क्लब के पत्र को देखकर
    आज फिर उनकी याद ताज़ी हो गयी | उनका जवाब वाकई सही है उन अवसरवादी लोगो के लिए जो
    कोई भी अवसर मिलने पर उसका दुरूपयोग करने से नहीं चुकते और अगर वाकई गोरखपुर प्रेस क्लब
    कोई ऐसा प्रस्ताव लेन को सोच रहा है तो उसे अपने कदम वापस ले ले लेने चाहिए क्योकि कोई भी ये नहीं
    चाहेगा की वास्तव में मीडिया का ये रूप सार्वजानिक हो और इसका कोई मजाक बने ……………..

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  • madan kumar tiwary says:

    चपंदुस हिंदी के पत्रकार । छोटी-छोटी बात पर स्वार्थ की रोटी सेकने वाले , जिवन गुजर गया कुता पच्चीसी करते हुये , इन्ही हरकतो के कारण तुमलोगों की यह हालत है । लडो-बचो लडो, लडते -लडते इतिहास बन जाओ .

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  • naveen lal suri says:

    maksad chunav jeetna or phir bhul jana gkp ke patrkaro ki fidfath hai kyoki unki dukan mkt mai saji rahe……..jung tho honi hi hai…….

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